Sunday, 16 August 2020

इफरात और तफरीत, मुर्तद की सज़ा।







इफरात और तफ़रीत का मामला,
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मुसलमानों के बारे में नबी सल्ल० ने पेशीनगोई फ़रमाई थी, कि "तुम क़दम दर कदम, अहले क़िताब की पैरवी करोगे यहाँ तक कि वो अगर गोह के बिल में घुसे होंगे तो तुम भी घुस जाओगे..."
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.... मैंने कहीं पढ़ा था कि यहूदियों ने दीन में इफ़रात (हद से आगे बढ़ने) का मामला किया और अपनी तरफ़ से खुद पर ऐसी चीज़ें भी हराम कर लीं जिनपर दीन में कोई पाबंदी लगाई ही नही गई थी, जैसे यहूदियों ने ख़ुद पर ऊंट का गोश्त खुद ही हराम कर लिया, जबकि उनके लिए वो हलाल था, इसके बरअक्स ईसाइयों ने दीन में तफ़रीत यानि बिलकुल आज़ादी लेने और हराम को भी हलाल ठहरा लेने का मामला किया और सूअर जैसी हराम चीज़ को हलाल ठहरा लिया
.... अल्लाह ने न यहूदियों की इफ़रात का मामला पसन्द किया न ईसाइयों की तफ़रीत का, बल्कि यहूद ओ नसारा के इफ़रात ओ तफ़रीत के अमल पर सूरह आराफ़ में ये बयान किया कि इस्लाम के नबी तुम्हारे लिए तय्यबात को हलाल और खबाइस को हराम ठहराते हैं, और यहूद ओ नसारा पर से उनके वह बोझ उतारते हैं, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलते हैं, जिनमें वे जकड़े हुए थे... (7:157)
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.... इस आयत का मतलब ये था कि दीन में सिर्फ़ उतना ज़रूरी है जितना फरमाने इलाही में बयान किया गया है, न उससे कम पर अल्लाह राज़ी है, न उससे ज्यादा ही बढ़ना अल्लाह के नज़दीक पसंदीदा है...
..... अहादीस में भी ये बात इस तरह बयां की गई है हलाल वो चीज़ें हैं जिन्हें क़ुरआन में हलाल किया गया, और हराम वो तमाम बातें हैं जिन्हें क़ुरआन में हराम ठहराया गया, और रही वो बातें जिनका तज़किरा क़ुरआन में नही किया गया, ये बातें "मुआफ़" हैं...!!!
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... इतनी साफ़ वजाहत के बावजूद मैंने मुसलमानों में इफ़रात का मुआमला देखा है.... जी हां वैसी ही इफ़रात का मामला जैसी इफ़रात यहूदियों ने अपनाई थी... उम्मीद है आप हज़रात भूले नही होंगे वो तमाम जानवरों की टैन खाल को पाक मानने की इमाम इब्ने हज़्म रह० की फ़िक़्ह को मेरी ताईद, और उस पर लोगों का बवाल, जबकि वो फ़िक़्ह हदीस शरीफ़ पर मबनी थी और क़ुरआन की आयतों के गहरे अध्ययन पर इफ़रात और तफ़रीत के अमल से बचने के ख़्याल से तरतीब दी गई थी, इसके बावजूद मुझे हराम को हलाल साबित करने की कोशिशें करने वाला बताकर ख़ूब गालियां दी गईं, 
मैंने उन लोगों का रद्दे अमल देखकर यही जाना कि भले ही ये लोग यहूदियों से हद से ज़्यादा नफ़रत दिखाते हों, मगर कदम दर कदम हैं ये लोग यहूदियों के नक़्शे कदम पर ही, जैसा कि नबी सल्ल० पेशीनगोई फ़रमा चुके हैं, ये लोग पूरा कर रहे हैं... यहूदी मज़हबी मामलात में इफ़रात करने के आदी थे, आज का मुसलमान भी देख लीजिये कई मामलों में इफ़रात कर रहा है, यहूदियों में एक आदत मज़हब को लेकर चरमपंथी बनने की थी कि अपने बनाए अक़ाइद से अलग दूसरी बात सुनने पर हज़रत ईसा का क़त्ल करने पर आमादा हो गए थे, और आज के मुसलमानों में भी ये चरमपंथ आप बख़ूबी देख सकते हैं, ये अपना अपना फ़िरक़ा पकड़कर दूसरों को क़त्ल करने पर आमादा हैं....
..... बेशक़ हुज़ूर सल्ललल्लाहो अलैहे वसल्लम की पेशीनगोई सच्ची साबित हुई।

~ ज़िया इम्तियाज़।



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क़ुरआन में इरतिदाद करने वालों का ज़िक्र बार बार आया है और कुरआन में कहीं वक़्त के हाकिम को ये हुक्म नही दिया गया कि वो मुर्तद को मौत की सज़ा दे
.... सिर्फ़ एक मुख्तसर रिवायत की बुनियाद पर कुछ भाईयों के हिसाब से इस्लाम से धर्म परिवर्तन करने के हर मामले पर मौत की सज़ा नाफिज़ होगी ..... हालांकि बड़े बड़े उलमा ने यही फ़तवा दिया है कि आम इर्तिदाद के मामलों पर हुदूद नाफ़िज़ नही होते....
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....... फिर भी जाने क्यों हमारे कुछ भाईयों के खयाल मे जो इंसान एक बार मुस्लिम से गैर मुस्लिम बना फिर उसे ज़िन्दा रहने का कोई हक नहीं .....
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लेकिन भाईयों क्या आप ये मानोगे कि अल्लाह और रसूल का कोई हुक्म कभी गलत साबित हो सकता है ??
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 गाज़ी धर्मपाल के बारे मे आपने कभी न कभी ज़रूर पढ़ा या सुना होगा .... उन्होने भी इस्लाम त्याग दिया था और कई साल मुर्तद के रूप मे गुज़ारे, और इस्लाम की खूब धज्जियां उड़ाई.....
....... किस्सा तमाम ये है कि सन् 1903 मे अब्दुल गफूर नाम के इक्कीस साल के नौजवान ने गुजरांवाला की आर्यसमाज में दाखिल होकर इस्लाम छोड़ कर वैदिक धर्म अपना लिया और अपना नाम धर्मपाल रखा इसके बाद धर्मपाल ने इस्लाम की बुराइयों से भरी किताबें लिखनी शुरू कर दीं, और तमाम हिन्दोस्तानी मुसलमानों को हिलाकर रख दिया
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ग़ाज़ी महमूद धर्मपाल जो इस्लाम के खिलाफ़ आर्यसमाज की मदद से कई किताबों के लेखक थे आपको सभी किताबों के इस्लामी स्कॉलरों ने जवाब भी दिये थे, 
.... तो मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी लेखक ‘हक प्रकाश बजवाब सत्यार्थ प्रकाश‘ से 11 साल के बहस मुबाहिसे के बाद धर्मपाल वापस इस्लाम की सच्चाई को मान कर 14 जून 1914 मे फिर से मुसलमान हुए और अपने 11 साल के आर्यसमाजी अनुभव से इस्लाम को अपनी कई किताबों से तक़वियत बख़्शी 
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 ..... ये अल्लाह का ही करना था कि इर्तिदाद के बरसों बाद उन्हें अपनी गल्ती का एहसास हुआ, और वो वापस मुस्लिम बन गए और इसके बाद उन्होंने इस्लाम की जो खिदमत की और अपने और दूसरों के लगाए इल्ज़ामात को इस्लाम पर से धो डाला,  वो हरगिज़ न हो पाता अगर उन्हें कत्ल कर दिया जाता...
..... तो भाईयों क्या ये मुमकिन है कि एक तरफ़ अल्लाह और रसूल मुर्तद को मौत की सज़ा के लायक़ बताएं, और दूसरी तरफ इर्तिदाद करने वाले को इस तरह क़ुबूल कर लें कि उससे इस्लाम की बेहतरीन ख़िदमात लें.....
...... सोचिये, अल्लाह का करना बता रहा है कि इस मामले में कहीं, मिसइन्फॉर्मेशन का मामला हुआ है, एक आम मुर्तद से मुसलमान का क्या रवैया हो, इस पर उस सज़ा वाली रिवायत से हम तक पूरी बात नहीं पहुँची है
..... तो ऐसी अधूरी बात पर कोई क़ानून तय करने की बजाय कुरआन की तरफ़ आएं, वहां देखें कि इस मामले पर क्या बताया गया है....
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...... क़ुरआन में सूरह आले इमरान की आयतें 86 से लेकर 90 तक, ईमान के बाद इर्तिदाद करने वालों का ज़िक्र किया जा रहा है कि अगर ये मुर्तद होकर अपनी गुमराही में बढ़ते गये तो अल्लाह भी इनको हमेशा की जहन्नुम में डाल देगा, .... लेकिन इसी बीच आयत 89 में पढ़िए, यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो इरतिदाद के बाद फिर मुस्लिम बन गया तो अल्लाह भी माफ़ करने वाला है, .... यानी इरतिदाद करने वाला अगर अपनी गलती का एहसास होने पर वापस दाखिल ए इस्लाम हो जाएगा, तो अल्लाह भी उस बन्दे का जुर्म माफ कर के उसे क़ुबूल कर लेगा, इन शा अल्लाह !!!
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....... अब यहां खुद देखिए, मुर्तद का वापस मुस्लिम बनना तभी सम्भव है जब वो इंसान ज़िंदा रहे, उसे अपने फैसले पर सही-गलत सोचने का मौका और मोहलत मिले.... आज आप थोड़ा ही इंटरनेट सर्च करें तो ऐसे लोगों की वीडिओज़ भरी पड़ी पाएंगे जो ये कहते हैं कि हम मुसलमान से मुर्तद हो गए थे और बरसों बाद हमें वापस इस्लाम के वाहिद सच्चा मज़हब होने का एहसास हुआ और हम वापस पहले से कहीं ज़्यादा पुख़्ता ईमान के साथ इस्लाम में दाख़िल हो गए....
.... मैं खुद अपनी आपबीती देखता हूँ तो पाता हूँ कि इस्लाम पर शक और फिर तहक़ीक़ के बाद इस्लाम पर जो मज़बूत यक़ीन बनता है, उसका कोई मुक़ाबला नही.... मुझे लगता है कि अपने बन्दों को दीन की तरफ़ लाने की ये भी अल्लाह की एक मस्लेहत है, .... उम्मीद है आप भी अल्लाह की इस मसलेहत को समझने की कोशिश करेंगे !!

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