हूर और अप्सरायें।
इधर काफी समय से अपने कुछ भाईयों को जन्नत मे मिलने वाली 72 हूरों को लेकर अश्लील बातें करते, और इस्लाम का अपमान करते देख रहा हूँ, कि इस्लाम मुसलमानों को जिहाद के लिए उकसाने को स्वर्ग मे मिलने वाली 72 सुन्दर लड़कियों का लालच देता है, और इसी लालच मे जिहादी फिदायीन हमले कर के स्वयं को बम से उड़ा लेते हैं......
ऐसे आरोप लगाने वाले भी मुझे बड़े मासूम से लगते हैं... इन मूर्खो को कौन समझाए कि अगर वासनापूर्ति ही मुस्लिमों का ध्येय होता तो दुनिया मे ही 72 से बहुत अधिक, अनगिनत जिस्मफरोश स्त्रियों से केवल कुछ दाम देकर सम्बन्ध बना सकते थे जैसे इस्लाम पर अश्लीलता का आरोप लगाने वाले ये गैर मुस्लिम वेश्याओं से सम्बन्ध बनाते हैं, इतनी सुलभ बात के लिए मौत की पीड़ादायक राह कोई महामूर्ख ही चुनेगा
भाई लोग एक फोटो भी बहुत शेयर करते हैं कि एक इस्लामी जिहादी ने अपने शरीर पर बम बांध कर फटने से पहले अपने गुप्त अंग पर मेटल का कवर लगा लिया ताकि उसका अंग नष्ट न हो और वो जन्नत मे हूरों के साथ सम्बन्ध बना सके
ये फोटो झूठा है क्योंकि इस्लाम का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि कयामत के बाद ईश्वर सभी नष्ट हो चुके मानव शरीरों को दोबारा से, और पूरे का पूरा बना देगा [ पवित्र कुरान के अनुसार ]
सो पूरे शरीर को नष्ट कर देने और एक अंग विशेष को बचाने के प्रयास की मूर्खता कोई मुस्लिम नहीं कर सकता
इस्लाम की सबसे प्रमाणित पुस्तक पवित्र कुरान मे कहीं 72 हूरों की संख्या कहीं नहीं बताई गई है, यदि बताई भी गई होती तो उसमें आपत्ति करने जैसी कोई बात थी नहीं ...
खैर, कुरान मे कुछ पवित्र पत्नियों का जिक्र अवश्य कुछ स्थानो पर है जिनका विवाह , नवजीवन पाकर स्वर्ग मे पहुंची पवित्र आत्माओं से कर दिया जाएगा और वो उनकी जीवन संगिनी बन जायेंगी, [ पवित्र कुरआन 2:25 ], [ 4:57 ], एवं [ 44:54 ], [ 52:20 ]
अब जब दुनिया मे विवाह कर के स्त्री पुरुष एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध हो जाते हैं, और इस बंधन को एक पवित्र बंधन माना जाता है, तो स्वर्ग मे यही बंधन जोड़ना अश्लील कर्म कैसे हो गया हमारे कुछ भाईयों की नजर मे ??
.... और यदि भाईयों को एक विवाह पर नहीं बल्कि 72 स्त्रियों की संख्या पर आपत्ति हो तो सवाल ये है क्या एक से अधिक विवाह करना इतना ही अश्लील कर्म है जितने गंदे आरोप हमारे गैर मुस्लिम भाईयों ने इस्लाम पर लगाए ?? फिर ये भाई श्री कृष्ण जी को क्या कहेंगे जिन्होंने 72 से कई गुना अधिक स्त्रियों से यानी सोलह हजार से ऊपर की संख्या मे विवाह किए थे ... हम तो श्रीकृष्ण जी के उन विवाहों को सम्मान की ही दृष्टि से देखते हैं ॥
इस्लाम मे स्वर्ग की नियामत के रूप मे ये पवित्र पत्नियां उनको मिलेंगी जो दुनिया मे नेक राह पर चलेंगे ऐसा भी कुरान की इन पवित्र आयतों मे स्पष्ट लिखा है ... और कुरान के अनुसार नेक राह है दुखियों पर दया रखना, मोहताज की सहायता करना, सब प्राणियों से प्रेम रखना, और अपनी शुचिता और सतीत्व को सदा पर स्त्री, पुरूषों से बचाकर रखना
मुसलमानों को युद्ध के लिए उकसाने को स्वर्ग मे मिलने वाली सुन्दर लड़कियों का लालच इस्लाम नहीं देता, पर ऐसी बात हमें "महाभारत" मे पढ़ने को मिलती है, जहाँ योद्धा को अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को प्रेरित करने के लिए अप्सराओं का वर्णन कुछ ऐसे किया गया है
"हजारों सुन्दर अप्सराएं युद्ध मे मारे गए नायक के चारों ओर दौड़ रही होंगी, हर एक यही चाहती होगी कि नायक उसका पति बने "
[ महाभारत शान्ति पर्व ( अध्याय 12), खण्ड 98, श्लोक 46 ]
वेद मे भी एक व्यक्ति के लिए एक, दो, बहत्तर या हजारों भी नहीं बल्कि इस संख्या से भी कहीं ऊपर "बहुत सारी" यानि जिनकी गिनती भी नही की जा सकती इतनी स्त्रियाँ दिए जाने का जिक्र है, ऐसा अथर्ववेद 4:34:2 मे लिखा है,
अनस्था: पूता: पवनेन शुद्धा: शुचय: शुचिमपि यंति लोकम् |
नैषां शिश्नं प्र दहति जातवेदा: स्वर्गे लोके बहु स्त्रैणमेषाम् ||
गौरतलब है कि कुरान मे तो हूर से जुड़ी कोई ऐसी बात नहीं लिखी फिर भी हमारे भाई लोग इस्लाम पर तरह तरह के गंदे आरोप लगाते हैं, लेकिन खुद अथर्ववेद के इस मन्त्र मे पुरूष अंग के अग्नि आदि से नष्ट न होने का जिक्र ये स्पष्ट करता है कि अप्सरा का मुख्य काम स्वर्गीय पुरुष को सेक्सुअल प्लेजर देना है,
जबकि कुरआन मे वर्णित जन्नत की हूर अपने सतीत्व की रक्षा करने वाली स्त्री होती हैै, तो बताइए भाईयों, इस्लाम पर आपकी आपत्तियां कहाँ तक जायज़ हैं ....??
वैसे हमें किसी बात पर आपत्ति नहीं है, चाहे वो बात स्वर्ग मे एक व्यक्ति को मिलने वाली असंख्य स्त्रियों की हो, या उन स्त्रियों से स्वर्गवासी व्यक्ति का शरीर सुख लेना .... ये सारी बातें स्वीकार्य हैं, यदि स्वर्ग के इन आश्वासनों के कारण व्यक्ति धरती का अपना जीवन आत्मसंयम के साथ बिना किसी अश्लील कर्म मे लिप्त हुए बिता ले जैसे कि अल्लाह से डरने वाले मुस्लिम अपना सारा जीवन बिताते हैं...!!!
~ ज़िया इम्तियाज़।
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क़ुरआन में "गिलमान" का ज़िक्र आया है कि जन्नत में जन्नती लोगों के लिए गिलमान होंगे, जो उनके आसपास फिर रहे होंगे, और सुरक्षित मोतियों के समान वो सुंदर होंगे....
गिलमान के विषय में इस्लाम विरोधियों को अक्सर मैंने ये कहते देखा है कि ये जन्नत में समलैंगिक संबंधों की अनुमति की ओर दर्शाता है, इस्लाम विरोधी कहते हैं कि जिस तरह दुनिया में इस्लाम में शराब हराम है, पर जन्नत में हलाल है, उसी तरह दुनिया में मुसलमानों के लिए समलैंगिकता हराम है लेकिन जन्नत में नही !!
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...... ऐसे ऊलजलूल अनुमान लगाने वालों को मैं बता दूं कि क़ुरआन में दुनिया में हराम ठहराई गई कोई भी चीज़ जन्नत में हलाल नही है, दुनिया में मुसलमानों के लिए हर प्रकार का नशा हराम है, और जन्नत में मिलने वाली 'शराब' में नशा नही होगा (देखें सूरह वाक़िया, आयत-19, "जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनकी बुद्धि में विकार आएगा") .... स्पष्ट है कि दुनिया में क़ुरआन में जो चीज़ हराम की गई है वो जन्नत में भी हलाल नही है, .... और क़ुरआन में समलैंगिकता को इतना घृणित अपराध माना गया है कि इस बुराई में डूब चुके हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के समुदाय को अल्लाह ने विनष्ट कर दिया था, फिर इस गंदगी का जन्नत में होना कैसे सम्भव हो सकता है ???
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.... गिलमान के विषय मे विद्वानों का आम ख्याल है कि गिलमान जन्नत में जाने वालों की सेवा में लगे गुलाम होंगे, ... और सेवा की प्रकृति भी क़ुरआन में ही बताई गई है कि ये जन्नती लोगों के लिये पवित्र पेय लाते होंगे....!!
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हमारे एक भाई ने पूछा है कि गिलमान की सुंदरता का ज़िक्र क्यों किया गया है, इससे कुछ और इशारा मिलता है.... भाई का "कुछ और इशारा" मैं समझ रहा हूँ, पर जानता हूँ जब मैं "गिलमान" शब्द का खुलासा करूँगा तब उस 'कुछ और इशारे' की सम्भावना ख़त्म हो जाएगी ...
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... क़ुरआन 52:24 में गिलमान का ज़िक्र है, दरअसल ये शब्द "ग़ुलाम" का बहुवचन है, और ग़ुलाम का सही अर्थ लड़का यानी मेल चाइल्ड होता है, पुरुष बनने से पहले की किसी भी उम्र के मेल चाइल्ड को गुलाम कहा जाता है, ... अरबी में कई शब्द पारिभाषिक रूप से प्रचलित थे जिस तरह उर्दू में स्त्री दासी के लिये लौंडी (लड़की) शब्द हमने सुना है, उसी तरह अरबी में पुरूष दासों को "लड़का" (गुलाम) कहने के प्रचलन के कारण, अब हम सुनने वालों के ज़हन में गुलाम का अर्थ केवल युवा उम्र का लड़का ही समझा जाने लगा, जबकि ये सही नहीं है बल्कि सही ये है कि एक मेल चाइल्ड को उसकी पैदाइश से लेकर किशोरावस्था से पहले तक की उम्र के बीच के वर्षों में भी लड़का (अरबी में ग़ुलाम) ही कहा जाता है, ....
.... क़ुरआन में भी ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं, .... कुरआन 3:40 में है कि बेटा पैदा होने की भविष्यवाणी पर ज़करिया अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मेरे यहाँ लड़का कैसे पैदा होगा ? यहां लड़के के लिए गुलाम शब्द आया है और कि जब माँ बाप अपनी औलाद की कल्पना करते हैं तो बालक की कल्पना करते हैं न कि जवान या किशोर की ... क़ुरआन 19:7-8 में फिर यही ज़िक्र यानी ज़करिया अलैहिस्सलाम के यहां बेटे की पैदाइश की भविष्यवाणी लफ्ज़ ग़ुलाम के साथ आई है, इसी तरह क़ुरआन 15:53 में हज़रत इब्राहीम के यहां बेटा पैदा होने की भविष्यवाणी की जा रही है, यहाँ भी ग़ुलाम लफ्ज़ आया है,
19:19-20 में हज़रत ईसा की पैदाइश की भविष्यवाणी में यही लफ्ज़ ग़ुलाम है और मरियम भी यही कहती हैं कि "मेरे लड़का कैसे पैदा हो सकता है ?" यानी ग़ुलाम शब्द बहुत कम उम्र लड़कों के लिए भी, और अपने ही बेटों के लिये भी अरबी में आमतौर पर प्रयुक्त होता था,
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.....युवावस्था से पूर्व की स्थिति में रहने वाले गिलमान की उम्र, किस आयु के आसपास होगी ? इस विषय मे क़ुरआन की कुछ अन्य आयतों के अध्ययन से ज़्यादा स्पष्ट तसवीर सामने आती है, क़ुरआन 56:17 और 76:19 में भी गिलमान का ही ज़िक्र किया गया है, लेकिन यहां गिलमान के लिये लफ्ज़ "विलदान" आया है... अनुवादकों ने यहां भी यही अनुवाद किया है कि जन्नतियों के आसपास किशोर घूमते होंगे... लेकिन लफ़्ज़ विलदान का अर्थ किशोर नही होता, ये लफ्ज़ अमूमन बच्चों के लिए इस्तेमाल होता है, और लफ़्ज़ विलदान का कोई स्पेसिफिक जेंडर भी नही है, मतलब ये छोटी उम्र के बच्चों और बच्चियों, दोनों के लिये इस्तेमाल होता है, खुद क़ुरान में कई जगह लफ्ज़ "विलदान" कम उम्र के बच्चे और बच्चियों दोनों के लिए आया है, जैसे क़ुरआन 4:75, 4:98, 4:127 और 73:17..
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दरअसल लफ्ज़ विलदान का रूट "व-ल-द" है और "वलादा" के अर्थ पैदा होने के होते हैं, विलादत, मौलिद का अर्थ पैदा होना होता है, वालिद और वालिदा का अर्थ जिन्होंने बच्चे को पैदा किया यानी माँ बाप.... लफ्ज़ "औलाद" भी विलदान का एक रूप है, यानी विलदान बच्चों को कहा जाता है, जब माँ बाप से उनके बच्चों की बात की जाए तो बच्चों की उम्र कितनी ही ज़्यादा हो सकती है, कि "फलां तुम्हारी औलाद है" ... लेकिन जब ऐसे लोग जो बच्चों के माता पिता न हों, उनके सामने किन्हीं बच्चों का ज़िक्र किया जाए तो स्पष्ट है कि वहाँ विलदान/बच्चों से आशय ऐसे बच्चे हैं जिनकी उम्र उनकी विलादत/पैदाइश के आसपास की ही हो
क़ुरआन 26:18 में फ़िरऔन मूसा अलैहिस्सलाम से कहता है कि मैंने तुझे पाला था जब तू बच्चा था, ... यहां नवजात उम्र के लिये लफ्ज़ "वलिदन" आया है....
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..... इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि क़ुरआन में वर्णित गिलमान दरअसल छोटी उम्र के लड़के हैं, और लफ्ज़ 'विलदान' के कारण इनमें बच्चियों के होने की सम्भावना भी बनती है.... और ये छोटे बच्चे जन्नती स्त्री पुरुषों के मातृत्व और पितृत्व भाव की पूर्ति करने के लिए हैं,
दरअसल ये इस्लामी विश्वास है कि यदि किसी मुस्लिम व्यक्ति की अबोध औलाद मर जाये तो वो खुद तो औलाद जन्नत में जाएगी ही, और अल्लाह से अपने माता पिता को भी जन्नत में भेजने का आग्रह करेगी (बुखारी शरीफ़ में भी इस आशय की हदीसें हैं)
... इसी प्रकार क़ुरआन में लिखा है कि अल्लाह तमाम नेक लोगों के नेक सम्बन्धियों और सन्तानों को जन्नत में मिला देगा .["अर्थात सदैव रहने के बाग़ है जिनमें वे प्रवेश करेंगे और उनके बाप-दादा और उनकी पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक होंगे वे भी और हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास पहुँचेंगे (13:23)]
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.... इस आयत के आधार पर समझा जा सकता है कि क़ुरआन में गिलमान और विलदान से आशय जन्नतियों के अपने अबोध बालक भी हो सकते हैं क्योंकि वो अबोध उम्र में मरने के कारण पाप पुण्य के आधार पर जन्नत में नही गए हैं, सो वो छोटी उम्र के रहेंगे इतनी उम्र कि अपने माता पिता की कुछ सेवा करने में भी सक्षम हों....
... फिर अल्लाह जन्नत में जाने वाले निस्संतान लोगों के मातृत्व-पितृत्व की भावना की पूर्ति भी क्यों नहीं करेगा ?उनके लिए ऐसे अबोध बच्चों को ले आएगा जो बच्चे अबोध उम्र में मर गए थे पर उनके माता पिता बहुत पापी होने के कारण दोज़ख़ में भेजे गए हैं, जैसा कि कई इस्लामी विद्वानों का अनुमान है कि काफिरों के ये मृत बच्चे जन्नत में सदैव छोटी उम्र के बनकर रहेंगे, और जन्नतियों की सेवा में लगाए जाएंगे, पर साथ ही इन बच्चों की सुंदरता देखकर जन्नतियों की आंखें भी ठंडी होंगी, उनके पितृत्व-मातृत्व की भावना की भी पूर्ति होगी, .... दुनिया में हम दूसरों के सात आठ साल की उम्र के सुंदर सुंदर बच्चों को देखकर प्रफुल्लित होते हैं, उनके साथ खेलना चाहते हैं, उन कमउम्र बच्चों के लिए हमारे दिमाग में कभी कोई अश्लील विचार नही आता... उनके लिये गलत विचार एक गन्दा बीमार दिमाग़ ही ला सकता है... एक स्वस्थ स्त्री पुरूष उन बच्चों के लिए ममता ही महसूस करते हैं, फिर जब जन्नत में ऐसे बच्चों का ज़िक्र हो, जिस जन्नत में किसी भी प्रकार की गंदगी या बुराई प्रविष्ट नही कर सकती तो जन्नत के बच्चों के लिए गलत अनुमान कैसे लगाया जा सकता है, जन्नत में ये बेऔलाद जन्नतियों को औलाद का सुख देने के लिए रखे जाएंगे, यही विचार सबसे सही लगता है...!!
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... जन्नत में जीवनसाथी बनाने के लिए अल्लाह दुनिया के नेक पति पत्नी को आपस में मिला देगा, जैसा कि क़ुरआन 13:23 में है, फिर जो नेक स्त्री पुरुष कुँवारे मरे होंगे उनके लिए सुंदर जीवनसाथी "हूर" (स्त्री और पुरुष दोनों लिंगों को हूर कहा जा सकता है) हैं... ये पाक पवित्र सम्बन्ध होगा, इस पाक पवित्र सम्बन्ध के अलावा जन्नत में अन्य किसी प्रकार के अनैतिक सम्बन्ध का अनुमान लगाना धृष्टता मात्र है !!
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