क्या क़ुरान में पृथ्वी को चपटी कहा गया है?
एक भाई साहब ने जानना चाहा था कि पाक कुरान मे पृथ्वी के भुगोल का वर्णन केसा है, क्या वह विज्ञान सम्मत है या नहीं ?
भाई को गलतफहमी थी कि कुरान पाक मे धरती को चपटी बताया गया है, हालांकि पाक कुरान मे ऐसी कोई भी आयत नहीं जो धरती के चपटा होने की वज़ाहत करती हो बल्कि कुरान पाक मे कई जगह धरती को विस्तृत बताया गया है जो कि वो है, और विस्तृत होने का मतलब चपटा होना नहीं होता।
.... फिर कुछ जगह कुरान पाक मे ज़मीन को कालीन कहा गया है, लोग इसपर आक्षेप लगा लेते हैं कि कालीन चपटा होता है, अर्थात कुरान मे जमीन को चपटा कहा गया, परंतु जमीन को कालीन कहने से उसको चपटा मान लेना अन्याय है क्योंकि कालीन तो जिस सतह पर डाल दो उसी सतह के आकार मे ढल जाती है, अगर कालीन को किसी बड़ी गोल चट्टान पर लपेट दो तो कालीन गोल आकार मे भी ढल जाएगी, वास्तविकता ये है कि कालीन असुविधाजनक फर्श पर बिछाने का कपड़ा होती है, जिसपर लोग आराम से चल फिर सकते हैं, कुरान मे जमीन को कालीन कहने का मतलब ग्लोब के आउटर क्रस्ट से है, हम जानते हैं कि ग्लोब का केन्द्र हजारों डिग्री के गर्म लावे की उपस्थिति के कारण अत्यधिक गर्म और तरल अवस्था मे है जिसपर चलना तो क्या जीवन का पनपना भी नामुमकिन था, लेकिन धरती की बाहरी परत यानि आउटर क्रस्ट अपने केन्द्र विपरीत बहुत ठण्डी, जीवन के अनुकूल और आराम से चलने फिरने लायक ठोस है ... इसी कारण धरती को कुरान मे कालीन कहा गया क्योंकि इसपर मनुष्य आराम से चल फिर सकते हैं, न कि धरती को चपटा बताने के उद्देश्य से।
~ ज़िया इम्तियाज़।
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क़ुरान में बताए दो मग़रिब और दो मशरिक़ से क्या मुराद है।
अक्सर मैंने कुछ गैरमुस्लिम दोस्तों को ये कहकर पवित्र कुरआन का मजाक उड़ाते देखा है कि कुरान 55:17 मे अल्लाह को दो मगरिबो और दो मशरिको का स्वामी बताया गया है, यानि कुरान मे धरती पर दो पूर्व और दो पश्चिम बताए गए हैं ... जबकि विज्ञान के अनुसार ऐसा होना सम्भव ही नहीं है ॥
.... दरअसल मजाक उड़ाने वालों से ये गलती होती है कि वो मशरिक व मगरिब का अर्थ धरती पर स्थित किसी एक बिन्दु को समझ लेते हैं, जबकि हम दिशा ज्ञान कराने वाले इन अरबी शब्दों का शाब्दिक अर्थ देखें तो बात स्पष्ट हो जाती है कि मशरिक (पूर्व) व मगरिब (पश्चिम) धरती के एक बिन्दु का नाम नहीं हैं ॥
मशरिक शब्द का मूल श-र-क है जिसका अर्थ "उदय होना" है , इसी तरह मगरिब शब्द का मूल ग-र-ब है, जिसका अर्थ अस्त होना है , यानि ये दोनों शब्द मशरिक व मगरिब सूर्य की स्थितियों सूर्योदय और सूर्यास्त से सम्बन्धित हैं ..
और जब इन शब्दों का प्रयोग दिशा ज्ञान के लिए किया जाता है तो मशरिक का अर्थ होता है वो स्थान जहाँ से सूर्य निकलता है, और मगरिब का अर्थ होता है वो स्थान जहाँ पर सूर्य डूबता है, यानि जिस भी स्थान पर सूरज निकले, डूबे हर वो स्थान मशरिक मगरिब होगा ! अब जिन्हें विज्ञान का कुछ ज्ञान है वो लोग जानते हैं कि सूरज वर्ष मे कभी एक ही स्थान से नहीं निकलता, बल्कि हर रोज़ एक नए स्थान से निकलता है, सूरज का ये स्थान परिवर्तन दरअसल धरती के सूर्य की परिक्रमा करने के विशेष आकार के परिपथ के कारण होता है , और इसी स्थान परिवर्तन के कारण हमारी धरती पर मौसम बदलते हैं और दिन छोटे बड़े होते हैं, विश्व के मानचित्र मे आपको तीन मानक रेखाओं का अंकन दिखाई देगा (कर्क रेखा, भूमध्य रेखा और मकर रेखा )
22 जून को सूर्य अपने आरम्भिक बिन्दु , कर्क रेखा पर निकलता है, हमारे देश मे वो दिन वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है और रात सबसे छोटी, इसके अगले दिन ही सूर्य इस बिन्दु पर न निकलकर इससे थोड़ा दक्षिण की ओर होकर निकलता है इसी कारण दिन और रात के समय मे पिछले दिन से थोड़ा परिवर्तन भी आ जाता है, फिर सूरज हर अगले दिन एक एक बिन्दु दक्षिण की ओर होकर निकला करता है, इस से दिन और रात के समयों मे भी रोज परिवर्तन आया करता है, इस तरह चलते हुए 23 सितंबर को सूर्य भूमध्य रेखा पर पहुंचता है, उस दिन रात और दिन बराबर होते हैं, अगले दिन फिर सूर्य भूमध्य रेखा से भी थोडा दक्षिण हो कर निकलता है , इसी तरह चलते हुए सूर्य अपने अंतिम बिन्दु मकर रेखा पर 22 दिसम्बर को पहुंचता है, और उस दिन वर्ष का सबसे छोटा दिन होता है और सबसे लम्बी रात ॥ इस बिन्दु के बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर लौटने लगता है, और 22 जून तक उत्तर की ओर चलता है ॥ सूरज हमेशा निकलने डूबने के इन्हीं दो आदि और अंत के बिन्दुओं (कर्क और मकर रेखा) के बीच चलता रहता है , कुरान 55:17 मे सूर्य की चाल के आदि और अंत के इन्हीं दो मुख्य बिन्दुओं की ओर इशारा किया गया है ॥
लोगों के मन मे प्रश्न उठेगा कि जब सूर्य रोज नए स्थान पर निकलता डूबता है, तो मशरिक व मगरिब दो कहाँ रहे, वो तो बहुत सारे हो गए .... तो भाईयों, कुरान भी ये दावा नहीं करता कि मशरिक और मगरिब केवल दो ही हैं, कुरान 55:17 मे मशरिक व मगरिब मे से प्रत्येक के लिए द्विवचन का प्रयोग किया गया है यानी दो मशरिको व दो मगरिबों का विशेष कर के जिक्र किया गया है, न कि ये दावा किया गया है कि मशरिक मगरिब दो ही हैं बल्कि वहाँ कहने का अर्थ ये है कि अल्लाह सूर्य की चाल के आरम्भिक बिन्दु का भी स्वामी है और अंतिम बिन्दु का भी ! व्याकरण मे किसी जीव या वस्तु के "आदि से अंत तक" की बात एक व्यंजना के रूप मे प्रयुक्त होती है, जिसका अर्थ उस जीव/वस्तु के पूरे अस्तित्व से होता है, जैसे कोई व्यक्ति अपने प्रिय से कहे कि "मैं सर से पांव तक तुम्हारा हूँ", तो इसका अर्थ उस व्यक्ति के केवल दो अंग, सिर और पैर ही नहीं बल्कि उस व्यक्ति का पूरा अस्तित्व होता है, उसी तरह यदि कुरान मे ये कहा गया है कि अल्लाह आदि और अंत वाले मगरिबों और मशरिकों का स्वामी है तो इसका अर्थ केवल दो स्थानों से नहीं बल्कि इन दो बिन्दुओं के बीच के सारे स्थानों से भी है, कि अल्लाह इन सारे स्थानों का भी स्वामी है .... कुरान 70:40 मे मशरिकों व मगरिबों के लिए द्विवचन की बजाय बहुवचन का प्रयोग कर के ये स्पष्ट कर देता है कि मशरिक व मगरिब दो से बहुत अधिक हैं ॥
~ ज़िया इम्तियाज़।
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सृष्टि निर्माण में कितने दिन।
कुरआन के बारे में ये प्रश्न पूछा है।
1. दो दिन में धरती बनायी (41:9)
2.चार दिन में पहाड बनाये (41:10)
3. दो दिन में सात आकाश बनाये (41:12)
सूरा युनुस 10:3 तुम्हारा रब वही अल्लाह हैं जिसने धरती और आकाशों को 6 दिन में बनाया..
क्या मुल्लों को गिनती नहीं आती हैं?....... 2+4+2=8
इस प्रश्न का उत्तर भाई मुश्फिक सुल्तान ने बहुत अच्छे ढंग से दिया है, वो उत्तर लिखने से पहले मैं अपनी ओर से भी एक बात पाठकों को बता दूं कि जब बात अल्लाह की ओर के दिन की होती है तो वह 24 घण्टे वाला सूर्य दिवस नहीं बल्कि एक निश्चित काल अवधि होता है ये काल अवधि बहुत ज्यादा समय की भी हो सकती है और थोड़े समय की भी जितनी अवधि अल्लाह नियत करना सुनिश्चित करे....
वैसे दिन का अर्थ ही होता है एक निश्चित कालावधि, हमारा सूर्य की चाल के अनुसार 24 घण्टे की समयसीमा मे बंटा दिन भी एक छोटी सी निश्चित कालावधि ही है...
बहरहाल....पवित्र कुरान को पढ़कर ये बात स्पष्ट पता चलती है कि अल्लाह ने अलग अलग कार्यों के लिए अलग अलग समयावधि के काल नियत कर रखे हैं ये कालावधि कहीं मनुष्यों के हिसाब से 1000 वर्ष है तो कहीं 50,000 वर्ष ... तो इस बात को दिमाग़ मे रखकर समझिए कि कुरान मे धरती और आकाश के निर्माण वाले ये दिन मानवीय संसार के दिन नही बल्कि उनसे सम्भवत: हजारों गुना ज्यादा लम्बा काल है ... बल्कि इस बात को यूं समझना चाहिए कि अल्लाह ने ब्रह्माण्ड के निर्माण के लिए कार्य को 6 समान काल अवधियों के चरणों मे बांट कर किया .... अब मुश्फिक भाई का उत्तर पढ़िए गणित के सम्बन्ध मे
उत्तर
ये आयात सूरह 41 फुस्सिलत की हैं
सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि कुरआन की अधिकतर आयात में आसमानों और धरती को ६ दिन (काल) में बना हुआ कहा गया है. उदाहरण के लिए देखिये कुरआन 7:54, 10:3, 11:7; 25:51, 32:4, 50:38, 51:4 आदि. इसके बाद कुरआन की व्याख्या का एक मूल सिद्धांत ध्यान में रखना चाहिए कि कुरआन की कुछ आयात अन्य आयात की व्याख्या करती हैं.
अब आइये आपके प्रश्न की और.
इस प्रश्न करने वाले ने यहाँ गलती यह खायी है कि 9-12 आयात के वर्णन को अनुक्रमिक (sequential) समझ लिया है जबकि यहाँ केवल प्रत्येक वस्तु का निर्माण काल बताया जा रहा है और गहरे अध्यन से पता चलता है कि यहाँ भी अन्य स्थानों की तरह 6 ही दिन (काल) में आकाश और धरती का उत्पन्न होना बताया गया है .
इस सूरह 41 की आयत ११ में जो अरबी शब्द ثم "सुम्मा" आया है उसके शब्दकोष में दो अर्थ हैं
१) फिर/इसके बाद
२) इसके अतिरिक्त/इसके साथ ही
यदि यहाँ पहले अर्थ का प्रयोग किया जाए तो सृष्टि निर्माण की संख्या 8 बनेगी और यह उन आयात के साथ विरोध करेंगी जहां सृष्टि निर्माण का समय 6 दिन बताया गया है . लेकिन इस अर्थ का प्रयोग यहाँ उचित नहीं है बल्कि "सुम्मा" का अर्थ "इसके साथ साथ ही (moreover)'' ऐसा करना ही उचित है. इसका कारण यह है कि कुरआन की सूरह 79 नाज़िआत की आयात 27-33 में स्पष्ट वर्णन है कि धरती और आसमानों की निर्माण प्रक्रिया साथ में ही शुरू हुई क्योंकि धरती भी किसी सौर मंडल और आकाशगंगा का ही भाग है. भूविज्ञान से आज हम यह जानते हैं कि धरती पहले पिघली हुई थी जो जीवन उत्पत्ति के लिए अनुकूल नहीं थी बाद में धरती ठंडी हुई और एक ठोस परत (crust) बन गयी. ध्यान रहे कि यह सब कुछ एक लम्बी प्रक्रिया के अधीन हुआ. इसे चट मंगनी पट ब्याह की तरह नहीं समझना चाहिए . इसके बाद धरती पर पानी उत्पन्न हुआ. पानी ने जीवन की उत्पत्ति को संभव बनाया. साथ ही साथ भूतत्त्व परिवर्तन (geological changes) भी हो रहे थे जिनसे पहाड़ उत्पन्न हुए और वे बड़ी बड़ी नदियों के स्रोत बने और अनेक प्रकार के वृक्ष और जानवर एक लम्बी प्रक्रिया से उत्पन्न हुए.
ये सारा वर्णन इन आयात 27-33 में समाया हुआ है. अब इसी वर्णन को सूरह 41 आयात 9-12 में दोहराया गया है और अब आपके प्रश्न का उत्तर भी मिल गया कि आकाश और धरती का निर्माण कैसे हुआ. तो आइये अब हम फिर से आयात 9-12 के वर्णन की गिनती करते हैं
१) धरती को दो 2 दिन (काल) में पैदा किया
२) धरती के ऊपर एक प्रक्रिया के अनुसार चार 4 दिन (काल) में पहाड़ उत्पन्न किये और तरह तरह के जीवों के लिए भोजन एक ठीक अंदाज़े से उत्पन्न किया
३) ثم "सुम्मा" इसके साथ साथ/समानांतर ही आकाश (धरती से अलग जो कुछ है अर्थात सौर मंडल और आकाशगंगाएं आदि) को दो दिन (काल) में बनाकर संवारा. ध्यान रहे कि आयत 11 में आकाश और धरती के साथ साथ निर्माण प्रक्रिया से गुजरने की और इशारा है और यह भी कहा है के आकाश धुवां था जिसे आज का आधुनिक विज्ञान मान चुका है कि शुरू में ब्रह्माण्ड gaseous form में था. तो इन दो दिन (काल) को और धरती के निर्माण के दो दिन (काल) को दो ही गिना जाएगा 4 नहीं .
अब गिनती करते हैं.
2 दिन (धरती और आकाश निर्माण) + 4 दिन (धरती पर पर्वत,पानी,वृक्ष,जीव निर्माण) = 6 दिन
तो कुरआन में कोई विरोध नहीं है।
~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या क़ुरान आसमानों के बीच चांद का होना और उसे तारों से दूर बताता है?
प्रश्न: कुरान सबसे निकटतम आकाश (पहले आकाश) में तारे कंदील के रूप में बुर्ज पर लगे बता रहा है। ठोस आकाश ठोस बुर्ज व वहां लगे कंदील तारे सबसे निकट हैं यह धारणा पूर्णतः अवैज्ञानिक है। इसी प्रकार सात आसमान के मध्य चंद्रमा लिखा जाना उसे चौथे आसमान के निकट अर्थात तारों से स्पष्टतः दूर बताता है। यूसुफ अली का किया 71:15-16 का ये अनुवाद: "'See ye not how Allah has created the seven heavens one above another, And made the moon a light in their midst, and made the sun as a (Glorious) Lamp?"...
जो आयत आप ने दिखाई उसका सही अनुवाद ये है
//क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने किस तरह सात आसमानो को परत दर परत बनाया.. और चन्द्रमा को उसमें नूर बनाया और सूर्य को दीपक बनाया ...
71:15-16//
....इस आयत मे अरबी शब्द "फी हिन्ना" आया है जिसका अर्थ है ..."उसमें" , न कि बीच मे ... यकीन न हो तो शब्दश: अनुवाद देख लीजिए
http://corpus.quran.com/wordbyword.jsp?chapter=71&verse=15
वैसे आपने जहाँ से ये अनुवाद देखा वहाँ और अनुवाद भी थे और किसी भी अनुवाद मे शब्द "बीच" नहीं था, पर आपको समझ नहीं आया
आयत का सीधा सा अर्थ है कि अल्लाह ने उसमे यानी आसमान मे चन्द्रमा को बनाया (आसमान मे बीच मे या ऊपर या नीचे की बात आयत मे नहीं लिखी) और स्पष्ट सी बात है कि चन्द्रमा और सूर्य दोनों अथाह आकाश मे ही हैं न कि कहीं और ॥
तो चन्द्रमा तारों से दूर सिद्ध नहीं होता जिन तारों को अल्लाह ने धरती के आकाश पर सुशोभित किया है। क्योंकि चन्द्रमा भी इसी दुनिया के आकाश के नीचे हम देखते हैं ...
आयत 37:6 के शाब्दिक अर्थ मे भी नहीं लिखा कि जहाँ तारे सुशोभित हैं, वो सबसे निचला आकाश है ... बल्कि आयत मे तो लिखा है कि तारे "दुनिया के आकाश" (समाअद्दुनिया) पर सुशोभित हैं ...
दुनिया का आकाश सबसे निचला आकाश है, ऐसा कुछ पुराने मुस्लिम विद्वानों का मत है, पर कुरान मे ऐसा कुछ नहीं लिखा ... अत: दुनिया के आकाश से नीचे भी आकाश होने की सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो आकाश कोई ठोस संरचना न होकर एक निर्वात अवस्था है ( पवित्र कुरान के अनुसार भी आकाश ठोस नहीं है क्योंकि कुरान के अनुसार चाँद सूरज आकाश मे तैर रहे हैं न कि कहीं जमे हुए हैं ) और निर्वात की प्रकृति आमतौर पर उसका न दिखना होता है तो कुरान मे जिन सात आसमानो की बात कही गई वो निर्वात की अवस्थाएं होने के कारण मनुष्य को साधारण आंखों से नही दिखते ... सो दुनिया के आकाश का सीधा सा अर्थ है वो ऊँचाई जिसको दुनिया वाले आंखों से देख सकते हैं .... और इसके नीचे भी एक से अधिक आकाश हो सकते हैं जिनकी खोज अभी वैज्ञानिक नहीं कर सके हों, और जो मनुष्य को दिखाई न देते हों
उदाहरण के तौर पर कुरान पाक मे लिखा है कि अल्लाह ने आकाश को सुरक्षित छत बनाया ... (21:32)
आसमान हमारे लिये सुरक्षित छत किस तरह है इस विषय में आधुनिक विद्वानों का विचार है कि सम्भवत: ये ओजोन की परत का जिक्र है , वैज्ञानिकों के अनुसार ओज़ोन की एक अदृश्य परत ज़मीन को घेरे हुए है जो सूर्य की हानि कारक परा बैंगनी किरणों एवं अन्य गैसों से हमारी सुरक्षा करती है, ये परत अगर न रहे तो जमीन से इन्सानी जीवन का खात्मा हो जाए, यानी ओज़ोन की परत जो कि तारों, सूर्य और चन्द्रमा से भी नीचे है, वो भी एक न दिखाई देनेवाला आकाश होने की पूरी पूरी सम्भावना है ।
अल्लाह बेहतर जानता है ।
~ ज़िया इम्तियाज़।
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हमारे एक भाई साहब पूछ रहे हैं कि अल्लाह ने कायनात 6 दिन लगाकर क्यों बनाई , "होजा" कहकर तुरंत क्यों न बना दी जबकि यह तकनीक क़ुरआन सिद्ध है ??
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.... कमाल है भाई, अभी आपको ये समस्या है कि अल्लाह ने तत्क्षण ब्रह्मांड का निर्माण क्यों नहीं कर दिया, और अभी चन्द दिनों पहले आपको ही ये समस्या भी थी कि कुरआन में ब्रह्मांड के निर्माण की अवधि बहुत कम सिद्ध हो रही है,
..... याद कीजिये, आप ही ने कहा था कि क़ुरआन में अल्लाह का एक दिन कहीं 1000 साल, कहीं 10000 साल, और कहीं 50000 साल के बराबर बताया गया है, तो अगर इनमे सबसे बड़ी गणना भी लें तो भी 6 दिन में कायनात बनाने की अवधि केवल 3 लाख साल ठहरेगी जबकि विज्ञान के अनुसार सिर्फ़ धरती को ही अपने मौजूदा रूप में आने में करीब साढ़े पाँच अरब साल लगे।
.... और तब मैंने आपको बताया था कि अल्लाह के नज़दीक एक दिन के अलग अलग टाइम पीरियड बताए गए हैं, इससे ये बात साबित होती है कि अल्लाह के नज़दीक "यौम" का एक फिक्स टाइम पीरियड नही है बल्कि अल्लाह जिस हिसाब से इन्हें घटाना बढाना चाहता है, घटा बढ़ा लेता है ... तो ब्रह्मांड के निर्माण के समय अल्लाह का दिन 50,000 साल से भी बहुत बड़ा हो सकना सम्भव है....!!!
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..... भाई ये आपका "चित भी मेरी, पट भी मेरी" वाला हिसाब समझ नही आ रहा ?? आप वाक़ई जवाब जानना चाहते हैं या अपने सवालों में इंसान को उलझा कर खुद के ज़्यादा बुद्धिजीवी होने के अहम् की तुष्टि करना चाहते हैं ??
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..... बहरहाल, जान लीजिये कि आपका सवाल तर्कसंगत नही है.
... सवाल कुरआन में कही गई बात पर होना चाहिए, न कि अपने अनुमानों पर...
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ये सूरह यासीन (सूरह 36) की आयतें हैं
.... "और उसने हमपर फब्ती कसी और अपनी पैदाइश को भूल गया। कहता है, "कौन हड्डियों में जान डालेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी?" कह दो, "उनमें वही जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया। वह तो प्रत्येक संसृति को भली-भाँति जानता है, वही है जिसने तुम्हारे लिए हरे-भरे वृक्ष से आग पैदा कर दी। तो लगे हो तुम उससे जलाने।" क्या जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया उसे इसकी सामर्थ्य नहीं कि उन जैसों को पुनः पैदा कर दे? क्यों नहीं, जबकि वह महान स्रष्टा, अत्यन्त ज्ञानवान है, उसका मामला तो बस यह है कि जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है तो उससे कहता है, "हो जा!" और वह हो जाती है"
(आयत संख्या 78 से 82 तक)
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इन आयतों का अर्थ है कि अल्लाह हर प्रकार का कार्य, यहां तक कि कोई भी चमत्कारी कार्य करने के लिए भी सार्मथ्यवान है, और कोई भी काम ऐसा नही है जो अल्लाह न कर पाए, बल्कि वो जिस भी कार्य के करने की इच्छा करता है, केवल उसके आदेश देने भर पर वो कार्य स्वयमेव होने लगता है.
... यहां इन आयतों में तो कहीं ऐसा नहीं कहा गया कि अल्लाह कोई भी कार्य तुरत फुरत करता है,
... उल्टे इन आयतों में तो तुरत फुरत के ठीक विपरीत बात है कि काफ़िर अपनी मृत्यु के बाद कयामत में दोबारा ज़िंदा किये जाने की बात का मज़ाक उड़ा रहे हैं और उस बात पर अल्लाह ने उन्हें क़यामत आ जाने तक का इंतज़ार करने को कहा है....
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.... यानी यहां तो आयतें ये बता रही हैं कि अल्लाह को हर एक काम की सामर्थ्य प्राप्त है जिन कामों के लिए अल्लाह ने समय नीयत कर रखे हैं और समय आने पर अल्लाह द्वारा नीयत किया हुआ हर एक काम होकर रहेगा....
.... इन आयतों के आधार पर पता नहीं कौन से विज्ञान से आप ये अनुमान लगा रहे हैं कि अल्लाह ने हर काम तुरंत तत्क्षण पूरा कर देने की बात कही है....
.... ख़ैर अब से बात को ध्यानपूर्वक समझ लीजिए कि "कुन फ़याकून" का अर्थ अल्लाह के आदेश देने भर से नियति का तय हो जाना है, कि अल्लाह ने आदेश दे दिया तो फिर वो बात टल नही सकती... इसका अर्थ जबरन कुछ और न निकालिये .... धन्यवाद !!!
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