Thursday, 14 January 2021

गैर मुसलमानों को सलाम और दुवा।

... हमारे मुआशरे में ये एक गलतफहमी फैल गई है कि मुसलमानों को गैरमुस्लिमों से सलाम नही करना चाहिए, इसकी बुनियाद में दो हदीसें पेश की जाती हैं, लेकिन उनको देखने से पहले हमको ये देखना चाहिए कि क़ुरआन इस बारे में क्या हुक़्म दे रहा है ?
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... क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है "और जब कोई शख्स सलाम करे तो तुम भी उसके जवाब में उससे बेहतर तरीक़े से सलाम करो या वही लफ्ज़ जवाब में कह दो बेशक ख़ुदा हर चीज़ का हिसाब करने वाला है....(सूरह निसा, आयत 86) इस आयत में ये नहीं कहा गया कि सिर्फ मुस्लिम के सलाम का जवाब दो, बल्कि इस हुक़्म में पूरी मानवजाति आ जाती है, जिनको हमें सलाम का जवाब बेहतर अल्फ़ाज़ में देना है..

क़ुरआन में कहीं भी गैरमुस्लिमों को सलाम करने पर रोक नही लगाई गई है, बल्कि क़ुरआन की कुछ आयतें तो ये साफ़ ज़ाहिर कर देती हैं कि आम अच्छी आदत के गैरमुस्लिमों की बात तो पीछे रही, इससे आगे बढ़कर जो लोग काफ़िर भी हों, मुस्लिमों से झगड़ने वाले भी हों, उन्हें भी मुस्लिमों को सलाम कह देना चाहिए .."और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ, तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) को नहीं चाहते...(सूरह कसस, आयत 55).
.... "और रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर विनम्रता के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे भिड़ जाते हैं, तो कहते हैं कि तुम को सलाम"....(सूरह फुरकान, आयत 63)
... इसी तरह सूरह मरियम (19:47) में हज़रत इब्राहीम द्वारा अपने गैरमुस्लिम पिता को सलाम कर के घर छोड़ने की आयत से पता चलता है कि अम्बिया गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे !!
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.... क़ुरआन में गैरमुस्लिमों को सलाम करने की दलील देने वाली इन आयतों के बाद अब उन हदीसों की बात कर ली जाए...
.... एक तो ये हदीस है कि यहूद और नसारा को सलाम में पहल न करो, (यानी वो सलाम करें तब जवाब दो) वो मदीना के एक ख़ास ग्रुप के लिए थीं जो मुसलमानों के खुले दुश्मन थे, और मुसलमानों के साथ बुरा सुलूक करते थे, तो ये बात उस छोटे से ग्रुप के लिए थी, न कि रहती दुनिया तक के यहूद और नसारा के लिये... और अगर यहूद और नसारा पर अप्लाई भी कर दें तो दूसरी गैरमुस्लिम कम्युनिटीज़.. हिन्दू, सिखों बौद्धों पर तो नही कर सकते.. 
... इसी तरह दूसरी हदीस यानी गैरमुस्लिम को सलाम के अधूरे जवाब वाली हदीस भी एक यहूदी की शरारत पर बेस्ड थी, उसने नबी सल्ल० से आकर कहा "साम अलैकुम" जिसका मतलब 'तुमपर मौत हो', इसके जवाब में नबी सल्ल० ने केवल इतना कहा "व अलैकुम" यानी "तुम पर भी" Same to you.... यहूदी लज्जित होकर चला गया.... यहां ध्यान दीजिये नबी सल्ल० पूरे पूरे वही अल्फ़ाज़ लौटा सकते थे कि "व अलैकुम साम" यानी "तुम पर भी मौत हो" .... लेकिन नबी सल्ल० ने जो लफ़्ज़ नही नही लौटाए, उनका मतलब बुरा था, यानी नबी सल्ल० ने बुराई करने वाले यहूदी के लिये भी बुरा लफ़्ज़ नही बोला.... इस हदीस से ये मतलब नही निकलता कि अच्छी नीयत से सलाम करने वाले गैरमुस्लिम को जवाब देते वक्त हम दुआ के अल्फ़ाज़ रोक लें, बल्कि उस हदीस में तो नबी सल्ल० ने बद्दुआ के अल्फ़ाज़ रोके थे... और ज़ाहिर है जब कोई गैरमुस्लिम हमको सलाम करेगा तो अधूरे जवाब "व अलैकुम" का मतलब भी व अलैकुम अस्सलाम ही होगा !!
.... सही बात ये है कि साफ़ दिल के गैरमुस्लिमों को सलाम करने और उनके सलाम का पूरा जवाब देने से रोकने वाली बात कोई हदीस भी नहीं करती, और प्यारे नबी नबी सल्ल० अपनी अमली ज़िन्दगी में गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे, इस बात का पता हमें चलता है, जब हम नबी सल्ल० का बहरीन के हाकिम "मुन्ज़िर इब्न सवा अल तमीमी" को इस्लाम की दावत देने के लिए लिखे गए ख़त का मज़मून पढ़ते हैं, जिसमें आप सल्ल० ने मुन्ज़िर को "सलाम अलैक" के अल्फ़ाज़ लिखे हैं, जबकि अभी मुन्ज़िर मुस्लिम नही बने थे, ये मज़मून आपको सीरत की किसी भी अच्छी किताब में मिल जाएगा और इंटरनेट पर भी नबी सल्ल० के इस खत का मज़मून मौजूद है, .... किस्सा तमाम ये कि क़ुरआन और सुन्नत बताते हैं कि आप गैरमुस्लिमों से सलाम करें, .... ये उनके हक में एक अच्छी दुआ है, और ज़िंदा इंसानों के हक में भलाई की दुआ करने से इस्लाम कहीं नही रोकता !!

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गैरमुस्लिमों को सलाम" कल की पोस्ट में अलग अलग दो जगहों पर इतना और अपडेट किया है-
... "प्यारे नबी सल्ल० अपनी अमली ज़िन्दगी में गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे, इस बात का पता हमें चलता है, जब हम नबी सल्ल० का बहरीन के हाकिम "मुन्ज़िर इब्न सवा अल तमीमी" को इस्लाम की दावत देने के लिए लिखे गए ख़त का मज़मून पढ़ते हैं, जिसमें आप सल्ल० ने मुन्ज़िर को "सलाम अलैक" के अल्फ़ाज़ लिखे हैं, जबकि अभी मुन्ज़िर मुस्लिम नही बने थे, ये मज़मून आपको सीरत की किसी भी अच्छी किताब में मिल जाएगा और इंटरनेट पर भी नबी सल्ल० के इस खत का मज़मून मौजूद है, .... इसी तरह सूरह मरियम (19:47) में हज़रत इब्राहीम द्वारा अपने गैरमुस्लिम पिता को सलाम कर के घर छोड़ने की आयत से पता चलता है कि अम्बिया गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे !!"

इसी तरह हब्शा के ईसाई हाकिम नजाशी को लिखे ख़त में भी आप सल्ल० ने "सलाम अलैक" के अल्फ़ाज़ नजाशी को लिखवाए थे।

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