Monday, 10 August 2020

शब्द अल्लाह, शब्द क़ुरान, आदम को नाम सिखाना।

शब्द अल्लाह की उत्त्पत्ति।

अक्सर मैंने बहुत से भाई बहनों को कहते देखा है कि हम एक और निराकार ईश्वर पर तो विश्वास कर सकते हैं, पर अल्लाह पर नहीं, क्योंकि अल्लाह का तो जन्म सिर्फ 1400 वर्ष पहले लिखी गई कुरान से हुआ था .... इससे पहले कोई अल्लाह का नाम तक न जानता था .... जबकि इस दुनिया का ईश्वर तो वो होगा जो मानव इतिहास की शुरुआत से मनुष्य की जानकारी मे रहा हो.....

दोस्तों आप बहुत बड़ी गलतफहमी मे जी रहे हो... आप लोगों से किसने कहा कि अल्लाह के नाम का जन्म हज़रत मोहम्मद स.अ.व. पर अवतरित हुई कुरान से हुआ ....

अल्लाह शब्द का अर्थ है... अल (The) + इलाह (God) ....

यानी अल्लाह का अर्थ सिर्फ ईश्वर है, कोई विशेष नाम रूप रंग नहीं ॥ बल्कि जो भी व्यक्ति एक और निराकार ईश्वर मे आस्था रखता हो ... अरबी मे कहा जाएगा उसका अल्लाह पर अकीदा है ।

आप लोग शायद नहीं जानते कि मुस्लिम ईश्वर के नाम को लेकर इस तरह संकीर्ण कभी नहीं रहे जैसे आप हो रहे हो ..... 

"ख़ुदा" ..!!

भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम सबसे ज़्यादा इस शब्द खुदा का प्रयोग ईश्वर को निरूपित करने के लिए करते हैं ... लेकिन इस शब्द का सम्बन्ध इस्लामी साहित्य से कहीं भी नहीं है ... बल्कि ये शब्द "ख़ुदा" तो पारसी धर्म से सम्बन्धित है, यानी पारसियों के ईश्वर का नाम खुदा है ... मुस्लिम इस शब्द का बहुधा प्रयोग करते हैं, क्योंकि इस शब्द का भी सीधा सा अर्थ होता है... “एक निराकार ईश्वर”

खैर जहाँ तक प्रश्न अल्लाह के नाम का है , तो ये नाम न तो केवल मुस्लिमों की बपौती है और ना ही ये नाम हजरत मोहम्मद स.अ.व. की ईजाद है 
बल्कि हिब्रू तोराह और बाइबल मे "अलोहिम" और "अलोई" भी अरबी मे अल्लाह और इलाह के रूप मे अनुवाद होते है...
हजरत मोहम्मद स.अ.व. के जन्म से बहुत पहले अरब मे निराकार ईश्वर को अल्लाह कह कर ही पुकारा जाता था ... 360 देवी देवताओं के साथ अरब वासी अल्लाह की भी पूजा करते थे ....

कुछ हिन्दू भाईयों द्वारा ये भी दावा किए जाते देखा है मैंने कि "अल्ला" एक संस्कृत शब्द है जो कि आदि शक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता था ... और मुस्लिमों ने ये नाम "चुरा" लिया है ...
 इन भाईयों से ये बात पूछना रह गई कि क्या ईश्वर और उनके नाम भी चोरी हो जाने वाली चीजें हैं .. :)

खैर.... आप खुद देखिए हजरत मोहम्मद स.अ.व. के जन्म से कई वर्ष पहले आप स.अ.व. के दादा ने अपने बेटे, यानि नबी स.अ.व. के पिता का नाम अब्दुल्लाह रखा था ... जिसका अर्थ होता है "अल्लाह का भक्त" .... तो सोचिए भला ये कैसे समझा जा सकता है कि अल्लाह की ईजाद अब्दुल्लाह के बेटे ने 40 वर्ष की अवस्था मे जाकर की होगी ????

~ ज़िया इम्तियाज़।

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शब्द क़ुरान।

आजकल एक पोस्ट सर्कुलेट की जा रही है कि... क़ुरआन शब्द सीरिया भाषा के "केरयाना" शब्द से लिया गया था जिसका अर्थ होता है - "शास्त्र पढ़"
यानि क़ुरआन शुद्ध अरबी भाषा मे नहीं है जैसा कि दावा किया जाता है 

... प्रश्न पूछने वालों ने यहाँ भी अपने सीमित ज्ञान का परिचय दिया , और प्रश्न पूछते समय ये सर्वविदित तथ्य भूल गए कि दुनिया की तमाम भाषाओं का मूल स्रोत कोई एक भाषा है जिससे विश्व की सारी भाषाओं का जन्म हुआ , इसी कारण चाहे सीरीयन हो, ग्रीक हो, हिब्रू, फारसी या संस्कृत हो इन सब भाषाओं मे बहुत से शब्द एक समान हैं ... तो यदि कोई शब्द सीरियन या अन्य किसी भाषा मे पाया जाता था तो इससे न तो ये निष्कर्ष निकलता है कि वो शब्द सीरिया की ही खोज है, और न ये कि,उसी समय ये शब्द किसी और भाषा मे प्रयोग नहीं किया जा रहा होगा...॥

दूसरी ओर कुरान ये भी दावा कहीं नहीं करता कि इसमें ऐसी अरबी भाषा प्रयुक्त की गई है जिसका अन्य किसी भाषा से कोई सम्बन्ध नहीं ... बल्कि कुरान मे तो ये लिखा है कि ये अरब जनसमुदाय की भाषा मे अवतरित किया गया है ताकि वे सरलतापूर्वक इसे समझ सकें

तो स्पष्ट है कि कुरान को "कुरआन" कहलाने वाला शब्द किसी भी भाषा से निकला हो पर वो शब्द कुरआन के अवतरण के समय अरबी भाषा, और अरब जनसाधारण द्वारा प्रयुक्त बोलचाल का अंग था ...  कुरान को अल्लाह ने सातवीं शताब्दी के अरबों की भाषा मे अवतरित किया था ... और उस समय अरबी भाषा मे "पढ़ने" को निरूपित करने करने के लिए "क़रआ", "
और "इक़रा" जैसे शब्द मौजूद थे बल्कि कुरान की अवतरित होने वाली पहली आयत का पहला ही शब्द था "इकरा" यानि "पढ़िए"

यानि उस वक्त की मौजूदा अरब की भाषा के ये सभी शब्द अंग थे, सातवीं शताब्दी के इन्हीं अरबी शब्दों से शब्द कुरआन बना है !! कुरआन का अर्थ है "पढ़ी या जाप की जाने वाली किताब" 

एक प्रश्न ये भी इण्टरनेट पर घूम रहा है कि कुरान का नाम अल्लाह ने नहीं बल्कि इंसानों ने रखा है, पहले इसका नाम "मुसहफ" रखा गया बाद मे कुरान कहा गया, इस तरह लोगों ने इस किताब का नाम ही बदल दिया जबकि अल्लाह का दावा था कि कुरान को बदला नहीं जा सकता 

ध्यान रहे कि कुरान का कोई नाम है ही नहीं, बल्कि इसके विशेषण हैं, जो अल्लाह ने इस किताब मे बताए हैं .. जैसे कि पहला विशेषण तो कुरान ही इस किताब मे बताया गया है, जिसका अर्थ ऊपर बताया .. अन्य विशेषण भी इस किताब के लिए खुद इसी किताब मे बताए गए हैं, वो हैं - "हुदा" (ईश्वरीय वाणी), "ज़िक्र" (ईश्वरीय वर्णन), "तंज़ील" (ईश्वरीय अभिप्रेरण), "फ़ुरकान" (सत्य और असत्य के बीच निर्णय करने वाला), आदि, .....
यही नहीं कई स्थानों पर इसे केवल "किताब" (पुस्तक) जैसे सर्वसाधारण विशेषण से इंगित किया गया है ॥ 
.. कुरान सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला विशेषण है जो कि अल्लाह द्वारा ही सुझाया गया है ... इसके अतिरिक्त कुरान के लिए "कलामुल्लाह", "कलाम पाक" और "बड़ी किताब" जैसे विशेषण भी समाज मे पर्याप्त प्रचलित हैं ।
"मुसहफ" एक अरबी शब्द है जो कि कुरान मे कुरान के लिए वर्णित शब्द "सुहूफ" (Pages) को ध्यान मे रखते हुए कुरान के लिए अरबी मे प्रयोग किया जाता है, मुसहफ का अर्थ है "संकलित पन्ने" अर्थात् किताब ... ये शब्द भौतिक किताब को इंगित करता है ॥

वैसे ये मैं बता देना उचित समझता हूँ कि, कुरान को बदला न जा सकने का अर्थ उसकी शिक्षा को बदला न जा सकने से है , उसकी आयतों मे घटाबढ़ी का न किये जा सकने से है ... न कि नाम के बदलने न बदलने से, 

फिर कुरान का नाम बदला भी नहीं गया बल्कि अल्लाह के ही दिए विशेषणो पर ही इसे आज तक पुकारा जाता रहा है...लेकिन यदि कुरान का नाम बदल भी दिया जाए, लिखने के ढंग और तकनीकी मे बदलाव आएं, लिखने और सहेज कर रखने की सामग्री आदि मे समय के साथ बदलाव आए,जोकि आते रहेंगे, तो न इनसे कुरान की शिक्षा बदलेगी, न ही अल्लाह का दावा गलत सिद्ध होगा।

~ ज़िया इम्तियाज़।


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आयतों की संख्या।

एक धन्यवाद तो बनता है, इस्लाम से दुश्मनी करने वाले लोगों का भी , क्योंकि इन लोगों द्वारा इस्लामी अवधारणाओं पर आपत्तियां उठाए जाने के कारण हमें भी बहुत सारी बातें आप लोगों को बताने का मौका मिलता है :)

एक साहब हमसे पूछते हैं कि "Zia Imtiyaz तुम अक्सर लोगो को बोलते हो कुरान सच्ची किताब है और पैगम्बर मुहम्मद पर नाजिल हुई . मुझे यह बताओ Kufi 6235, bsri 6216, shami 6250, mkki 6212,Iraqi 6214 और आम कुरान 6666 इनमे से कौन सी कुरान सच्ची है ? कुरानी आयत में क्यों फर्क है ? इन् में से कौन सी कुरआन असल हालत में है ? और कौन सी कुरआन पैगम्बर मुहम्मद पर नाजिल हुई थी ?? 

लीजिए उत्तर प्रस्तुत है ... क्योंकि इसका उत्तर जानना बहुत से मुस्लिम भाईयों के लिए भी आवश्यक है 

प्रश्न करते हुए उन भाई से ये गलती हुई कि वे अलग अलग आयतों की संख्या के कारण कुरान को ही अलग अलग समझ बैठे , जबकि ये सारे विद्वान सेम कुरान के विषय मे ही बता गए हैं ... आयात की संख्या मे फर्क सिर्फ इस कारण आया क्योंकि इन विद्वानों ने कुरान की आयतों की गणना अलग अलग दृष्टिकोण से की है ,

कुछ विद्वानों ने कुरान की हर सूरत के शुरू मे आनेवाले "बिस्मिल्लाह" को अलग आयत के रूप मे गिना है इसलिए उनके विचार मे कुरान मे अधिक आयात हैं बनिस्बत उनके विचार के जो विद्वान बिस्मिल्लाह को अलग आयत के रूप मे नहीं गिनते

कुछ विद्वान मानते थे कि लम्बी आयतों को एक नहीं बल्कि लम्बाई के अनुसार दो या तीन आयतों के रूप मे गिना जाना चाहिए, इसलिए इन्होंने इस प्रकार गणना की तो कुरान की आयतों की संख्या अधिक बताई

इसके विपरीत कुछ विद्वानों ने कुरान की कुछ सूरतों के आरंभ मे आनेवाले कुछ विशेष शब्दों,  जैसे "अलिफ लाम मीम", "यासीन", हामीम" आदि को अलग आयत के रूप मे नहीं गिना, इसलिए इनकी गणना मे कुरान की आयतें अन्यों से कम लगीं

एक आम धारणा है कि एक आम कुरान मे 6,666 आयतें होती हैं ... लेकिन ये धारणा बिस्मिल्लाह को गिनकर और बड़ी आयतों को छोटी छोटी तीन चार आयतें मानकर गणना कर के बनाई गई,
यदि आप खुद कुरान की वास्तविक आयतों को गिनिए तो ये 6,236 निकलती हैं ... इसलिए कुफा का मत आज पूरे विश्व के मुस्लिम विद्वान स्वीकार करते हैं कि पवित्र कुरान मे कुल 6,236 आयात हैं ॥


~ ज़िया इम्तियाज़।




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आदम को नाम सिखाना।


आर्य समाज के कुछ भाईयों द्वारा अक्सर ये आक्षेप किया जाता है कि कुरान मे लिखा है कि अल्लाह ने फरिश्तों के सामने कुछ वस्तुएं ला के उन्हें चैलेन्ज दिया कि इन चीजों के नाम बताओ.... लेकिन फरिश्ते नही बता पाए, तब अल्लाह ने आदम अ.स. से उन वस्तुओं के नाम पूछे और आदम अ.स. ने उन सभी वस्तुओं के नाम बता दिए ..... इस प्रकार अल्लाह ने फरिश्तों का धोखा दिया क्योंकि अल्लाह ने आदम अ.स. को पहले से ही उन सारी वस्तुओं के नाम सिखा दिए थे जबकि फरिश्तों को नहीं सिखाए थे 

पर इसमे कौन सा धोखा हुआ? क्या अल्लाह ने फरिश्तो के समक्ष पहले से ये ऐलान नहीं किया हुआ था कि मै तुम सबसे श्रेष्ठ रचना बनाने वाला हूँ ??? 
बिल्कुल ऐलान किया था, पवित्र कुरान की सूरह 15:29 देखिए, यहाँ लिखा है अल्लाह ने फरिश्तों से कहा कि मै मनुष्य को बनाने जा रहा हूँ तो जब मै उसे बना के उसमें प्राण डाल दूं तुम सब उसको सजदा करना 
जाहिर है सजदा निम्न श्रेणी वाले ही अपने से बड़ी श्रेणी वाले को करते हैं । 
जब अल्लाह ने सब फरिश्तो और जिन्नो से आदम को श्रेष्ठ बनाने का निर्णय किया तो आदम मे फरिश्तो और जिन्नो से अधिक अच्छा तो कुछ अल्लाह को बनाना था ही, सो उस ने आदम को सबसे अधिक ज्ञान दे दिया ..... धोखा तो तब होता जब अल्लाह बिना किसी को ये बताए कि आदम उन सबसे श्रेष्ठ होन्गे , आदम अ.स. को बनाता और फिर सबसे कहता कि इस से ज्यादा जानकर दिखाओ । 

रहा सवाल फरिश्तों से वस्तुओं के नाम पूछने का, तो यहाँ भी अल्लाह ने यों ही नही फरिश्तों से वस्तुओं के नाम पूछे बल्कि आदम अ.स. किस प्रकार फरिश्तो से श्रेष्ठ होंगे इस विषय मे पहले फरिश्तों ने ही एक जिज्ञासा प्रकट की थी, जिसे शांत करने के लिए अल्लाह ने फरिश्तों से वस्तुओं के नाम पूछे ॥ इसे अल्लाह द्वारा फरिश्तों को चैलेन्ज दिया जाना समझना भी ठीक नहीं क्योंकि चैलेन्ज या चुनौती की नौबत तो बहस और लडाई झगड़े मे आती है .... और फरिश्तो मे अल्लाह से बहस करने की या उसकी बात काटने और अल्लाह के कथन की अवहेलना करने की सिफत (गुण) नहीं है ... 

पवित्र कुरान की दूसरी सूरत की आयत नम्बर 30 से 33 तक के अनुसार ..... जब अल्लाह ने मनुष्य को धरती का उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा की तो कुछ फरिश्तो ने जिज्ञासा जाहिर की कि मनुष्य तो धरती मे बिगाड़ पैदा कर सकता है जबकि हम आपकी स्तुति किया करते हैं ..... उनका आशय था कि मनुष्य धरती के लिए उपयुक्त चुनाव नहीं है क्योंकि मनुष्य स्वतंत्र बुद्धि का होगा और अल्लाह की आज्ञा का मनुष्य द्वारा उल्लंघन किया जा सकता है ... 
तब अल्लाह ने फरिश्तो से कहा कि मै तुमसे बेहतर जानता हूँ कि कौन उपयुक्त चुनाव है ..... और ये चुनाव कितना उपयुक्त है ये बताने के लिए कुछ चीजों के नाम बताने को फरिश्तो से कहा तो फरिश्तो ने कहा कि हमें तो सिर्फ उतना पता है जितना तूने हमें बताया है इन चीजों के नाम हम नही जानते । 
तब अल्लाह ने फरिश्तो को ये बताने के लिए कि फरिश्तो से ज्यादा ज्ञान अल्लाह ने आदम को दिया है आदम अ.स. को उन चीजों के नाम बताने को कहा, और आदम अ.स. ने उन चीजों के नाम बता दिए ।

~ ज़िया इम्तियाज़।

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