Sunday, 16 August 2020

भविष्यपुराण में महामद।

महामद

भविष्यपुराण में महामद का सकारात्मक उल्लेख।

उससे पहले ये भी समझ लीजिए कि अगर इस कथा को भविष्य कथन मानकर पढ़ते हैं, तो ज्योतिष विज्ञान के आम नियम के अनुसार कथा का हर घटनाक्रम अक्षरश: वैसा ही वास्तव मे घटित नहीं होगा जैसा लिखा है, बल्कि कई बातें प्रतीकात्मक भी होंगी, जैसाकि कथा मे नबी सल्ल. को सिंधु तट पर आया बताया गया है जबकि इतिहास मे ऐसा कभी नहीं हुआ था, इसी तरह किसी भोजराज या कालिदास से भी नबी सल्ल. की कोई भेंट इतिहास मे दर्ज नहीं है, अत: इन बातों के गूढ़ अर्थ समझने होंगे

कथा ये है कि राजा भोज म्लेच्छ लोगों (म्लेच्छ का सही अर्थ है, विदेशी भाषा बोलने वाले व्यक्ति) के देश मे जाते हैं, जिस समय वहाँ म्लेच्छों के एक आचार्य (आध्यात्मिक गुरु) जिनका नाम महामद (मोहम्मद सल्ल.) है, अपने मत का प्रचार कर रहे हैं ॥ राजा भोज वहाँ के किसी बड़े देवालय मे जाकर वहाँ के अधिष्ठाता देवता की पूजा अर्चना करते हैं, (इस देवता को शिव बताना, केवल हिन्दू अनुवादकों के पूर्वाग्रह का नतीजा है, अन्यथा आसपास कहीं भी इस देवता का नाम नही लिया गया है, और राजा भोज इस देवता की स्तुति करते हुए इसे मरुस्थल निवासी बताते हैं, जबकि शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं) तब ये देवता राजा भोज को अरब मे आगे जाने और नबी सल्ल. से भेंट करने से रोकता है और मोहम्मद सल्ल. की निन्दा करता है, राजा भोज ये सुनकर वापस सिंधु प्रदेश आ जाते हैं । कुछ समय बाद मोहम्मद सल्ल. भी अपने शिष्यों (सहाबा) के साथ सिंधु तट पर आते हैं, और राजा भोज से कहते हैं कि राजन् तुम्हारे देवता मेरे दास (अनुयायी) बन गए हैं, देखो वो मेरे द्वारा छोड़ा हुआ भोजन कर रहे हैं, ये देख और सुनकर (श्रुत्वा तथा दृष्टा), भोजराज को महान आश्चर्य हुआ, और उन्होंने भी मोहम्मद सल्ल. के मत को अपनाने का मन बना लिया,  ये देखकर कालिदास, मोहम्मद सल्ल. के विषय मे अपशब्द कहने लगता है, व मुस्लिमों को बिना अपने मत का प्रचार किए वापस अपने देश लौट जाना पड़ता है । इसके बाद एक रात राजा भोज के सामने मोहम्मद सल्ल. देवरूप मे आते हैं, और बताते हैं कि आर्यधर्म सर्वश्रेष्ठ है, और मैं ईश्वर के आदेश से योद्धा धर्म का प्रसार करूंगा और इसके बाद मुसलमानों की निशानियों का वर्णन करते हैं ॥"

1- कथा मे सबसे पहले जो देव नबी सल्ल. की निन्दा करता है, बाद मे राजा भोज का वो ही आराध्य देव नबी सल्ल. का इस प्रकार अनुयायी बन जाता है कि आप सल्ल. का जूठा खाना भी प्रेम से खाने लगता है, और राजा भोज इस बात को खुद"देखते" और "सुनते" हैं, (ध्यान दीजिए संस्कृत शब्दों "श्रुत्वा" एवं "दृष्टा" पर) इससे एक बात तो ये सिद्ध होती है कि वो देव कोई दैवीय शक्ति नहीं, बल्कि एक साधारण व्यक्ति था, जो खुद को लोगों का देवता कहलवाता था, और जिसने इस्लाम कुबूल करने  से पहले की स्थिति मे नबी सल्ल. और इस्लाम के विरुद्ध झूठ बोले थे ॥

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे देखें तो जब नबी सल्ल. ने इस्लाम का प्रचार शुरू किया तो अरब के अनेकों मन्दिरो के अधिष्ठाता इस्लाम के विरोध मे बहुत झूठ फैलाते थे, और अपने अनुयायियों को नबी सल्ल. से मिलने सेइसलिए रोकते थे क्योंकि मानवता, समानता और प्रेम भरी नबी सल्ल. की बातें हर सुनने वाले को प्रभावित कर लेती थीं, व झूठ उन बातों के आगे नहीं ठहरता था, इसी कारण उस देव ने जब वो स्वयं मुस्लिम विरोधी था तो भोज को नबी सल्ल. से मिलने से उसने रोका था, पर बाद मे जब वो स्वयं मुस्लिम बन गया तो भोजराज को इस्लाम की दावत देने स्वयं आया था ॥

2- कालिदास ने भी नबी सल्ल. के विषय मे अपशब्द बोले, पर कालिदास कोई दैवीय शक्ति नहीं बल्कि भारतीय धार्मिक पुरोहितों का प्रतीक है, और कालिदास का व्यवहार, इस्लाम के प्रसार से चिढ़े अन्य धर्मों के ठेकेदारों के व्यवहार का ही प्रतीक है, तो उस देव के द्वारा पहले इस्लाम के बारे मे कहे गए अपशब्दो की तरह ही कालिदास के अपशब्द भी इस्लाम या नबी सल्ल. के विषय मे न तो कोई सच्चा परिचय देते हैं, न ही ये ईशवाणी हैं, जिनसे कोई शिक्षा ली जाए ॥ कालिदास द्वारा नबी सल्ल० की हत्या का प्रयास और इसके उपरान्त नबी सल्ल० का मलेच्छों का देवता बन जाना भी एक प्रतीकात्मक भविष्यवाणी है कि विरोधियों ने नबी सल्ल० को खत्म करने के प्रयास किये मगर उनके प्रयासों से उलट लोगों का विश्वास और श्रद्धा नबी सल्ल० की शिक्षाओं में बढ़ती गई

3- ईश्वर का आदेश क्या था ये राजा भोजके सम्मुख  प्रकट हुए नबी सल्ल. बताते हैं "कि मैं ईश्वर के आदेश से पिशाच  धर्म (यानि सैन्य धर्म) का प्रसार करूंगा" । स्पष्ट है जब इस धर्म के प्रसार का आदेश ईश्वर का है, तो इससे ठीक पहले सर्वश्रेष्ठ बताया गया आर्य धर्म, यही सैनिक धर्म है ॥ और ये भी स्पष्ट है कि सारे जगत का स्वामी, ईश्वर एक है, जिसके आदेश का पालन करना समस्त मानवजाति का कर्तव्य है, न कि किसी एक देश या समुदाय के लोगों का ॥

4- उस धर्म का नाम भविष्य पुराण मे पिशाच धर्म बताया गया है, जिसके प्रसार का आदेश सर्वशक्तिमान ईश्वर ने महामद (मोहम्मद सल्ल.) को दिया है, और ईश्वर पवित्र और अच्छी बातों के ही प्रसार का आदेश दिया करता है फिर शब्द "पिशाच" का भी यहाँ अच्छा और पवित्र अर्थ ही होगा
जांच पड़ताल करने पर मालूम चलता है कि शब्द पिशाच अपने उद्भव के समय बुरे अर्थो मे प्रयुक्त नहीं किया जाता था, तब महाभारत मे पाण्डवों की ओर से महाभारत का युद्ध लड़ने वाली एक जाति का जिक्र है जिनके लिए पिशाच शब्द व्यवह्रत था, विद्वानों के अनुसार ये आर्यो से अलग एक जाति थी ॥ पाणिनी ने अपनी अष्ठाधायी मे "पिशाच" शब्द की विवेचना  करते हुए इन्हें एक सैन्य जाति बताया है , आधुनिक विद्वान पिशाच का अर्थ "पिशित" अर्थात् मांस खाने वालों से लगाते हैं, तो यहाँ शाब्दिक या ऐतिहासिक कोई भी अर्थ राक्षसी, दुष्ट या अमानवीय नहीं निकलता,



भाविष्य पुराण में ये तीन शब्द हैं महामद और उनके धर्म के लिए।

जो है: असुर, धर्मदूषक और पिशाच धर्म ॥

ये लोग वास्तव मे इन शब्दों पर विश्वास जताकर अनजाने मे भविष्य पुराण की स्वीकार्यता पर खुद मुहर लगा रहे हैं कि भविष्य पुराण मे पैगंबर मोहम्मद सल्ल. के आगमन से बहुत पहले ही सटीक भविष्यवाणियां कर दी गई हैं, जो कि बाद मे चलकर सत्य साबित हुईं, इसलिए इस चमत्कारी ग्रंथ की बातें विश्वासयोग्य हैं।

ये निष्कर्ष निकालते है कि "असुर" शब्द नबी सल्ल. के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो ऐसा मानते हों उनके लिए इस शब्द असुर की विवेचना भी हम कर देते हैं, इस शब्द से अभिप्राय खलनायक ही हो, ऐसा नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा समझा जाएगा, तो इससे वैदिक देवताओं का ही बड़ा अपमान हो जाएगा,  वास्तव मे असुर का विभक्त है अ-सुर ... अर्थात् जो सुर (देवता) न हो, अब क्योंकि मनुष्य भी देवता नहीं है, इसलिए मनुष्य भी असुर हुए ...उसी तरह देवताओं के स्वामी (भगवान) भी देवता नहीं हैं, अत: उनके लिए भी असुर शब्द प्रयुक्त हो सकता है. सम्भवत: इसी कारण इन्द्र, अग्नि और वरूण जैसे सबसे बड़े वैदिक देवताओं को भी वैदिक साहित्य में असुर कहा गया है , जिसका अभिप्राय उन्हें सामान्य देवताओं से बड़ा और विशिष्ट बताना था

उदाहरणार्थ, रिग्वेद 1/24/14
अव ते हेळो वरुण नमोभिरव यज्ञेभिरीमहे हविर्भिः |कषयन्नस्मभ्यमसुर परचेता राजन्नेनांसि शिश्रथः कर्तानि ||
With bending down, oblations, sacrifices, O Varuna, we deprecate your anger: Wise Asura, you King of wide dominion, loosen the bonds of sins by us committed.

इन्द्र को  रिग्वेद 1/54/3 मे असुर कहकर सम्बोधित किया गया है
बर्हच्छ्रवा असुरो बर्हणा कर्तः पुरो हरिभ्यां वर्षभो रथो हि षः ||
High glory hath the Asura, compact of strength, drawn on by two Bay Steeds: a Bull, a Car is he.

बहरहाल वास्तविकता ये है कि नबी सल्ल. के लिए असुर शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है ॥ जहां तक "पिशाच धर्म" की बात है, तो इस शब्द को गलत तरीके से एक आसुरी धर्म के रूप में हिंदुओं द्वारा अनुवाद किया गया है। जबकि वास्तव में "पिशाच धर्म" का अर्थ है "मांस खाने वाले लोगों का धर्म"। क्योंकि संस्कृत मे "पिशाच" का अर्थ होता है "मांसभक्षी".... वैदिक काल मे भारतीयों के लिए मांस भक्षण आम बात थी, पर उत्तर वैदिक काल मे, अहिंसावादी धर्मों की बराबरी करने की होड़ मे हिंदू धर्म में भी मांस खाने को एक नीच और आसुरी कृत्य के रूप मे देखा जाने लगा, इस कारण "पिशाच" शब्द को भी बुराई का प्रतीक बना लिया गया । अन्यथा इससे पहले पिशाच शब्द के साथ कोई बुरी छवि कभी नहीं जुड़ी  थी
..... पिशाच शब्द का उद्भव, संस्कृत मे मांस के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द से हुआ है । मांस के लिए शब्द "पिशित" संस्कृत में प्रयुक्त किया जाता है; इसी तरह शब्द "पेशी" का मतलब मांस या मांस की गांठ होता है। तो पिशाच धर्म का गलत अर्थ बताकर, इस्लाम की छवि एक आसुरी धर्म की बनाना, वास्तव में साधारण हिंदुओं को बड़ा धोखा देना है ।
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अब रहा प्रश्न शब्द "धर्मदूषक" का, सामान्य तौर से दूषक का मतलब "प्रदूषित करने वाला" समझा जाता है। हालांकि, संस्कृत में इस शब्द का एक और अर्थ किया जाता है, वो है "दोष" (आरोप, आपत्ति, या खण्डन)..... वी.एस. आप्टे के प्रैक्टिकल संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश मे संस्कृत शब्द "दूषण" के कुछ अर्थ ये हैं: प्रतिकूल तर्क, आलोचना, आपत्ति और खंडन आदि।

इसलिए, यहां धर्मदूषक का मतलब होगा, समाज मे धर्म के नाम पर प्रचलित कुरीतियों का खण्डन, विरोध, आलोचना करने वाला, नबी सल्ल. ने वास्तव मे अपने समय मे धर्म के नाम पर स्थापित कुप्रथाओं का खण्डन और आलोचना की यानि "धर्मदूषण" किया...... और फिर दूसरी ओर देखा जाए तो जिन लोगों के हिसाब से जातिप्रथा, अस्पृश्यता, नरबलि, सती, वेश्यागमन आदि प्रथाएं धर्म थे, उनके हिसाब से इन कुरीतियों को मिटा डालने वाले नबी सल्ल. "धर्मदूषक" ही ठहरेंगे, यानि उनके धर्म को प्रदूषित करने वाले, अब ये बात और है कि उन कुरीति प्रेमियों के अनुसार जो बातें धर्म को प्रदूषित करना होंगी, उन बातों को अन्य सभी लोग "धार्मिक सुधार" कहते हैं ।

इस ग्रंथ भविष्य पुराण मे इन्हीं उपरोक्त तीन शब्दों के होने के कारण इस ग्रंथ का मुस्लिमों के आदेश पर रचित होने की आशंका गलत सिद्ध हो जाती है क्योंकि मुस्लिमों के आगमन से काफी पहले ही असुर और पिशाच जैसे शब्द भारतीय जनमानस मे बुराई का प्रतीक बन चुके थे, सो मुस्लिम यदि भविष्य पुराण लिखाते तो उसमें ये शब्द नहीं होते। इन शब्दों से तो भविष्य पुराण की ऐतिहासिकता वैदिक काल या उत्तर वैदिक काल तक जा पहुंचती है यानि अब से कम से कम 1900 साल पहले।

~ ज़िया इम्तियाज़।


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सत्य हमेशा स्पष्ट होता है, उसके लिए लिए किसी तरह की दलील की ज़रुरत नहीं. यह बात और है कि हम उसे समझ न पायें या कुछ लोग हमें इससे दूर रखने का कुप्रचार करें. यह बात अब छिपी नहीं रही कि वेदों, उपनिषदों और पुराणों में इस श्रृष्टि के अंतिम संदेष्ठा के आने की भविष्यवाणी की गयी है. मानवतावादी लेखकों और विद्वानों ने ऐसे अकाट्य साक्ष्य पेश करें हैं कि जिससे सत्य सामने पेश हो गया है और खुलकर हमारे सामने आ गया है. इन सच्चाईयों के मद्देनज़र मानवमात्र को एक सूत्र में पिरोने का जो कार्य हो सकता है वह वाकई अदभुत होगा. मानव एकता और अखंडता और वसुधैव कुटुम्बकम को मज़बूत करने के लिए सार्थक प्रयास हो सकते हैं. यह वक़्त की नज़ाक़त भी है. वैमनष्यता और साम्प्रदायिकता के इस दौर में जहाँ लोग अति-कट्टर होकर सत्य सुनने को ही राज़ी नहीं बल्कि सत्य-गवेशियों को प्रताड़ित और बॉयकाट किया जाता है. वैमनष्यता और साम्प्रदायिकता के इस आत्मघाती दौर में ये सच्चाइयां मील का पत्थर साबित हो सकती है. भाई-भाई को गले मिला सकती है और एक ऐसे समाज की स्थापना हो जहाँ हिंसा, शोषण, दमन और नफ़रत लेशमात्र भी न हो.


हिन्दू धर्म ग्रन्थ और हज़रत मुहम्मद (स.) Hazrat Muhammad (saw) in Hindu Scriptures की इस नशिस्त (एपिसोड) में ज़िक्र करेंगे कि "हज़रत मुहम्मद (स.) का ज़िक्र पुराणों में" 


पुराणों में नराशंश या मुहम्मद (स.) के आने की भविष्यवाणी कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है. यही नहीं वेदों में भी भविष्यवाणी का ज़िक्र है (जिसे मैं इस पोस्ट के बाद लिखूंगा). वेदों और पुराणों दोनों में ही हज़रत मुहम्मद (ईश्वर की उन पर शांति हो) का कार्यस्थल रेगिस्तान में होने का उल्लेख आया है. भविष्यपुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 'एक दुसरे देश में आचार्य अपने मित्रों के साथ आयेंगे, उनका नाम महामद होगा, वे रेगिस्तान क्षेत्र में आयेंगे.

इस अध्याय के श्लोक ६, ७ व ८ भी मुहम्मद साहब (स.) के विषय में है. पैग़म्बरे-इस्लाम (स.) के जन्म स्थान सहित अन्य साम्यतायें कल्कि अवतार से भी मिलती हैं, जिसका वर्णन कल्कि पुराण में है. इसकी चर्चा बाद में की जायेगी.


यहाँ यह उल्लेख कर देना महती आवश्यक है कि भविष्यपुराण में कई ईशदुतों (नबियों) की जीवन गाथा है. इस्लाम पर भी विस्तृत अध्याय है. इस पुराण में एकदम सटीक तौर पर मुहम्मद (स.) के बारे में बातें आयीं हैं. जिसे आप स्वयं भी पढ़ कर समझ सकते हैं. इसमें जहाँ महामद शब्द से मुहम्मद (स.) की निकटता है वहीँ पैग़म्बरे-इस्लाम (स.) की पहचान की अन्य सभी बातें भी स्पष्ट रूप से बिलकुल सत्य उतरती हैं. इसमें ज़रा भी व्याख्या की ज़रुरत नहीं है.


भविष्यपुराण में कहा गया है,


लिंग्च्छेदी शिखाहीन: श्म्श्रुधारी स दूषक:

उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जानो मम् 25 

विना कौलं च पश्वस्तेशाम भक्ष्या माता मम्

मुस्लेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति 26 

तस्मान्मुसल्वन्तो हि जातयो धर्म दुषकाह

इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति ममा कृतः 27 


भविष्य पुराण, पर्व ३, खंड ३, अध्याय १, श्लोक 25, 26, 27


इन श्लोकों का भावार्थ इस प्रकार है:


"हमारे लोगों का खतना होगा, वे शिखाहीन होंगे, वे दाढ़ी रखेंगे, उचे स्वर में आलाप करेंगे (अर्थात अज़ान), शाकाहारी-मांसाहारी दोनों होंगे, किन्तु उनके लिए मन्त्र से पवित्र किये हुए बिना कोई भी पशु भक्ष्य योग्य नहीं होगा (अर्थात वे हलाल मांस खायेंगे). इस प्रकार हमारे मत के अनुसार हमारे अनुनायीयों का मुस्लिम संस्कार होगा. उन्हीं से निष्ठावानों का धर्म फैलेगा और ऐसा मेरे कहने से पैशाच धर्म का अंत होगा."


भविष्यपुराण की उक्त भविष्यवाणी इतनी स्पष्ट है कि हर चीज़ स्पष्ट हो जाती है और हम देखते हैं कि यह मुहम्मद (स.) पर खरी उतरती है. अतः आप (स.) की अंतिम ऋषि के रूप में पहचान स्पष्ट हो जाती है. ये तो सभी जानते है कि वेद और पुराण के ये ग्रन्थ कुर-आन के अवतरित होने के बहुत पहले के है.


संग्राम पुराण की पूर्व सूचना:


संग्राम पुराण भी भविष्य पुराण की ही तरह एक महान पुराण है और इसमें भी ईश्वर के अंतिम ईशदूत और पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (स.) के आगमन की पूर्व सुचना मिलती है. पंडित धर्मवीर उपाध्याय की प्रसिद्द पुस्तक "अंतिम ईशदूत" में लिखा है; "काग्भुसुन्दी और गरुण दोनों राम की सेवा में दीर्घ अवधि तक रहे और वे उनके उपदेशों मात्र सुनते ही नहीं बल्कि लोगों को सुनाते भी थे. इन उपदेशों की चर्चा तुलसीदास ने "संग्राम-पुराण" के अपने अनुवाद में की है. जिसमें शंकर जी ने अपने पुत्र षन्मुख को आने वाले धर्म और अवतार (ईशदूत) के विषय में पूर्व सुचना दी. अनुवाद इस प्रकार है।


यहाँ न पक्षपात कछु राखहु 

वेद, पुराण संत मत भाखहूँ 

संवत विक्रम दोउ अनंगा 

महाकोक नस चतुर्पतंगा 

राजनीती भव प्रीति दिखावै 

आपन मत सबका समझावै 

सूरन चतुसुदर सत्चारी 

तिनको वंश भयो अतिभारी 

तब तक सुन्दर मद्दिकोया 

बिना महामद पार न होया 

तबसे मानहु जन्तु भिखारी 

समरथ नाम एही व्रतधारी 

हर सुन्दर निर्माण न होई 

तुलसी वचन सत्य सच होई 


(संग्राम पुराण, स्कन्ध १२, काण्ड ६, पद्यानुवाद, गोस्वामी तुलसीदास)


पंडित धर्मवीर उपाध्याय जी ने इसका भावार्थ इस प्रकार किया है:


(तुलसीदास जी कहते हैं) मैंने यहाँ किसी प्रकार का पक्षपात करते हुए संतो, वेदों, पुरानों के मत को कहा है. सातवीं विक्रमी सदी में चारो सूर्यों के प्रकाश के साथ वह पैदा होगा. राज करने में जैसी परिस्थियाँ हों, प्रेम से या सख्ती से, वह अपना मत सभी को समझा सकेगा. उसके साथ चार देवता (चार प्रमुख सहयोगी) होंगे, जिनके सहायत से उसके अनुनायीयों की संख्या काफी हो जायेगी. जब तक सुन्दर वाणी (कुर-आन) धरती पर रहेगी, उसके और महामद (हज़रत मुहम्मद स.) के बिना मुक्ति नहीं मिलेगी. इंसान, भिखारी, कीडे-मकोडे और जानवर इस व्रतधारी (रोज़ा रखने वाले) का नाम लेते ही ईश्वर के भक्त हो जायेंगे. फिर कोई उसकी तरह का पैदा नहीं होगा (अर्थात कोई रसूल न आएगा), तुलसी दास ऐसा कहते हैं कि उनका वचन सत्य सिद्ध होगा.


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