क्या किसी की उम्र हज़ार साल हो सकती है।
प्रश्न: कुरआन 29 :14 हजरत नूह की उम्र 950 साल की थी .. जब तूफान आया तो उनके पत्नी और बच्चे और समुदाय सब मौजूद थे जो उनके ही साथ लंबी उम्र जी रहे थे. लेकिन आज विज्ञान साबित कर रही है कि पुराने जमाने के इंसान की उम्र कभी आज के इंसान से अलग नहीं थी, बल्कि पिछले 2 लाख साल से औसतन एक समान ही है. आज सैकड़ों और हजारों पुराने अवशेषों और मानव ढाचो पर विज्ञान अनुसंधान कर चुकी है कोई 5 हजार से लेकर 2 लाख साल पुराने हैं, लेकिन उनमें से किसी की उम्र हजारों वर्ष नहीं थी.... तो कुरान की बात विज्ञान के आधार पर गलत साबित हो गई है ।
उत्तर: विज्ञान के विषय मे कुछ कहने से पहले ये बात सदैव ध्यान मे रखनी चाहिए कि विज्ञान की खोजबीन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, इसकी कोई भी बात अंतिम सत्य खुद वैज्ञानिक ही नहीं मानते, बल्कि नई नई खोज के साथ वैज्ञानिकों के निष्कर्ष भी बदलते रहते हैं ... व्यक्ति प्रारंभ मे कितनी उम्र जिया करता था इसका भी कोई सुस्पष्ट उत्तर अभी तक विज्ञान नहीं खोज पाया है, इसलिए इस विषय पर कुरान को गलत सिद्ध करने की स्थिति मे विज्ञान अभी है ही नहीं ॥
पहले तो आपको ये जानना चाहिए कि कोई जीवाश्म कितना पुराना है ये जानने की तकनीक, यानी कार्बन डेटिन्ग, जीव या वनस्पति की मौत के बाद से लेकर आज तक कितना वक्त बीत चुका है ये बताती है लेकिन जीव कितने वर्ष जीवित रहा ये बात कार्बन डेटिन्ग से पता नहीं चलती, जीव कितना जिया ये बात पता लगाने के मानक अलग हैं, किसी व्यक्ति के कंकाल से उस की मृत्यु के समय की उसकी उम्र किस तरह पता लगाई जाती है , इसकी एक अलग ही विधि है, जीव कंकाल मे पेड़ के तने की तरह वार्षिक वलय नहीं पड़ते जिन्हें गिनकर व्यक्ति की सही सही उम्र पता लगा ली जाए ... बल्कि कंकाल के लिए अलग अलग उम्र के कुछ स्टैंडर्ड पैरामीटर बना लिये गए हैं कि व्यक्ति की बाल्यावस्था, किशोरावस्था और फिर प्रौढ़ावस्था से लेकर बुढ़ापे तक विशेष उम्रों पर उसके कंकाल की बनावट मे आमूल परिवर्तन आते हैं... उदाहरणार्थ 35 से कम उम्र के व्यक्ति की खोपड़ी मे अधिक जोड़ दिखाई पड़ते हैं पर 35 की आयु के बाद उनमें एक स्पष्ट जोड़ भर जाता है, वैसे ही 40 की उम्र पार कर लेने के बाद खोपड़ी का एक और जोड़ भर जाता है ... ऐसे ही कुछ पैरामीटर्स के आधार पर कब्र से निकले कंकाल की उम्र का अनुमान लगाया जाता है, जो अनुमान कमोबेश सही बैठते हैं ... पर दुर्भाग्यवश उम्र के साथ कंकाल की बनावट मे बदलाव के ये मानक केवल उतनी ही आयु तक तय किए जा सकते थे जितनी अधिकतम आयु आज का मनुष्य जी सकता था... इसी कारण ये मानक केवल 100 वर्ष की आयु तक का ही अनुमान लगाने मे सहायता कर सकते हैं उस उम्र से आगे मानव कंकाल मे क्या परिवर्तन आते हैं ये बात अध्ययन के अभाव के कारण पुरातत्व विज्ञानियों को पता नही है, और मानक की अनुपस्थिति के कारण उनके लिए सौ से ऊपर की उम्र जीवित रहे हर कंकाल की आयु 101 वर्ष है ,फिर चाहे वो व्यक्ति 103 वर्ष जिया हो या 301 वर्ष ... तो भाई चाहे कोई हजार वर्ष का कंकाल भी पुरावेत्ताओं को मिला हो उन्होने उपलब्ध मानको के आधार पर उसकी उम्र बताई होगी, सो वो हजार वर्ष की उम्र बता ही नही सकते...!!
~ ज़िया इम्तियाज़।
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एक भाई ने कुछ साल पहले रमज़ान के समय एक पोस्ट की थी, कि "कनाडा, अमरीका का राज्य अलास्का, ग्रीनलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड, रूस और आइसलैंड इन देशों के कुछ हिस्से अंटार्कटिक ध्रुव के उस क्षेत्र में आते हैं जहां पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री झुकी हुई घूमती है. इसलिए गर्मियों के मौसम में सूरज डूबता ही नहीं, उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर तो सूरज वर्ष में एक बार उगता है और एक बार डूबता है, जिसका परिणाम यह होता है कि लगभग छह महीने दिन रहता है और छह महीने रात, तो कृपया सावधान रोजेदार मुसलमान इन क्षेत्रों में ना जाए! नहीं तो पूरे महीने रोजा रखना पड़ जाएगा!! चौदह सौ साल पहले शायद अल्लाह को खबर नहीं थी कि ऐसी भी जगह है जहाँ 6 महीने दिन और 6 महीने रात होती है। पता होता तो ऐसे नियम बनाता ??"
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तब मैंने उन भाई को एक हदीस के ज़रिये उत्तर दिया था कि इस्लाम मे ऐसी जगहों, जहाँ दिन महीनों लम्बा होता हो, के लिए भी रोज़े और नमाज़ का सुविधाजनक विधान मौजूद है, और जहाँ धरती की इस विशेषता के प्रति बाकी धर्म मौन हैं, इस्लाम मे इस मुद्दे पर भी बात की गई है....
.... हदीस मे स्पष्ट ज़िक्र है कि दुनिया की जिन जगहों पर दिन और रात 24 घण्टे के दायरे मे नहीं आते, बल्कि बेहद लम्बे होते हैं वहाँ पर मुस्लिमों को इबादत करने के लिए दिन को 24 घण्टे के छोटे टुकड़ों मे बांट देना चाहिए .... ठीक इसी आधार पर ऐसी जगहों पर रोज़े भी 24 घण्टे के दायरे मे रखने चाहिए,
.... मुस्लिम शरीफ़ की किताब 41, हदीस नम्बर 7015 पर एक लम्बी हदीस का विषयसंगत भाग ये था कि, नबी सलल्लाहो अलैहि वसल्लम ने सहाबा से फरमाया कि दज्जाल का प्रभाव 40 दिन तक दुनिया पर रहेगा, इनमें से एक दिन एक साल के बराबर होगा, एक दिन एक महीने के बराबर, एक दिन एक हफ्ते के बराबर, और शेष दिन तुम्हारे (24 घण्टे के) दिनो के बराबर" (अवश्य ही यहाँ दज्जाल के प्रभाव वाले देशों के दिन की अवधि बताई गई है )
सहाबा ने पूछा कि क्या जो एक दिन एक साल के बराबर लम्बा होगा (छह महीने का दिन व छह महीने की रात होगी) उस दिन के लिए क्या हमारे एक दिन की पांच नमाज़े पर्याप्त होंगी ?
नबी सल्ल. ने उत्तर दिया "नहीं, बल्कि उस दिन को (24 घण्टे के दिन के बराबर) भागों मे बांटो, (और उसके अनुसार नमाज़े पढ़ो) ॥"
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....इस्लामी विद्वानों ने ऐसी जगहो पर सहरी और इफ्तार के वक्तो का संतोषजनक अनुमान देने के लिए ये फतवा दिया है कि उन जगहों के निवासी अपने मुल्क से सबसे करीब उस जगह जहाँ दिन और रात 24 घण्टे के दायरे मे आते हों, के दिन के बराबर का अपना एक दिन मानकर उतने ही वक्त का रोज़ा रखे...!!
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.. आज प्रसंगवश फिर वो सवाल उठा और हमारे पंकज भाई ने कहा कि "ज़िया तुम तो कहते हो कि हदीसें गढ़ी भी गई हैं तो फिर अपनी सुविधा से कुछ हदीसों को भी क्यों मानने लगते हो ??"
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.... तो भाई, मैंने आपसे यही बताया था कि जो हदीसें क़ुरआन के किसी नियम से परस्पर विरोधी होती हैं वो गढ़ी हुई या संक्षिप्त मानी जाती हैं और कुरआन के विरुद्ध उन हदीसों को अस्वीकार कर दिया जाता है, लेकिन अन्य जो हदीसें क़ुरआन के कानूनों के विरुद्ध बात नही कहतीं उन्हें स्वीकार किया जाता है, .... उपरोक्त हदीस में अत्यधिक लम्बे दिन में नमाज़ के लिए 24 घण्टे के दिन के अनुमान के लगाने की बात क़ुरआन की किसी आयत के विरुद्ध बात नहीं है
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.... फिर क़ुरआन मे सूरह कहफ़ (सूरह नम्बर 18) की सत्रहवीं आयत में एक सूत्र मिलता है कि दुनिया में कहीं कोई ऐसी जगह भी है जहां सूर्य बहुत छोटे से दायरे में घूमता दिखता है,
....... "और तुम सूर्य को उसके उदित होते समय देखते तो दिखाई देता कि वह उनकी गुफा से दाहिनी ओर को बचकर निकल जाता है और जब अस्त होता है तो उनकी बाई ओर से कतराकर निकल जाता है। और वे है कि उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। यह अल्लाह की निशानियों में से है। जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे उसका तुम कोई सहायक मार्गदर्शक कदापि न पाओगे" (18:17)
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..... ध्रुवीय क्षेत्रों के पास के देशों में ऐसा ही नज़ारा दिखाई देता है कि सूरज जहां से उगता है उससे थोड़ी ही दूरी पर थोड़े ही समय में डूब भी जाता है, यानी सूरज आकाश में ऊपर जाकर अपने उगने की विपरीत दिशा में नही डूबता, बल्कि जिस दिशा में उगता है उसी दिशा में थोड़ा आगे बढ़कर डूब जाता है.. और यदि बीच में कोई इमारत हो तो ये लगे कि उसके दायें से उग कर बाएं डूब जा रहा है, पोस्ट के साथ दिये फ़ोटो में सूरज की इसी चाल का टाइम लैप्स दिखाया गया है और सर्दियों में सूरज का ये "आर्क" और ज़्यादा छोटा हो जाता है, ... अलास्का में ऐसे ही एक नज़ारे की यूट्यूब लिंक भी आपको दे रहा हूं -
https://m.youtube.com/watch?v=8-JmBY4OJ50
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... तो क़ुरआन में उस छोटे दिन के उदाहरण से असामान्य अवधि के दिन में समय को बराबर भागों में बांटकर इबादत की शिक्षा देने वाली इस हदीस की भी पुष्टि होती है, और इस आरोप का भी खण्डन होता है कि क़ुरआन में या इस्लाम में ध्रुवीय क्षेत्रों के बारे में कुछ कहा नही गया...!!!
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