Thursday, 14 January 2021

हुरूफ़ ए मुक़ातात, मिलादुन्नबी, ईसा रिटर्न्स।

क़ुरआन पाक की बाज़ आयतें ऐसी हैं जो कुछ राज़ भरे हर्फ़ से शुरू होती हैं, 
इन हुरूफ़ को अलग अलग पढ़ा जाता है, जैसे "या-सीन", "अलिफ़-लाम-मीम", "ता-हा" वगैरह.... इसीलिए इनको "हुरूफ़ ए मुक़त्तआत" कहा जाता है, अभी तक इन हर्फ़ों का सही मतलब हम नही जान सके हैं....

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 हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के बारे में आमतौर पर उलमा की राय ये है कि ये क़ुरआन में कुछ कोड वर्ड हैं, और  इन हुरूफ़ का मतलब सिवाय अल्लाह के कोई भी नहीं जानता.... इनको क़ुरआन में नाज़िल करने की हिकमत अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते होंगे हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते, लेकिन ये जिस तरह क़ुरआन में नाज़िल हुए थे उसी तरह हमें इन्हें लिखते और पढ़ते रहना चाहिए !!
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.... यहां तक तो ठीक है कि हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते,.... लेकिन कुछ मज़हबी रहनुमाओं को मैंने ये कहते देखा है कि हुरूफ़ ए मुक़त्तआत का मतलब समझने की इंसान को बिल्कुल कोशिश भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये इंसानी इख़्तियार की बात ही नही है...
.... इस हाल में एक सवाल लाज़मी पैदा होता है कि जब अल्लाह क़ुरआन में ये फरमाता है कि क़ुरआन को नस्ले इंसानी की हिदायत के लिए नाज़िल फ़रमाया गया है, तो इसमें ऐसे हुरूफ़ अल्लाह ने क्यों नाज़िल किये जिन हुरूफ़ को समझना इंसानों के बस के बात ही न हो....??? अगर क़ुरआन हिदायत के लिए है तो इसमें न समझ में आने वाले कोड वर्ड का क्या काम ??
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..... इस बारे में मैंने मौलाना इसरार अहमद रह० की एक तक़रीर सुनी थी कि नबी सल्ल० के ज़्यादातर सहाबियों ने भी हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की कोई तशरीह नही निकालने की कोशिश की और तमाम उलमा का इसी बात पर इज्मा है कि हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते लेकिन इन्हें ये सोचकर क़ुरआन में पढ़ते रहें कि हमें नही, पर हो सकता है हमसे आगे आने वाली नस्लों में इन हुरूफ़ के मानी समझने वाले लोग भी हो जाएं, और कुछ नए राज़ खुल जाएं इसलिए इन हुरूफ़ के साथ ही क़ुरआन को नई नस्लों तक पहुँचाया जाता रहना चाहिए, ..... लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन हुरूफ़ की तशरीह करने की सहाबा के ज़माने में किसी ने कोशिश नही की उस वक्त भी अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि० जैसे जलील उल क़दर सहाबी ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के मतलब समझने की कोशिश की, उन्होंने खयाल ज़ाहिर किया कि "अलिफ़ लाम मीम" दरअसल एक पोशीदा आयत है जिसका खुलासा "अनल्लाहो आलमो" है, यानी "मैं अल्लाह, जानने वाला हूं" .... इसमे पहले हर्फ़ अलिफ़ से "अना", दूसरे हर्फ़ लाम को लफ़्ज़ "अल्लाह" के बीच में लिया, और तीसरे लफ़्ज़ मीम को "आलमो" के आख़ीर में...
.... हालांकि इस ख्याल को बाक़ी लोगों ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि० की ज़ाती राय माना, और इस खयाल को ज़्यादा मकबूलियत हासिल न हुई....
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.... बहरहाल नबी के सहाबी ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की तशरीह की कोशिश की, इससे मेरी समझ में एक बात तो ये साफ़ हो जाती है कि आप सल्ल० ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत को लेकर ऐसी कोई मनाही नही की थी कि इन हुरूफ़ का मतलब निकालने की कोई मुसलमान कोशिश न करे...
... चुनांचे बाद के ज़मानों में भी कुछ दानिशवरों ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की तशरीह समझने की कोशिश की, .... जैसे मौलाना हमीद्दुदीन फराही रह० ने ख़्याल ज़ाहिर किया कि ये हुरूफ़ दरअसल जिस सूरत के शुरू में हैं, उस सूरत में बयान की गई किसी ख़ास बात की तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए अल्लाह ने इन हुरूफ़ के ज़रिये इशारा किया है, .... मसलन उन्होंने बताया कि इब्रानी ज़बान में लफ़्ज़े "ता" से इशारा "साँप" की तरफ़ होता है, तो हुरूफ़ ए मुक़त्तआत से शुरू होने वाली सूरह "ता-हा" में हज़रत मूसा अस० की असा के सांप बन जाने का वाकया बयान किया गया है और, सूरह की शुरुआत में लफ़्ज़ "ता" से उसी साँप की तरफ़ इशारा किया गया है, 
.... इसी तरह "नून" अरबी में मछली को कहा जाता है और हर्फ़ "नून" से शुरू होने वाली सूरह "नून वल क़लम" में उस ख़ास वाकये का ज़िक्र है जब हज़रत यूनुस अस० एक तवील अरसे तक के लिए एक मछली के पेट में फंसे रहे थे....!!!
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.... बहरहाल, मेरा ये मानना है कि इस मसले पर अभी कोई आख़री राय क़ायम कर लेना जल्दबाजी होगी, .... जिस तरह हमारे बुज़ुर्गों ने ये सोचा कि हम नही, पर शायद अगली नस्लों में इन हुरूफ़ का राज़ जानने वाले लोग आ जाएं... यही मेरा भी सोचना है..
...... मैंने ये जाना है कि इससे पहले भी क़ुरआन पाक की बहुत सी आयतों के राज़ हमसे पहले के लोग नहीं जान पाए थे, जैसे फ़िरऔन की लाश किस तरह बची है, इस बात को सौ साल से पहले क़ुरआन में पढ़ने वाले लोग नही समझ पाते होंगे, इंसान की पैदाइश लोथड़े या जोंक से किस तरह हुई, इस बात को आज के ज़माने से पहले के मुसलमान क़ुरआन में पढ़ कर किस हद तक समझ पाते होंगे ?? लेकिन वो क़ुरआन को जस का तस आगे बढ़ाते रहे, और तरक़्क़ी ए ज़माना के साथ हम क़ुरआन के इन राज़ों को बेहतर ढंग से समझते गए....
.... तो बेशक हुरूफ़ ए मुक़त्तआत में भी कोई हिदायत ही पोशीदा है, जो शायद बाद के ज़मानों की तरक़्क़ी के साथ इंसानों को समझ में आएगी... 
.... लेकिन बाद के ज़माने के लोगों को इनके पीछे का राज़ भी तभी पता चल सकता है, जब हुरूफ़ ए मुक़त्तआत को समझने की कोशिश करने वालों की मुखालिफत न की जाए... क़ुरआन पाक में अल्लाह बार बार इसकी आयतों पर ग़ौरो फ़िक्र करने की दावत इंसानों को देता है, लिहाज़ा ये सोच पालना कि हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के मतलब ढूंढने वाला शख़्स मज़हब के हिसाब से कोई गुस्ताखाना अमल कर रहा है, ये सोच पालना दुरुस्त नही !!!

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मीलादुन्नबी का जश्न ......!!!
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इस्लामी दुनिया के एक नामवर आलिम शेख़ अब्दुल्लाह बिन बय्यह फ़त्वा देते हैं कि ' जो नबी स० की मव्लिद मनाना चाहता है उसे चाहिए कि इस प्रकार मनाए कि इस्लाम के विरुद्ध कोई अमल इस में ना हो, तब इसके मनाने में कोई बुराई नही' .... जानिये ये फ़त्वा उन्होंने किस बुनियाद पर दिया है.....!!!
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..... नबी (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की पैदाइश का दिन (मव्लिद) मनाना, उलमा में एक विवादास्पद मुद्दा है। इस लिए, कई उलमा ने इस को एक नापसंद बिदअत समझा है, कुछ ने इस के निषेध का हुक्म दिया और कुछ इसे एक पसंदीदा बिदअत समझते हैं।
इस इख्तिलाफ़ की बुनियाद, बिदअत के तसव्वुर और परिभाषा में है, और बिदअत की क़िस्मों की समझ में इख्तिलाफ़ से पैदा होती है। कुछ उलमा ने इस तरह की बिदआत को वैध (जायज़) माना। इस विचार को रखने वाले इमाम शाफई (र) थे और इस विचार के मुख्य आलिम इज़्ज़ुद्दीन अब्दुस सलाम (र) थे। इसके अतिरिक्त, इमाम अल-कराफि (र) जो एक 'मालिकी' आलिम थे, उनका भी यही विचार था। उनहों ने इसे खास तवज्जुह दिया और इसकी विस्तृत व्याख्या भी की। इस व्याख्या में इमाम कराफ़ी (र) ने बिदअत को पाँच तबकों मे विभाजित किया 1) फर्ज़ (अनिवार्य) 2) मुस्तहब (सराहनीय) 3) मुबाह (जायज़/वैध) 4) मकरूह (नापसंद) 5) हराम (अवैध)
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लेकिन कुछ उलमा ने इस विभाजन को कुबूल नहीं किया। उनहों ने हज़रत उमर (रआ) के नमाज़े तरावीह के बारे में कहे शब्द 'बिदअते हसन' (अच्छी बिदअत) को पारिभाषिक अर्थों में न लेते हुए सीमित शाब्दिक अर्थों में स्वीकार किया। इस मत को अपनाने वाले उलमा की बड़ी संख्या है जिन में तकी अद्दीन अहमद इबने तेमियह (र), इमाम शातिबी (र), और मालिकी एवं हमबली मत के कई उलमा काबिले ज़िक्र हैं।
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जिन उलमा ने 'मव्लिद' मनाने के समर्थन में लिखा उन में इमाम जलालुद्दीन सुयूती (र) प्रसिद्ध हैं। इस से मालूम होता है कि इस विषय में दोनों पक्षों ने इसके समर्थन एवं विरोध में लिखा है। इस लिए, मेरे विचार में, इस विषय को लंबा खींचने की ज़रूरत नहीं है और इस पर अनावश्यक बहस नहीं होनी चाहिए।
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निर्णय - फत्वा
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जो भी मव्लिद मनाना चाहता है उसे चाहिए कि इस प्रकार मनाए कि इस्लाम के विरुद्ध कोई अमल इस में ना हो (जैसे शिर्क, फजूल खर्ची, धमाल मचाना आदि)। 'मव्लिद' इस निय्यत से मनाने चाहिए कि यह 'सुन्नत' (अर्थात दीनी हुक्म) नहीं है नाही यह कोई 'फर्ज़' अमल है। यदि यह शर्तें स्वीकार करके, और कोई भी गैर इस्लामी अमल किए बिना इस को मनाया जाता है, नबी (स) से सच्ची मोहब्बत के जज़्बे के अंतर्गत, तब, इनशा अल्लाह, इस में कोई खराबी नहीं है और मनाने वाले को ज़रूर अजर मिलेगा।
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इसी पर टिप्पणी करते हुए, शेख इबने तेमियह (र) ने फरमाया, "बेशक ऐसे व्यक्ति को उसकी निय्यत के कारण अजर मिलेगा"। इसी प्रकार जो इस 'मव्लिद' को  सुन्नत से जुड़े रहने और बिदअत में गिरने के खौफ से नहीं मनाते, ऐसे व्यक्ति भी अजर/इनाम को पाएंगे, इनशा अल्लाह। यह याद रखना ज़रूरी है कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, नाही इसको ज़्यादा एहमियत देने की ज़रूरत है।
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मंहज- तरीक ए कार -कार्यप्रणाली
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इस विषय पर मेरा ध्यान देना मुसलमानों को मुत्तहिद (एकत्र) करने के उद्देश से है। मैं इस विचार को दोनों पक्षों का एक दूसरे को समझने पर आदारित करता हूँ। यह इस कारण कि हमारे कुरआन ने और नबी (स) के फरमान ने मुसलमानों के आपसी इत्तेहाद पर अधिक ज़ोर दिया है। यदि एक विवादास्पद मुद्दा उठता है, हम उस मुद्दे पर अधिक ध्यान देते हैं, दोनों पक्षों का सम्मान रखते हुए। यह ध्यान केवल लोगों को खुश करने के लिए नहीं दिया गया, या फिर कमजोर राय रखने वालों पर आरोप लगाने के लिए। यह सम्मान और इख्तिलाफ़ को बर्दाश्त करने का विचार इस लिए कहा है, कि दोनों पक्ष अपने प्रमाण इस्लामी ग्रन्थों से ही दे रहे हैं। कुछ मामलों में प्रमाण स्पष्ट होते हैं, और कुछ में नहीं। इसी कारण कई उलमा ने इस अमल की वैधता के प्रमाण दिये हैं, और कुछ ने इस के विरोध में। अंत में, मेरा मौकिफ दोनों पक्ष अच्छाई पर हैं, इन शा अल्लाह, जब तक कि इस मव्लिद में बुरे आमाल नहीं मिलाए जाते और लोगों की नियात साफ हो।
वल्लाहु आलम (अल्लाह ही बेहतर जानने वाला है)
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(प्रस्तुत लेख में शेख अब्दुल्लाह बिन बय्यह के शब्द हैं, जिनके मूल अंग्रेजी लेख का अनुवाद मुश्फिक सुल्तान साहब ने किया है, ... शेख अब्दुल्लाह बिन बय्यह इस्लामी गणराज्य मौरितानिया मूल के इस्लामी विद्वान और राजनीतिज्ञ हैं, ये मौरितानिया में शरिया मामलों के विभाग के हेड और मौरितानिया के हाई कोर्ट के जज रहने के साथ साथ यूके, आयरलैंड, लेबनान, भारत, जॉर्डन, कुवैत, सऊदी अरब जैसे कई अन्य देशों में भी इस्लामी ज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दे चुके हैं, विशेषकर मैं ज़िक्र करना चाहूंगा कि शेख़ बिन बय्यह जेद्दा की किंग अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं और, मक्का शरीफ़ में मुस्लिम लीग द्वारा गठित मस्जिदों के इंटरनेशनल हाई काउंसिल के मेम्बर भी रह चुके हैं )

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कुछ लोग ये कहते हैं कि हज़रत ईसा के दोबारा दुनिया में आने का अक़ीदा तमाम मुस्लिम उम्मत का अक़ीदा है, और जो ये अक़ीदा न रखे वो क़ादियानी मज़हब का सपोर्टर है, क्योंकि क़ादियानी ही नुज़ूल ए ईसा सानी का इनकार करते हैं... 
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... ये एक झूठ है कि कभी उम्मत का इज्माई अक़ीदा रहा हज़रत ईसा के नुज़ूल ए सानी पर, पहली बात तो इस मामले की जानकारी अवाम को अक्सर रही ही नही है, ये मामला उलमा तक सीमित रहा है, तो जिस बात की जानकारी चन्द लोगों के सिवा किसी को रही न हो उस बात को "उम्मत का इज्मा" कह देना ही झूठ है... फिर उलमा भी कभी इस पर एक मत नही रहे, ... आज के ज़माने में भी कई अहले हदीस उलमा ने इन रिवायतों के ख़िलाफ़ दलीलें दी हैं .... इसलिए जब कोई ये कहता है कि सिवाय एक शख़्स के, कुल उम्मत का इज्मा इस पर है कि हज़रत ईसा दुनिया में दोबारा उतारे जाएंगे, तो वो शख्स अपने अक़ीदे को दूसरों से मनवाने के लिए उसपर मानसिक दबाव बनाने को ये झूठ बोल रहा होता है....!!!
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हज़रत ईसा आज भी ज़िंदा हैं, वो दुनिया में दोबारा आएंगे ये अक़ीदा असल में ईसाइयों का है, क्योंकि उनके लिए ईसा ख़ुदा के बेटे हैं खुदा के बेटे पर मौत का असर नहीं होने का ख्याल पालना उनके लिए आसान है....
... लेकिन मुस्लिमों ने ये हज़रत ईसा को सब नबियों में बरतरी का दर्जा दिए जाने का अक़ीदा क्या सोचकर पाल लिया ?? जबकि क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है "लानुफर्रिकु बैन अहदिम मिर्रुसुलिही" 
...... मुसलमानों में ये नुज़ूले ईसा सानी का अक़ीदा ईसाइयों के ज़रिए आया है, जबकि क़ुरआन पाक में हज़रत ईसा की सेकेण्ड कमिंग का कहीं ज़िक्र नही है, ...... हां अवाम में मशहूर कहानियों के ज़हन में बसा होने की वजह से कोई कुछ आयतों पर कयास लगा सकता है
.... इस अक़ीदे कि हज़रत ईसा आज तक ज़िंदा हैं, और नबी सल्ल० की वफ़ात हो गई, इसकी बुनियाद पर मुसलमानों को ईसाई बनाने के प्रोग्राम चल भी रहे हैं और कामयाब भी हो रहे हैं, आप यूट्यूब पर भारत के एक मुस्लिम इमाम के ईसाई पादरी बनने की वीडियो देख सकते हैं जिसमें वो कहता है कि मुझे मुसलमान होते हुए भी हज़रत ईसा के ख़ुदा होने का यक़ीन इस बात से आया कि इस्लामी किताबों में लिखा है कि मुहम्मद सल्ल० की तो वफ़ात हो गई लेकिन हज़रत ईसा ज़िंदा हैं और वापस आएंगे... इस गलत अक़ीदे ने उस मुसलमान को ईसाई बना दिया, सोचिये कितना संगीन मामला है ये....!!!!
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..... सूरह निसा की आयत 159 पर कयास लगाकर हज़रत ईसा के आज तक जिंदा होने की बात कही जाती है, कहा जाता है कि उनकी सेकेंड कमिंग में तमाम अहले किताब उन पर ईमान लाएंगे... लेकिन यही लोग ये भी मानते हैं कि सेकेंड कमिंग में हज़रत ईसा नबी की हैसियत से अपने दीन की दावत देने का काम नहीं करेंगे.... तो भला ये कैसे हो सकता है कि जब नबी अल्लाह की किताब सुनाकर लोगों को बुलाये, तो वो ईमान न लाएं, और जब दीन की दावत देने का काम न करें तो तमाम लोग उनपर ईमान ले आएं ?? फिर इसी आयत 159 में है कि इन ईमान लाने वालों पर कयामत के रोज़ ईसा गवाह होंगे, क़यामत के रोज़ लोगों पर गवाह होने का काम उस उम्मत के नबियों का है, तो जब ईसा नबवी हैसियत से नही आएंगे तो इस आयत में कयामत के करीब के यहूदियों की बात कैसे हो सकती है ??
दरअसल वो आयत उन तमाम अहले किताब के बारे में उतरी है जिनको हज़रत ईसा ने बतौरे नबी दीन की दावत दी थी और शुरू में उन्होंने ठुकरा दी थी, लेकिन नबी को ग़लबा देने का अल्लाह का कानून है इसलिये ईसा अलैहिस्सलाम को देखने और सुनने वाले इन अहले क़िताब को अपनी ज़िंदगी में हज़रत ईसा पर ईमान लाना ही पड़ा.... कुरआन 4:159 में किसकी मौत का ज़िक्र है, हज़रत ईसा की, या उन अहले किताब की, ये भी सोच का विषय है, फिर भी हज़रत ईसा की ही मौत समझें, तो जिस वक्त अल्लाह ने ईसा को सलीब से बचाया उस वक्त रोमन मन्दिर का पर्दा फटने और मौसम में अचानक डरा देने वाली तब्दीलियों का ईसाइयों के यहां ज़िक्र किया जाता है, फिर इसके बाद कई दिनों तक हज़रत ईसा को ज़िंदा और भला चंगा देखे जाने का भी बाइबल में ज़िक्र है, ऐसी निशानियां देखकर उन तमाम अहले किताब को हज़रत ईसा की हक्कानियत पर यकीन आ जाना ऐन मुमकिन है !!!
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.... ख़ैर, दीन के तमाम अहम मामलात के बारे में अल्लाह ने फरमाया है कि उसने क़ुरआन में कुछ भी लिखने से नही छोड़ा (अल अनआम 6:38), तो फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि दीन के मामले में इतनी अहम और ज़रूरी बात नुजूले ईसा सानी का क़ुरआन में रत्ती भर भी ज़िक्र न किया जाए...??
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..... मसीह अलैहिस्सलाम की सेकेण्ड कमिंग का ज़िक्र होने का सबसे बेहतर मौका जब क़ुरआन 5:116-118 में आया था तो वहाँ ख़ुद हज़रत ईसा एक बार दुनिया से उठाये के बाद दुनिया के हालात से नावाकफियत का इज़हार करते हुए अल्लाह से अर्ज़ करते हैं कि जब तक मैं दुनिया वालों के बीच रहा, उन्हें देखता रहा, फिर जब तूने मुझे उनके बीच से उठा लिया उसके बाद, ऐ रब तू ही उनकी निगरानी करता था और उनका गवाह है.... यानि उठा लिए जाने के बाद ईसा अलैहिस्सलाम दुनिया वालों के हालात से ख़बरदार नही थे
.... ये ध्यान रखिये कि ये कयामत के दिन ईसा अलैहिस्सलाम और अल्लाह के बीच के मुकालमे का ज़िक्र है जबकि अल्लाह की तमाम निशानियां और आज़माइशें पूरी हो चुकी हैं, और अगर ईसा अलैहिस्सलाम को दो बार दुनिया में आना था तो वो बात भी पूरी हो चुकी है, तो फिर इस मौके पर हज़रत ईसा ने ये क्यों नहीं फ़रमाया कि ऐ अल्लाह, तूने मुझे दो बार दुनिया में भेजा, और मैंने लोगों को दोनों बार नसीहतें कीं...
....ये बात सौ फीसदी सच है कि क़ुरआन की आयतों में किसी तरह की कमी ढूंढे नही मिलती, ऐसे में यहाँ हज़रत ईसा के दोबारा नुज़ूल का ज़िक्र न होना, एक बड़ी बात है जिसपर लोग गौर नही करते
.... इसी तरह सूरह आले इमरान की 55वीं आयत है, जहां अल्लाह ने हज़रत ईसा को उन्हें सूली पर चढ़ाने की साज़िश करने वालों की शरारत से बचाकर अपने पास उठाने का ज़िक्र किया है वहां अल्लाह ने हज़रत ईसा के लिए लफ्ज़ "मुत'वफ्फिका" यानि वफ़ात देने का लफ्ज़ इस्तेमाल किया है, कि "हम तुझे वफ़ात देंगे, और अपनी तरफ़ बुला लेंगे" ... इस लफ्ज़ का रूट "व-फ़-य" है, और क़ुरआनी लुग़त में इसका मतलब किसी चीज़ को मुकम्मल करने से है, या किसी को मौत आने से है... बस..!! 
यानी आयत में अल्लाह ने हज़रत ईसा की दुनियावी ज़िन्दगी और उस ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारियों को मुकम्मल करने का ऐलान किया है, इसी तरह सूरह मायदा की आयत 117 में भी हज़रत ईसा यही फ़रमाते हैं, कि (तवफ्फयतनी) अल्लाह ने मुझे "वफ़ात" दी,

क़ुरआन पाक में बार बार मौत के लिये वफ़ात लफ्ज़ का इस्तेमाल किया गया है, फिर भी आप नही मानते कि हज़रत ईसा को मौत दे दी गई है ?? दूसरा मतलब यानि किसी बात को मुकम्मल करने का मतलब भी लें, तो अल्लाह ने नबी ईसा की दुनियावी ज़िन्दगी और उनकी ज़िम्मेदारियों को मुकम्मल कर दिया, यही बात निकलती है, इसमें भी उनके दोबारा आने की सूरत नही बचती ..

वहीं क़ुरान पाक में अल्लाह गाहे गाहे इस बात की तरफ भी तवज्जोह दिलाता है, कि मसीह अलैहिस्सलाम को बाकी नबियों पर कोई बरतरी नही दी गई है, सूरह माएदा की 75वीं आयत में लिखा है : "मरयम का बेटा मसीह एक रसूल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। उससे पहले भी बहुत-से रसूल गुज़र चुके हैं। उसकी माँ अत्यन्त सत्यवती थी। दोनों ही भोजन करते थे। देखो, हम किस प्रकार उनके सामने निशानियाँ स्पष्ट करते है; फिर देखो, ये किस प्रकार उलटे फिरे जा रहे हैं" .... 
इसी तरह सूरह अम्बिया की सात, आठ और नौ नम्बर की आयतों को पढ़िए, अल्लाह ने नबी सल्ल० से फ़रमाया है कि "आप सल्ल० से पहले भी हमने आदमियों ही को रसूल बनाकर भेजा, उनको हमने कोई ऐसा जिस्म नहीं दिया था कि वो खाना न खाते हों और न वो हमेशा रहने वाले ही थे, फिर हमने उनके साथ वादे को सच्चा कर दिखाया और उन्हें हमने छुटकारा दिया"
..... इन आयतों में हज़रत ईसा समेत नबी सल्ल० से पहले के तमाम नबियों का ज़िक्र "गुज़रे हुए इंसानो' के तौर पर अल्लाह ने किया है, यहाँ ये तो नही फ़रमाया कि बाक़ी नबी तो हमेशा रहने वाले नहीं थे, और गुज़र चुके अलबत्ता ईसा अभी हयात हैं ...
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... इन आयतों को पढ़ने समझने के बाद ये मानना कि हज़रत ईसा अभी तक अपने जिस्म के साथ हयात हैं, और दोबारा उसी जिस्म के साथ आसमान से उतार के दुनिया में भेजे जाएंगे, सही साबित नही होता,
...... हज़रत ईसा का नुज़ूल ए सानी क़ुरान शरीफ में नही बयान किया गया, बल्कि नबी सल्ल० के ज़माने के 150 साल बाद मदीना शरीफ के लोगों से अहादीस ले लेकर लिखी गई हदीस की पहली किताब "मालिक मुवत्ता" में भी कहीं नही लिखा गया कि हज़रत ईसा का दोबारा इस दुनिया में नुज़ूल होगा जबकि किसी बड़े नबी का दोबारा ज़िंदा हो जाना मज़हब की एक बहुत बड़ी बात है, फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि इमाम मालिक रह० छोटी छोटी बातों का ज़िक्र तो करें, और मज़हब की इतनी बड़ी बात उनके सुनने में ही न आये ??
आप सल्ल० के अहादीस बयान करने के ढाई सौ साल बाद हज़रत ईसा के नुज़ूल ए सानी की पेशीनगोइयों को किताबों में पहली बार लिखा जाने लगा..... तब तक ये बातें सिर्फ ज़बानी ज़िक्र के ज़रिये आगे बढ़ीं... और इतने अर्से में इन बातों का अपनी असली शक्ल से बदल जाना कोई गैरमुमकिन बात नही
...बल्कि ये ज़िक्र अपनी असली शक्ल से वाकई बदला है ये बात मुवत्ता इमाम मालिक में नबी सल्ल० की एक रिवायत पढ़कर साफ़ पता चलती है ... मुवत्ता इमाम मालिक की किताब 49, हदीस नम्बर 49.2.2 पर एक हदीस है, अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि० रिवायत करते हैं कि नबी सल्ल० ने फरमाया "रात मैंने एक ख्वाब देखा कि मैं काबा शरीफ में हूँ, वहां मैंने एक काले रंग के शख्स को देखा, जो इतने ज़्यादा खूबसूरत थे जितना ज्यादा खूबसूरत मर्द तुमने कभी काले लोगों में देखा हो, .. उनके बाल उनके कानों और कंधों के दरम्यान पहुँच रहे थे, और उनके बाल भी बेहद खूबसूरत थे, उन्होंने अपने बालों को काढ़ा हुआ था, और उन बालों से पानी के क़तरे टपक रहे थे, उन्हें दो लोग काबा का तवाफ़ करा रहे थे, मैंने पूछा कि ये शख्स कौन हैं, मुझे बताया गया कि ये मसीह इब्ने मरियम हैं !
फिर मैंने एक और शख्स को देखा जिसके बाल कड़े थे और वो दाहिनी आँख से काना था, मैंने पूछा कि ये शख्स कौन है ? ... मुझे बताया गया कि ये "मसीह ए दज्जाल" है !!"

..... यहां नबी सल्ल० ने कोई पेशीनगोई नही की बल्कि अपने एक ख्वाब का ज़िक्र किया है इस हदीस में... नबी सल्ल० ने इस ख्वाब में हज़रत ईसा का जो हुलिया देखा था, बाद की किताबों में उसी हुलिए को भविष्यवाणी के तौर पर लिखा गया है .... यानि बाद की किताबों में जितने भी ज़िक्र हैं वो सब इस एक ख्वाब के बड़े वर्ज़न हैं, या लोगों ने ख़्वाब की ताबीर निकालनी चाही है, लेकिन बाद की अहादीस में जो भी लिखा है उसका "एज़ इट इज़" पूरा होने का ख्याल इसलिये दुरुस्त नही क्योंकि वो नबी सल्ल० का ख़्वाब है
...... हालांकि नबी सल्ल० के क़रीब के ज़माने से मिली हदीस इस बात पर भी ज़ोर नही देती कि इस ख़्वाब में कोई पेशीनगोई है, लेकिन फिर भी इसको पेशीनगोई की तरह लिया जाए तो इसके कुछ इस्तिलाही मायने लेने होंगे...
..... मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब हिन्दोस्तान के उन चंद एक इस्लामी उलमा में शामिल हैं जिन्हें आलमी सतह पर शोहरत हासिल है... मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब खुद देवबंदी मकतब ए फ़िक्र से हैं,
अपनी किताब "क़यामत का अलार्म" में मौलाना साहब ने पेज 49 और 50 पर लिखा है कि "हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम का दोबारा अपने जिस्म के साथ दुनिया में उतरने का ख्याल न क़ुरान से दुरुस्त साबित होता है और न हदीस से ... बल्कि ये किसी "आम इंसान" के मसीही रोल अदा करने की पेशीन गोई है, और हज़रत ईसा अपने जिस्म के साथ दोबारा ज़मीन पर नही उतरेंगे ये बात कोई नया ख़याल नही है बल्कि हमेशा से उलमा की एक क़ाबिल ए लिहाज़ तादाद इस ख़्याल की हामी रही है जिनमे बाज़ नाम सय्यद जमालुद्दीन अफ़गानी, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मुफ़्ती मुहम्मद अब्दुह, शेख मोहम्मद शलतूत, अबू ज़हरा, डॉक्टर मुहम्मद इक़बाल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, वगैरह के हैं"
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..... ऐसे न जाने कितने अरबी और दुनियाभर के इस्लामी विद्वान हुए हैं जिन्हें हज़रत ईसा के दोबारा दुनिया में आने की बात से इख्तिलाफ रहा है... किसी मसीहा के आने के इंतज़ार की बजाय मैं भी उन अहादीस की ये इस्तिलाह समझता हूं कि ग़ालिबन आख़री ज़माने में हज़रत ईसा के मानने वाले तमाम लोग मुसलमानों के साथ हो जाएंगे.. !!!
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.....जो लोग ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि हज़रत ईसा की सेकेंड कमिंग का इनकार करना क़ादियानी मज़हब की पैरोकारी करना है, उनको अपनी अक़्ल पर ज़ोर देकर ये बात समझनी होगी .... अगर क़ादियानी यही मानते हैं कि हज़रत ईसा का नुज़ूल ए सानी नहीं होगा, तो फिर ऑटोमैटिकली उन्होने ये भी तस्लीम कर लिया है कि उनका बानी गुलाम अहमद झूठा साबित हुआ, क्योंकि गुलाम अहमद ने खुद को हज़रत ईसा कहा था, और इसी नुज़ूल ए सानी के अक़ीदे का फ़ायदा उठाकर खुद को अल्लाह का नबी कहते हुए अपना एक अलग मज़हब पैदा कर दिया था.... जब अपने पीर को झूठा मान चुके तो फिर ये क़ादियानी तौबा कर के इस्लाम की तरफ लौट क्यों नहीं आते ??
..... असल बात ये है कि क़ादियानी मज़हब हज़रत ईसा के नुज़ूल ए सानी की रिवायतों पर यक़ीन के नतीजे में पैदा हुआ और पल बढ़ रहा है, अगर इन रिवायतों पर अंधा यक़ीन न होता तो इस्लाम मे ये टूट भी न पड़ती...!!!
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.... हम कहते हैं कि हज़रत ईसा को सिरे से दोबारा आना ही नही था और कादियानियों का मानना है कि अब उनके पीर की शक्ल में ईसा आ चुके हैं और अब कोई और ईसा नही आएंगे... इस तरह गुलाम अहमद को ईसा मानने वाले कादियानियों का नुज़ूल ए सानी पर पक्का अक़ीदा है और अगर वो हमारी दलाइल मान लेंगे तो तौबा कर के मुस्लिम बन जाएंगे....!!!



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