Monday, 10 August 2020

हिदायत देना।

हिदायत पाना।

यूं तो कुरान मे स्पष्ट रूप से अनेक स्थानों पर लिखा हुआ है कि अल्लाह ने इनसानों को स्वतंत्र इच्छा दी है जिसके आधार पर इनसान अपनी मर्जी से भलाई या बुराई को अपना सकता है ... यानी अल्लाह ये भली प्रकार स्पष्ट कर देता है कि किसी भी इनसान के हाथ से बुराई का व्यवहार अल्लाह नहीं करवाता बल्कि वो व्यक्ति खुद बुरा भला कार्य करता है
इसके बावजूद कुरान की भाषा शैली से अनभिज्ञ कुछ भाईयों को हिन्दी मे अनूदित कुरान की ऐसी कुछ आयतें देखकर कि “अल्लाह जिसको चाहे उसको भटका देता है ,और जिसको चाहे सन्मार्ग दिखा देता है “... ये भ्रम हो जाता है कि अल्लाह ही कुछ व्यक्तियों द्वारा बुरे कार्य करवाता है 

ऐसे सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि कुरान के अनुवाद की शुद्धता बनाए रखने के लिए अक्सर

कुरान का अनुवाद ठीक ठीक उन्हीं शब्दों मे करने का प्रयास किया जाता है जिन शब्दों मे वो अरबी मे लिखा हुआ है ... फिर हमारे कुछ नासमझ भाई इन आयात का सही अर्थ इसलिए नहीं समझ पात, क्योंकि वे अरबी व्याकरण का ज्ञान नहीं रखते 
खैर यदि आपमे सामान्य बुद्धि भी है तो आप ये समझ जाएन्गे कि हर अलग भाषा के भाषाई व्याकरण को मद्दे नजर रखकर उस भाषा की लेखनी का अर्थ निकाला जाता है 

तो अरबी भाषा शैली ये है कि वहाँ सीमित शब्दों मे बात कही जाती है ... स्पष्ट सी बात है कि ये जरूरी नहीं कि जितने शब्दों मे आपकी भाषा मे कोई बात पूरी होती हो, किसी दूसरी भाषा मे भी एक वाक्य उतने ही शब्दों मे पूरा हो ऐसे मे दूसरी भाषा के भाषाई व्याकरण का ज्ञान होना जरूरी है ... उदाहरण के लिए इंगलिश को ही लें , मै यदि इंगलिश के I love you का ठीक ठीक इन्हीं शब्दों मे अनुवाद बिना अंग्रेजी व्याकरण के नियम समझे करूं तो ये लिखा जाएगा "मैं प्रेम तुम"... ऐसे कुछ समझ न आया ... पर जब हम इंगलिश के भाषाई व्याकरण को समझें तो इस वाक्य को इस तरह समझ लेंगे कि "मैं तुम से प्रेम करता हूँ ।" हालांकि ये इंगलिश के शब्दों का शुद्ध अनुवाद नहीं होगा क्योंकि I love you मे "से" और "करता हूँ" के लिए कोई शब्द नही है

इसी तरह कुरान मे सीमित शब्दों मे बात कहे जाने का एक कारण ये भी है कि आप ये जानते ही होंगे कि कुरान की भाषा काव्य के रूप मे लयबद्ध है ... काव्य की सुन्दरता ये है कि कम से कम शब्दों का प्रयोग कर के अधिक बातें कह दी जाती हैं .... 

सो उन आयतों मे भी अरबी भाषा शैली और काव्य की सुन्दरता के अनुसार सीमित शब्दों मे जो लिखा गया है, कुरान मे वर्णित मनुष्य के स्वेच्छा सिद्धांत और अरबी व्याकरण के अनुसार वाक्य विन्यास को मद्देनजर रखते हुए उन आयतों का तात्पर्य ये है कि आयत मे मार्ग दिखा देने और कुछ को भटका देने का अर्थ ये है कि 
“अल्लाह जिसको चाहे उसको भटकने देता है ,और जिसको चाहे सन्मार्ग दिखा देता है “

यानी मनुष्य भटकता अपनी फ्री विल से ही है .. पर यदि कोई व्यक्ति अज्ञानतावश भटक रहा होता है, और वास्तव मे उसका झुकाव नेकी की ओर रहा होता है, तो अल्लाह ऐसे व्यक्ति की भटकाव से निकलने मे सहायता करता है ... लेकिन जो व्यक्ति सारा ज्ञान होने के बावजूद बुराई करता रहे तो ऐसे की अल्लाह सहायता नही करता और उसे बुराई पर ही रहने देता है । यानि भटकने देता है...॥

~ ज़िया इम्तियाज़।

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