Monday, 10 August 2020

हज़रत आएशा की उम्र। हo आएशा की गुड़िया।


हज़रत आएशा की उम्र।


अम्मी आएशा रज़ि. की निकाह के वक्त उम्र 6 साल नहीं थी .. एक भाई ने मेरी इस पोस्ट का मतलब ये निकाला कि मैं हजरत इमाम बुखारी रह• पर सीधी तोहमत लगा रहा हूँ ...

बड़ा अफसोस होता है मुझे, ये देखकर कि नबी स. के पाक किरदार पर लगाई गई बेहद नाज़ेबा तोहमतों से ज्यादा फिक्र लोगों को दूसरों की होती है .....॥

बहरहाल मैने हजरत बुखारी पर वैसे भी कोई तोहमत नहीं लगाई थी बल्कि खुद इमाम बुखारी ने जो 6 साल वाली हदीस की विरोधाभासी कुछ हदीस कलेक्ट की थीं, मैंने उनको ही पेश किया था ... यानी खुद हजरत बुखारी का अकीदा 6 साल वाली बात पर न था मुझे तो इसका यकीन है ॥

बहुत मुमकिन है कि अम्मी आएशा रज़ि. का वो 6 और 9 साल वाला बयान जैसा अम्मी आएशा रज़ि. और इमाम बुखारी ने समझा हो वैसा हम समझ न पा रहे हों

एक तरफ इमाम बुखारी लिखते हैं कि उहद की जंग 3 हिजरी में 15 साल से कम उम्र के लोगों को नबी सल्ल० ने शामिल नही किया, दूसरी तरफ वो लिखते हैं कि इसी जंग में हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ि० शामिल थीं ... कैसे ??? जबकि अगर 2 हिजरी में अपनी रुखसती के वक्त वो सिर्फ़ नौ साल की थीं, तो उहद के वक्त सिर्फ दस ही साल की तो हुईं ....!!! .... बहुत से माहिरीन का ख़्याल है कि निकाह और रुखसती के वक्त उम्मुल मोमिनीन आएशा सिद्दीक़ा रज़ि० की उम्र वाली हदीस के रावी हिशाम की याददाश्त अच्छी नहीं थी वो "तिस्सह अशरह" में से सिर्फ तिस्सह को याद रख पाए और अशरह को भूल गए
.... या ये भी हो सकता है, जैसा कि गामिदी साहब कहते हैं कि अरब की आम बोलचाल का तरीक़ा ये था कि लोग इकाई के अदद बोलते थे और दहाई के अदद सुनने वाले की कॉमनसेंस पर छोड़ देते थे, ऐसा हमें शबे क़दर की तलाश वाली मशहूर हदीस में देखने को मिलता है कि शबे कद्र को पांचवीं , सातवीं और नवीं रातों मे तलाश करो 
( सही बुखारी , किताब #2, हदीस #46) और (सही बुखारी, किताब #73, हदीस #75)

जबकि दीगर अहादीस से हम जानते हैं कि ये बयान रमज़ान के आखिरी दस दिनों की ताक़ (विषम संख्या) रातों के बारे मे था, और अस्ल मे कहने का मकसद ये था कि शबे कद्र को पच्चीसवीं, सत्ताइसवीं और उन्तीसवीं रात मे तलाश करो
... इसी तरह जब अम्मी आएशा रज़ि. ने अपने निकाह और रुख्सती की उम्र बयान की तो आम रिवाज़ के मुताबिक़ इकाई के अंक ही बयान किए, और अपनी उम्र को "सित्तत" (छह) और "तिस्सह" (नौ) बताया ... जबकि उनके कहने का मकसद
 सित्तत अशरह (16) और तिस्सह अशरह (19) साल था....

हकीकतन हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ि० के नबी सल्ल० से निकाह के पीछे मस्लेहत ये थी कि एक बेहतरीन याददाश्त वाली औरत हों जो नबी सल्ल० से दीन सीख कर बाक़ी औरतों और मर्दों को सिखा सके.... और दूसरी तरफ साइंसी ऐतबार से ये बात हक़ीक़त है कि 15 साल की उम्र से पहले बच्चे का दिमाग़ पूरी तरह से विकसित नही होता, दिमाग पूरी तरह बनता ही नही है 15 साल की उम्र से पहले ! 15 की उम्र से पहले न इंसान की याददाश्त में मज़बूती होती है कि तमाम बातें वो याद रख सके, और न तमाम बातों को पुख़्ता ढंग से वो समझ ही सकता है ... जबकि 15 साल की उम्र के बाद की तमाम बातों को कुदरतन याद रखना आसान हो जाता है, ... ये बात मैंने एक साइंस न्यूज़ में पढ़ी थी और फिर खुद इसका तजुर्बा किया पन्द्रह साल की उम्र के बाद की बातें मुझे आज भी इस तरह याद हैं जैसे कल की बात हो, लेकिन उससे पहले की उम्र की बातें मुझे मुश्किल से याद आती हैं, और जो बातें याद आती हैं वो ऐसी लगती हैं जैसे बहुत बहुत पुरानी कोई बात हो, पन्द्रह की उम्र से पीछे का एक एक साल एक एक ज़माने के बराबर लगता था, और पन्द्रह की उम्र के बाद साल ऐसे गुज़रते हैं जैसे एक महीना गुज़रे, सोचकर देखिये, आपका तजुर्बा भी यही होगा, क्योंकि पन्द्रह की उम्र के बाद आपकी याद रखने की कुव्वत बढ़ गई है ऐसा इसलिए होता है, पन्द्रह की उम्र के बाद ही आप तमाम नाज़ुक मसाइल को भी बेहतर ढंग से समझने लगे हैं जो उससे पहले की उम्र में नही समझ पाते थे,  सोचिये, ऐसा है कि नही ??

~ ज़िया इम्तियाज़।

____________________________________________________


हज़रत आएशा की उम्र।

कल कुछ मित्रों ने हमारा ध्यान एक स्वामी जी की फेसबुक पोस्ट की ओर आकृष्ट किया जिसमें स्वामी जी ने हजरत मोहम्मद सल्ल. और अम्मी आइशा रज़ि. की विवाह के समय उम्र पर आपत्ति जताई थी
 स्वामी जी ने आरोप बड़े गम्भीर लगाए, इनका कहना है कि इस्लाम के संस्थापक ने एक छोटी, अबोध बच्ची का यौन शोषण किया ....

हालांकि तथ्य बताते हैं कि अम्मी आइशा रज़ि. अपने विवाह के समय 9 साल की नही बल्कि 19 साल के आसपास थीं ...

स्वामी जी ने आरोप तो कई लगाए पर इन्हें ये मालूम ही नहीं है कि इस्लाम मे अबोध बच्चों की शादी होती ही नहीं है क्योंकि शादी के लिए वर और वधू दोनों की स्वीकृति नितान्त आवश्यक है, और इस स्वीकृति के लिए वर वधू दोनों को परिपक्व बुद्धि वाला होना आवश्यक है .....

दूसरी ओर इस्लाम मे शादी के लिए ये भी जरूरी है, कि वर और वधू दोनों विवाह करने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम हों और उन्हें विवाह की आवश्यकता महसूस होती हो, यानि वे प्यूबर्टी (यौवनारम्भ) की अवस्था को पार कर चुके हों .... शरीयत मे विधान है कि यदि किसी कारणवश किसी अबोध बालक बालिका के संरक्षक ने उनका विवाह किसी के साथ कर दिया है तो ये विवाह उनके वयस्क होने तक अनियमित अर्थात अधूरा रहेगा, यानि उन बाल विवाहित बालक या बालिका से शारीरिक सम्बन्ध उनके यौवनारम्भ के पहले हरगिज़ नहीं बनाया जा सकेगा ... फिर वयस्क और यौन क्रिया मे सक्षम होने के बाद यदि बाल विवाहित व्यक्ति इस विवाह को न स्वीकारे तो विवाह शून्य ठहरा दिया जाएगा .... यानि विवाह पूरा हुए बिना ही खत्म हो जाएगा ....इसमें किसी बालक या बालिका के यौन शोषण की सम्भावना ही कहां बनती है ??? 

क्योंकि शरीयत मे विवाह करने, अथवा विवाह पूर्ण करने की उम्र प्यूबर्टी की अवस्था पार कर लेने के उपरांत है अत: समझा जा सकता है कि कुरान मे यौवनारम्भ के बाद की इसी उम्र को विवाह की उम्र कहा गया है, यानी इस्लाम ने मनुष्य की विवाह की उम्र वो निर्धारित की है, जब उनका शरीर स्वयं एक साथी के साथ सम्बन्ध बनाने की मांग करने लगता है ....
..... कुरान मे एक जगह बच्चों के संरक्षक को सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि "वे अनाथ बच्चों को जांचते रहें और जब वे "विवाह की उम्र" के हो जाएं, तो उनकी सम्पत्ति उन्हें सौंप दी जाए ..."
[ अल-कुरआन, 4:6 ]

इस आयत से भी दो तथ्य स्पष्ट होते हैं
एक तो ये, कि इस्लाम ने मनुष्य के विवाह के लिए एक उम्र सुनिश्चित की है ,और स्वामी जी का ये आरोप गलत है कि इस्लाम मे व्यक्ति के विवाह के लिए कोई उम्र ही निर्धारित नहीं है .... और दूसरा तथ्य ये कि चूंकि विवाह की इसी उम्र मे आकर व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति की देखभाल का जिम्मा सौंप दिया जाएगा , यानी इस्लाम मे बताई विवाह की उम्र तक पहुंचते पहुंचते व्यक्ति इतनी परिपक्व बुद्धि भी पा लेता है कि अपनी सम्पत्ति और जीविकोपार्जन के सम्बन्ध मे स्वयं निर्णय लेने लग जाए 
ये तो जगजाहिर ही है कि जिस समय प्रकृति मनुष्य मे यौन शक्ति जागृत करती है, उसी समय इस यौन शक्ति को सम्हालने के लिए प्रकृति मनुष्य की बुद्धि भी पूरी तरह परिपक्व कर देती है और मनुष्य मे अबोधता का कोई लक्षण बाकी नहीं रह जाता

ये सब बातें जानने के बाद ये वैज्ञानिक तथ्य भी जान लें कि किसी भी बालक मे प्यूबर्टी स्टार्ट होने के साथ ही साथ वो पूर्ण पुरुष या पूर्ण स्त्री की लम्बाई पा लेता है और इसके बाद मुश्किल से उसके कद मे दो या तीन इंच की बढ़ोतरी होती है .... फिर क्योंकि बालकों के संरक्षको पर ये जिम्मेदारी है कि जब वे देखेंगे कि बालक शादी की उम्र के युवा हो गए हैं तब उनका विवाह किया जाएगा, या इस समय विवाह पूर्ण किया जाएगा, तो बालकों के संरक्षक तो बालकों की विवाह की उम्र तभी देख पाएंगे जब लड़कों के चेहरे पर स्पष्ट दाढ़ी मूंछे, और लड़कियों की शारीरिक बनावट मे स्पष्ट परिवर्तन देख लेंगे

यानि इस्लाम मे बाल विवाह की कोई गुन्जाइश नही, बल्कि इस्लाम मे पूर्ण रूप से युवा, परिपक्व बुद्धि से अपना भला बुरा सोचने मे पूरी तरह सक्षम और विवाह के इच्छुक स्त्री पुरुषों का ही विवाह किया जाता है

इसके पश्चात भी अगर आप ये मानना चाहें कि अपने विवाह के समय अम्मी आइशा रज़ि. केवल 9 वर्ष की थीं तो आपको ये भी मानना होगा कि उन्होंने 9 वर्ष की अवस्था मे यौवनारम्भ को पार कर लिया था ....
ये भी मानना होगा कि अम्मी आइशा रज़ि. की बुद्धि 9 वर्ष की अवस्था मे किसी 19-20 वर्ष की स्त्री जितनी परिपक्व हो गई थी ...और साथ ही ये भी मानना होगा कि 9 वर्ष की अवस्था मे भी आप रज़ि. 16-17 वर्ष की नवयौवना के समान दिखती थीं

रहा सवाल प्यारे नबी सल्ल. का तो वे भी अम्मा आइशा रज़ि से शादी के वक्त जवान ही थे .... बल्कि अहादीस से ये पता चलता है कि आप सल्ल. सदा एक बहुत खूबसूरत और जवान मर्द दिखते थे ... अन्तिम समय तक आप सल्ल. के बाल और दाढ़ी मुबारक मे 20 से अधिक सफेद बाल नही थे ( सही मुस्लिम, हदीस-5779 एवं शुमाइल तिरमिज़ी, वॉल्यूम-1, हदीस-1)

इसके अतिरिक्त सही बुखारी,किताब-56 हदीस-761 के अनुसार आप सल्ल. की त्वचा बहुत कोमल थी जिससे ये पता चलता है कि आप सल्ल. की त्वचा पर झुर्रियां भी नही थीं क्योंकि झुर्री वाली त्वचा खुरदुरी होती है उसमें कोमलता नहीं बचती
साथ ही अनेक हदीसो मे जिक्र है कि आप सल्ल. शारीरिक रूप से काफी बलशाली भी थे .... अर्थात् प्यारे नबी सल्ल. मे एक युवा, बलवान और सुन्दर पुरुष के सभी गुण 54 वर्ष की आयु मे भी मौजूद थे जिन गुणों की कामना अपने भावी वर मे होने की कामना कोई कुवारी कन्या करती है

तो इस्लामी विधि के विवाह मे किसी बालक या बालिका के यौन शोषण की बात केवल उन स्वामी जी  के मस्तिष्क की उपज है .... एक जवान और सक्षम स्त्री पुरुष यदि अच्छी तरह से सोच विचार कर एक दूसरे का वरण अपने जीवन साथी के रूप मे पूरी तरह अपनी इच्छा से करते हैं, तो इस विवाह मे कहाँ, कैसे और किसके यौन शोषण की स्थिति बनती है ? मुझे ये बता दीजिए आप ???

~ ज़िया इम्तियाज़।

____________________________________________________

हज़रत आएशा की उम्र।

अम्मी आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा के बारे में बुख़ारी शरीफ के हवाले से ये ख्याल किया जाता है कि वो अपने निकाह के वक़्त 6 साल और रुखसती के वक्त 9 साल की थीं, .... और इसी बात को लेकर कुछ गुमराह गैर मुस्लिम हमारी माँ आयशा रज़ि० और नबी सल्ल० पर बेहद ही बहुदा इलज़ाम लगाते हैं ....

बेशक़, नबी क़रीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उम्मुल मोमिनीन माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० की उम्र में फासला था, लेकिन माँ आयशा इतनी छोटी भी नहीं थीं जितना ख्याल किया जाता है

खुद बुख़ारी शरीफ की ही दो अलग विषयों की हदीसें इस बात के खिलाफ इशारा देती हैं कि अम्मा आयशा रज़ि० अपने निकाह के वक़्त 6 साल की थीं

उस ज़माने में अरब का रिवाज था कि कोई भी शख्स 15 साल की उम्र से पहले किसी जंग में शामिल नही हो सकता था, ये बात कई अहादीस से साबित है, खुद बुख़ारी शरीफ़ (इंग्लिश ट्रांसलेशन) Book-59, Hadith-423 में इब्ने उमर रज़ि० से रिवायत है कि उहद की जंग के मौक़े पर उनकी उम्र 14 साल की होने की वजह से नबी सल्ल० ने उन्हें जंग में शामिल होने से रोक दिया, और 15 साल की उम्र होने के बाद ही उन्हें खन्दक की जंग में शामिल होने की इजाज़त दी.....
और बुख़ारी शरीफ में दूसरी तरफ ये लिखा हुआ है कि अम्मी आयशा रज़ि० जंगे उहद में शामिल हुई थीं (Sahih Bukhari, Book -52 , Hadith -131, और Book -58 , Hadith -156 ) . जंगे उहद 3 हिजरी में हुई थी यानी 2 हिजरी में अपनी रुखसती के वक़्त वो 14 साल की उम्र पार कर चुकी थीं, तभी तो 3 हिजरी में 15 साल की उम्र पार कर के जंग में शामिल हो सकीं....

सहीह बुख़ारी शरीफ में ही किताब 61 हदीस 515 में अम्मी आयशा रज़िअल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं कि वो सूरह क़मर के नुज़ूल के वक़्त खेलने वाली उम्र की लड़की थीं, रिवायत में लफ्ज़ जारियाः आया है, जारियाः उन लड़कियों को कहा जाता था जो किशोरावस्था शुरू होने के आस पास की उम्र में हों.... आमतौर पर लड़कियों में किशोरावस्था 8-9 साल की उम्र में आती है.

ज्यादाते इस्लामी विद्वानों की राय है कि सूरह क़मर का नुज़ूल हिजरत से 8 साल पहले हुआ (The Bounteous Koran, M.M. Khatib, 1985) और हिजरत के दूसरे साल में अम्मी आयशा रज़ि० की रुखसती हज़रत मोहम्मद सल्ल० के घर हुई,

यानि सूरह क़मर अम्मी आयशा रज़ि० की शादी से 10 साल पहले नाज़िल हुई थी, यानि अगर सूरह क़मर के नुज़ूल के वक़्त अम्मी आयशा रज़ि० 8 या 9 साल की थीं तो10 साल बाद अपनी शादी के वक़्त 18 या 19 साल की ठहरती हैं...!!!

इसी तरह अल्लामा इब्न कसीर ने तफ़्सीर अल-बिदाया में लिखा है कि अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि०  की वफ़ात 73 हिजरी में हुई और तब उनकी उम्र 100 साल थी. अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० की बड़ी बहन थीं और माँ आयशा से उम्र में 10 साल बड़ी थीं, अब हिजरी सन की शुरुआत में अगर अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० की उम्र का हिसाब किया जाए तो (100-73=27) उनकी उम्र 27 साल निकलती है, और माँ आयशा रज़ि० की उम्र उनसे 10 साल कम यानि 17 साल होती है....
हज़रत आयशा रज़ि० की रुखसती नबी सल्ल० के घर 2 हिजरी में हुई , यानि माँ आयशा की उम्र (17+2=19) 19 साल होती है जब उनकी रुखसती हुई !!!

और ये भी साफ़ कर दिया जाय कि इस शादी का मकसद क्या था... गन्दी ज़हनियत के लोग इस शादी का मकसद सिर्फ फिज़िकल रिलेशन से जोड़ कर बदतमीज़ी करते हैं, लेकिन इस शादी का मकसद फिज़िकल रिलेशन से बहुत ज़्यादा अहम मकसदों को हासिल करना थाथा, इस शादी का मकसद ये था कि औरतों के गुप्त विषयों में इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं, ये बात तमाम औरतों तक पंहुचाना... अब क्योंकि शर्म वाली बातें औरतें सीधे तो नबी सल्ल० से कह नही सकती थीं, इसलिये एक ऐसी मध्यस्थ औरत की ज़रूरत महसूस हुई जिसके और नबी सल्ल० के बीच शर्म का पर्दा न हो, और जो बहुत ज़्यादा होशियार भी हो और बातों को बहुत अच्छे ढंग से खुद भी समझ लेती हो और उतने ही अच्छे ढंग से अपनी बात दूसरों को भी समझा सकती हो.. ताकि वो औरतों के सभी गुप्त विषयों की बातें बगैर शरमाये नबी सल्ल० से पूछ सके और फिर खूब अच्छे ढंग से तमाम औरतों को समझा भी सके......
हज़रत आयशा रज़ि० में होशियारी और बात को अच्छे ढंग से समझने और समझाने के ये सारे गुण थे... और क्योंकि पति पत्नी के बीच में कोई पर्दा नही होता एक बीवी अपने शौहर से सारी गुप्त बातें कर सकती है, इसलिये माँ आयशा रज़ि० और नबी सल्ल० अल्लाह की प्रेरणा से एक दूसरे से शादी करने के लिए तैयार हो गए..!!!

इसके बाद माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़िअल्लाहु अन्हा ने दीन की तब्लीग़ का काम बहुत ही खूबी के साथ और बड़ी ज़िम्मेदारी से निभाया, उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० से मनसूब रिवायतों की तादाद इसीलिये अबु हुरैरह रज़ि० के के अलावा सबसे ज़्यादा हैं... जिन रिवायतों से इल्म लेकर आज तक मुसलमान मर्द औरत फायदा उठाते हैं !!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

____________________________________________________

हज़रत आएशा की उम्र।

अक्सर गैरमुस्लिमों का  नबी सल्ल० पर ये इल्ज़ाम होता है कि उन्होंने एक शिशु उम्र की बच्ची से शादी की अपने निकाह और रुख़्सती के वक्त हज़रत आयेशा रज़ि० एक अबोध बच्ची थीं, जो शादी और उसकी ज़िम्मेदारियों का मतलब नहीं जानती थीं, इस आरोप को और मज़बूत करने के लिए गैरमुस्लिम ये दलील देते हैं कि हज़रत आएशा रज़ि० अपनी शादी के बाद भी गुड़ियों से खेला करती थीं और गुड़ियों से अबोध बच्चियां ही खेला करती हैं, युवतियां नही खेलतीं....
..... बहुत से मुसलमानों का भी यही ख्याल है कि हज़रत आएशा रज़ि० अपनी कमसिन उम्र के सबब ही गुड़ियों से खेला करती थीं .....
.
..... बेशक़ हम अपने सामने सिर्फ़ 10-11 साल तक की बच्चियों को गुड़ियों से खेलते देखते हैं, जिस उम्र के बाद उनमें किशोरावस्था के लक्षण पैदा होने लगते हैं, उनकी दिलचस्पियाँ बदल जाती हैं,  और गुड़ियों से खेलने का उनका शौक़ खत्म हो जाता है.... लेकिन ये सब देखने के बावजूद आपका ये अंदाज़ा लगा लेना दुरुस्त नही कि गुड़ियों से खेलने वाली लड़की अबोध उम्र की ही हो सकती है, उससे ज्यादा नही
..... सच्चाई ये है कि पुराने दौर में जवान लड़कियां और औरतें भी गुड़ियों से खेला करती थीं, और उनका गुड़िया से खेल अबोधता का प्रतीक नही बल्कि एक मनोरंजन था, घरदारी के जौहर दिखाने और वक्त गुजारी का साधन था.... 
.
.
आप इस मशहूर हदीस शरीफ़ पर गौर करें तो आपको मालूम चलेगा कि गुड़ियों से खेलने का मतलब अबोध, मासूम उम्र होना नही है ...... हजरत आयशा सिद्दीका रज़ि. का बयान है के गजवा ए तबूक 9 हिजरी (या गजवा ए खैबर 7 हिजरी) से रसूले अकरम ﷺ वापस तशरीफ लाए तो उस वक्त मैं ने अपने ताकचा में पर्दा लटका रखा था, इसी दौरान एक जोरदार हवा चली जिसकी वजह से पर्दा हट गया और मेरी बनाई हुई गुड़ियां नजर आने लगी. यह देख कर रसूले अकरम ﷺ ने दरयाफ्त फरमाया:  आयशा ! यह सब क्या है ? हज़रत आयशा ने जवाब दिया: "मेरी गुड़िया है". रसूले अकरम ﷺ ने उन गुड़ियों के दरमियान एक घोड़े को देखकर जिसके ऊपर कपड़े के दो पर भी बने हुए थे, दरियाफ्त फरमाया : इन गुड़ियों के दरमियान में यह क्या देख रहा हूं? हज़रत आयशा ने जवाब दिया: घोड़ा है घोड़ा। रसूले अकरम ﷺ ने पूछा: उस घोड़े के ऊपर यह कौन सी चीज है? हज़रत आयशा ने जवाब दिया: इसके ऊपर दो पंख लगे हुए हैं। रसूले अकरम ﷺ ने ताज्जुब से फरमाया: कहीं घोड़े के भी पंख होते हैं ?  अम्मां आयशा ने  जवाब दिया: " क्या आपने सुना नहीं है कि हजरत सुलैमान अलैहिस सलाम के पास एक घोड़ा था जिसके पंख थे।" यह सुनकर हुजूर ﷺ इस कदर जोर से हंस पड़े जिससे आपकी दाढें नजर आने लगी। (अबु दावूद: 4914)
.
.... अब आप हिसाब लगाएं, हज़रत आयशा रज़ि० की रुखसती नबी सल्ल० के घर में 2 हिजरी में हुई थी और जैसा कि आम ख्याल है, अगर उस वक्त उनकी उम्र 9 ही साल मानी जाए तो खैबर (सात हिजरी) के वक्त वो 14 साल की थीं, या तबूक के वक्त 16 साल की थीं, तो बताएं कि क्या आज की तारीख़ में 14 या 16 साल की लड़कियां गुड़ियों से खेलती हुई देखी हैं आपने ?? 
.... चौदह और सोलह साल की उम्र की लड़कियों में कोई अबोधता नही होती, उनके सारे शौक़ और सारी मसरूफियात जवान औरतों वाली होती हैं.... और माँ आएशा बता रही थीं कि वो चौदह या सोलह साल की उम्र में गुड़ियों से खेला करती थीं.... इस बात का साफ़ मतलब है कि उनका गुड़ियों से खेलना वक़्त गुज़ारने, व्यस्त रहने या मनोरंजन करने के लिए ही था, उनकी अबोध उम्र की वजह से नही था....

~ ज़िया इम्तियाज़।

_____________________________________________


अम्मी आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा के बारे में बुख़ारी शरीफ के हवाले से ये ख्याल किया जाता है कि वो अपने निकाह के वक़्त 6 साल और रुखसती के वक्त 9 साल की थीं, .... और इसी बात को लेकर कुछ गुमराह गैर मुस्लिम हमारी माँ आयशा रज़ि० और नबी सल्ल० पर बेहद ही बहुदा इलज़ाम लगाते हैं ....

बेशक़, नबी क़रीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उम्मुल मोमिनीन माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० की उम्र में फासला था, लेकिन माँ आयशा इतनी छोटी भी नहीं थीं जितना ख्याल किया जाता है।

खुद बुख़ारी शरीफ की ही दो अलग विषयों की हदीसें इस बात के खिलाफ इशारा देती हैं कि अम्मा आयशा रज़ि० अपने निकाह के वक़्त 6 साल की थीं

उस ज़माने में अरब का रिवाज था कि कोई भी शख्स 15 साल की उम्र से पहले किसी जंग में शामिल नही हो सकता था, ये बात कई अहादीस से साबित है, खुद बुख़ारी शरीफ़ (इंग्लिश ट्रांसलेशन) Book-59, Hadith-423 में इब्ने उमर रज़ि० से रिवायत है कि उहद की जंग के मौक़े पर उनकी उम्र 14 साल की होने की वजह से नबी सल्ल० ने उन्हें जंग में शामिल होने से रोक दिया, और 15 साल की उम्र होने के बाद ही उन्हें खन्दक की जंग में शामिल होने की इजाज़त दी.....
और बुख़ारी शरीफ में दूसरी तरफ ये लिखा हुआ है कि अम्मी आयशा रज़ि० जंगे उहद में शामिल हुई थीं (Sahih Bukhari, Book -52 , Hadith -131, और Book -58 , Hadith -156 ) . जंगे उहद 3 हिजरी में हुई थी यानी 2 हिजरी में अपनी रुखसती के वक़्त वो 14 साल की उम्र पार कर चुकी थीं, तभी तो 3 हिजरी में 15 साल की उम्र पार कर के जंग में शामिल हो सकीं....

सहीह बुख़ारी शरीफ में ही किताब 61 हदीस 515 में अम्मी आयशा रज़िअल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं कि वो सूरह क़मर के नुज़ूल के वक़्त खेलने वाली उम्र की लड़की थीं, रिवायत में लफ्ज़ जारियाः आया है, जारियाः उन लड़कियों को कहा जाता था जो किशोरावस्था शुरू होने के आस पास की उम्र में हों.... आमतौर पर लड़कियों में किशोरावस्था 8-9 साल की उम्र में आती है.

ज्यादाते इस्लामी विद्वानों की राय है कि सूरह क़मर का नुज़ूल हिजरत से 8 साल पहले हुआ (The Bounteous Koran, M.M. Khatib, 1985) और हिजरत के दूसरे साल में अम्मी आयशा रज़ि० की रुखसती हज़रत मोहम्मद सल्ल० के घर हुई,

यानि सूरह क़मर अम्मी आयशा रज़ि० की शादी से 10 साल पहले नाज़िल हुई थी, यानि अगर सूरह क़मर के नुज़ूल के वक़्त अम्मी आयशा रज़ि० 8 या 9 साल की थीं तो10 साल बाद अपनी शादी के वक़्त 18 या 19 साल की ठहरती हैं...!!!

इसी तरह अल्लामा इब्न कसीर ने तफ़्सीर अल-बिदाया में लिखा है कि अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि०  की वफ़ात 73 हिजरी में हुई और तब उनकी उम्र 100 साल थी. अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० की बड़ी बहन थीं और माँ आयशा से उम्र में 10 साल बड़ी थीं, अब हिजरी सन की शुरुआत में अगर अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० की उम्र का हिसाब किया जाए तो (100-73=27) उनकी उम्र 27 साल निकलती है, और माँ आयशा रज़ि० की उम्र उनसे 10 साल कम यानि 17 साल होती है....
हज़रत आयशा रज़ि० की रुखसती नबी सल्ल० के घर 2 हिजरी में हुई , यानि माँ आयशा की उम्र (17+2=19) 19 साल होती है जब उनकी रुखसती हुई !!!

और ये भी साफ़ कर दिया जाय कि इस शादी का मकसद क्या था... गन्दी ज़हनियत के लोग इस शादी का मकसद सिर्फ फिज़िकल रिलेशन से जोड़ कर बदतमीज़ी करते हैं, लेकिन इस शादी का मकसद फिज़िकल रिलेशन से बहुत ज़्यादा अहम मकसदों को हासिल करना थाथा, इस शादी का मकसद ये था कि औरतों के गुप्त विषयों में इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं, ये बात तमाम औरतों तक पंहुचाना... अब क्योंकि शर्म वाली बातें औरतें सीधे तो नबी सल्ल० से कह नही सकती थीं, इसलिये एक ऐसी मध्यस्थ औरत की ज़रूरत महसूस हुई जिसके और नबी सल्ल० के बीच शर्म का पर्दा न हो, और जो बहुत ज़्यादा होशियार भी हो और बातों को बहुत अच्छे ढंग से खुद भी समझ लेती हो और उतने ही अच्छे ढंग से अपनी बात दूसरों को भी समझा सकती हो.. ताकि वो औरतों के सभी गुप्त विषयों की बातें बगैर शरमाये नबी सल्ल० से पूछ सके और फिर खूब अच्छे ढंग से तमाम औरतों को समझा भी सके......
हज़रत आयशा रज़ि० में होशियारी और बात को अच्छे ढंग से समझने और समझाने के ये सारे गुण थे... और क्योंकि पति पत्नी के बीच में कोई पर्दा नही होता एक बीवी अपने शौहर से सारी गुप्त बातें कर सकती है, इसलिये माँ आयशा रज़ि० और नबी सल्ल० अल्लाह की प्रेरणा से एक दूसरे से शादी करने के लिए तैयार हो गए..!!!

इसके बाद माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़िअल्लाहु अन्हा ने दीन की तब्लीग़ का काम बहुत ही खूबी के साथ और बड़ी ज़िम्मेदारी से निभाया, उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० से मनसूब रिवायतों की तादाद इसीलिये अबु हुरैरह रज़ि० के के अलावा सबसे ज़्यादा हैं... जिन रिवायतों से इल्म लेकर आज तक मुसलमान मर्द औरत फायदा उठाते हैं !!!

Zia

_____________________________________________

अक्सर कुछ कुंठित मानसिक विकलांगों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि प्रोफेट मोहम्मद saw ने, आयशा ra से 9 या 6 साल की आयु मैं विवाह किया था ....
जबकि इन्हें ये मालूम ही नहीं है कि इस्लाम मे अबोध बच्चों की शादी होती ही नहीं है क्योंकि शादी के लिए वर और वधू दोनों की स्वीकृति नितान्त आवश्यक है, और इस स्वीकृति के लिए वर वधू दोनों को परिपक्व बुद्धि वाला होना आवश्यक है .
दूसरी ओर इस्लाम मे शादी के लिए ये भी जरूरी है, कि वर और वधू दोनों विवाह करने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम हों और उन्हें विवाह की आवश्यकता महसूस होती हो, यानि वे प्यूबर्टी (यौवनारम्भ) की अवस्था को पार कर चुके हों .
"वे अनाथ बच्चों को जांचते रहें और जब वे "विवाह की उम्र" के हो जाएं, तो उनकी सम्पत्ति उन्हें सौंप दी जाए ..." [ अल-कुरआन, 4:6 ]
यह ग़लत इल्ज़ाम है कि अल्लाह के नबी (स.) ने हजरत आयशा (R.A.) से 9 या 6 साल की उम्र में शादी की थी। इस्लाम की सच्चाई व पैगम्बर मोहम्मद (स.) का बेदाग़ चरित्र शुरूआत से ही इस्लाम दुश्मनों की नज़र में खटकता रहा है। और वे नबी के चरित्र पर उंगली उठाने के मौके ढूंढते रहे हैं। इसके लिये अक्सर वे ज़ईफ़(Weak)हदीसों का सहारा लेने से नहीं चूकते, अर्थात जिनकी रावियों(Narrator),के सिलसिले में कहीं कोई कमज़ोर कड़ी पायी जाती है। इसी तरह का एक निहायत गलत आक्षेप ये है कि पैगम्बर मोहम्मद(स.) ने जब हज़रत आयशा(र.) से शादी की तो उनकी उम्र मात्र छह या नों साल थी। यह बात पूरी तरह गलत है कि नबी(अ.) से शादी के वक्त हज़रत आयशा(र.) की उम्र छह साल थी।ऐतिहासिक रूप से इसका कोई प्रमाण नहीं और हक़ीक़त इसके उलट है। 
तमाम इतिहासकार इसपर सहमत हैं कि हज़रत आयशा(र.) की बड़ी बहन हज़रत अस्मा(र.) उनसे दस साल बड़ी थीं।(1,2) और उनकी मृत्यु सन 73 हिजरी में 100 साल की उम्र में हुई (3,4,5,6) अर्थात हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय उनकी उम्र 
27 या 28 साल थी।और इस तरह हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 17 या 18 साल थी जबकि सन 2 हिजरी में उनकी शादी हुई। अर्थात शादी के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 19 या 20 साल थी।
References....
1. Siyar A’lama-nubala, Al- Zahabi, Vol. 2, pg 289, Arabic, Muassasatu-risalah, 1992
2. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, pg 371, Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah, 1933
3. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, p. 372
4. Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah,1933
5. Ibne Asakir vol 69 Page 18
6. Alsunnan Alkubra Albehaqi Vol.6 Page 204
7. Sahih Bukhari, kitabu’l-tafsir, Bab QaulihiBal al-sa`atu Maw`iduhum wa’l-sa`atu adha’ wa amarr)
8.Tarikh Tabari, vol. 4,



______________________________________________

हज़रत आएशा का गुड़िया से खेलना।

लीजिए भाई एक वेबसाइट पर केवल इस बात से अन्दाजा लगा लिया गया कि अम्मी आएशा रज़ि• अपने विवाह के समय अबोध बच्ची थीं क्योंकि वो गुड़िया से खेला करती थीं ....

लेकिन गुड़िया से खेलना क्या वाकई अबोधता और इतनी कम उम्र होने का प्रतीक है ?? मुझे तो नहीं लगता।

1995 का समय था जब मैं अपनी नानी के यहाँ गया तो मेरी कज़िन सिस्टर ने मुझे दावत दी ..... अपनी गुड़िया की शादी की, जो कि मेरी दूसरी कज़िन सिस्टर के गुड्डे के साथ हो रही थी .... मेरी वो दोनों ही बहनें 18 वर्ष के पार की हो चुकी थीं जो गुड़ियों से खेल रही थीं ... और मजे की बात ये कि इस खेल मे उनका भरपूर सहयोग देने वाली मेरी एक मामी थीं जिनकी उम्र 30 से ऊपर ही होगी....

क्या वे सब असामान्य थीं जो बच्चों वाला खेल इतनी उम्र मे खेल रही थीं ??
जी नहीं ... असल मे ये सामाजिक परिवेश का फर्क है जो आज हम युवा लड़कियों द्वारा गुड़िया से खेलने की बात एक आश्चर्य के तौर पर लेते हैं ... पर चालीस वर्ष का हो जाने पर भी क्रिकेट खेलने वाले पुरूषों को सामान्य तौर पर देखते हैं ..... बूढ़े हो चुके लोगों को भी मोबाइल पर वही गेम खेलते देखते हैं जो गेम हमारा सात साल का भाई भी चाव से खेलता है... 
पर ये सब देखकर भी हम आश्चर्य नहीं करते .... क्यों भाई ? खेल तो खेल है और खेलों का सम्बन्ध सामान्य तौर पर बच्चों से ही होता है ...

हमारे देश मे सावन के महीने मे प्रौढ़ महिलाएं भी मायके मे आकर झूला झूलती हैं ... तो क्या आने वाले समय मे इनको भी 6 वर्ष की बालिका वधू मान लिया जाएगा ??

अस्ल मे हर दौर, हर समाज मे पुरुष और महिलाओं के पास समय काटने के अलग अलग साधन होते हैं, जो बदलते समय के साथ बदलते भी जाते हैं ।

1995 के समय जब मेरी युवा बहनें गुड़िया से खेल रही थीं तब न मोबाइल थे, न गांव मे मेकअप का सामान सुलभ था जिसमें दिल लगाया जाता, न वहां किताबें मिलती थीं, न उस वक्त तक गांव मे बिजली थी कि टीवी देखकर वक्त गुजारा जाता, .... खाली वक्त गुजारने का कुछ ही साधन जैसे बातें और खेल
स्पष्ट है कि उनका गुड़िया से खेल अबोधता का प्रतीक नही बल्कि घरदारी के जौहर दिखाने और वक्त गुजारी का साधन था 

एण्टी इस्लामिक साइट वाले ने तो एक सिरा पकड़ कर नबी स. पर आपत्तिजनक आरोपों की झड़ी लगा दी पर जरा वो अपनी आंख चौड़ी कर के इन्टरनेट ही सर्च कर लेता तो उसे पता लगता कि गुड़िया का खेल बच्चों से ज्यादा वयस्क लोगों को प्रिय होते हैं।

जैसे कि एक 43 वर्षों तक उत्तर पूर्वी पेरिस की अपनी दुकान में गुड़ि‍यों की मरम्मत करने वाले हेनरी लॉने (Henri Launay) कहते हैं कि उन्होंने अपने कॅरियर के दौरान 30000 से अधिक गु‍ड़ि‍यों का सुधारा है। उनके ज्यादातर ग्राहक बच्चे नहीं बल्कि 50-60 साल के बुजुर्ग थे।

~ ज़िया इम्तियाज़।

◆◆◆◆◆

■■■

उम्मुल मुमिनिन हजरत आयशा रजि अल्लाहु तअला अन्हा से आप ﷺ के निकाह को लेकर किए जाने वाले एतराज का मुदल्लल जवाब.

मोहम्मद नोमान मक्की
किंग अब्दुल्ला मेडिकल सिटी मक्का मुकर्रमा
मंजूर शुदा : हजरत मौलाना इलियास घुम्मन साहब हफिजाहुल्लाह 


क्या उम्मूल मोमिनिन हजरत आयशा रजि अल्लाहु तआला अन्हा का निकाह हजरत मोहम्मद ﷺ  के साथ कम सिन्नी(कम उम्र) मैं हुआ था...???
 दुश्मनाने इस्लाम खुसुसन "मगरिबी दुनिया के लोग इस बात को लेकर हजरत मोहम्मद ﷺ की शान ए अकदस मैं गुस्ताखी करते नजर आते हैं..
और आप ﷺ के मुबारक तकद्दूस को पामाल करनेकी नापाक कोशिश करते हैं जिनके देखा देखी आजकल हिंदुस्तान के कुछ तंग ज़हन इस्लाम के मुखालिफ लोग भी इस को उनवान बनाकर हिंदुस्तान के मुसलमानो के जज्बात को मजरूह करने की कोशिश कर रहे हैं.. जिसको सुनकर मुसलमान बहुत ज्यादा परेशान हो जाते हैं और शाने अकदस में होने वाली गुस्ताखी को बर्दाश्त नहीं कर पाते मगर इसके बावजूद इस एतराज पर अपने आप को ला जवाब महसूस करते नजर आते हैं.. और बाज मुसलमान खुद हैरान होकर 
इस पर सवाल करते हैं कि 
आप ﷺ ने अम्मी आयशा से इतनी कम उम्र में निकाह क्यों किया था...???

 आगे जो तहकीक और हकाइक आपके सामने पेश किए जा रहे हैं उसे पढ़कर आपके सारे इशकाल दूर हो जाएंगे इंशा अल्लाह..और आप खुद दूसरे मुस्लिम और गेर मुस्लिम भाईयों की गलत फहमी को दूर कर सकते है
  
यह तहरीर बड़ी मेहनत से तैयार की गई है  इसको कम से कम एक बार जरूर पढ़ें ताकि पूरी जिंदगी इस उनवान के मुताल्लीक ताज्ज़ुब  में मुब्तला ना होना पड़े अन करीब इसका अंग्रेजी में भी तरजमा पेश किया जाएगा इंशा अल्लाह
जिसको आप अपने गैर मुस्लिम दोस्तों के साथ भी शेयर कर सकते हैं

बा वक्त ए ज़रूरत मुकररीनीन हजरात भी इस तहिकक से फायदा उठाते हुए अवाम को इसके मूताल्लीक बता सकते हैं
जो कि इस वक्त मुसलमान खुसुसन "दुनियवी पढ़े लिखे तबके के ईमान और अकाईद की सलामती के लिए जरूरी है....

सहिह बुखारी और सहीह मुस्लिम की रिवायत से पता चलता है कि
हजरत आयशा रजि अल्लाहू अन्हा का निकाह उनकी 6 साल की उम्र में हुआ और रुखसती के वक्त उनकी उम्र शरीफ 9 बरस की थी
{ رواه البخاري (3894) ومسلم (1422) }..
यह सारी रिवायत सही है इनकी सिह्हत पर कलाम नहीं किया जा सकता

 इस बात को मगरीबी मीडिया ने कई दफा mispresent करके आवाम के दिलों में हजरत मोहम्मद मुस्तफा ﷺ के मुताल्लिक बद गुमानी पैदा करने की नापाक कोशिश की है..
जिसकी वजह से बाज लोग हेरानी और  ताज्जुब. से पूछते हैं कि क्या मोहम्मद ﷺने एक बच्ची से निकाह किया था..??
 आइए देखते हैं किसकी हकीकत क्या है......
इस निकाह के पीछे क्या हिकमत थी..??

1400 साल पहले क्या यह आम सी बात थी..???
 
इसका जवाब देने के लिए उन रीवायात की सिह्हत पर कलाम करने की जरूरत नहीं बल्कि इसको तारीखी पस मंजर से देखने की जरूरत है..

एक अहम नुकता

वक्त के साथ साथ इंसानों की गिजा और उनके अंदर इस्तेमाल की चीजों में बड़ी तब्दीलियां आई है और इसी तरह इंसानो के अंदर भी जिस्मानी तब्दीलियां
 (  Anatomical and Physiological Changes ) 
हुई है.....

1400 साल पहले इतनी कम उम्र मैं शादी होना एक आम सी बात थी.. और यह तारीखी  हकीकत है कि युरूप एशिया अफ्रीका और अमेरिका में 9 साल से 14 साल की लड़कियो की शादी कर दी जाती थी....

मिसाल के तौर पर सेंट आगस्टिन
 Saint Augustine ~ 350 AD   ने जिस लड़की से शादी की उसकी *उम्र 10 साल थी*

राजा रिचर्ड 
 2 ، KING RICHARD-II 1400 AD  ने जिस लड़की से शादी की उसकी *उम्र 7 साल की थी*

हेनरी  ، HENRY 8 ने *6 साल की लड़की से शादी की थी*

यहां तक कि ईसाइयों की पढ़ी जाने वाली आज की मौजूदा बाइबिल में है

In the book of Numbers, chapter 31 and verse 17 

*" But Save for yourselves every GIRL who has never slept with a man "*

*मगर हर वह लड़की जो बाकीरा है उसको अपने लिए मखसूस करो*

ईसाईयो की कोथोलिक इनसाइक्लोपीडिया के मुताबिक हजरत इसा अयहीस सलाम की वालदा हजरत मरियम का निकाह
उनकी 12 साल की उम्र में 99 बरस के जोसफ से हुवा था..

1929 से पहले तक बरतानिया में चर्च आफ इंगलैंड के वूजारा *12 साल* की लड़की से शादी कर सकते थे 
1983 से पहले कैथोलिक केनान के कानून ने अपने पादरीयों को
ऐसी लड़कियों से शादी कर लेने की इजाजत दे रखी थी जिनकी *उम्र 12*को पहुंच चुकी हो.

बहुत सारे लोग इस बात से 
ना वाकिफ हैं कि अमेरिका के स्टेट ऑफ डेलेवर मैं 1880 में लड़की की शादी की जो कम से कम उम्र थी वह *8 साल* थी
और केलिफोर्निया में *10साल* थी...

यहां तक के आज तक भी अमरीका के कुछ स्टेटस मैं लड़कियों की शादी की
जो उम्र है वह *मेसेचोसस में 12साल* और *नियो हेमसफ़र में 13साल* और *न्यूयॉर्क में 24 साल* की उम्र है
 यहां तक तो इस्साईय्यत  और मगरिबी ममालिक में लड़कियों की शादी की मुनासिब उम्र और वहां के मारूफ शख्सियात के मुताल्लीक था
जिससे यह साफ साबित होता है कि तारीखी नूकता ए नज़र से इस उम्र की लड़की से निकाह करना एक आम सी बात थी और इसको कोई मायूब नहीं समझता था

 *हिंदू मजहब में शादी की उम्र*:

अब हमारे मुल्क हिंदुस्तान के कवानिन और हिंदू मजहब की मुकद्दस किताबों पर नजर डालते हैं  कि उनमें लड़की की शादी की मुनासिब उम्र के बारे में क्या लिखा है??
हिंदू मजहब की किताब मनुस्मृति मैं लिखा है

*लड़की बालिग होने से पहले उसकी शादी कर देनी चाहिए*
 (गोतमा18-21 )

*इस डर से के कहीं अय्याम ए हेज ना शुरू हो जाए बाप को चाहिए के अपनी बेटी की शादी उसी वक्त कर दे जब के वह बे लिबास घूम रही हो*
*क्यूंकि अगर वह बुलुगियत के बाद भी घर में रहे तो उसका गुनाह बाप के सर होगा*
 
वाशिस्था ( 17:70 )
(manu ix, 88; http://www.payer.de/dharmashastra/dharmash083.htm)

- *Age of Marriage in India*
:
*हिंदुस्तान में शादियों की उम्र* 
इसके मुताल्लिक  केमबरज के सेन्ट जानिस कालेज के Jack Goody ने अपनी किताब 
Tha Encyclopedia of religion and Ethics 
मे  लिखा है कि हिंदुस्तानी घरों में लड़कियां बहुत जल्दी ही बियादी जाती थी
सरी नवास इन दोनों के बारे मैं लिखते हैं   जबकि इंडिया में बुलूगियत से पहले शादी करने का रिवाज चलता था

 (1984: 11) लडकी को उसकी उम्र को पहुंचने से पहले उसकी शादी कर देनी होती थी हिंदूओ के  मुताबिक और मुल्क  के रिवाज के मुवाफिक लडकी के  बाप पर यह जरूरी था कि वह बालिग होने से पहले उसकी शादी कर दे अगर चे रूखसती मे अकसर ताखिर होती होती थी जो तकरिबन "3 साल होती थी 
(The Oriental, the Ancient, and the Primitive, p.208.)

ओर ये बात सब जानते हैं की कम उम्र की शादीयो का इंडिया में आज भी रिवाज है 

- *The Encyclopedia of Religion and Ethics*   

मे लिखा है कि जिसकी बेटी इस हालत में  बुलुगियत को पहुंचती   थी की वह गैर शादीशुदा हो तो उसके ( हिंदू ) बाप को  गुनाहगार समझा जाता था अगर ऐसा होता तो वह लड़की खुद बा खुद शुद्र( निचली जात) के दर्जे में चली जाती थी और ऐसी लडकी से शादी करना  शौहर के लिए बाईसे रुसवाई होता था 
 
*मनु* की *समरती* ने मर्द ओर ओरत के लिए शादी की जो 
उम्र तय कि है वो इस तरह की ,लड़का 30 साल का और लड़की 12साल की या लड़का 24 साल का और लड़की 8 साल की....
मगर आगे चल कर *भ्रस्प्ती* 
और *महा भारता* की तालीम के मुताबिक ऐसे मौके पर ( हिंदू ) लड़कियो की शादी की जो उम्र बताई गई हैं वो 10 साल और 7 साल है जबकि उसके बाद के         *श्लोकास* में शादी की कम से कम उम्र 4 से 6 साल और ज़्यादा से ज़्यादा 8 साल बताई गई है
 और इस बात के बैशुमार गवाह है की ये बात सिर्फ तहरीर में नहीं थी यानी इन पर अमल भी होता था
(encyclopedia of religion and ethics, p.450 ), 

तो हिंदू मजहब के मानने वालों की अपनी किताबो के  मुताबिक भी इस उम्र में शादी करना कोई ऐब की बात नहीं है जो लोग इस पर एतराज करते हैं वो या तो जहालत की बुनियाद पर करते हैं या सियासी मफाद की खातिर इनको चाहिए के पहले तारीख का और अपनी मजहबी किताबों का मुताला करें 

*1400 साल पहले मुल्के अरब में*

 भी इस उम्र में लड़की की शादी को मायूब नहीं समझा जाता था हजरत मोहम्मद ﷺ  के जमाने में जिन लोगों ने आपके ﷺ पैगाम  को झूठ लाया उन्होंने हर तरीके से आप ﷺ को बदनाम करने और आप ﷺ को नीचा दिखाने की कोशिश की वह हर उस मोके की ताक में रहते थे कि जिससे वह आपकी शख्सियत पर वार कर सकें जबानी तौर पर भी और जिस्मानी तौर पर भी

आप ﷺ पर जो जबानी हमले करते थे उनमें कभी आपﷺको जादूगर कहते थे कभी आपकोﷺ  झूठा कहते तो कभी आपको मजनून कहते थे 
ना आऊजु बिल्लह मिन जालिका

मगर कभी भी उन लोगों के दिलों में यह ख्याल भी नहीं आया के हजरत आयशा रज़ी  से आप ﷺ के निकाह को लेकर एतराज़  करें या ताना दे ऐसा क्यों.????

क्योंकि उस वक्त उनके समाज में यह आम सी बात थी और उनके नजदीक वह कोई ऐसी बात नहीं थी जिस को बुनियाद बना कर वो आपको ताना देते ....

*क्या आप जानते हैं*

क्या आप जानते हैं कि हजरत मोहम्मद ﷺ की हयाते तय्याबाह के पहले 54 साल तक सिर्फ एक ही जोजा  मोहतरमा थी और वह उम्मुल  मोमीनिन हजरत खादीजा रजी अल्लाहु तआला अन्हा थी 
क्या आप जानते हैं कि वह एक बेवा औरत  थी जिनसे हजरत ﷺ मुहम्मद ने निकाह  किया था

और क्या आप जानते हैं कि वह आपसे उम्र में 15 साल बड़ी थी हजरत मोहम्मद ﷺ ने अपनी जिंदगी के ऐन जवानी के अय्याम सिर्फ एक बीवी हजरत खदीजा के साथ गुजारे हैं जो आप से उम्र में 15 साल बड़ी थी और आपने उनकी वफात तक भी उनसे ताल्लुक रखा और यहां तक कि उनकी वफात के बाद भी उनके दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ हुसने सुलूक और ताल्लुक को बरकरार खा

*उम्मुल मोमिनन हजरत आयशा रजी अल्लाहु तआला अनहा से आप का निकाह*

अल्लाह के हुक्म पर आप ﷺ ने उम्मुल मोमिनन हजरत आयशा रजी अल्लाहु तआला अनहा से निकाह फरमाया जबकि उनकी उम्र 6 साल थी मगर उसी वक्त रुखसाती नहीं की गई

जब हजरत आयशा रजी की उम्र 9 साल की हुई तब आपकी रूखसती  हुई

अब सवाल ये है की जिस वक्त आपकी रुखसति हुई उस वक्त क्या हज़रत आयशा रजी. अभी ना बालिग बच्ची थी ????

नहीं बल्कि मुल्के अरब के मौसम और वहां की तरतीब के हिसाब से वो उम्र बच्चियों की रुखसाती के लिए काबिले कुबूल थी 

*तारीख और जदीद साइंस*
इस बात को वाजेह  करते है कि बुलगियत की उम्र मुख्तलिफ ज़माने और मुख्तलिफ इलाकों के हिसाब से मुख्तलिफ होती है

मौजूदा साइनसी तहकीकात इस बात को साबित करती है कि लड़कियां मुकम्मल बुलुगियत की उम्र को 9 से 15 साल की उम्र के दरमियान किसी भी वक्त पहुंच सकती है

( http://www.livescience.com/1824-truth-early-puberty.html )

*" The average temperature of the country is considered the chief factor with regard to Menstruation and Sexual Puberty"*
(Women : An Historical, Gynecological and Anthropological compendium, Volume I, Lord and Brandsby , 1998, p. 563)

तरजमा:- किसी भी इलाके की बच्चियों के अय्यामें हेज़ के शुरुआत और  इज़दीवाजी बुलुगियत की उम्र को पहुंचने मैं उस मुल्क का औसत जो दर्जा ए हररात है वह अहम किरदार अदा करता है

इन सारे दलाईल की रोशनी में अगर इस वाकिए को देखें तो यह इशकाल की अम्मी आइशा रूखसती  के वक्त नाबालिग बच्ची थी बिल्कुल खत्म हो जाता है और इन सारे वाकियात और तारीखी पस मंजर को सामने रखकर देखा जाए तो किसी को भी इस निकाह पर एतराज करने का कोई भी मौका बाकी नहीं रहता 

हां अगर किसी के दिल में पहले ही से मर्ज हो तो उसका कोई  कुछ नहीं कर सकता..
 
قوله تعالى:
﴿ فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ فَزَادَهُمُ اللَّهُ مَرَضًا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ ﴾
सुरह बकरा आयत 10

तरजमा:- उनके दिलों में मर्ज था खुदा ने उनका मर्ज और ज्यादा कर दिया और उनके झूठ बोलने के सबब उनको दुःख देने वाला अजाब होगा 

*इस निकाह कि अज़ीम हिक्मत:*

तो इस निकाह के पीछे क्या हिकमत थी???

हमारा खालिक हम सबको पैदा करने वाला सब चीजों को सबसे बेहतर जानने वाला है 

हजरत आयशा से आप ﷺ ने निकाह अल्लाह के हुक्म की तामील में किया था 

(सही बुखारी जिल्द नंबर 5 किताब 58 हदीस 235)

हजरत आयशा सिद्दीका रजि. अल्लाह  तआला अन्हा ने अल्लाह के हबीब ﷺ की 2200 से ज्यादा अहादीस हम तक पहुंचाई है हजरत आयशा गेर मामूली जहीन थी और बहुत बेहतरीन कुव्वत ए हाफजा की मालिक थी
और चूंकि कम उम्र में ही उनकी शादी अल्लाह के नबी ﷺ से हो गई थी तो उन्हें आपसे बहुत सारा इल्म हासिल करने का मौका मिल गया जिसकी बदौलत आगे चलकर उन्होंने एक बहुत बेहतरीन उस्ताद माहिर और फकिह  का किरदार अदा किया तो इस शादी के पीछे बड़ी हिकमते  पोशीदा थी

हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलयही वसल्लम दुनिया की आसाईश और उसकी लज्जतो से लुत्फ अंदोज होने के लिए दुनिया में तशरीफ नहीं लाए बल्कि आपने हमेशा अपने आप को दुनिया की जेबो ज़ीनत और उसकी लज्जतो से दूर रखा और अपनी उम्मत को भी इसके धोखे से डराया  

जितने भी निकाह आपने अपनी हयात ए तय्याबा में फरमाए वह मर्दो वाले शोक की  शादियां नहीं थी बल्कि वह  हुक्मे इलाही और हिकमत ए खुदा बंदी की बुनियाद पर थी 

वरना एक ऐसा हसीन और जमील  अजमल और अकमल अबहा और अनवर आला और अनसब तूवाना और खूबसूरत नौजवान जिस जैसा किसी की आंख ने ना देखा हो वह अपनी ऐन भरपूर जवानी के अय्याम अपने से 15 साल बड़ी एक ही बीवी के साथ गुजार सकता था ??

●●●●●

एक निहायत गलत आक्षेप ये है कि पैगम्बर मोहम्मद(स.) ने जब हज़रत आयशा(र.) से शादी की तो उनकी उम्र मात्र छह साल थी। यह बात पूरी तरह आधारहीन है कि नबी(अ.) से शादी के वक्त हज़रत आयशा(र.) की उम्र छह साल थी। ऐतिहासिक रूप से इसका कोई प्रमाण नहीं और हक़ीक़त इसके उलट है। 
तमाम इतिहासकार इसपर सहमत हैं कि हज़रत आयशा(र.) की बड़ी बहन हज़रत अस्मा(र.) उनसे दस साल बड़ी थीं।(1,2) और उनकी मृत्यु सन 73 हिजरी में 100 साल की उम्र में हुई (3,4,5,6) अर्थात हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय उनकी उम्र 27 या 28 साल थी। और इस तरह हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 17 या 18 साल थी जबकि सन 2 हिजरी में उनकी शादी हुई। अर्थात शादी के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 19 या 20 साल थी।
दूसरा सुबूत हज़रत आयशा(र.) का स्वयं का क़ौल है जो कि सहीह बुखारी में इस तरह दर्ज है,(7) ''जब सूर: अल क़मर का नुज़ूल हुआ उस समय मैं किशोरावस्था (जारिया:) में थी।" ज्ञात रहे कि सूर: अल क़मर का नुज़ूल हिजरी वर्ष आरम्भ होने के 8 साल पहले हुआ था। अब किसी किशोरी की आयु दस साल बाद अर्थात शादी के समय क्या होगी इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
तबरी के अनुसार, ''पैगम्बर मोहम्मद(स.) ने जब इस्लाम का पैगाम दिया, उससे पहले हज़रत अबूबक्र(र.) ने दो शादियां की थीं। पहली बीवी का नाम फातिला था उनसे एक बेटा अब्दुल्लाह व बेटी अस्मा हुई । जबकि दूसरी बीवी की नाम उम्मे रूमाँ था। इनसे बेटा अब्दुर्रहमान व बेटी आयशा (र.) हुई । ये चारों इस्लाम का पैगाम आने से पहले हो चुके थे।(8 ) रसूल(स.) ने इस्लाम का पैगाम जब दिया था तो उनकी उम्र थी चालीस साल। जबकि हिजरत के वक्त उनकी उम्र थी 52 साल। उसके दो साल बाद उन्होंने हज़रत आयशा(र.) से शादी की। इस तरह भी इस शादी के वक्त हज़रत आयशा(र.) की उम्र 14 साल से ज़्यादा ही ठहरती है, कम नहीं।
गर्ज़ ये कि इस्लाम के रसूल(स.) पर लगाया गया ये इल्ज़ाम पूरी तरह गलत है कि उन्होंने किसी बच्ची से शादी की थी।           

1. Siyar A’lama-nubala, Al-Zahabi, Vol. 2, pg 289, Arabic, Muassasatu-risalah, 1992
2. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, pg 371, Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah, 1933
3. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, p. 372 
4. Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah, 1933
5. Ibne Asakir vol 69 Page 18
6. Alsunnan Alkubra Albehaqi Vol.6 Page 204 
7. Sahih Bukhari, kitabu’l-tafsir, Bab QaulihiBal al-sa`atu Maw`iduhum wa’l-sa`atu adha’ wa amarr)
8.Tarikh Tabari, vol. 4, p. 50


◆◆◆
उम्र ए आयशा...

जब आप तारीखी शख्सियात का मुताल'अ करते हैं, तो आपके सामने बहुत सारी चीज़ें आती हैं। मुल्हिद और लिबरल क़िस्म के लोग जनाब ए इब्न सीना की बहुत तारीफ़ करते हैं। मगर ये वही इब्न सीना हैं जिनके गुलाम भी थे और इन मौसूफ़ ने सिर्फ़ अठारह साल की उम्र में इलाज करना शुरू कर दिया था। शादी उनकी कम उम्र में हो गई थी। ये सब बातें तारीख़ में लिखी हैं। और इन मौसूफ़ पर किसी ने इस बुनियाद पर कोई तनक़ीद भी नहीं की कि उसे ग्रेजुएट बनाए बग़ैर इलाज क्यों करने दिया जा रहा था, उसकी कम उम्री में शादी क्यों की और उन्हें गुलाम भी नहीं खरीदने चाहिए थे। 
ये ऐतराज़ इंसान दो वुजूहात के सबब कभी भी नहीं करेगा। एक ये कि उसको पता है कि हर ज़माने के हालात मुख़्तलिफ़ होते हैं। एक चीज़ जो एक ज़माने में कुछ वुजूहात के सबब ज़ुल्म से कम न हो, दूसरे ज़माने में एक बहुत ही आम सी चीज़ होती है और कोई काबिल ए ऐतराज़ बात नहीं होती है। फिर ये कि आप ये भी सोचते हैं कि उससे शायद किसी का नुक़सान भी नहीं हुआ होगा क्योंकि उस ज़माने का माहोल ही ऐसा था कि इतनी सी उम्र में इलाज शुरू कर देने से शायद ही किसी का नुक़सान हुआ हो कि न ही मेडिकल साइंस इतने बुलंद मक़ाम पर पहुंची हुई थी कि ग्रेजुएशन ज़रूरी हो और इलाज के तरीके भी सादा और मुख़्तलिफ़ थे।
जब सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र की बात आती है, तो उनको उस ज़माने की खातून नहीं समझा जाता। उनको आज के ज़माने की कोई खातून समझ कर ये समझा जाता है कि उनसे कम उम्री में शादी शायद कोई बहुत बड़ा ज़ुल्म उन पर हो गया। असल बात तो ये है कि सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा ने ज़िंदगी भर इस पर कोई ऐतराज़ नहीं किया। अपनी उम्र पर तो एक लफ़्ज़ न कहा कि उस उम्र में शादी क्यों की गई, देर से हो जाती तो अच्छा था। अपनी किस्मत पर भी कोई पशेमानी न हुई, बल्कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तारीफ़ व तौसीफ़ करती नज़र आती हैं और उनकी शरीयत पर जगह जगह इज्तिहाद करती नज़र आती हैं। किसी भी तारीख़ी मे'यार पर मेरे पास क्या वजह रह जाती है कि मैं उसको तनक़ीद की बुनियाद बनाऊं जबकि न सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा को कोई तकलीफ़ हुई थी और न उस ज़माने के किसी शख़्स को ऐतराज़ हुआ। और जहां तक ये नुक्त़ा है कि सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उमर क्या नौ साल ही थी? तो ये क़त'ई तौर पर नहीं कहा जा सकता। वो इसलिए कि अहले अरब में उस ज़माने में उम्रें याद रखने का कोई बहुत ज़्यादा रिवाज नहीं था। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अहले अरब के हवाले से फरमाया:

"हम एक अनपढ़ कौम हैं, हम न किताबत करते हैं और न हिसाब रखते हैं।"
(सही बुखारी: 1913)

उम्रों के बारे में क़ौल मुख़्तलिफ़ हो ही जाते हैं क्योंकि अंदाज़ों की बुनियाद पर ये बातें होती थीं। एक शख़्स को खुद अपनी उम्र याद नहीं होती थी। और ख़ुद आज के ज़माने में भी यमन और बाज़ इलाके अरब ही के ऐसे हैं जहां टेक्नोलॉजी कम है और लोगों को अपनी ही उम्रें याद नहीं होती हैं, वो अंदाज़ों से अपनी उम्रें बताते हैं। मुमकिन है कि सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा ने भी इसी लिहाज़ से बताया हो क्योंकि ख़ुद सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा तिर्मिज़ी की एक रिवायत में बुलूग़त की उम्र नौ साल बताई थी और कहती थीं कि नौ साल के बाद एक लड़की औरत बन जाती है। उन्होंने शायद इसी मुनासबत से कोई अंदाज़ा लगाया हो कि शर'अन कोई हराम काम तो है ही नहीं। मगर बहर हाल, किसी भी ज़ाविए से काबिल ए एतराज़ बात क़त'अन भी नहीं है। और तारीख़ के तनाज़ुर में मुहद्दिसीन ने अहादीस को परखा भी है और बाज़ अवकात रद्द भी कर दिया है। हम ये कह सकते हैं कि  क़त'ई यकीनी से ये कहना मुश्किल है कि उम्र नौ साल ही थी और वुजूहात भी सारे अर्ज़ कर दिए गए हैं। और तारीख़ी दलाइल इस उम्र के न होने के हवाले से बहुत ज़्यादा हैं जिस पर कांधलवी साहब की "तहक़ीक उम्र ए आयशा" और शेख़ सलाह अल-दीन इदलिबी की तहक़ीक मुफीद है। शेख़ ख़ुद एक मुहद्दिस हैं, उन्होंने इस रिवायत का इंकार नहीं किया, अलबत्ता सिर्फ़ ये कहा है कि इस बात के क़वी इमकानात तारीख़ की रौशनी में मौजूद हैं कि सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र नौ न हो।

■■■

<निकाह के वक़्त सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र 16 या 17 साल के करीब थी और रुख़्सती के वक़्त 19 या 20 साल>
वीडियो में चंद दलाइल और सवालात हैं, बाकी दलाइल जो वीडियो में नहीं है वो यहां पढ़ लें:
1. सूरेह अल कमर 5 या 6 नबवी में नाज़िल हुई, बुखारी की ही एक रिवायत (सही बुखारी: 4876) में सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा बयान करती हैं कि जब सूरेह कमर नाज़िल हुई तो मैं उस वक़्त खेलती फिरती थी।
यानी सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा उमर के उस हिस्से में थीं कि जहां वो अपनी हम उम्र लड़कियों के साथ खेलती भी थीं और अक्ल भी इतनी पुख़्ता हो चुकी थी कि उन्हें पता चल गया कि ये कुरआन की आयात है और फिर सारी ज़िंदगी उसके नुज़ूल का वक़्त याद भी रहा जिसे वो रावी को बता रही हैं।
इस सूरेह के नुज़ूल के वक़्त अगर हम सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र कम अज़ कम सात साल भी फ़र्ज़ करें तो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से निकाह के वक़्त उनकी उम्र 16 या 17 साल बनती है और रुख़्सती के वक़्त उनकी उम्र 19 या 20 साल बनती है।
2. अगर बुखारी की इस रिवायत को दुरुस्त मान लिया जाए कि निकाह के वक़्त सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र छह साल थी तो फिर इसका मतलब ये बनता है कि जब ग़ज़्वा ए उहुद (3 हिजरी) हुआ तो उस वक़्त सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र 10 साल होगी।
लेकिन बुखारी में ही एक रिवायत (सही बुखारी: 2880) मौजूद है कि सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा ग़ज़्वा ए उहुद में शरीक थीं और ज़ख्मियों को पानी पिलाने के लिए  मश्कीज़े भर भर कर ला रही थीं।
अब ज़रा गौर कीजिए कि एक दस साल की बच्ची जंग के ख़तरनाक माहोल में क्या कर रही थी? और वो कमज़ोर जान पानी के मश्कीज़े भर भर कर एक जगह से दूसरी जगह कैसे ले जा सकती है? जबकि बुखारी की ही एक रिवायत (सही बुखारी: 2664) में मौजूद है कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग़ज़्वा ए उहुद में पंद्रह साल से कम उम्र बच्चों को जाने के इजाज़त नहीं दी।
तो इससे ये नतीजा निकलता है कि उहुद के वक़्त सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र 15 साल से ज़्यादा थी।
3. सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की बड़ी बहन सय्यदा असमा रज़ी अल्लाहुअन्हा उनसे दस साल बड़ी थीं।
सय्यदा असमा रज़ी अल्लाहुअन्हा की वफात 73 हिजरी में हुई जब उनकी उम्र 100 साल थी।
साबित ये हुआ कि अगर 73 हिजरी में उनकी उम्र 100 साल थी तो फिर हिजरत के वक़्त उनकी उम्र 27 साल होगी, और सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा उनसे 10 साल छोटी थीं तो उनकी उम्र हिजरत के वक़्त 17 साल होगी। और हिजरत के तकरीबन दो या तीन साल बाद सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की रुख़्सती हुई थी यानी उस वक़्त उनकी उम्र 19 या 20 साल थी।
ये बात मुंदरिजा-ज़ेल कुतुब में बयान हुई है:
(अल्लामा इब्न हजर अस्कलानी, तहज़ीब अल तहज़ीब: जिल्द 12 सफ़्हा 426)
(इब्न कसीर, अल बिदाया व अल निहाया: जिल्द 8 सफ़्हा 346)
(अल तबकात अल कुबरा: जिल्द 8 सफ़्हा 255)
(इमाम इब्न जौज़ी, उस्द अल गाभा फी मारीफत अल सहाबा: जिल्द 5 सफ़्हा 392)
(सीरत इब्न हिशाम: जिल्द 1 सफ़्हा 271)
(इब्न असाकिर, तारीख़ दमिश्क: जिल्द 22 सफ़्हा 69)
(इब्न अब्द अल बर्र, अल इस्ती'आब: जिल्द 2 सफ़्हा 616)
(बहकी: अल सुनन अल कबरी: 11927)
4. अगर बुखारी की इस रिवायत को दुरुस्त मान लिया जाए कि सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र निकाह के वक़्त छह साल थी तो फिर इसका मतलब ये बनता है कि उनकी पैदाइश ऐलान ए नुबुव्वत के पांच साल बाद हुई होगी। 
जबकि अबू बक्र रज़ी अल्लाहुअन्हु की तमाम औलाद ज़माना ए जाहिलियत में हुई थी, यानी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ऐलान नुबुव्वत से पहले ही सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा पैदा हो चुकी थीं और इस हिसाब से उनकी निकाह के वक़्त उम्र 19 या 20 साल ही बनती है।
(तारीख़ तबरी: 2/351)
5. इब्तिदाई दौर में इस्लाम क़ुबूल करने वालों में सय्यदना अबू बक्र रज़ी अल्लाहुअन्हु के साथ साथ उनकी साहबज़ादियां सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा और सय्यदा असमा रज़ी अल्लाहुअन्हा का भी नाम दर्ज है, इब्न हिशाम की तसरीह के मुताबिक उम्म-उल-मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा सय्यदना उमर रज़ी अल्लाहुअन्हु के इस्लाम लाने से काफ़ी कब्ल सन एक नबवी में इस्लाम क़ुबूल कर चुकी थीं। जिसका मतलब हुआ कि निकाह व रुख़्सती के वक़्त हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा की उम्र ज़्यादा थी। जबकि अगर छह साल के निकाह वाली बात को दुरुस्त माना जाए तो फिर उस वक़्त सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा पैदा भी नहीं हुई थीं जिस वक़्त उनके इस्लाम क़ुबूल करने की रिवायत मिल रही है।
(सीरत इब्न इसहाक़: 2/124)
(सीरत इब्न हिशाम: 2/92)
6. छह साल वाली रिवायत में जो रावियों से गलती का इम्कान है वो हमारे नज़दीक गिनती को न समझने की वजह से पैदा हुई है।
उर्दू में गिनती का हर लफ़्ज़ एक ही लफ़्ज़ पर मुश्तमिल होता है मसलन: एक, दो, तीन, ग्यारह, पंद्रह, इक्कीस, बाइस, सत्ताइस। ये सब एक एक लफ़्ज़ ही हैं।
जबकि इंग्लिश में one, two, three से ले कर twenty तक तो एक एक लफ़्ज़ ही रहता है लेकिन उससे आगे फिर दो दो अल्फाज़ शुरू हो जाते हैं मसलन: twenty one, twenty two. ये अब दो अल्फाज़ का मजमुआ बन गए हैं एक लफ़्ज़ twenty और दूसरा लफ़्ज़ two है जिसको उर्दू में लिखें तो एक ही लफ़्ज़ बाईस बनेगा।
अरबी जुबान में गिनती का तरीक़ा उर्दू वाला नहीं बल्कि इंग्लिश वाला होता है, वहां एक से 10 तक गिनती में तो एक एक लफ्ज़ ही रहता है लेकिन फिर आगे दो दो अल्फ़ाज़ का मजमुआ बन जाता है, सय्यदा आयशा रज़ी अल्लाहुअन्हा ने 16 या 19 साल उम्र ही बयां की होगी लेकिन रावियों से (1) वाला हिस्सा गिर गया और पीछे सिर्फ 6 और 9 रह गई जिसे उन्होंने आगे बयान कर दिया और इस तरह ये रिवायत बाकी तमाम हालत वाकियात के खिलाफ़ हो गई।
मज़ीद तफ़्सील इस विडियो में देख सकते हैं, कमेंट में बरेलवी और देवबंदी उलमा की विडियोज़ भी मौजूद हैं जो छह साल में निकाह वाली रिवायत को कुबूल नहीं करते।

◆◆◆◆

ऐसा कहा जाता है कि जब हज़रत आयशा की उम्र छह साल थी तब आपका निकाह पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) के साथ हुआ, और जब आपकी उम्र नौ साल थी तब आप अपने शौहर के साथ रहने के लिए मदीना (हिजरत के बाद) मुंतक़िल हो गईं।

इस गुमराह करने वाली इत्तेला (सूचना) ने गलत तास्सुर दिया कि इस्लाम में बच्चों की शादी की इजाज़त है। ये क़ाबिले गौर है कि हदीस के मुस्तनद (प्रमाणिक) होने को साबित करने के लिए, रावियों, हालात और उस वक्त की कैफियत का तारीखी हक़ाएक़ (ऐतिहासिक तथ्यों) के साथ बाहमी ताल्लुक़ को देखा जाना चाहिए। इस सिलसिले में हिशाम की एक हदीस है जिसमें हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र नौ साल होने का इशारा मिलता है, जब वो अपने शौहर के साथ रहने के लिए आईं।

कई मुस्तनद (प्रमाणिक) हदीसें भी ज़ाहिर करती हैं कि हिशाम की रवायत नबी करीम (स.अ.व.) की ज़िंदगी की कई तारीखी हक़ाएक़ (ऐतिहासिक तथ्य) जिन पर इज्मा है, के गैर मुताबिक़ हैं। उमर अहमद उस्मानी, हकीम नियाज़ अहमद और हबीबुर्रहमान कांधोलवी जैसे उलमा के हवाले के साथ, इस हक़ीक़त के हक़ में कुछ दलीलें पेश करना चाहूंगी, कि हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र कम से कम 18 साल थी जब आपका निकाह हुआ और आपकी उम्र कम से कम 21 साल थीं जब आप नबी करीम (स.अ.व.) साथ रहने के लिए आप (स.अ.व.) के घर में मुंतक़िल हुईं।

उमर अहमद उस्मानी के मुताबिक़, सूरे अल-निसा में ये कहा गया है कि यतीमों (अनाथों) के वली उनका माल उन्हें वापस करने से पहले उनकी लगातार आज़ामाइश करते रहें, जब तक कि वो शादी की उम्र तक पहुँच जायें (4:6)। इससे उलेमा हज़रात ने ये नतीजा निकाला है कि क़ुरआन ने शादी की एक कम से कम उम्र तय की है जो कम से कम सने बलोगत है। चूंकि लड़की की मंजूरी एक कानूनी आवश्यकता है इसलिए वो नाबालिग नहीं हो सकती है।

हिशाम बिन उरवह इस हदीस के खास रावी हैं। उनकी ज़िंदगी दो दौरों में तकसीम की गयी हैः 131 A.H. में मदनी मुद्दत समाप्त हुई, और इराकी अवधि शुरू हुई, उस समय हिशाम की उम्र 71 साल थी। हाफ़िज़ ज़हबी ने बाद के समय में हिशाम की याददाश्त खराब हो जाने के बारे में बात की है। मदीना, में उनके तालिबे इल्मों इमाम मालिक और इमाम अबू हनीफह ने इस हदीस का ज़िक्र नहीं किया है। इमाम मालिक और मदीने के लोगों ने उन्हें उनकी इराकी हदीसों के लिए तंक़ीद (आलोचना) की है।

इस हदीस के सभी रावी इराकी हैं जिन्होंने हिशाम से उसे सुना था। अल्लामा कांधोलवी का कहना है कि हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र के बारे में कहा गया शब्द ‘तिस्सह अशरह’ कहा गया है जिसका अर्थ 19 है, जब हिशाम ने सिर्फ तिस्सह सुना (या याद किया) जिसका मतलब 9 होता है। मौलाना उस्मानी का खयाल ​​है कि इस तब्दीली को जान बूझ कर और बदनियती से बाद में बनाया गया था।

इतिहासकार इब्ने इसहाक़ ने 'सीरते रसूलल्लाह’ (स.अ.व.) इस्लाम के औपचारिक घोषणा के पहले साल में इस्लाम स्वीकार करने वालों की एक फेहरिस्त (सूची) दी है जिसमें हज़रत आयशा रज़ि. का नाम हज़रत अबु बक्र रज़ि.की "छोटी बेटी आयशा रज़ि." के तौर पर दिया गया है। अगर हम हिशाम के हिसाब को कुबूल करते हैं, तो उस वक्त तक वो पैदा भी नहीं हुई थीं।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की पहली बीवी, हज़रत ख़दीजा की वफात के कुछ दिनों बाद, हज़रत खौवलह रज़ि. ने नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को बकरुन से दोबारा शादी करने का सुझाव दिया, जिसकी मुराद हज़रत आयशा रज़ि. से था (मसनद अहमद)। अरबी में बकरुन का अर्थ एक गैर शादीशुदा लड़की से है जिसने सने बलोगत को पार कर लिया हो और शादी की उम्र हो गई हो। एक छह साल की लड़की के लिए ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

कुछ अहले इल्म हज़रात का खयाल ​​है कि हज़रत आयशा रज़ि. की शादी जल्दी हो गई थी क्योंकि अरब में लड़कियाँ जल्दी बालिग़ हो जाती हैं। लेकिन ये उस वक्त अरबों का आम रिवाज नहीं था। अल्लामा कांधोलवी के मुताबिक़, इस्लाम से पहले या उसके बाद इस तरह का कोई मामला दर्ज नहीं है। और न ही उसे नबी करीम (स.अ.व.) की सुन्नत के रूप में बढ़ावा दिया गया। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी बेटियों की शादी हज़रत फ़ातिमा रज़ि की 21 और हज़रत रुक़य्या रज़ि. की 23 साल की उम्र में शादी कर दी थी। इसके अलावा, हज़रत अबु बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत आयशा रज़ि. के वालिद ने 26 साल की उम्र में अपनी सबसे बड़ी बेटी हजरते अस्मा रज़ि. की शादी कर दी थी।

हज़रत आयशा रज़ि. का बयान है कि वह जंगे बद्र में लड़ाई के मैदान में थीं (मुस्लिम)। ये किसी को भी इस नतीजे की तरफ़ ले जाता है कि हज़रत आयशा रज़ि. 1 हिजरी में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के घर में मुंतक़िल हुईं। लेकिन नौ साल की बच्ची को किसी भी तरह एक खतरनाक फौज़ी मिशन पर नहीं ले जाया जा सकता है।

2 हिजरी में नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने जंगे अहद में 15 साल से कम उम्र के लड़कों को ले जाने से इन्कार कर दिया था। क्या आप (स.अ.व.) ने एक 10 साल की लड़की को अपने साथ जाने की इजाज़त दी होगी? लेकिन हज़रत अनस रज़ि. से रवायत है कि उन्होंने हज़रत आयशा रज़ि. और हज़रत उम्मे सुलैम रज़ि. को पानी से भरी मश्क ले जाते हुए देखा और वो फौजियों को पानी पिला रही थीं (बुखारी)। हज़रत उम्मे सुलैम रज़ि. और जंगे अहद में दूसरी ख़ातून हज़रत उम्मे अम्मारा रज़ि. मजबूत और बालिग़ खवातीन थीं, जिनकी जिम्मेदारी शहीद हुए और ज़ख्मी फौजियों को उठाना था और उनके जख़्मों का इलाज करना था। भारी मश्क में पानी ले जाना और गोला बारूद और यहाँ तक कि तलवार भी ले जाती थीं।

हज़रत आयशा रज़ि. ने कुन्नियत का इस्तेमाल किया जो हज़रत उम्मे अब्दुल्ला रज़ि. के बेटे और आपके भतीजे और गोद लिए गए बेटे के नाम से लिया गया था।

अगर वो छह साल की थीं जब आपका निकाह हुआ था, तो उनसे आठ साल ही बड़ी रहीं होंगी जो उन्हें मुश्किल से ही गोद लेने के क़ाबिल बनाता। इसके अलावा, एक लड़की कभी अपने बच्चे की उम्मीद नहीं छोड़ सकती थी जबकि उन्होंने अपनी कुन्नियत के लिए अपने गोद लिए गए बच्चे के नाम इस्तेमाल किया।

हज़रत आयशा रज़ि. के भतीजे उरवह ने एक बार कहा कि इस्लामी कानूनों, शायरी और इतिहास के बारे में उनके आश्चर्यजनक ज्ञान से वो हैरान नहीं हैं क्योंकि वह नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बीवी और हज़रत अबु बकर रज़ि की बेटी थीं। अगर वो आठ साल की थीं जब आपके वालिद ने हिजरत की, तब उन्होंने अपने वालिद से शायरी और इतिहास का इल्म कब सीखा?

इस बात पर इत्तेफाक़ राये है कि हज़रत आयशा रज़ि. अपनी बड़ी बहन हज़रत अस्मह रज़ि. से 10 साल छोटी थीं, जिनकी हिजरत के वक्त उम्र लगभग 28 साल थी। इस तरह यह नतीजा निकाला जा सकता है कि हज़रत आयशा रज़ि. हिजरत के वक्त लगभग 18 साल की थीं। और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के घर मुंतक़िल होने के वक्त आप 21 साल की नौजवान औरत थीं। उस वक्त बहुत से तारीखी हक़ाएक़ (ऐतिहासिक तथ्यों) के साथ बाहमी ताल्लुक़ न बना पाने के सबब हिशाम हदीस के अकेले रावी हैं जिनकी सच्चाई को चैलेंज किया गया है।


◆◆◆

अक्सर कुछ कुंठित मानसिक विकलांगों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि प्रोफेट मोहम्मद saw ने, आयशा ra से 9 या 6 साल की आयु मैं विवाह किया था ....
जबकि इन्हें ये मालूम ही नहीं है कि इस्लाम मे अबोध बच्चों की शादी होती ही नहीं है क्योंकि शादी के लिए वर और वधू दोनों की स्वीकृति नितान्त आवश्यक है, और इस स्वीकृति के लिए वर वधू दोनों को परिपक्व बुद्धि वाला होना आवश्यक है .
दूसरी ओर इस्लाम मे शादी के लिए ये भी जरूरी है, कि वर और वधू दोनों विवाह करने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम हों और उन्हें विवाह की आवश्यकता महसूस होती हो, यानि वे प्यूबर्टी (यौवनारम्भ) की अवस्था को पार कर चुके हों .
"वे अनाथ बच्चों को जांचते रहें और जब वे "विवाह की उम्र" के हो जाएं, तो उनकी सम्पत्ति उन्हें सौंप दी जाए ..." [ अल-कुरआन, 4:6 ]
यह ग़लत इल्ज़ाम है कि अल्लाह के नबी (स.) ने हजरत आयशा (R.A.) से 9 या 6 साल की उम्र में शादी की थी। इस्लाम की सच्चाई व पैगम्बर मोहम्मद (स.) का बेदाग़ चरित्र शुरूआत से ही इस्लाम दुश्मनों की नज़र में खटकता रहा है। और वे नबी के चरित्र पर उंगली उठाने के मौके ढूंढते रहे हैं। इसके लिये अक्सर वे ज़ईफ़(Weak)हदीसों का सहारा लेने से नहीं चूकते, अर्थात जिनकी रावियों(Narrator),के सिलसिले में कहीं कोई कमज़ोर कड़ी पायी जाती है। इसी तरह का एक निहायत गलत आक्षेप ये है कि पैगम्बर मोहम्मद(स.) ने जब हज़रत आयशा(र.) से शादी की तो उनकी उम्र मात्र छह या नों साल थी। यह बात पूरी तरह गलत है कि नबी(अ.) से शादी के वक्त हज़रत आयशा(र.) की उम्र छह साल थी।ऐतिहासिक रूप से इसका कोई प्रमाण नहीं और हक़ीक़त इसके उलट है। 
तमाम इतिहासकार इसपर सहमत हैं कि हज़रत आयशा(र.) की बड़ी बहन हज़रत अस्मा(र.) उनसे दस साल बड़ी थीं।(1,2) और उनकी मृत्यु सन 73 हिजरी में 100 साल की उम्र में हुई (3,4,5,6) अर्थात हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय उनकी उम्र 
27 या 28 साल थी।और इस तरह हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 17 या 18 साल थी जबकि सन 2 हिजरी में उनकी शादी हुई। अर्थात शादी के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 19 या 20 साल थी।
References....
1. Siyar A’lama-nubala, Al- Zahabi, Vol. 2, pg 289, Arabic, Muassasatu-risalah, 1992
2. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, pg 371, Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah, 1933
3. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, p. 372
4. Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah,1933
5. Ibne Asakir vol 69 Page 18
6. Alsunnan Alkubra Albehaqi Vol.6 Page 204
7. Sahih Bukhari, kitabu’l-tafsir, Bab QaulihiBal al-sa`atu Maw`iduhum wa’l-sa`atu adha’ wa amarr)
8.Tarikh Tabari, vol. 4,

◆◆◆◆


No comments:

Post a Comment

बुद्ध और ईसा।

एक दिन संयोग से मैंने डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय की किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्य नन्दा को अपने अंत...