Sunday, 16 August 2020

क्या अल्लाह साकार हैं।

क्या अल्लाह साकार है।

पिछले कुछ दिनों में दो तीन बार इस किस्म के सवाल मेरे सामने आये कि मुस्लिम तो ये दावा करते हैं कि अल्लाह निराकार है, उसका कोई आकार नही, लेकिन क़ुरान पाक में तो लिखा है कि अल्लाह ने आदम अस० को अपने हाथों से बनाया जिससे सिद्ध होता है कि मुस्लिमों का अल्लाह शरीर वाला है, तथा क़ुरान में अल्लाह के एक कुर्सी पर बैठे होने का वर्णन है जिसका अर्थ ये हुआ कि अल्लाह एक आकार और एक स्थान में सीमित है, वो सर्वव्यापी नही है जैसा कि मुस्लिम दावा करते हैं !!!
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उत्तर : देखिये, पहली बात तो ये है जिसे मैंने अक्सर बताया है कि क़ुरान की भाषा को अलंकृत, या लयात्मक यानि शायरी जैसा रखा गया है ताकि ये रूचि से सुनी जाये और इसे याद रखने और कंठस्थ करने में आसानी हो... सो, शायरी या काव्य का तरीका ये है कि उसमें मिसालों और मुहावरों का इस्तेमाल कर के बात को बयान किया जाता है .....

..... जहाँ तक क़ुरआन पाक में इस सांसारिक जीवन से परे की स्थितियों की बात है, इसके बारे में सच्चाई तो ये है कि ये ऐसी बातें हैं जो अपने वास्तविक रूप में इंसान की समझ में नही आ सकतीं जब तक इंसान उस अगली दुनिया में जाकर खुद उन परिस्थितियों और चीज़ों का अनुभव न कर ले, मुस्लिम शरीफ में एक हदीस का सार ये है कि परलोक की बातों का कोई मनुष्य न वर्णन कर सकता है, न उन दृश्यों की सही सही कल्पना ही करना उसके वश में है, (सही मुस्लिम, किताब-40, हदीस संख्या- 6780, 6781 और 6782 से मफ़हूम) .... ऐसा इसलिये, क्योंकि धरती पर ऐसा कभी कुछ किसी व्यक्ति ने देखा ही नही जिसकी तुलना के आधार पर वो परलोक की दुनिया के रूप पर कोई अनुमान लगाये..
पर क्योंकि क़ुरान का काम इंसान को आख़िरत के बारे में चेतावनी देना था, इसलिये इंसान को परलोक के बारे में एक अनुमान देना ज़रूरी था, इसलिये क़ुरान में इंसानी ज़बान में इंसानों के समझने में आसान मिसालें दे देकर बात को समझाया गया है, ताकि लोग कुछ हद तक बातों को समझ सकें, और कम से कम बात के मर्म तक पंहुच पाएं ..
..... इन बातों को दिमाग में बिठाकर क़ुरान की इन आयतों को समझना चाहिये....
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.... इस्लामी आस्था बिलकुल यही कहती है कि अल्लाह को निराकार स्वीकार करते हुए उसकी बन्दगी की जाए, और जिस तरह विश्व के अनेकों समुदायों ने ईश्वर के आकार की कल्पना करके झूटी मूर्तियों और तस्वीरों को गढ़ के उन्हें ईश्वर का रूप बता दिया इस कुचेष्टा से मुसलमान कोसों कोसों दूर रहें और बिना किसी मूर्ति की कल्पना के ईश्वर की इबादत करें.... कुरआन में कई स्थानों पर ये बात दोहराई गई है कि अल्लाह "बेमिस्ल" है, यानी यानी वो किसी भी प्रकार की "भौतिक" तुलनाओं से परे है.... तो स्पष्ट है कि पवित्र क़ुरआन की जिन आयतों से विरोधीजन अल्लाह के आकार प्रकार का पता लगाना चाह रहे हैं, उन आयतों का वास्तविक मन्तव्य कुछ और ही है,
........ ..... देखिये, जहाँ तक सवाल अल्लाह के "कुर्सी" पर बैठने का है तो जैसा कि हमारा ईमान है कि अल्लाह किसी भी किस्म की बनावट, जगह और वक्त की हदों से परे है, सो स्पष्ट है कि यहां उसके किसी "भौतिक" सिंहासन या कुर्सी पर बैठने की बात नही कही गई है, यहां दरअसल कुर्सी पर बैठने के शब्दों का प्रयोग मिसाल के तौर पर, या मुहावरतन किया गया है, और वो मुहावरा ये है कि जैसे एक बात कही जाती है, कि इस वक्त देश की गद्दी पर फलां शख्स बैठा है, इस बात का मतलब ये नही होता कि इस लम्हे वो शख्स किसी गद्दी पर बैठा ही होगा, बल्कि इस मुहावरे का मतलब ये है कि मौजूदा दौर में इस देश का हाकिम वो शख्स है, .... यही मुहावरा क़ुरान में अल्लाह ने अपने लिये इस्तेमाल किया है कि उसने दुनिया बनाई और इस दुनिया की सर्वोच्च सत्ता की बागडोर खुद सम्हाली यानि सबसे ऊंची कुर्सी पर वो विराजमान हुआ, ....!!!

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इसी तरह हज़रत आदम को अल्लाह द्वारा अपने "हाथों से" बनाए जाने की बात कहना भी एक इंसानों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला आम मुहावरा ही है, ..... क्योंकि क़ुरान ही तस्दीक करता है कि किसी भी चीज़ के निर्माण के लिये अल्लाह को खुद परिश्रम नही करना पड़ता, बल्कि अल्लाह जब किसी चीज़ का निर्माण करना चाहता है तो केवल आदेश करता है, और उस चीज़ का निर्माण होने लगता है, याद कीजिये क़ुरआन का प्रसिद्ध वाक्य "कुन फह्या कुन" जिसका खुलासा ये है कि जब अल्लाह किसी चीज़ का निर्माण करना चाहता है तो वो सिर्फ उस चीज़ को निर्मित होने का आदेश देता है और उस चीज़ का निर्माण हो जाता है...!!
... दरअसल किसी काम के पीछे किसी का "हाथ" होने के मुहावरे का अर्थ ये है कि फलां काम करने के पीछे, फलां व्यक्ति ज़िम्मेदार है, फिर भले ही वो काम उसने वास्तव में अपने हाथ से न किया हो लेकिन मुहावरे में यही कहा जाता है कि इस काम में उसका हाथ है....
.. और जब कोई व्यक्ति ख़ुद ये बात कहता है कि ये काम मैंने ख़ुद अपने "हाथों" से किया है, तो इसका सीधा मतलब ये समझा जाता है कि ये शख्स इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि फलां बात करने का ज़िम्मेदार मैं हूँ, जैसे एक उदाहरण लीजिये... हमारे समाज में अक्सर बूढ़े बाप अपने जवान बेटों पर जब गुस्सा होते हैं तो कहते हैं कि "मैंने तुझे अपने इन्हीं हाथों से पाल पोसकर बड़ा किया, और आज तू मुझे जवाब दे रहा है ?" .... जबकि वास्तव में अपने हाथों से पालने पोसने का काम तो माँएं करती हैं, हां बच्चों को पालने में बराबर के ज़िम्मेदार बाप भी होते हैं, और बच्चे को पालने के साधन जुटाने के ज़िम्मेदार होते हैं
... तो इसी मुहावरे का इस्तेमाल इंसानों को बात का मर्म अच्छे ढंग से समझाने के लिये किया गया इस आयत के पार्श्व में वृतांत ये है कि जब आदम अलैहिस्लाम का निर्माण करने के बाद अल्लाह ने अपने दासों को आदम के सम्मान में झुकने का आदेश दिया तो इब्लीस ने आदम अस० को अपने से हेय मानते हुए, अल्लाह के इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया, तब अल्लाह ने शैतान पर क्रोध करते हुए खासतौर पर इस बात बात पर ज़ोर देकर कहा कि शैतान ने उस आदम को तुच्छ कैसे समझ लिया जिस आदम का निर्माण करने का ज़िम्मेदार सर्वोच्च शक्तिशाली ईश्वर है, ...यानी आदम से अल्लाह के सम्बन्ध का ध्यान इब्लीस को दिलाने पर अल्लाह ने जोर दिया और इसी बात को इंसानी मुहावरे में क़ुरान में यूँ बयान किया गया है..."अल्लाह ने कहा, ऐ शैतान, तुझे आदम को सजदा करने से किस बात ने रोका ?? जिस आदम को मैंने अपने हाथों से बनाया है, क्या तूने घमण्ड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है ??" (38:75)
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......... तो वास्तव में बात यहां कुछ और है और विरोधीजन कुछ और सिद्ध करना चाहते थे...... इसी तरह कुछ हदीसें जिनमे बताया गया है कि कयामत के दिन बन्दे अपने रब्ब को देखेंगे, ... इन हदीसों को कोट करके भी लोग ये सिद्ध करना चाहते हैं कि देखा तो साकार को ही जा सकता है, निराकार को नही !! जबकि मामला यहाँ भी वही है कि मानवीय शब्दावली पारलौकिक दुनिया की बातों का सही सही वर्णन करने के लिये अपर्याप्त है, .... कयामत के रोज़ हर बन्दा अल्लाह के समक्ष होगा और उसके सामने अपने रचयिता को लेकर कोई संशय नही रहेगा जो संशय सांसारिक जीवन में उसके साथ रहे थे, इस स्थिति को अल्लाह को देखना के शब्दों से व्यक्त करने का प्रयास किया गया है, पर अल्लाह के आकार प्रकार पर कोई चर्चा नही की गई, वास्तव में मरने के बाद क्या होगा और कैसा होगा इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य की गर्त में हैं... और बेहतर ये है कि इन प्रश्नों में उलझने की बजाए हम सांसारिक जीवन के अपने कर्तव्यों को पूरा करने में ध्यान लगाएं, जिन कर्तव्यों को निभाने की हमारा रब्ब हमसे अपेक्षा रखता है !!!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

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