इस्लाम में गुलाम और लौंडी
इस्लाम के बारे में कई अन्य गलत धारणाओं (तसव्वुर) में से एक धारणा यह भी है कि इस्लाम गुलामी को मंजूरी देता है और अपने मानने वालों को इजाज़त देता है कि वह युद्ध के कैदियों, खासकर महिलाओं को दासी बनाएं और उनसे विवाहेतर (extra-marital) संबंध रखें। लेकिन सच्चाई यह है कि इस्लाम का गुलामी और रखेल-प्रथा से ज़रा भी संबंध नहीं है। इसके उलट इस्लाम में इस तरह की प्रथाओं की पूरी तरह से मनाही है। जो धर्म मानवता की उन्नति के लिए उतरा है उसका संबंध इस तरह की ज़ालिमाना और घृणा योग्य प्रथाओं से निकालना बेहद अपमानजनक है।
जिस बात को समझने की ज़रूरत है और जो शायद इस गलतफ़हमी की असल वजह भी है वह यह कि इस्लाम ने गुलामी की प्रथा को खत्म करने के लिए एक क्रमिक प्रक्रिया (gradual process) को अपनाया यानी एकदम से इसको खत्म करने का हुक्म देने की बजाय धीरे-धीरे इसे समाप्त किया गया क्योंकि उस समय अरब के समाजी हालात को देखते हुए यही सही रास्ता था। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस्लाम से पहले गुलामी की प्रथा अरब समाज का एक अभिन्न हिस्सा थी। लगभग हर घर में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष गुलाम मौजूद थे। इसके दो बड़े कारण थे: पहला, उस समय आम नीति यह थी कि युद्ध के कैदियों को गुलामों के रूप में विजयी सेना में बाँट दिया जाता था। दूसरा, उस समय अरब में गुलामों के व्यापक बाज़ार हुआ करते थे जहाँ हर उम्र के महिला-पुरुष गुलाम किसी समान की तरह बिका करते थे।
इन हालात में जहाँ गुलामी अरब समाज की ज़रूरत बन चुकी थी, इस्लाम ने इसे खत्म करने के लिए धीरे-धीरे लेकिन सधे हुए कदम बढ़ाये। इसको खत्म करने का तत्काल आदेश दे दिया जाता तो बड़ी सामाजिक और आर्थिक (social & economic) परेशानियाँ पैदा हो जाती। गुलामों की इतनी बड़ी संख्या जो कि अभी तक विभिन्न परिवारों पर निर्भर थी, उनकी ज़रूरतें पूरा करना समाज के लिए नामुमकिन हो जाता। इसके अलावा राज्य के ख़ज़ाने की भी यह स्थिति नहीं थी कि सब को स्थायी आधार दे सके। उनमें बड़ी संख्या बूढ़े थे जो खुद की रोज़ी-रोटी के लिए कुछ नहीं कर सकते थे, उन्हें एकदम आज़ाद करने पर भीख मांगने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचता और वह समाज पर आर्थिक बोझ बन जाते। गुलाम महिलाओं और लड़कियों का मामला और भी नाज़ुक था, गुलामी के कारण उनका नैतिकता (अख्लाकियात) का स्तर पहले ही बहुत कम हो चुका था और अचानक मुक्त कर देने से वेश्यालयों में भारी बढ़ोतरी होती।
इस तरह की क्रमिक प्रक्रिया को क्यों अपनाया गया यह और बेहतर तरीके से समझने के लिए हम आज के दौर के कई मुसलिम राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं (economies) में ब्याज़ की स्थिति को मिसाल के तौर पर देख सकते हैं। ब्याज़ इन अर्थव्यवस्थाओं का एक अभिन्न अंग बन चुका है इस बात को नकारा नहीं जा सकता इसकी जड़ें इतनी जम चुकी हैं कि इन अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी बन चुका है। समझ रखने वाला हर इंसान इस बात को मानेगा कि अगर आज कोई सरकार अपनी अर्थ प्रणाली (economy) में ब्याज़ से छुटकारा चाहे तो इस्लाम में इसकी पूरी तरह मनाही के बावजूद एक दिन में पूरी व्यवस्था से इसको नहीं हटाया जा सकता, इसके लिए एक क्रमिक प्रक्रिया को अपनाना होगा। इस दौरान ब्याज़ आधारित सौदों को भी बर्दाश्त किया जायेगा और इस तरह के मामलों के लिए अस्थायी (थोड़े वक़्त के लिए) कानून भी बनाये जायेंगे, जिस तरह कुरआन ने गुलामी की प्रथा को समाप्त करने की प्रक्रिया के दौरान अस्थायी निर्देश दिए। एक वैकल्पिक (alternative) आर्थिक व्यवस्था बनायीं जाएगी, इसके बिना अचानक से ब्याज़ को खत्म करने की जल्दी से पूरी व्यवस्था ढह जाएगी जो कि पूरे राज्य के लिए विनाशकारी होगा। इसी तरह के विनाश को रोकने के लिए चौदह सौ साल पहले इस्लाम ने गुलामी को खत्म करने के लिए क्रमिक कदम बढ़ाये।
विभिन्न चरणों में विभिन्न निर्देश दिए गए जिससे धीरे-धीरे समाज से गुलामी की बुराई दूर हो सकी।
यह निर्देश संक्षेप में:[1]
अपने उतरने के शुरुआत से ही कुरआन ने गुलामों को आज़ाद कराने को एक महान पुण्य का दर्जा दिया है और लोगों से प्रभावी तरीके से इस करने का आग्रह (अपील) किया है। कुरआन के इस्तेमाल किये गए शब्दो فَكُّ رَقَبَة (गर्दनें छुड़ाना) से इसकी ज़बरदस्त अपील भाषा का ज्ञान रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है। इस तरह के भाव कुरआन में जहाँ भी आयें हैं उसके संदर्भ (पसमंज़र) से मालूम होता है कि अल्लाह को खुश करने का यह पहला और सबसे बड़ा कदम है।[2]
इसी तरह रसूलअल्लाह (स.व) ने मुसलमानों से इन शब्दों में गुलामों को छुड़ाने का आग्रह किया है: “जो भी एक मुसलमान गुलाम आज़ाद कराता है, उस गुलाम के हर अंग के बदले में अल्लाह आज़ाद कराने वाले का हर अंग नरक से सुरक्षित कर देता है।”[3]
लोगों से आग्रह किया गया कि जब तक वह अपने गुलामों को आज़ाद ना कर दें तब तक वह उनसे भलाई का रवैया रखें। जिस तरह जहालत के दौर में मालिक का गुलामों पर अनियंत्रित (बेकाबू) अधिकार था वह खत्म किया गया। उन्हें बताया गया कि गुलाम भी इंसान हैं और इस नाते उनके भी अधिकार है जिनका उल्लंघन करने का हक़ किसी को नहीं है।
अबू हुरैरा (रज़ि.)रवायत करते हैं कि रसूलअल्लाह (स.व) ने फ़रमाया: “एक गुलाम को खाने और कपड़ों का अधिकार है, और उससे किसी ऐसे काम के लिए नहीं कहना चाहिए जो उसके बस से बाहर हो।”[4]
अबू ज़र अल-गिफ्फारी (रज़ि.) रसूलअल्लाह (स.व) से रवायत करते है: “वह तुम्हारे भाई हैं। अल्लाह ने उन्हें तुम्हारा आज्ञाकारी बनाया है। तो जो तुम खाओ वही उन्हें खिलाओ, जो तुम पहनो वैसा ही उन्हें पहनाओ। और उनसे किसी ऐसे काम के लिए ना कहो जो उनके सामर्थ्य (बस) के बाहर हो और अगर कोई ऐसा काम आ जाए तो उसमें उनकी मदद करो।”[5]
इब्न उमर (रज़ि.) रसूलअल्लाह (स.व) से रवायत करते है: “जिसने भी एक गुलाम को थप्पड़ मारा या उसकी पिटाई की हो तो उसे उस गुलाम को आज़ाद करके इस पाप का प्रायश्चित करना चाहिए।”[6]
अबू मसूद (रज़ि.) कहते है: “मैं एक बार अपने गुलाम को पीट रहा था और मैंने अपने पीछे से आवाज़ सुनी: ‘अबू मसूद! अल्लाह तुम से ज़्यादा ज़ोर रखता है।’ मैंने मुड़ कर देखा तो रसूलअल्लाह (स.व) थे। मैंने तुरंत कहा: हे अल्लाह के रसूल! मैं अल्लाह के लिए इसे आज़ाद करता हूँ।’ रसूलअल्लाह (स.व) ने कहा: ‘अगर तुम ऐसा नहीं करते तो आग की सज़ा पाते।’”[7]
इब्न उमर (रज़ि.) से रवायत है कि एक बार एक व्यक्ति ने रसूलअल्लाह (स.व) से पूछा: “हमें कितनी बार अपने सेवकों को माफ कर देना चाहिए ?” [इस पर] रसूलअल्लाह (स.व) चुप रहे। उसने दुबारा पूछा और रसूलअल्लाह (स.व) इस बार भी चुप रहे। तीसरी बारे पूछे जाने पर आप (स.व) ने फरमाया: “एक दिन में सत्तर बार।”[8]
गैर इरादतन हत्या, ज़िहार, और इसी तरह के अन्य मामलों में गुलाम को छुड़ाना प्रायश्चित्त और सदका (दान) बताया गया।[9]
निर्देश दिया गया कि जो गुलाम पुरुष और गुलाम महिलाएं शादी करने में सक्षम (काबिल) हैं उनकी शादी करा दी जाये ताकि वह नैतिक और सामाजिक दोनों रूप से समाज के बाकी लोगों के बराबर हो सकें।[10]
अगर कोई व्यक्ति किसी की गुलाम महिला से शादी करना चाहता तो उस मामले में बड़ी सावधानी बरती गयी क्योंकि इससे स्वामित्व (मालिकाना) और वैवाहिक अधिकारों के बीच टकराव हो सकता था। इस तरह के लोगों से कहा गया कि अगर वह किसी आज़ाद महिला से शादी करने के हालात में नहीं हैं तो वह किसी ऐसी गुलाम महिला से जो कि मुसलमान और पवित्र हो, उसके मालिक की इजाज़त लेने के बाद शादी कर सकते हैं। इस तरह की शादी में उन्हें उन महिलाओं के महर देने होंगे जिससे उन्हें आज़ाद महिलाओं के बराबर लाया जा सके। कुरआन में आता है:
وَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ مِنكُمْ طَوْلًا أَن يَنكِحَ الْمُحْصَنَاتِ الْمُؤْمِنَاتِ فَمِن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم مِّن فَتَيَاتِكُمُ الْمُؤْمِنَاتِوَاللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَانِكُمبَعْضُكُم مِّن بَعْضٍفَانكِحُوهُنَّ بِإِذْنِ أَهْلِهِنَّ وَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ مُحْصَنَاتٍ غَيْرَ مُسَافِحَاتٍ وَلَا مُتَّخِذَاتِ أَخْدَانٍفَإِذَا أُحْصِنَّ فَإِنْ أَتَيْنَ بِفَاحِشَةٍ فَعَلَيْهِنَّ نِصْفُ مَا عَلَى الْمُحْصَنَاتِ مِنَ الْعَذَابِذَٰلِكَ لِمَنْ خَشِيَ الْعَنَتَ مِنكُمْوَأَن تَصْبِرُوا خَيْرٌ لَّكُمْوَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
[٤: ٢٥]
और तुममें से जो आज़ाद मुसलमान औरतों से निकाह करने कि हैसियत में ना हों, उन्हें चाहिए कि वह तुम्हारी उन मुसलमान लौंडियों से निकाह कर ले जो तुम्हारे अधिकार में हों। [और यह हक़ीकत धयान में रखें कि] अल्लाह तुम्हारे ईमान को खूब जानता है, तुम सब एक ही जिंस से हो। सो उनके मालिकों की इजाज़त से उन के साथ निकाह कर लो और दस्तूर के मुताबिक उनके महर भी उनको दो, इस शर्त के साथ कि वह पाक दामन रही हों, बदकारी करने वाली और चोरी-छुपे आशनाई करने वाली ना हों…..
यह इजाज़त तुम में से उनके लोगों के लिए है जिन्हें गुनाह में पड़ जाने का अंदेशा हो। वरना सब्र करो तो तुम्हारे लिए बेहतर है और [भरोसा रखो कि सावधानी के बाद भी कोई गलती हो जाती है तो] अल्लाह माफ़ करने वाला है, हमेशा दयावान है। (4:25)
ज़कात में एक हिस्सा فِي الرِّقَابِ (गर्दनें छुड़ाने) के लिए रखा गया ताकि गुलामी को खत्म करने में सरकारी खज़ाने से मदद मिल सके।[11]
व्यभिचारिता (ज़िना) को अपराध करार दिया गया जिसके नतीजे में वह वेश्यालय जो गुलाम औरतों के आधार पर चल रहे थे बंद हो गए, और अगर किसी ने गुप्त रूप से यह कारोबार करने की कोशिश की तो उन्हें मिसाल बनाने वाली सज़ा (exemplary punishment) दी गयी।
लोगों को बताया गया कि वह सब अल्लाह के गुलाम हैं और عبد गुलाम पुरुष और أمة गुलाम महिला के स्थान पर فاتي लड़का/आदमी और فتاه लड़की/औरत शब्द इस्तेमाल करें ताकि मानसिकता में बदलाव आये और पुरानी चली आ रही धारणाएं बदली जा सकें।[12]
आखिरी पैगंबर जब आये तो गुलामी की प्रथा का एक बड़ा स्रोत (वजह) युद्ध के कैदी हुआ करते थे। जब ऐसी स्थिति मुसलमानों के लिए पैदा हुई तो कुरआन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उन्हें गुलाम नहीं बनाया जा सकता बल्कि कैदी बनाकर ही रखा जायेगा। इसके बाद भी दो ही सूरते होंगी: उन्हें या तो मुक्ति धन (फिदया) लेकर छोड़ दिया जायेगा या बिना मुआवज़े के एहसान के तौर पर। इसके अलावा कोई और सूरत नहीं है।
अंत में यह हुक्म दिया गया:
وَالَّذِينَ يَبْتَغُونَ الْكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًاوَآتُوهُم مِّن مَّالِ اللَّهِ الَّذِي آتَاكُمْ
[٢٤: ٣٣]
और तुम्हारे गुलामों में से जो मुकातबत चाहे, उनसे मुकातबत कर लो। अगर तुम उनमें योग्यता पाओ [ताकि वह भी पवित्रता में आगे बढ़ें]। और [इसके लिए अगर ज़रूरत हो तो मुसलमानों] उन्हें उस माल में से दो जो अल्लाह ने तुम्हें दिया है। (24:33)
उपर दी गयी सूरह नूर की आयत में मुकातबत का निर्देश दिया गया है। इसका मतलब है कि एक गुलाम अपने मालिक के साथ अनुबंध (contract) करेगा जिसके अनुसार उसे तय समय के अंदर एक तय रकम चुकानी होगी या फिर अपने मालिक के लिए कोई विशिष्ट कार्य (ख़ास काम) करना होगा। एक बार इन दोनों में से कोई एक काम वह कर देता है तो फिर वह आज़ाद होगा आसान लफ़्ज़ों में कहें तो उसे साबित करना होगा कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। उल्लेख की गयी आयत में मुसलमानों को निर्देश दिया गया है कि अगर गुलाम यह अनुबंध करना चाहे और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनने की काबिलीयत रखता हो तो मुसलमानों को यह स्वीकार करना होगा। इसके बाद यह कहा गया है कि मुसलिम राज्य को सरकारी खज़ाने में से, जिसको यहाँ अल्लाह का धन कहा गया है ऐसे गुलामों की मदद करनी चाहिए। आयात के शब्दों से साफ़ है कि मुकातबत का हक़ गुलाम पुरुषों की तरह गुलाम महिलाओं को भी दिया गया था। दूसरे शब्दों में असल में यह एलान था कि गुलाम अब अपना भाग्य खुद तय कर सकते हैं और जब चाहें खुद को आज़ाद करा सकते हैं।
[1]. देखें: ग़ामिदी, मीज़ान, 479-482।
[2]. कुरआन 90:13।
[3]. सहीह मुसलिम, भाग. 2, 1147, (न. 1509)।
[4]. पूर्वोक्त, भाग.3, 1284, (न. 1662)।
[5]. पूर्वोक्त, भाग.3, 1282, (न. 1661)।
[6]. पूर्वोक्त, भाग.3, 1657, (न. 1279)।
[7]. पूर्वोक्त, भाग.3, 1659, (न. 1281)।
[8]. अबू दाऊद भाग.4, 341, (न. 5164)।
[9]. कुरआन: 4:92, 58:3, 5:89।
[10]. कुरआन: 24:32-33।
[11]. कुरआन: 9:60।
[12]. सहीह मुस्लिम भाग.4, 1764, (न. 2249)।
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प्रारम्भिक दौर के इस्लाम की एक व्यवस्था पर एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि प्राचीन समय मे मुस्लिमों को बिना विधिवत विवाह के अपनी दासी से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति क्यों दी गई थी? क्या ये किसी स्त्री का शोषण और व्यभिचार नही..??....... आइए इसका उत्तर जानने की कोशिश करते हैं ..॥
सोचिए कि आपके शहर का रेड लाइट एरिया बंद करवा दिया जाए और आपसे कहा जाए कि उन शरीर बेचने वालियों से आप शादी कर के उनके जीवन यापन का सहारा बन जाएं तो कितने लोग राज़ी होंगे इसके लिए ?? सोच मे पड़ गए न ?
प्री इस्लामिक अरब समाज मे दो प्रकार की दासियां होती थीं एक तो वे जो या तो किसी गुलाम स्त्री से पैदा होने के कारण जन्म से ही गुलाम होती थीं या फिर किसी गरीब और जाहिल घराने मे पैदा होती थीं और अपने ही घरवालों द्वारा बचपन मे ही बेच दी जाती थीं , और ये प्रचलित था कि गुलाम की अपनी कोई इच्छा अनिच्छा नही होती, बल्कि उसको खरीदने वाला उस गुलाम का जैसे भी चाहे, उपयोग या उपभोग करे, प्रीइस्लामिक अरब में एक गुलाम स्त्री को अपना शरीर अपने मालिक को सौंपना ही पड़ता था, वो किसी भी प्रकार से अपने सतीत्व को बचाकर नही रख सकती थी, .... दूसरे प्रकार की गुलाम वे इज्जतदार घरों की स्त्रियाँ होती थीं जिन्हें युद्ध मे उनकी सेना की पराजय के बाद गुलाम बना कर अरब के गैर मुस्लिम उन स्त्रियों की इच्छा अनिच्छा की चिंता के बगैर उनसे भी हर प्रकार का काम लेने के साथ ही साथ उनके शारीरिक शोषण भी किया करते थे
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क्योंकि क़ुरआन में सूरह मुहम्मद, सूरह 47, की चौथी आयत में स्पष्टता से ये विधान दे दिया गया है कि युद्धबन्दियों को मुसलमान सदा के लिए गुलाम बनाकर नही रख सकते, बल्कि या तो उनसे कुछ अर्थदंड लेकर उन्हें रिहा कर दें, या बिना कुछ लिए, एहसान के तौर पर रिहा कर दें.... इसके सिवाय तीसरा कोई रास्ता युद्धबन्दियों के लिए क़ुरआन ने नही बताया है ...
.... अतः इस्लाम मे जिन दासियों के साथ बिना विधिवत विवाह के केवल दासी की सहमति मिल जाने पर ही उस से ताल्लुक बनाने की इजाजत दी गई है ये उपरोक्त पहले प्रकार की यानि जन्म से बनी दासियां थीं, अन्य कोई दासी नहीं .... ये वे दासियां थीं जिनके शरीर को काफिरों ने कई बार खरीद बेच के भोगा था.... मुस्लिमों को ये आदेश दिया गया कि इन औरतों को सदा के लिए अपना लें, ताकि इनका आगामी जीवन सम्मान और आराम के साथ बीते....
इन औरतों से ताल्लुक बनाने के साथ ही मुस्लिमों पर जीवन भर इनका भरण पोषण करना अनिवार्य यानी फर्ज़ हो गया और इनके बच्चों को अपना नाम देना और उन बच्चों का पालन पोषण करना व उन्हें सम्पत्ति मे हिस्सेदार बनाना भी फर्ज हो गया
और क्या इन औरतों से मुस्लिमों को बिना विवाह किए ही सम्बन्ध बनाने की अनुमति दी गई थी ? इस्लाम मे विवाह किन्हीं कर्मकाण्डो के होने से हुआ नहीं माना जाता बल्कि वर वधू द्वारा एक दूसरे को दिल से पति पत्नी मान लेने और एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध रहने यानि वफादार रहने की प्रतिज्ञा से हुआ माना जाता है ... इसी कारण नबी स. के समय भी मूर्तिपूजक धर्म छोड़कर साथ साथ इस्लाम कुबूल करने वाले दम्पति का न कभी दोबारा इस्लामी रीति से निकाह करवाया गया न ही आज भी ऐसी स्थिति मे इस्लाम कुबूल करने वाले दम्पति का दोबारा निकाह करवाया जाता है ... बल्कि उनके पिछले धर्म के गैर इस्लामी नियमानुसार हुए विवाह को ही मान्यता दी जाती है ... क्योंकि उसी विवाह के समय से वे एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध हैं ।
इसी तरह क्योंकि मुस्लिमों ने अपनी कनीज़ों की मर्ज़ी जानी और उसके बाद दोनों ने एक दूसरे को दिल से अपना पति पत्नी मान लिया इसलिये उनका विवाह भी सम्पन्न ही हुआ
किसी घर परिवार वाली लड़की से विवाह करते समय गवाह और काज़ी आदि उस लड़की के घरवाले, अपनी बेटी के भविष्य की सुरक्षा के लिए और समाज मे अपना सम्मान बनाए रखने के लिए बुलाते हैं, ताकि दुनिया जान ले कि उनकी बेटी ससम्मान फ़लाँ शख्स के घर उसकी पत्नी बन के चली गई है
लेकिन क्योंकि उन दासियों का कोई घर परिवार ही नहीं था और वो पहले से ही अपने मालिकों के घर मे रह रही थीं, और पुराने अरब रिवाज़ के कारण समाज पहले से ही उनके मालिकों को उन कनीज़ों के शरीर का अधिकारी मानकर उन कनीज़ों को कुंवारी नही मानता था, इसलिए समाज को दिखाने के लिए कर्मकाण्ड करने का न कोई फायदा था और न कोई ज़रूरत, हां लेकिन ये जरूरी था कि क्योंकि उन लड़कियों के पिता और भाई जैसे कोई संरक्षक नहीं थे, अत: उन लड़कियों के भविष्य की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मुस्लिम स्वयं उठाएं, और उन कनीज़ों से शरीर सुख लेने के बाद मुस्लिम उन्हें काफिरो की तरह किसी और के हाथों बेच न दें, बल्कि हमेशा अपनी पत्नी होने का सम्मान अधिकार और प्यार दें, जो कि मुस्लिमों ने दिया ।
कुछ हदीसों से प्रतीत होता है कि मुस्लिमों ने युद्ध में गैरमुस्लिमों को पराजित करने के बाद उनकी स्त्रियों को गुलाम बनाकर रख लिया था, .... ये ज़रूर वो स्त्रियां थीं जो कुफ़्फ़ार के यहां भी ग़ुलाम थीं और कुफ़्फ़ार उन्हें मुसलमानों से युद्ध लड़ने जंग के मैदान में ले आये थे... इन्हीं पहले से गुलाम स्त्रियों को मुस्लिम उन स्त्रियों की सहमति से अपने वास रख सकते थे, किसी आज़ाद रही स्त्री को नही.. जो स्त्रियां पहले आज़ाद थीं, उन्हें गुलाम बनाकर रख लेना तो इस्लाम की प्रकृति के ख़िलाफ़ है , बुख़ारी शरीफ़ और अबू दाऊद शरीफ़ ने नबी सल्ल० की हदीस है जिसमें किसी भी आज़ाद मर्द-औरत को गुलाम बनाना बहुत बड़ा गुनाह बताया गया है....
दरअसल युद्ध मे पराजित लोगों को मुस्लिम दुश्मनी निकालने के लिए प्रताड़ित करने को नही बल्कि इस कारण दास बनाते थे क्योंकि एक तो उस समय युद्धबन्दियों को जेल में बंद करके रखने वाली वो व्यवस्था नही थी जो आज विश्व भर में प्रचलन में है, बल्कि उस समय युद्धबन्दियों को विजेता समुदाय के घरों में घरेलू नौकरों के तौर पर रखे जाने की व्यवस्था थी, जिस व्यवस्था की स्वीकार्यता होने के कारण इसका पालन मुस्लिमों ने भी खास उद्देश्यों से किया.... इन बंधकों के बदले मुस्लिम गैरमुस्लिमों से उनके पास बंधक मुस्लिम बन्दियों को छुड़ाने के समझौते कर सकते थे जैसे कि सही मुस्लिम में मुस्लिमों के पास बंधक बने कबीले बनु फ़ज़ारा के युद्ध बन्दी स्त्री पुरुषों का ज़िक्र है जिनके बदले गैरमुस्लिमों से एक समझौता कर के मुस्लिम युद्ध बन्दियों को मुस्लिमों ने आज़ाद करवाया था.... इस प्रकार के बंधक स्त्रियों और पुरुषों से इस कारण कोई अपमानजनक व्यवहार भी मुस्लिम नही करते थे, ताकि यदि किसी समझौते के तहत गैरमुस्लिमों के यहाँ बन्दी मुस्लिमों को छुड़वाया न भी जा सके, तो भी उनके यहां बन्दी मुस्लिम बंधकों के साथ अच्छा व्यवहार करने की उन गैरमुस्लिमों को सन्मति मिले.....इसी नाते ऐसी युद्धबन्दी स्त्रियों के साथ भी मुस्लिम पक्ष का कोई व्यक्ति प्रणय निवेदन भी नही कर सकता था, शारीरिक संबंध बनाने की बात तो बहुत दूर है, ये बात भी बनु फ़ज़ारा के युद्ध बंधकों वाली ही रिवायत में पता चल जाती है जब एक मुस्लिम व्यक्ति को घरेलू नौकरानी के तौर पर दी गई बनु फ़ज़ारा की एक सुंदर युद्धबन्दी स्त्री पसन्द आ गई थी पर वे इस हदीस में कम से कम तीन स्थानों कसम खाकर कहते कि मैंने उस स्त्री को कभी भी नही छुआ... और अंततः गैरमुस्लिमों के साथ मुस्लिमों का समझौता हुआ और दोनों तरफ के युद्धबन्दियों को एक दूसरे के बदले रिहा कर दिया गया, और वो स्त्री जैसी पवित्र मुस्लिमों के पास गुलाम बनकर आई थी, वैसी ही पवित्र उसके लोगों के पास वापस पहुँचा दी गई
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कल यूट्यूब पर एक मुफ़्ती साहब की वीडियो देखी, जिसमें वो बता रहे थे कि जंग में गुलाम बनाई गई औरतों से हमबिस्तरी की इस्लाम में इजाज़त है....
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.... मुफ़्ती साहब को मालूम होना चाहिए कि इस्लाम ग़ुलामी प्रथा को ख़त्म करने आया था, न कि नए ग़ुलाम बनाने के हुक़्म देने,
....ये तो कुफ़्फ़ार ए अरब का तरीक़ा था कि वो जंग में हारने वाले आज़ाद लोगों को पकड़ कर हमेशा के लिए ग़ुलाम बना लेते थे क़ुरआन में सूरह मोहम्मद में अल्लाह ने इस बुरी प्रथा को ख़त्म करते हुए मुसलमानों को हुक़्म दिया कि "जंग के कैदियों को या तो फिदया लेकर रिहा कर दो, या एहसान के तौर पर बिना कोई क़ीमत लिए ही उन्हें रिहा कर दो"....(47:4)
....तो तमाम अहादीस से भी ये पता चलता है कि आप सल्ल० ने जंग में क़ैद की गई तमाम औरतों को बाइज़्ज़त आज़ाद कर दिया था, आज़ाद होने के बाद उनमें से कई औरतों ने इस्लाम भी कुबूल किया है, और उनमें से हज़रत जुवैरिया बिन्त हारिस रज़ि० जैसी कुछ ने बाद में नबी सल्ल० से निकाह भी किया है...!!
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..... जो बांदियाँ क़ुरआन में मुसलमानों के लिए हलाल बताई गई हैं, दरअसल वो कभी आज़ाद रही औरतें नही थीं, बल्कि ये कुफ़्फ़ार ए अरब की वो बांदियाँ थीं, जो कुफ़्फ़ार के हाथों नस्ल दर नस्ल से गुलाम बनी हुई थीं, जिन्हें कई बार खरीदा बेचा गया था, और उनकी इज़्ज़त को सलामत नही रखा था, ऐसी बांदियों के लिये अल्लाह ने मुसलमानों को हुक़्म दिया कि वो जब मुसलमानों के कब्ज़े में आएं तो मुसलमान उन बाँदियों की सहमति मिल जाने के बाद उनको अपनी पत्नी का दर्जा दे दें, उन्हें एक इज़्ज़त की ज़िंदगी दे दें और उनके जीवन भर के भरण पोषण का सहारा बन जाएं... इसकी मिसाल मारिया किबतिया से ली जा सकती है जो या तो नस्लन ग़ुलाम थीं, या बहुत कमसिन उम्र में ग़ुलाम बना दी गई थीं... इन्हें नबी सल्ल० के पास नज़राने के तौर पर भेजा गया था, और आप सल्ल० ने उन्हें गुलाम न रखते हुए अपनी पत्नी का दर्जा दे दिया था !!
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युद्ध में बन्दी बनाए गये स्त्रियों और पुरुषों से मुस्लिम कैसा व्यवहार करते थे इसका अनुमान बनू मुस्तलिक़, एक यहूदी क़बीले द्वारा मुसलमानों पर चढ़ाई करने, और उसके बाद हुए युद्ध में मुस्लिमों की जीत के बाद बन्दी बनाई गईं जुवैरिया बिन्त हारिस रज़ि० और उनके पुरूष रिश्तेदारों के वृत्तांत से भी आप लगा सकते हैं, इनके पति इसी युद्ध में मारे गए थे और ये विधवा हो गई थीं, इन्हें दासी के रूप में एक सहाबी हज़रत साबित बिन क़ैस रज़ि० को दिया गया था, पर हज़रत जुवैरिया रज़ि० ऐश्वर्य में पली बढ़ी थीं उन्हें घरेलू नौकरानी के तौर पर काम करने में असुविधा होने लगी और वे फ़रियाद लेकर नबी सल्ल० के पास गईं नबी सल्ल० ने उनकी विपदा सुनकर उनकी आज़ादी की क़ीमत चुका दी, फिर आप सल्ल० ने हज़रत जुवैरिया रज़ि० को विवाह का प्रस्ताव दिया जिसे स्वीकार करके हज़रत जुवैरिया रज़ि० ने नबी सल्ल० से विवाह कर लिया व मुसलमानों के मध्य सबसे ज्यादा सम्माननीय महिलाओं में से एक बन गई थीं इसके साथ ही उनके पिता और बनु मुस्तलिक़ के अन्य कई बंधकों को भी मुस्लिमों ने आज़ाद कर दिया, बाद में इन लोगों ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया ...(अबू दाऊद, किताब-30, हदीस-3920)
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