ज़ैनब बिन्त जहश।
हमारे प्यारे नबी स. का अपना कोई बेटा नहीं था ,जो बेटे पैदा हुए भी उनका बहुत कमसिनी मे इन्तेकाल हो गया था, सो आप स. ने अपने एक आज़ाद किए हुए गुलाम जिनका नाम हज़रत ज़ैद बिन हारिस था को गोद लेकर अपना बेटा बना लिया था, मगर दोनों के बीच कोई खून का रिश्ता न था,
नबी स. चाहते थे कि हजरत ज़ैद रज़ि. की शादी बीवी ज़ैनब बिन्ते जहश से हो जाए, जबकि बीवी ज़ैनब के वालिदैन बीवी ज़ैनब की शादी खुद नबी स. से कराना चाहते थे,
पर आखीर मे नबी स. की ही बात मानकर बीवी ज़ैनब रज़ि. की शादी हज़रत ज़ैद रज़ि. के साथ कर दी गई ...
लेकिन ये शादी ज्यादा दिन तक टिक न सकी और हजरत ज़ैद ने बीवी ज़ैनब बिन्त जहश रज़ि. को तलाक दे दी
क्योंकि ये शादी नबी स. के इसरार पर हुई थी इसलिए इस शादी के टूटने पर आप स. को बहुत रंज हुआ कि आप स. की वजह से बीवी ज़ैनब रज़ि. को इतनी तकलीफ पहुंची
इस्लाम इस बात को पूर्णतया निषिद्ध (हराम) ठहराता है कि कोई बाप अपने जैविक पुत्र द्वारा तलाक दी हुई औरत से शादी करे .... लेकिन कुरान मे इस बात को भी स्पष्ट कर दिया गया है कि “गोद लिए हुए बेटे तुम्हारे असली बेटे नही हैं ” [Al-Quran, 33:4]
बीवी ज़ैनब रज़ि. का दुख दूर करने के लिए और अल्लाह के हुक्म पर बीवी ज़ैनब की शादी आप स. के साथ कर दी गई, ताकि आने वाली नस्ल ये जान जाएं कि इस प्रकार की शादी इस्लाम मे वैध है [देखें Quran, 33:37]
अस्ल मे इस्लाम हमें मुंहबोले रिश्तों के साथ खून के रिश्तों जैसा सुलूक करने से रोकता है, क्योंकि खून के रिश्तों मे तो प्रेम और मर्यादा अल्लाह पैदा करता है, जबकि मुंहबोले रिश्तों मे मर्यादा बनाने का प्रयास इनसान करता है , और इनसानी प्रयास मे असफलता की दर ज्यादा होती है, क्योंकि कृत्रिमता मे प्राकृतिकता वाला गुण बडे प्रयास से ही आ सकता है, वो भी शत प्रतिशत नहीं ... या बहुत बार व्यक्ति मुंहबोले रिश्ते बनाकर मर्यादा का केवल दिखावा करता है और दिल मे कपट छिपाकर बैठा होता है, इसलिए मुंहबोले रिश्तों मे अमर्यादित व्यवहार बहुत ज्यादा होते हम देखते हैं, जबकि खून के रिश्तों मे न के बराबर ...!!
हम अपने आसपास अक्सर देखते ही हैं कि वो युवा लड़का लड़की एक दूसरे के साथ घर से भाग जाते हैं, जो समाज की नजरों मे राखी भाई बहन थे .... अक्सर गुप्त प्रेमी प्रेमिका राखी के पवित्र बन्धन का इस्तेमाल अपने बेखौफ मेलजोल के बनाए रखने के लिए करते हैं , हमारा समाज उनको भाई बहन मानकर घुलने मिलने का पूरा मौका देता है जिसका नतीजा ये निकलता है . इस्लाम यही मौके नहीं देता मुंहबोले रिश्तों को ।
मुंहबोले रिश्तों के साथ जब खून के रिश्तों सा सुलूक न करने की सीमा बना दी गई तो ये मुंहबोले शून्य साबित हुए, और इन रिश्तों के शून्य होने से इनके बीच शादी होने की सम्भावना खुद पैदा हो गई ।
~ ज़िया इम्तियाज़।
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