Sunday, 16 August 2020

मक्खी, सुवर, काला कुत्ता।


मक्खी के पर में शिफा।

एक भाई साहब बहुत मजाक उड़ाते हुए बोले कि देखो मुसलमानों के रसूल (स.) का विज्ञान जो पीने की चीजों मे मक्खी को डुबकी देकर बीमारियों का इलाज करते हैं ... 
भाई इस हदीस शरीफ़ का उपहास कर रहे थे कि
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "यदि तुम में से किसी के पीने की वस्तुओं (पानी, दूध आदि) में मक्खी गिर पड़े तो उसे चाहिए कि उसे ड्रिंक में डुबकी दे, फिर उसे निकाल फेंके, क्योंकि उसके एक पर मे बीमारी है तो दूसरे में शिफा।"

निश्चय ही मजाक उड़ाने वाले भाईयों को औषध विज्ञान के मूल नियम नहीं पता इसलिए उन्हें इस हदीस को पढ़कर हंसी आती है ...
पर यदि वे चिकित्सा के छात्र होते तो इस हदीस को पढ़कर ये सोचने पर मजबूर अवश्य होते कि चिकित्सा की इतनी गूढ़ बात 1400 वर्ष पहले नबी स. को किसने बताई ????

दरअसल औषधि विज्ञान मे रोगों से लड़ने के लिए दो तरीकों पर काम किया जाता है 1- रोग होने के बाद रोग के विषाणुओं को मारने की औषधि देना
2- रोग होने से पहले ही रोग से बचाव के लिए शरीर को तैयार करने को रोग प्रतिरोधक औषधि देना

उपरोक्त हदीस मे रोग होने से पहले ही रोग से बचाव के लिए शरीर को तैयार करने यानि रोग प्रतिरोधक लेने की बात है ।

गौर तलब है कि उपरोक्त हदीस मे 1400 वर्ष पूर्व रोग से बचाव का जो फार्मूला नबी स. ने बताया आज अक्षरश उसी फार्मूले का अनुसरण कर के आज मनुष्य ने हैजा, कण्ठमाला और चेचक जैसी घातक बीमारियों की प्रतिरोधक औषधियां विकसित कर ली हैं.... ये बात और है कि इन खोजों के लिए विज्ञानियों ने इस हदीस से मदद न लेकर अपने स्वतंत्र प्रयासों से इलाज खोजे .. जिससे एक ओर तो बीमारियों का इलाज खोजने मे बहुत देर लग गई, वहीं खोज का श्रेय हदीस को नहीं दिया गया ।

खैर रोग प्रतिरक्षण के लिए जिस फार्मूले का उपयोग किया जाता है, उसे समझिए....
...ईश्वर ने हर जीव के शरीर मे रोगों से लड़ने की एक अद्भुत क्षमता दी है कि जब भी किसी बीमारी के विषाणु किसी जीव या मनुष्य के शरीर मे पहली बार जाते हैं तो शरीर उन विषाणु की प्रकृति की पहचान करता है और फिर स्वयं शरीर मे उन विषाणुओं से लड़ने वाली एण्टीबॉडी औषधि बना लेता है और विषाणुओं को मार कर खत्म कर देता है जिसके बाद उस जीव या मनुष्य को रोग से मुक्ति मिल जाती है. इसे जीव की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि इम्यूनिटी कहा जाता है ॥
रोग के विषाणु को पहचानने, और फिर एण्टीबॉडी बनाने के लिए इम्यूनिटी को पर्याप्त समय मिले इसके लिए आवश्यक है कि पहली बार शरीर के सम्पर्क मे आने वाले रोगाणु कमजोर या कम घातक हों .... क्योंकि यदि पहली ही बार मे शरीर मे किसी घातक रोग के उग्र विषाणु चले जाएंगे तो जब तक इम्यूनिटी उनको पहचानेगी शरीर के काफी भाग, यहाँ तक कि शरीर की इम्यूनिटी पर भी रोग का कब्जा हो जाएगा और बीमारी घातक रूप ले लेगी ....
हां यदि पहली बार मे कमजोर विषाणु से इम्यूनिटी का सामना होगा और बहुत हल्की बीमारी के बाद उसके विरुद्ध शरीर एण्टीबॉडी बना लेगा, फिर लम्बे समय तक शरीर इस फार्मूले को याद रखेगा और इसी रोग के शक्तिशाली विषाणुओं के शरीर के सम्पर्क मे आने पर , शरीर मे पहले से बने फार्मूले के तहत बिना एक पल भी गंवाए एण्टीबॉडी बनाकर विषाणुओं को मारना शुरू कर देगा... और शरीर को घातक रोग से बचा लेगा

तो बस इसी ईश्वरप्रदत्त सुविधा का लाभ उठाते हुए चिकित्सा विज्ञानियों ने मनुष्य की इम्यूनिटी को घातक रोगों का मुकाबला करने के लिए तैयार करने को उन्हीं घातक रोगों के निष्क्रिय विषाणु शरीर मे टीके या मुख द्वारा पहुंचाए ( जैसे चेचक से बचाव के लिए टीके द्वारा गाय चेचक "cow pox" के विषाणु शरीर मे डाले जाते हैं, जो मानव शरीर के लिए  घातक नही होते पर इनके कारण शरीर की इम्यूनिटी घातक चेचक से लड़ने की क्षमता विकसित कर लेता है)

नबी स. को 1400 वर्ष पूर्व भी इस बात का भली भांति ज्ञान था कि कुछ हल्की फुल्की बीमारियां हो जाने पर इन से सम्बन्धित घातक बीमारियों से बचाव करती हैं ... जैसे आप स. ने फरमाया कि आंख दुखने को बुरा मत समझो क्योंकि जिसकी आंख दुखती है उसका अंधेपन से बचाव हो जाता है
तो पेय पदार्थ मे गिरी मक्खी को डुबकी देकर निकाल देने की शिक्षा देकर भी नबी स. ने व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की युक्ति बताई है ... कि संक्रामक रोगों के कुछ विषाणु इस प्रयोग से व्यक्ति के शरीर मे जाएं और शरीर उन रोगों के घातक प्रभाव से लड़ने को तैयार हो जाए
और इस बात का भी भय नहीं कि मक्खी के शरीर से शक्तिशाली रोगाणु निकल कर पेय पदार्थ मे मिल जाएंगे क्योंकि मक्खी के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने भी उन रोगाणुओं से मक्खी को रोगी होने से रोकने की औषधि तैयार की हुई है जो मक्खी की त्वचा पर फैले रोगाणुओं को निष्क्रिय करने के लिए मक्खी की त्वचा पर ही सक्रिय रहती है 
इस कारण जब मक्खी का पूरा शरीर पेय मे डुबकी लगाकर निकाला जाएगा तो निश्चय ही मक्खी के शरीर से निष्क्रिय रोगाणु ही पेय में जाएंगे ॥ पर उन निष्क्रिय रोगाणुओं की एण्टीबॉडीज़ बनाकर हमारा शरीर कई घातक बीमारियों से लड़ने को तैयार हो जाएगा .... तो इस तरह चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से यदि देखा जाए तो नबी सल्ल० का ये कथन अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है कि मक्खी के एक पर मे बीमारी है तो दूसरे में शिफा।


~ ज़िया इम्तियाज़।

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सुवर के गोश्त।


"सूअर के नाम से भी मुसलमान नफरत करते हैं " मैं इसे एक जुमले से ज्यादा नहीं समझता .... क्योंकि सूअर से यदि नफरत की बात हो तो सबसे ज्यादा पोर्क खाने वाले पश्चिम मे भी "स्वाइन" शब्द एक गाली की तरह इस्तेमाल होता है, और हमारे ही देश मे गैर मुस्लिम समुदायों के लोग खुद गालियों मे सूअर शब्द का बहुत प्रयोग करते हैं, सूअर को सबसे गन्दा जानवर मानकर नफरत की राजनीति मे सूअर और सूअर के मांस का प्रयोग किया करते हैं, 

.... तो हमारे कुछ भाई लोगों को सूअर से सिर्फ मुस्लिमों की ही विरक्तता क्यों दिखाई देती है, ??

.......हां ये ठीक है कि सूअर का मांस खाना मुस्लिमों के लिए प्रतिबंधित है ... और प्रतिबंधित इसलिए क्योंकि सूअर की प्रकृति गंदगी खाने की होती है, इसलिए मुस्लिम इस जानवर से घिन महसूस करते हैं और इसी घिन के कारण अपने घर या खाने मे इस जानवर की कल्पना नहीं कर सकते हैं, सिर्फ मुस्लिम ही नहीं हमारे देश के अधिकांश गैर मुस्लिम भी समान कारणों से सूअर से घिन रखते हैं .... 

अब इस घिन या "नफरत" मे मुस्लिम क्या करते हैं सिवाय इसके कि वो सूअर को अपने घरों से दूर रखते हैं 
..... कहीं नफरत के चलते मुस्लिम लोग सूअरों को मार मार कर घायल कर रहे हों, या सूअर की निर्मम हत्या कर रहे हों, ऐसा तो कोई उदाहरण आज तक हमारे सामने नहीं आया, बल्कि सूअर को प्रकृति का सफाईकर्मी बनाया गया है, ये बात और इस कारण सूअर के जीवित रहने की जरूरत हम मुस्लिम अच्छी तरह से जानते हैं ॥

कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि सूअर 1400 वर्ष पहले सिर्फ मल खाता था, तब उसका मांस हराम ठहराया जाना ठीक था पर अब सूअर को सफाई सुथराई के साथ साफ आहार खिलाकर पाला जाता है तो अब मुस्लिमो को सूअर का मांस हराम न समझकर खा लेना चाहिए.... पर ये तर्क देने वाले सूअर के आहार की मूल प्रकृति को भूल जाते हैं जिस प्रकृति को बदला नहीं जा सकता, इसी प्रकृति के चलते उसे चाहे कितनी ही सफाई से रखा जाए व साफ खाना खिलाया जाए तब भी सूअर अपना और बाड़े के अन्य सूअरों का मल खाया करता है, इसलिए ये तर्क देने का कोई अर्थ नहीं कि सफाई से पाले हुए सूअर का मांस खाने मे हर्ज नहीं, 

.... सूअर की मल खाने की प्रकृति के कारण इस जानवर का शरीर अशुद्धियों से भरा हुआ होता है, क्योंकि जाहिर है किसी भी जीव का शरीर उसके द्वारा खाए गए भोजन के तत्वों से ही बनता बढ़ता है, तो विभिन्न जीवों, मनुष्यों के मल को खाकर बने सूअर के मांस मे खतरनाक बीमारियां पैदा करने वाले कीटाणुओं की भरमार रहती है, मेडिकल एक्सपर्टस के मुताबिक पोर्क मे मौजूद किस्म किस्म के बैक्टीरिया लगभग 70 तरह की बीमारियां पैदा कर सकते हैं, जो लोग पोर्क खाया करते हैं उनकी आंतों मे पिन वर्म, हुक वर्म और रोइण्ड्रम जैसे कीड़े पैदा हो जाते हैं, जिनमें कदुदाना नाम का आंत मे पैदा होने वाला कीड़ा सबसे ज्यादा घातक होता है, ये कीड़ा खून के बहाव के साथ जिस्म के किसी भी हिस्से मे पहुंचकर हार्ट अटैक, दिमागी बीमारी, अंधापन जैसी खतरनाक बीमारियां दे सकता है ... सूअर के मांस मे मौजूद बैक्टीरिया उसको अच्छी तरह पकाने के बावजूद जिन्दा रह सकते हैं, अमेरिका मे किए गए एक अध्ययन मे ये बात सामने आई कि "Trichura Tichurasis" रोग से पीड़ित 24 मे से 22 लोगों ने पोर्क को अच्छी तरह पकाकर खाया था फिर भी वो इस रोग से पीड़ित हो गए ॥

.... कुछ लोग ये कह सकते हैं कि अगर सूअर का मांस इतना ही हानिकारक है तो अमेरिका मे तो सभी पोर्क खाते हैं तो सब बीमार क्यों नहीं रहते वहाँ ? वो लोग स्वास्थ्य के मामले मे भारत के लोगों से बेहतर कैसे रहते हैं  ??
उसका उत्तर ये है कि अमेरिका के लोग पोर्क के साथ ही साथ बहुत सी स्वास्थ्यवर्धक चीजें, फल,मेवे, मछली, शुद्ध दूध मक्खन आदि भी भरपूर मात्रा मे खाते हैं जिन चीजों के गुणों से इनके शरीर को जो क्षति पोर्क खाने से हुई होती है उसकी क्षतिपूर्ति हो जाती है, ये ठीक ऐसा है जैसे एक चेन स्मोकर , सिगरेट पीने के साथ साथ खाने मे विटामिन सी से भरपूर चीजों की भी खूब मात्रा ले रहा हो तो उस व्यक्ति की त्वचा और बाल स्मोकिन्ग के प्रभाव से बचे रहेंगे लेकिन कोई इसका ये निष्कर्ष निकाले कि भरपूर सिगरेट पीने से त्वचा मुलायम और बाल काले घने रहते हैं तो इसे निष्कर्ष निकालने वाले की अज्ञानता ही कहा जाएगा ॥ 

बहरहाल कुरान के अलावा बाइबल मे भी सूअर के मांस पर प्रतिबंध है तो हम समझ सकते हैं कि पहले के नबियों के लिए भी ये चीज हराम थी और अल्लाह का नियम सदा एक सा और स्पष्ट रहा है कि स्वास्थ्य के लिए हानिकर चीजों से सदा दूर रहा जाए, अज्ञानी तो वो मनुष्य हैं जो इन बातों पर ध्यान न देकर अस्वास्थ्यकर चीजों मे मजा ढूंढने चलते हैं और बीमारी मोल ले लेते हैं ॥


~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या नबी सल्ल० ने मुसलमानों को हुक्म दिया है कि वो तमाम काले कुत्तों को मार डालें ???
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मुस्लिम शरीफ में एक रिवायत है, जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० ने फरमाया नबी सल्ल० ने हमें कुत्तों को मारने का हुक्म दिया, हमने आप सल्ल० के हुक्म को माना, यहां तक कि हमने बाहरी क्षेत्र से आई हुई एक औरत के साथ आये उसके कुत्ते को भी मार दिया, जब रसूलल्लाह सल्ल० ने ये सुना तो ऐसे कुत्तों को मारने से हमें मना किया और फ़रमाया कि तुम केवल काले कुत्तों को मारो जिनके ऊपर दो स्पॉट्स हों"  (सहीह मुस्लिम, किताब-10, हदीस-3813)
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.... क्या कह रही है ये हदीस ??? हदीस के शब्दों को पढ़ने से पता चलता है कि हदीस को काफी संक्षिप्त रूप से बयान किया गया है, किस तरह के स्पॉट्स की बात कही गई है, ये स्पष्ट नही है, काले कुत्तों में क्या बुराई है ये स्पष्ट नही ... ये बात सन्तोषजनक है कि मुस्लिम समुदाय ने काले कुत्तों को मारने की कोई परिपाटी नही अपनाई है, और अपनाई भी नहीं जा सकती, क्योंकि हदीस के शब्द अस्पष्ट और संक्षिप्त हैं, ऐसी हदीस से कोई गलत शिक्षा लिए जाने की बहुत संभावना है, संक्षिप्त हदीस से कोई शिक्षा तब तक नहीं ली जा सकती जब तक इस विषय (यानी कुत्तों के साथ मनुष्यों का क्या व्यवहार हो?) से लगती अन्य हदीसों और पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं का हम अध्ययन नही कर लेते.....
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.... कुत्तों के साथ एक मुस्लिम व्यक्ति का कैसा व्यवहार हो, इस बात की चर्चा छिड़ने पर मुझे बचपन से सुनी वो कथा याद आ जाती है जो असल में एक हदीस है कि एक वेश्या के सारे पाप अल्लाह ने इस कारण माफ कर दिये थे क्योंकि एक दिन उस वेश्या ने एक प्यासे कुत्ते को पानी पिलाकर उस कुत्ते की जान बचा ली थी, उस वेश्या की इस नेकी के बदले अल्लाह ने उसके लिए जन्नत नियत कर दी थी.... बचपन से इस कहानी को सुनते रहने के कारण ही, मेरे मन में हमेशा तमाम जानवरों के लिए दयाभाव प्रबल रहा....
इसी तरह बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ में वर्णित एक हदीस है जिसमें नबी सल्ल० लोगों को एक ऐसे व्यक्ति की कथा सुनाते हैं, जिस ने रेगिस्तान में प्यास से मौत के सन्निकट हुए एक कुत्ते को कुएं से पानी भर के पिला दिया, तो अल्लाह ने उस व्यक्ति की इस एक नेकी के बदले उसके पापों को क्षमा कर दिया था, लोगों ने ये कथा सुनकर नबी सल्ल० से पूछा कि क्या चौपायों के साथ नेकी करने पर भी सवाब मिलता है ? इस पर आप सल्ल० ने जवाब दिया कि "हां, हर जानदार के साथ नेकी करने पर सवाब मिलता है"
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..... अब आएं क़ुरआन पर, .... सूरह माएदा की चौथी आयत में प्रशिक्षित पालतू कुत्तों द्वारा पकड़े गए शिकार को अल्लाह ने हमारे लिये हलाल करार दिया है, यानी अल्लाह ने न अपनी किताब में कुत्तों को नापाक माना है, न उनके पालने पर रोक लगाई है, और न ही उन्हें कोई अप्रिय जानवर घोषित किया है, बल्कि क़ुरआन में असहाबे कहफ़ का किस्सा (सूरह नम्बर 18) इंसानों और कुत्ते की अद्भुत मित्रता की कहानी बताता है, जहां अल्लाह ने अपने प्रिय बन्दों के पालतू कुत्ते को भी तीन सौ वर्ष लम्बा जीवन दे दिया था...
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.... ऐसे में जहां कुत्तों के साथ नेक व्यवहार पर जन्नत देने की बात की जा रही हो, जहां धार्मिक ग्रन्थ कुत्तों की उपयोगिता की तारीफ़ कर रहा हो, वहां अकारण कुछ कुत्तों को मार डालने का आदेश, तब गले से नही उतरता जबकि हमने हदीस और क़ुरआन की अन्य शिक्षाएं पढ़ ली हैं जो उस हदीस से बिलकुल विपरीत बात कर रही हैं
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.... काले कुत्तों को मारने वाली हदीस में उन कुत्तों को मारने का कोई वैध कारण नज़र नही आ रहा, इस कारण वो हदीस समझ में नही आ रही, वैसे किसी कुत्ते को मार डालने का एक प्रबल वैध कारण रेबीज़ का संक्रमण होता है और कुत्ते उसके मुख्य संवाहक होते हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि रेबीज (हलक जाना) का कोई इलाज नहीं है और रेबीज़ ग्रसित व्यक्ति की तीन महीने के भीतर मौत होना निश्चित है।
ये बीमारी होने पर व्यक्ति के शरीर मे तेज दर्द होता है, व्यक्ति को प्यास लगती है, पर पानी देखते ही उसे दौरा पड जाता है, रोगी चीखने चिल्लाने लगता है, धीरे धीरे रोगी का व्यवहार बढ़ते रोग के साथ मनुष्य की बजाय एक हिंसक जानवर की तरह का हो जाता है, व्यक्ति बोलना छोड़ देता है और कुत्ते की तरह गुर्राना और भौंकना शुरू कर देता है, लोगों को झपटने और काटने दौड़ता है, तदन्तर रोगी की रीढ़ की हड्डी भी किसी जानवर की तरह मुड़ जाती है और अंतत: इसी कष्ट मे रोगी प्राण त्याग देता है, ये रोग कितना घातक है इसका अनुमान इस बात से लगाइए कि आज तक कोई भी इस रोग से ठीक नहीं हुआ है
रेबीज़ से ग्रसित कुत्ते जिन्हें आम भाषा में हम पागल कुत्ते कहते हैं, ये कुत्ते आक्रामक होकर हर किसी को काटने दौड़ते हैं, और जिसे काट लिया उसको प्राणघातक बीमारी निश्चित थी, इसलिये कुछ हदीसों में  हम देखते हैं कि "काट खाने वाले कुत्ते यानी पागल कुत्ते क्योंकि मनुष्य के लिये प्राणघातक होते हैं, इस कारण ऐसे कुत्तों को मार देने की अनुमति दे दी गई है," (उदाहरण के लिए बुख़ारी, किताब-29, हदीस-54)
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..... प्रतीत होता है कि जिन विशेष प्रकार के स्पॉट्स वाले काले कुत्तों को मारने का नबी सल्ल० ने हुक्म दिया था वो रेबीज़ से ग्रसित कुत्ते थे,
... ऐसा हो सकता है कि काले कुत्तों की कोई नस्ल जो उस समय नगर में रहती थी, में रेबीज़ फैल गया हो, हदीस में काले रंग के साथ ही दो स्पॉट्स यानी दो निशानों की बात भी है, ये दो रहस्यमयी निशान, जिन पर हदीस में खुलकर नही बताया गया है, ये रेबीज़ के दो निशान यानी ग्रसित कुत्तों के खुले जबड़े और टपकती लार हो सकते हैं... हो ये भी सकता है कि "काले कुत्तों" से आशय "पागल कुत्ते" हों जैसे हमारी भाषा में काले का अर्थ बुराई से लिया जाता है और "काली नज़र" या "काली करतूत" जैसे शब्द प्रयोगों के हम शाब्दिक अर्थ न लेकर अलंकारिक अर्थ समझ जाते हैं, ऐसे ही हो सकता है अरब में शब्द "काले" का अलंकारिक प्रयोग किसी चीज़ की भयावहता बताने के लिए किया जाता हो, और "काले कुत्तों" से अर्थ उनमें फैले भयावह संक्रमण से लिया जाता हो.... बहरहाल सच्चाई चाहे जो हो, इतना तय है कि किसी जानवर की नस्ल या वंश को अकारण हानि पहुँचाने की शिक्षा इस्लाम कहीं नही देता...!!!


~ ज़िया इम्तियाज़।
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