ऊंट का पेशाब, हदीस और मुन्किरीन-ए-इस्लाम का ऐतराज़
एक हदीस-ए-मुबारका में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कुछ लोगों को एक बीमारी के इलाज के तौर पर ऊंट का पेशाब और दूध इस्तेमाल करने की सलाह दी थी, जिसको लेकर मुन्किरीन-ए-इस्लाम का इस बात पर ऐतराज़ है कि जब इस्लाम भी ऊंट के नजिश पेशाब पीने की इजाज़त देता है तो गाय के पेशाब पीने वाले अलग-अलग कैसे हुए? दोनों ही पेशाब को मुक़द्दस और सवाब का काम समझते हैं!
जवाब: यह एक ख़ास क़बीले के लोगों को ऐसी बीमारी लग गई थी कि उन्हें ऊंट का पेशाब इस्तेमाल किए बग़ैर उनके लिए और कोई रास्ता न था कि जिसके ज़रिए वो बीमारी ठीक होती, इस लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें इस बीमारी से निजात पाने के लिए ऊंट का पेशाब और दूध इस्तेमाल करने की सलाह दी, हवाले के लिए देखिए सहीह बुख़ारी हदीस नंबर १५०१।
इसका यह हरगिज़ मतलब नहीं कि इस्लाम इसके इस्तेमाल के लिए हर खास ओ आम को वाजिब करार दिया है कि ऐसा करो तो करो! नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है! इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक बार यह वाकया पेश आया था, उसके बाद सहाबा-ए-किराम के ज़माने में भी कभी ऐसा वाकया पेश ही नहीं आया।
इसका मतलब यह हुआ कि सिर्फ एक ख़ास क़बीले के लोगों के लिए यह हुक्म हुआ था, जो उनकी बीमारी का इलाज यही था, जिसकी वजह से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें यह इस्तेमाल करने का हुक्म दिया था।
मतलब यह कि एक स्पेशल इवेंट है जिसमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को वहीह के थ्रो इनफॉर्म कर दिया गया था कि दूध के साथ ऊंट का पेशाब इस्तेमाल किए बग़ैर उन हज़रात की शिफ़ा और ज़िन्दगी मुमकिन नहीं है, इस तरह यह लोग बेचारगी और मजबूरी के हुक्म में आ गए और बेचारगी और मजबूर के नजिस चीज़ का इस्तेमाल जायज़ है, यानी अगर किसी इन्सान की जान खतरे में हो तो उसकी जान बचाने के लिए हराम चीज़ से इलाज किया जा सकता है, दलील के तौर पर यह आयत-ए-करीमा देखिए:
اِنَّمَا حَرَّمَ عَلَیۡکُمُ الۡمَیۡتَۃَ وَ الدَّمَ وَ لَحۡمَ الۡخِنۡزِیۡرِ وَ مَاۤ اُہِلَّ بِہٖ لِغَیۡرِ اللّٰہِ ۚ فَمَنِ اضۡطُرَّ غَیۡرَ بَاغٍ وَّ لَا عَادٍ فَلَاۤ اِثۡمَ عَلَیۡہِ ؕ اِنَّ اللّٰہَ غَفُوۡرٌ رَّحِیۡمٌ
अल्लाह ने तुम पर हराम किया है सिर्फ़ मुर्दार को, और ख़ून को, और सुअर के गोश्त को, और जिस पर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, फिर जो शख़्स मजबूर हो जाए, वह न उसकी चाहत रखता हो और न हद से आगे बढ़ने वाला हो तो उस पर कोई गुनाह नहीं, बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है।
(सूरह बक़रा: १७३)
दूसरी बात यह कि इस हदीस में जनरल ऑर्डर नहीं है कि कोई भी शख़्स ऊंट के पेशाब से इलाज करे जैसा कि मुन्किरीन-ए-इस्लाम ने समझा है बल्कि यह एक स्पेशल इवेंट था, जैसा कि आप हदीस की किताबों में इस तरह के वाक़यात पाओगे कि अल्लाह के रसूल ने किसी ख़ास शख़्स को ख़ास काम करने के लिए कहा लेकिन दूसरे लोग उस हुक्म से बरी होते हैं।
जैसे कि एक हदीस में है जिसमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत ख़ुज़ैफ़ा रज़ि अल्लाहु अन्हु की बीवी को हुक्म दिया था कि वह अपने शौहर के ग़ुलाम हज़रत सालिम को अपना दूध (बर्तन में डाल कर) पिला दें जिससे दोनों के दरमियान हुरमत साबित हो जाए, हालांकि क़ुरआन ओ हदीस की रौशनी में उम्मत का इत्तिफाक है कि दो साल के बाद दूध पिलाने से हुरमत साबित नहीं होगी यानी मां बेटे का रिश्ता नहीं बन सकता! यह हुक्म सिर्फ़ हज़रत सालिम रज के लिए के खास था।
(सहीह मुस्लिम: ३६००)
इस पोस्ट का खुलासा यह है कि सहीह बुख़ारी में ऊंट के पेशाब से इलाज वाला स्पेशल और एक्सेप्शन है।
और ऐसी चीज़ क़ुरआन से भी साबित है जिसे ऊपर लिख चुका हूं कि अल्लाह ने तुम पर हराम किया है सिर्फ़ मुर्दार को, और ख़ून को, और सुअर के गोश्त को, और जिस पर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, फिर जो शख़्स मजबूर हो जाए, वह न उसकी चाहत रखता हो और न हद से आगे बढ़ने वाला हो तो उस पर कोई गुनाह नहीं, बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है।
(सूरह बक़रा: १७३)
अब आ जाते हैं उस बात की तरफ़ जिसमें ऐतराज़ किया गया है कि जब इस्लाम भी ऊंट के नजिस पेशाब पीने की इजाज़त देता है तो गाय के पेशाब पीने वाले अलग-अलग कैसे हुए? दोनों ही पेशाब को मुक़द्दस और सवाब का काम समझते हैं!
मुन्किरीन-ए-इस्लाम इस हदीस को हिंदुओं का गाय का पेशाब पीने से मिलाते हैं, जबकि हिंदुओं का गाय का पेशाब पीना मुक़द्दस मानते हुए बाकायदा एक दिलबस्तगी है न कि किसी ख़ास बीमारी की वजह से!
इस्लाम में न तो ऊंट को मुक़द्दस जानवर समझा जाता है न उसका पेशाब बाबरकत समझ कर हर चीज़ पर छिड़कने का कोई कांसेप्ट है न उसका तअल्लुक़ इबादत और पूजा पाठ और दीन का हिस्सा है!
तो दोनों एक कैसे हुए?
हदीस में ऊंट के पेशाब का इस्तेमाल केवल एक दवा के तौर पर कराया गया उससे बढ़ कर कुछ नहीं, इलाज के लिए लाज़िम भी क़रार नहीं दिया गया जिसकी तबीयत गवारा न करे वो न पीए, इसको किसी के लिए लाज़िम क़रार नहीं दिया और न ही उस पर अमल न करने वाले के लिए कोई अज़ाब वगैरह सुनाई गई, और न ही किसी और को यह इलाज बताया, न इस तरीक़-ए-इलाज को कभी सुन्नत समझा गया।
आजकल हराम और नजिस चीज़ों से इलाज आम है, हज़ारों दवाइयों में ऐसे केमिकल इस्तेमाल होते हैं जो इंतिहाई नजिस चीज़ों से हासिल किए जाते हैं, यह तो इस्लाम की ख़ूबी है कि उसने अव्वल दिन से ही इसकी गुंजाइश रखी कि इंतिहाई ज़रूरत के वक़्त इलाज किसी नजिस लेकिन फ़ायदा मंद चीज़ को इस्तेमाल किया जा सकता है, हर चीज़ को हर हाल में हराम क़रार दे कर इन्सानों को बिला वजह की परेशानी और सख़्ती में नहीं झोका!
हैरत होती है इस्लाम के इस ख़ूबी के ऊपर भी लोग ऐतराज़ करते हैं!
और उल्टा उसे इस्लाम के लिए एक नुक़्स और ताने की बात बना लेते हैं।
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सुव्वर का मांस।
एक भाई ने सवाल किया
मुसलमान ये कहता है की ये सारी कायनात अल्लाह की बनाई हुई है तो "सुअर" किस ने बनाई ????? क्या कोई दूसरा खुदा था जो सिर्फ़ सुअर बना कर ख़त्म हो गया....?? और एक मुसलमान सुअर या कुत्ते को छू भर लेने से नापाक हो जाता है, क्या ये इस्लामी खुदा का इन जानवरो के लिए पक्षपात नहीं? ??
भाई के दो सवाल हैं, पहला ये कि सुअर को किसने बनाया ..... इस्लाम मे सुअर खाना हराम है, ये जानकर बहुत से गैर मुस्लिम भाई इसी गलतफहमी मे रहते हैं कि मुसलमानो के खुदा को इस जानवर से कोई जाती दुश्मनी है,
सुअर का मांस केवल इसलिए हराम है क्योंकि वो इस वजह से दूषित होता है कि सुअर सारा जीवन मल मूत्र खाता रहता है,
इसके अलावा मुस्लिम तमाम जीवों की तरह इस जानवर को भी खुदा का बनाया एक जीव ही मानते हैं, न मुसलमान इस जानवर से कोई दुश्मनी रखते हैं, और न ही उसे कोई नुकसान ही पहुंचाते हैं
रही बात किसी जानवर के छू जाने आदमी के नापाक हो जाने के पक्षपात की, तो ये कोई पक्षपात नही है. . . . .
इस्लाम मे नापाकी कान्सेप्ट ये है कि किसी जानवर से छू के पैदा हुई नापाकी का मतलब है, शरीर का रोग वाले कीटाणुओ के सम्पर्क मे आना, जिस नापाकी को हम साधारण पानी से नहा के दूर कर लेते हैं, [ यानी अगर कुत्ता पकड़ने के कारण उसके बाल व लार जिस्म से चिपक जाएं तो नहा लेना चाहिए . हां अगर सूखा कुत्ता पल भर को हमें छू जाए तो नहाने की ज़रूरत नहीं. ]
इस्लाम का तरीका कितना वैज्ञानिक है आप खुद देखिए !
इस्लाम मे कुछ पशुओं को अपवित्र बताना कोई पक्षपात नहीं बल्कि अपने समान मनुष्यों को जब अछूत ठहरा दिया जाता है तो इसे पक्षपात कहते हैं, क्योंकि जानवर को हम छूने से बचेन्गे तो जानवर को कोई दुख नहीं होगा, लेकिन कि मनुष्य को अगर अछूत बना दिया जाएगा तो उस मनुष्य को जरूर बहुत दुख पहुंचेगा
~ ज़िया इम्तियाज़।
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