Tuesday, 11 August 2020

9 बचकाने से सवालों के जवाब।

9 बचकाने से सवालों के जवाब।

1-कितने हिन्दू भाइयों को ही क्या मुसलमानो को भी ये न पता होगा की पैगम्बर सिकंदर के 500 साल बाद पैदा हुए थे

2-भारत को छोड़ पूरे संसार में रमजान को"रामदान" कहते है, आप गूगल पर भी देख सकते हैं | भारत में अपनी नक़ल छुपाने को इन्होने इसे "रमजान" कर दिया | इस्लाम के पवित्र महीना रमजान संस्कृत शब्द "रामज्ञान" का अपभ्रंस है | और मक्का में विश्व प्रसिद्ध शिव लिंग भी था और अभी भी है और ये मुस्लिम हज के समय इस शिवलिंग को ही सज़दा करते हैं।

3- पैगम्बर के चाचा एक हिन्दू थे और अरब में भी आर्य संस्कृति का प्रभाव बहुत था | मुहम्मद साहब के चाचा ने एक पुस्तक भी लिखी थी "शायर उल ओकुल" जिसमें हिन्दू संस्कृति की भूरी भूरी प्रसंसा थी | बाद में मुहम्मद के बदमाशों ने उन्हें मार दिया था |

4-"मुसलमानो का "नमाज" भी संस्कृत के नमत शब्द से बना है जिसका अर्थ है
झुकना।

5- मुसलमानो की दिन में ५ बार नमाज हमारे वेदों के "पञ्च महा यज्ञ" की ही नक़ल है |

6- मुसलामानों का त्यौहार "शब्बेरात" शिवरात्री का ही अपभ्रंस है |

7-*नमाज के पहले ५ अंगों को धुलना वेदों के "शरीरशुद्ध्यर ्थं पंचांग न्यासः"का ही नियम है | 

8-ईद उल फितर भी हिन्दुओं के पित्री पक्षकी नक़ल है और ईद उल फ़ित्र में मुसलमान अपने पुरखों को ही याद करते हैं |

9-नक़ल यहीं बंद नहीं हुई : गर्भा बना काबा,पुराण बना कुराण, संगे
अश्वेत बना संगे अस्वाद,हमारा मलमास बना सफ़र मास, रवि से उनका रबी महिना, उनका ग्यारहवी शरीफ हमारे एकादशी (11) की ही नक़ल है | गृह
सेही उनका गाह शब्द बना ईदगाह , दरगाह********** * बस नक़ल
करने वाले बंदर निकले और सब गड़बड़ हो गया।

हालांकि हमने भाई से कहा कि इन सवालों मे कोई वज़न नही, इनके जवाब देने मे सिर्फ वक्त की बर्बादी होगी बस, इन सवालों के जवाब से किसी का भला नही होगा , मगर हमारे भाई जवाब लेने पर अड़ गए .... तो भाई क्षमाप्रार्थना के साथ जवाब हाजिर हैं 

1- भाई आपका ज्ञान गलत है सिकंदर था ईसा से 300 वर्ष पहले का और हजरत मोहम्मद सल्ल. हैं ईसा से लगभग 600 वर्ष बाद के, यानि सिकंदर 500 वर्ष पहले नही बल्कि 900 वर्ष पहले हुआ था

2- कुरआन का ज्ञान रखने वाले सारे मुस्लिम जानते हैं कि अरबी भाषा मे "ज़" की ध्वनि नहीं है, भारतीय मुस्लिम फारसी स्वरों का प्रयोग करते हुए जिस शब्द को रमज़ान कहते हैं, उसे अरब वासी रमद्वान कहते हैं .... और इस शब्द मे राम नहीं बल्कि रम्ज़ आया है ....
सो भाई इस तरह दूसरी भाषा के शब्दों से अपनी मंदबुद्धि से मनमाने अर्थ नही निकालने चाहिए, 

3- पूरा अरब हजरत मोहम्मद सल्ल. के जन्म के पहले मूर्तिपूजक था उनमें बहुत थोड़े से लोग एकेश्वरवादी भी थे ... खैर यदि मूर्ति पूजा, कन्या शिशु हत्या और बहुपति प्रथा जैसी साम्यताओं के कारण आप अरब मूर्तिपूजकों को हिंदू मानते हों तो इसमें आपके लिए कोई सम्मान की बात हो ऐसा मुझे नहीं लगता 

4- "नमाज़" और संस्कृत का शब्द "नम:" दोनों का अर्थ एक है, - "झुकना" ..... दरअसल फारसी और संस्कृत, दोनों भाषाओं का मूल एक है औऱ इस कारण बहुत से समान शब्दों का समान ही अर्थ होता है, क्योंकि ये दोनों शब्द, आपस मे एक दूसरे का बिगड़ा हुआ रूप ही होते हैं ।
खैर, नमाज एक फारसी शब्द है, इस्लामी साहित्य से इस शब्द का कोई सम्बन्ध नहीं है .... नमाज के लिए इस्लामी शब्द है "सलात" (शाब्दिक अर्थ = प्रार्थना करना ), जो कुरान और हदीसों मे आया है ॥

5- आपके वेदो मे पंच महायज्ञ और 7-शरीरशुद्ध्यर्थं पंचांग न्यासः जैसी बातें हैं तो कृपया इसका सन्दर्भ भी दीजिए, और इनका पालन भी कीजिए 
वैसे वेद मे तो ये भी लिखा है कि ईश्वर एक है [रिगवेद, 1:164:46], और मूर्ति पूजा पाप है [ यजुर्वेद, 40:9] इन सभी बातों का पालन तो आप मे से कोई करता नही फिर केवल मै बड़ा-मै बड़ा का राग अलापने से कोई लाभ है ...??

6- आपके द्वारा बताया गया शब्द "शब्बेरात" या "शुबरात" या "शबे बरात" जैसा कोई शब्द कुरान या हदीस मे तो आया नही ....
इसी तरह ग्यारहवीं शरीफ भी इस्लामी त्योहार नही जिसे आपने एकादशी की नकल बताया है, ग्यारहवीं शरीफ का जिक्र भी न कुरान मे है न हदीस मे, और केवल भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम ही इसे धार्मिक त्योहार समझकर मनाते हैं, सो ये शब्द और त्यौहार भले ही आपकी नकल हो, पर ये नकल इस्लाम ने नही की बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिमों ने की है, यहाँ से बाहर निकल के देखिए न विश्व का कोई भी मुस्लिम शब्बेरात या इससे मिलते जुलते शब्द का प्रयोग करता मिलेगा और न ही ग्यारहवीं शरीफ मनाता मिलेगा ... 

8- फिर वही दूसरी भाषा के अपनी भाषा से मिलते जुलते शब्द से मनमाना अर्थ निकालने का हास्यास्पद प्रयास ...... फितर शब्द का अर्थ अरबी डिक्शनरी मे है "दान", न कि पितर या पूर्वज .... 

और मैंने तो आज तक किसी मुस्लिम को ईद पर अपने पूर्वजों को याद करते नही देखा, ऐसा तो कोई कर्मकाण्ड ईद के दिन कभी किया नहीं जाता जिसमें पितरों को याद किया जाता हो, फेंकने की भी हद होती है भाई 

9- गर्भा-काबा, पुराण-कुरान की समानता के प्रश्न पर मैं फिर कहूंगा भाई कि इस तरह दूसरी भाषा के शब्दों से अपनी बुद्धि से मनमाने अर्थ नही निकालने चाहिए, वरना अपने ही बनाए चक्रव्यूह मे फंस जाओगे... 
हां ग्रह और गाह का एक ही अर्थ है जिसका फिर वही कारण है कि "गाह" एक फारसी शब्द है , अरबी या इस्लामी नही


~ ज़िया इम्तियाज़।

No comments:

Post a Comment

बुद्ध और ईसा।

एक दिन संयोग से मैंने डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय की किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्य नन्दा को अपने अंत...