Thursday, 14 January 2021

मंदिर ध्वस्त के आरोप, राजपूतानी जौहर, पाक हिन्दू संख्या।




आज मुगल इतिहास के एक महत्वपूर्ण शासक "औरंगज़ेब आलमगीर" की जन्मतिथी है, (3 या 4 नवम्बर 1618 ईसवी) .... मुग़ल शासक औरंगजेब को अंग्रेज इतिहासकारों ने बहुत ज़्यादा क्रूर, हिन्दू द्वेषी और मंदिरों को तोड़ने वाला बताया है.... लेकिन जब औरंगज़ेब के समय के अभिलेखों का अध्ययन किया जाता है तो कहानी कुछ और ही नज़र आती है इस विषय में पहले बहुत सी पोस्ट्स में मैं आपको बताता रहा हूँ.... संगीत के विषय में औरंगजेब के क्या रवैया था, ये बताना रह गया था... चलिए वो भी किसी दिन बताऊंगा पर आज शबनम शुक्ला जी की पोस्ट के कुछ अंश शेयर कर रहा हूँ... पढ़ियेगा
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...... "इतिहासकार ईटन के मुताबिक औरंगजेब के शासन में जिन मन्दिरों के तोड़े जाने का उल्लेख मिलता है तो वास्तविकता ये है कि केवल वही मंदिर तोड़े गए जिनमें विद्रोहियों को शरण मिलती थी या जिनकी मदद से बादशाह के खिलाफ़ साजिश रची जाती थी।उस समय मंदिर तोड़ने का कोई धार्मिक उद्देश्य नहीं था। उसके शासनकाल में मंदिर ढहाने के उदाहरण बहुत ही दुर्लभ हैं (ईटन इनकी संख्या 15 बताते हैं) और जो हैं उनकी जड़ में राजनीतिक कारण ही रहे हैं। उदाहरण के लिए औरंगजेब ने दक्षिण भारत में कभी-भी मंदिरों को निशाना नहीं बनाया जबकि उसके शासनकाल में ज्यादातर सेना यहीं तैनात थी।
उत्तर भारत में उसने जरूर कुछ मंदिरों पर हमले किए जैसे मथुरा का केशव राय मंदिर लेकिन इसका कारण धार्मिक नहीं था। मथुरा के जाटों ने सल्तनत के खिलाफ़ विद्रोह किया था (मन्दिर का उपयोग विद्रोही छिपने के लिए कर रहे थे) इसलिए यह हमला किया गया।
ठीक इसके उलट कारणों से औरंगजेब ने मंदिरों को संरक्षण भी दिया। यह उसकी उन हिंदुओं को भेंट थी जो बादशाह के वफादार थे। किंग्स कॉलेज, लंदन की इतिहासकार कैथरीन बटलर तो यहां तक कहती हैं कि औरंगजेब ने जितने मंदिर तोड़े, उससे ज्यादा बनवाए थे. कैथरीन फ्रैंक, एम अथर अली और जलालुद्दीन जैसे विद्वान इस तरफ भी इशारा करते हैं कि औरंगजेब ने कई हिंदू मंदिरों को अनुदान दिया था जिनमें बनारस का जंगम बाड़ी मठ, चित्रकूट का बालाजी मंदिर, इलाहाबाद का सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर और गुवाहाटी का उमानंद मंदिर सबसे जाने-पहचाने नाम हैं।
इसी से जुड़ी एक दिलचस्प बात है कि मंदिरों की तोड़फोड़ भारतीय इतिहास में सिर्फ मुगलकाल तक सीमित नहीं है। 1791 में मराठा सेना ने श्रृंगेरी मठ पर हमला कर शंकराचार्य मंदिर में तोड़फोड़ की थी क्योंकि इसे उसके दुश्मन टीपू सुल्तान का संरक्षण हासिल था।
.... औरंगजे़ब की सेना में वरिष्ठ पदों पर बड़ी संख्या में राजपूत नियुक्त थे।मराठा और सिखों के खिलाफ औरंगजे़ब के हमले को धार्मिक चश्मे से देखा जाता है लेकिन यह निष्कर्ष निकालते वक्त इस बात की उपेक्षा कर दी जाती है कि तब युद्ध क्षेत्र में मुगल सेना की कमान अक्सर राजपूत सेनापति के हाथ में होती थी।उसके सेनापति और खजांची हिन्दू थे।
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.... औरंगज़ेब नृत्य-संगीत के विरोध में भी नहीं था, लेकिन इसमें लिप्त हो कर काम- काज में लापरवाही एकदम नापसंद करता था, इसलिए अंकुश रखता था
.... औरंगजेब को कट्टरपंथी साबित करने की कोशिश में एक बड़ा तर्क यह भी दिया जाता है कि उसने संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन यह बात भी सही नहीं है। कैथरीन बताती हैं कि सल्तनत में तो क्या संगीत पर उसके दरबार में भी प्रतिबंध नहीं था। बादशाह ने जिस दिन राजगद्दी संभाली थी, हर साल उस दिन उत्सव में खूब नाच-गाना होता था। कुछ ध्रुपदों की रचना में औरंगजे़ब नाम शामिल है जो बताता है कि उसके शासनकाल में संगीत को संरक्षण हासिल था। कुछ ऐतिहासिक तथ्य इस बात की तरफ भी इशारा करते हैं कि वह खुद संगीत का अच्छा जानकार था। “मिरात-ए-आलम” में बख्तावर खान ने लिखा है कि बादशाह को संगीत विशारदों जैसा ज्ञान था। मुगल विद्वान फ़क़ीरुल्लाह ने “राग दर्पण” नाम के दस्तावेज में औरंगजे़ब के पसंदीदा गायकों और वादकों के नाम दर्ज किए हैं। औरंगजे़ब को अपने बेटों में आज़म शाह बहुत प्रिय था और इतिहास बताता है कि शाह अपने पिता के जीवनकाल में ही निपुण संगीतकार बन चुका था। बादशाह के बेटे आज़म शाह की ब्रज कविता में खासी दिलचस्पी थी। ब्रज साहित्य के कुछ बड़े नामों जैसे महाकवि देव को उसने संरक्षण दिया था। 
एक बड़े कवि वृंद तो औरंगजे़ब के प्रशासन में भी नियुक्त थे।"

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तीन साल पहले आज के दिन, यानि 26 नवम्बर, 2017 को ये पोस्ट संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पद्मावत के लेकर चल रहे विवाद के समय लिखी थी, आज फिर हवाई किस्सों की बजाय इतिहास के तथ्य देखे जाएं.....
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.... "भारतीय क्षेत्र में शासक की हार पर जौहर एक अतिप्राचीन प्रथा थी जिसमे जब भारत के किसी राजा की किसी युद्ध में हार हो जाती थी तो उसके रनिवास की रानियां आत्महत्या कर लिया करती थीं.... सम्भवतः ये प्रथा सती प्रथा का ही वैविध्य थी... कुछ लोग जौहर के लिये मुस्लिम आक्रमणकारियों की कुदृष्टि को दोष देते हैं... लेकिन इतिहास में तो जौहर प्रथा की जड़ें ईसा से भी 300 वर्ष पहले से मिलती हैं
सिकंदर के समय में भी ये प्रथा थी जिसका ज़िक्र एरियन ने दूसरी शताब्दी ईस्वी में किया है कि जब सिकंदर की सेना ने उत्तर पश्चिम भारत के "अगलासोई" जाति की सेना को परास्त कर दिया तो ये सुनकर इस जाति की पूरी बस्ती के स्त्री पुरुषों ने बच्चों सहित आत्मदाह कर लिया था... 
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.... ये प्रथा अपने साथ खुद एक किस्म की क्रूरता और जल्दबाज़ी ही कही जाएगी, क्योंकि हर आक्रमणकारी आपकी अस्मिता पर ही आक्रमण करने आया हो ऐसा नही होता था... सिकंदर ने जिन भारतीय क्षेत्रों पर हमला किया वहां जनसंहार या स्त्रियों के अपहरण नही किए उसका उद्देश्य केवल राज्य विस्तार था.... इसी तरह अकबर जो हिन्दू रीती रिवाजों को प्रश्रय देने के लिये प्रसिद्ध है, उस अकबर का भी उद्देश्य राज्य विस्तार ही होता था, परंतु जब अकबर की सेना ने चित्तौड़ विजय किया तो अबुल फजल ने उस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि चित्तौड़ के पुरुषों ने अपनी स्त्रियों को आग में झोंक दिया और फिर खुद आत्महत्या कर ली....
... इससे पूर्व अलाउद्दीन खिलजी द्वारा जीते गए कुछ क्षेत्रों की रानियों (पद्मावती नही) द्वारा भी जौहर का उल्लेख है, पर अलाउद्दीन का उद्देश्य भी रानियों के शील भंग की बजाये राज्य विस्तार था... जीते हुए क्षेत्रों के शासकों के साथ अलाउद्दीन खिलजी का व्यवहार देखना हो तो हमे देवगिरि के शासक रामचंद्र देव के साथ खिलजी का व्यवहार देखना चाहिये... जब परास्त हुए रामचन्द्र देव को अलाउद्दीन खिलजी के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो खिलजी ने उसके साथ उदारता का व्यवहार करते हुए ‘राय रायान’ की उपाधि प्रदान की। उसे सुल्तान ने गुजरात की नवसारी जागीर एवं एक लाख स्वर्ण टके देकर वापस भेज दिया, इस तरह राजा रामचन्द्र देव और अलाउद्दीन का में मित्रता का संबंध बन गया था....!!!"

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हमारे कुछ भाइयों को लगातार गोदी मीडिया के द्वारा ये गलत आँकड़े बताए गये हैं कि पश्चिमी पाकिस्तान यानी आज के पाकिस्तान में 1947 में हिंदुओं का प्रतिशत करीब 23% था जो आज महज़ 2% के आसपास रह गया है, वहीं पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में 1947 में हिन्दू करीब 22% थे जो आज 7% से कुछ कम हो चुके हैं।.... ये आबादी की गिरावट दोनों ओर के पाकिस्तान में गैरमुस्लिमों के धार्मिक उत्पीड़न के कारण हुई है...और आंकड़ों के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ बहुत बुरा व्यवहार होता है क्योंकि वहां अल्पसंख्यक आबादी में भयंकर गिरावट आई है.... हमारे कुछ भाई जब तब ये आपत्ति उठाते रहते हैं, सो इस आपत्ति का उत्तर देना मैने ज़रूरी समझा है !!
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.... सही बात ये है कि ये आंकड़े काफी गलत हैं, कुछ ऐसे ही आंकड़े पिछले साल संसद में सीएए के पक्ष में माहौल बनाने के लिए अमित शाह जी भी दे रहे थे कि "1947 में पाकिस्तान में 23% अल्पसंख्यक थे और आज वहां अल्पसंख्यक मात्र 3.7% रह गए, ... बाक़ी लोग कहां गए ? या तो उन्हें मार दिया गया होगा, या उनका धर्मपरिवर्तन कर दिया गया होगा"
.... अमित शाह जी के इस व्यक्तव्य के बाद न्यूज़ एजेंसी इंडिया टुडे ने इन आंकड़ों की सच्चाई पता लगाने के बाद एक रिपोर्ट पब्लिश की थी, जहां पाया गया कि अमित शाह जी के ये आंकड़े सरासर झूठे थे....
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.... इंडिया टुडे की रिपोर्ट मे पता लगा था कि 1947 में पाकिस्तान के गठन के समय ऐसे कोई धर्म आधारित जनसंख्या के आंकड़े प्रस्तुत ही नहीं किये गए थे जो 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या पर अमित शाह जी कोई सही दावा प्रस्तुत कर सकें.... सबसे पहले 1951 में पाकिस्तान के गठन के बाद जनगणना के 
आंकड़े प्रस्तुत किये गए, जिसके आधार पर हिंदुओं की जनसंख्या पश्चिमी और पूर्वी दोनों ओर के पाकिस्तान को मिलाकर कुल आबादी की 14.20% थी, न कि अमित शाह जी के दावे के अनुसार 23%
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..... 1951 में आज के पाकिस्तान और तब के पश्चिमी पाकिस्तान में गैरमुस्लिम आबादी का प्रतिशत 3.44% था, और वहां हमेशा गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 3% के आसपास ही बना रहा है बल्कि बाद के वर्षों में ये प्रतिशत बढ़ा है .... 1961 के आंकड़ों में ज़रूर पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी में गिरावट रिकॉर्ड की गई थी तब वहां ये प्रतिशत घटकर 2.83% हो गया था, इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक ये भी हो सकता है कि इनमें से कई अल्पसंख्यक, गैरमुस्लिम जनसंख्या के अधिक घनत्व वाले क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में चले गए हों, 
बहरहाल 1972 में पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक आबादी का प्रतिशत बढ़कर 3.25%, ... फिर 1981 में बढ़कर 3.33% और 1998 में बढ़कर 3.70% हो गया था... यानी पश्चिमी पाकिस्तान में उत्तरोत्तर अल्पसंख्यकों की आबादी के प्रतिशत में बढ़ोतरी ही हुई है, न कि भाजपा के दावे के मुताबिक कमी....!!!
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... 1951 में आज के बांग्लादेश में हिंदुओं की अधिक आबादी थी, लगभग 23.20% गैरमुस्लिम वहां 1951 में थे, 1972 में बांग्लादेश के गठन के समय वहां गैरमुस्लिमों की आबादी 22% थी.... बांग्लादेश में ज़रूर उत्तरोत्तर गैरमुस्लिमों की आबादी के प्रतिशत में गिरावट आई है और आज के समय मे बांग्लादेश में गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 9% के पास है.... लेकिन यहां गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत घटने का कारण धार्मिक उत्पीड़न नही है, बल्कि बांग्लादेश के गठन के पहले वहां से आने वाले शरणार्थियों के लिए भारतीय सीमा के दरवाज़े खुले रखना और बांग्लादेश के गठन के बाद में मित्र देश होने के नाते  उसकी सीमाओं पर निगरानी न रखने के कारण वहां से लगातार गैरमुस्लिमों का भारत आते रहना कारण है....
... बांग्लादेश अपने गठन से लेकर आज तक मित्र देश है, वहां से कई हिन्दू यहां हिन्दू बहुल देश मे उनके विकास के ज़्यादा मौके होने के लालच में घुसपैठ करते आये हैं, जो असम में रहते हैं और एनआरसी का मुद्दा इन्ही घुसपैठियों की वजह से असम में ये समझकर उभरा था कि बांग्लादेश से शायद मुस्लिम आ गए हैं 
.... बांग्लादेश के गठन से लेकर आज तक वहां की अल्पसंख्यक आबादी के प्रतिशत में जितनी गिरावट हुई है, ये जनसंख्या क़रीब 2 करोड़ के आसपास बैठती है, .... क्या वाकई इतनी बड़ी संख्या में भारत में बांग्लादेशियों ने घुसपैठ की होगी ?? 2016 के आखिरी में संसद में एक प्रश्न का जवाब देते हुये गृहराज्य मंत्री किरन रिजिजू ने बताया था कि उस वक्त भारत में करीब 2 करोड़ गैरकानूनी बांग्लादेशी प्रवासी है. किरण रिजिजू के बताये आंकड़ों से करीब एक दशक पहले 14 जुलाई, 2004 को संसद में गैर कानूनी बांग्लादेशी घुसपैठियों के बारे में संसद में बोलते हुये तत्कालीन गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने कहा था कि देशभर में अलग-अलग हिस्सों में करीब 1.2 करोड़ घुसपैठिए रह रहे हैं. जिसमें से 50 लाख लोग केवल असम में रह रहे हैं.
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.... ख़ैर, ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अमित शाह जी ने संसद में बांग्लादेश के आंकड़ों को भूलवश पाकिस्तान के आंकड़े समझ लिया होगा क्योंकि उन्होंने अपने उसी व्यक्तव्य में अलग से बांग्लादेश के आंकड़ों का भी ज़िक्र किया था और 1947 में बांग्लादेश में गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 22% और वर्ष 2011 में 7.9% बताया था, जो लगभग लगभग बांग्लादेश के सही आंकड़ों के आसपास है.... इससे स्पष्ट है कि पश्चिमी पाकिस्तान के बारे में बताते हुए अमित शाह जी को सारी वास्तविकता पता थी, पर उन्होंने धर्म आधारित राजनीति के कारण सही आंकड़े बताने की बजाय जनता की भावनाओं को भड़काने वाला बयान दिया था
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https://www.indiatoday.in/india/story/pakistan-bangladesh-non-muslim-population-citizenship-amendment-bill-bjp-1627678-2019-12-12?



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