Monday, 10 August 2020

काफिरों को मारने, मुश्रिकों को जंहा पाओ मारने का हुक्म। 24 खूनी आयतें।

क्या क़ुरान काफिरों को मारने का हुक्म देता है?

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो, फिर यदि वे तौबा कर लें, नमाज कायम करें, और जकात दें तो उनका रास्ता छोड़ दो ” (Al Qur’an 9:5)

हमारे एक भाई का सूरह तौबा की आयत नम्बर पांच के बारे मे कहना है कि इससे साबित हो रहा है कि अगर मुसरिक ईमान ले आए तो जान बक्श दो यदि नहीं तो मार दो

सबसे पहले मैं भाई की मुख्य शंका दूर करना चाहूंगा कि कुरान 9:5 का ये आदेश मुस्लिमों को इसलिए नहीं था कि वे दूसरे समुदायों पर हमले कर के उन्हें पराजित कर के जबरन उनका इस्लाम मे धर्मान्तरण कर के इस्लाम का प्रसार करें, बल्कि 9:5 का आदेश, पहले भी बहुत बार बता चुका हूँ इसलिए था, ताकि मुस्लिम अपने ऊपर हमले करने वाले गैर मुस्लिमों के हाथों इस्लाम का समूल नाश होने से बचा सकें, दूसरे शब्दों मे कहूँ तो ये और ऐसे अन्य युद्ध के आदेश इस्लाम के प्रसार के लिए नहीं बल्कि काफिरों के हाथो से मुस्लिमों की प्राणरक्षा हो सके इसलिए थे ॥

फिर भी यदि एक बार को मान लिया जाए कि कुरान के ये आदेश इस्लाम के क्रूरतापूर्वक प्रसार के लिए ही दिए गए थे तो फिर ध्यान कीजिए कि भारत मे 711 ईस्वी मे सिंध पर मुहम्मद बिन कासिम की चढाई के समय से 1857 तक यानी साढ़े गयारह सौ सालों तक मुस्लिमों का लगातार शासन रहा ... और भारत मे आने वाले हर मुस्लिम सेनापति के समक्ष भारतीय शासकों की पराजय होती रही ... इसके बावजूद मुस्लिमों ने पराजित राज्यों के सामने मृत्युदण्ड या इस्लाम मे से एक विकल्प चुनने को क्यों नहीं बाध्य किया, क्योंकि यदि उन्होने बाध्य किया होता तो 1100 वर्षों की अवधि से बहुत पहले ही भारत से अन्य सभी धर्मों का नामोनिशान मिट चुका होता और भारत मे केवल इस्लाम के अनुयायी होते लेकिन हुआ क्या ... आजादी से पहले भी अविभाजित भारत मे मुस्लिमों की आबादी, भारत की कुल आबादी के चौथाई से भी कम थी ... ऐसा क्यों ? मुस्लिम भारत की आबादी मे इतने कम क्यों रह गए, कुरान के उस "बाध्यकारी" आदेश और 1100 वर्षों के सुदीर्घ "अन्यायपूर्ण" इस्लामी कब्जे के बावजूद ??

.... जरा गलतफहमी की चादर हटाइए, और देखिए, 1001 ईस्वी के बाद भारत के उद्भाण्डपुर पर आक्रमण कर के जयचन्द को पराजित करने वाले महमूद गज़नवी ने जयचन्द के आगे इस्लाम या मौत मे से कोई एक विकल्प चुनने को नहीं कहा, बल्कि जयचन्द के साथ एक सन्धि की थी, ... इसी तरह दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान को पराजित करने वाले मोहम्मद गौरी ने साक्ष्यों के आधार पर , न तो चौहान को मारा न मुस्लिम बनाया, बल्कि अपने अधीन शासक बनाया, ... और सबसे कट्टर मुस्लिम शासक औरंगज़ेब को ही देखिए , इन्होंने भी युद्ध मे कमजोर पड़े शिवाजी के साथ पुरन्दर की विख्यात संधि की थी, बजाय उनके धर्मान्तरण या हत्या किए.... क्या आपके विचार से बादशाह औरंगज़ेब ने भी अपने धर्म का पालन नही किया ??
क्या कारण था कि भारत मे हिन्दू संस्कृति सबसे ज्यादा बढ़ावा उन्हीं मुस्लिम शासकों ने ही क्यों दिया जिनका धर्म तमाम पराजित गैर मुस्लिमों की हत्या या जबरन धर्मान्तरण की शिक्षा देता था ....?? ... सोचिए, और सोचते रहिए

तो बात सूरह तौबा की आयात की जो कि उस युद्ध की नौबत जो कि मुश्रिक ही पैदा करते थे, आने के बाद की परिस्थिति आ जाने के बाद की हैं, ... कि जब मुस्लिमों द्वारा युद्ध से बचने के भरसक प्रयासों के बाद भी युद्ध होने लग जाए तो केवल एक नहीं बल्कि तीन रास्ते बताए गए हैं, उन लोगों के उत्पात को मिटाने के लिए जो लोग मुस्लिमों के समूल नाश के लिए मुस्लिमों के साथ खून खराबा करते थे और जबरन मुस्लिमों को बहुदेववादी बनाने का हर गलत हथकण्डा अपनाते थे ...

1- पहला विकल्प, जब युद्ध के चलते ही चलते कोई मुश्रिक बिना अपना पूर्व धर्म बदले युद्ध छोड़ना चाहे तो उसे युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाल देने का आदेश मुस्लिमो को दिया गया (9:6)

2- दूसरा विकल्प, उन लोगों के लिए जो युद्ध मे अनेक मुस्लिमों की हत्या कर चुकने के बाद फिर मुस्लिमों के हाथों पराजित हो जाने के बाद यदि दण्ड से बचने को ही वे गैरमुस्लिम मुस्लिमों को ये विश्वास दिला दें कि वे अपने पूर्व मे किए गए पापों पर पश्चाताप कर रहे हैं, और अब वे इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं, तो ऐसे लोगों को भी माफ कर देने का आदेश मुस्लिमों को दिया गया, (9:5)
ये कोई बाध्यता नहीं बल्कि एक छूट थी उन अपराधियों के लिए  वो इस कारण क्योंकि स्वयं इस्लाम स्वीकार कर के वो गैरमुस्लिम, मुस्लिमों के विरुद्ध भविष्य मे कभी कोई युद्ध किए जाने की सारी सम्भावनाओं को खत्म कर देने को आश्वस्त करते हैं .... यहाँ एक बात और ध्यान देने की है कि इस्लाम स्वीकारने या न स्वीकारने का फैसला पूरी तरह से उन गैर मुस्लिमों की मर्जी का फैसला होगा ...न कि मुस्लिम उन्हें विवश कर सकते हैं, क्योंकि अल्लाह का ये आदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी को विवश कर के इस्लाम कुबूल कराने की कोई आवश्यकता नहीं है, अल्लाह जिसे चाहता है वो व्यक्ति केवल समझाने मात्र से मुस्लिम बन जाता है .... पवित्र कुरान मे लिखा है
"अगर तुम्हारा रब्ब चाहता, तो इस धरती मे जितने लोग हैं, वे सारे के सारे ईमान ले आते . फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे ईमान वाले बन जाएं ?" 
[ पवित्र कुरान 10:99 ]

3- तीसरा विकल्प उनके लिए जो मुस्लिमों की हत्या युद्ध मे कर चुके हैं, फिर पराजित होकर मुस्लिमों के कब्जे व मुस्लिमों के रहमो करम पर आश्रित हो चुके हैं, और बिना किसी अन्य विकल्प का चुनाव किए, दण्ड पाने के लिए तैयार हैं, ... तो फिर मुस्लिमों को अल्लाह के आदेशानुसार उन्हें दण्ड देने का अधिकार है, यानी मुस्लिमों के हत्यारों का दण्ड मौत की सजा, व उन हत्यारों का सहयोग करने वालों को बंदी बनाना ... ये दण्ड पूरी तरह न्यायसंगत है , तिसपर भी अल्लाह का आदेश कि "बुराई का बदला वैसी ही बुराई है, लेकिन जो माफ कर दे और सुधार करे तो उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे है, बेशक वो ज़ालिमो को पसन्द नही करता” (पवित्र कुरान, 42:40)

... ये आदेश मुस्लिमों को उन हत्यारों को भी क्षमा कर देने के लिए प्रेरित करता है, और वे अल्लाह की कृपादृष्टि पाने की आशा मे जालिमो को भी माफ कर सकते हैं।

~ ज़िया इम्तियाज़।


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क़ुरान कहता है कि मुश्रिकों को जंहा पाओ मारो।

“फिर जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुश्रिको को जहाँ पाओ मारो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो, और घात लगाने वाली जगह पर उनकी घात लगाकर बैठो ” (Al Qur’an 9:5)

सूरह तौबा की इस आयत नम्बर पांच का प्रयोग, इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम की छवि धूमिल करने के लिए खूब किया है कि इस्लाम गैर मुस्लिमों के साथ ऐसा हिंसक व्यवहार करने की शिक्षा मुस्लिमों को देता है,.... क्या वास्तव में, सूरह तौबा मे अल्लाह ने मुस्लिमों को क्रूरता और हिंसा की ही तालीम दी है ॥ आईए देखें 

सूरह तौबा की इन आयतों का ऐतिहासिक परिदृश्य ये है कि पैगंबर सल्ल. को नबूवत मिलने के 13 वर्ष बाद तक बहुदेववादियो ने मुस्लिमों पर बड़े बड़े ज़ुल्म ढाए, जिन ज़ुल्मो को मुस्लिमों ने चुपचाप बर्दाश्त किया और मक्का से बाहर मदीना चले गए, तब इन हिंसक गैर मुस्लिमों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...

लेकिन पासा उल्टा पड़ा और मदीना पर इन बहुदेववादियो की चढ़ाई के फलस्वरूप जब मुस्लिमों ने आत्मरक्षा मे हथियार उठाए तो हर बार इन अत्याचारियों पर वे गिनती के कुछ मुस्लिम भारी पड़े । जब मुस्लिमों से सीधे युद्ध मे बहुदेववादी जीतना मुश्किल समझने लगे तो उन्होंने धोखे से मुस्लिमों के खात्मे की योजना बनाई कि ऊपर से तो युद्ध बंद रखने का एक समझौता उन्होंने मुस्लिमों के साथ कर लिया लेकिन पीछे पीछे वो मुस्लिमों की जड़ें काटने की जुगत मे थे 
जब अरब के बहुदेववादियों ने मुस्लिमों के साथ किया हुआ युद्धबन्दी का एक ऐसा ही समझौता तोड़ दिया और धोखे से मुस्लिमों के साथियों की हत्याएं कीं, तो अल्लाह ने भी कुरान मे यह घोषणा कर दी कि मुस्लिमों को भी अब उन बहुदेववादियों से युद्ध बंद रखने की कोई जरूरत नहीं है ''Tum (muslimo) ne mushriko ke sath jangbandi ka jo samjhauta kia tha Allah aur Rasool ab us se bezaar hain'' [9:1]

लेकिन साथ ही जिन बहुदेववादी लोगों ने संधि समझौते को तोड़ा नहीं था, मुस्लिमों को भी उनसे संधि कायम रखने और युद्ध न करने की तालीम अल्लाह ने दी,

''Siway un mushriko ke jinhone tumhare sath samjhauta kia tha aur usy nahi toda, na he tumhare khilaf (yuddh me) kisi ki madad ki. to tum un mushriko ke sath samjhauta uska samay pura hone tak jaari rakho. beshaq Allah nek logo ko pasand krta hai'' [9:4]

हालांकि बहुदेववादियों ने तो सुलह की आड़ मे धोखे से मुसलमानों के साथियों की जानें ली थीं, लेकिन फिर भी अल्लाह के हुक्म से मुस्लिमों ने उन हत्यारों को 4 महीने पहले से चेतावनी सुना दी कि यदि वे हत्यारे अपने पाप का पश्चाताप करना चाहें, तो इस अवधि मे कर ले,

''to 4 maheene aur zameen pr aaram se chal phir lo aur ye jaan lo ki tum Allah ke kabu se bahar nahi ja sakte. aur Allah inkar karne walo ko apmanit karta hai''. [9:2]

4 महीने बीत जाने के बावजूद भी जिन व्यक्तियों को कोई पश्चाताप ना हो और वो मुस्लिमों से युद्ध करने को ही पसंद करें, तो ऐसे लोगों के लिए ही सूरह तौबा की वो पांचवीं आयत आई है जिसे बिना उसकी पृष्ठभूमि सामने रखे, जगह जगह लिखकर, बताकर विरोधी इस्लाम को बुरा साबित करना चाहते हैं। लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बोलिए कि यदि कोई व्यक्ति आपके कुछ पारिवारिक सदस्यों की हत्या कर चुका हो, और फिर भी उसके मन मे कोई पश्चाताप न हो बल्कि वो फिर से आप पर आक्रमण कर के आपके मां बाप, भाई बहनों समेत आपका समूल नाश करना चाहता हो तो क्या आप उस व्यक्ति पर दया दिखाएंगे ? 

जी नहीं यदि आप बुद्धिमान होंगे तो समझते होंगे कि उस वक्त दया का पात्र वो हत्यारा नहीं बल्कि आप और आपका परिवार होगा, और निश्चय ही आप बातचीत ,और बातचीत विफल होने पर शक्ति के जरिए आत्मरक्षा के उपाय करेंगे, बिल्कुल यही शिक्षा कुरान मे है।

आगे भी देखिए कि यदि इन्हीं दुष्ट हत्यारों मे से कोई युद्ध के मैदान मे पहुंचने के बाद भी मुस्लिमों से युद्ध छोड़कर युद्ध भूमि से बाहर जाना चाहे तो युद्ध के मैदान मे दुश्मन के साथ भी दयालुता और नेकी की क्या खूब तालीम दी है मेरे रब ने, इसी सूरह तौबा की अगली ही आयत यानि आयत 6 मे..

''Aur agar un mushriko me se koi tumhari sharan chahe to uski hifazat karo taki wo Allah ke shabd sun len . aur fir usko us ki surakshit jagah pahoncha do. kyonki ye wo log hain jo nahi jaante'' [9:6]

आगे की आयतों मे भी आप देख सकते हैं, कि अरब के वे बहुदेववादी किसी भी वादे या कसम या रिश्ते नाते का भी खयाल नहीं करते थे जब वे मुस्लिमों को कमजोर पाते थे.... ऐसे अत्याचारियों के साथ युद्ध भी करने की शिक्षा दी मेरे अल्लाह ने तो वो भी कितनी नेकी की शिक्षा के साथ।

~ ज़िया इम्तियाज़।

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24 खूनी आयतें।


अक्सर कुछ गैर मुस्लिम भाई "कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला" नाम की एक पोस्ट सर्कुलेट करते दिखाई देते हैं, जिस पोस्ट मे ये बताया गया होता है कि, इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा दिल्ली) और राजकुमार ने कुरान मजीद (अनु. मौहम्मद फारुख खां, प्रकाशक मक्तबा अल हस्नात, रामपुर उ.प्र. १९६६) की 24 आयतों का एक पोस्टर छापा जिसके कारण इन दोनों पर इण्डियन पीनल कोड की धारा १५३ए और २६५ए के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया ... इस मुकदमे की सुनवाई के बाद मैट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट श्री जेड़ एस. लोहाट ने ३१ जुलाई १९८६ को दोनों आरोपियों को बरी करते हुए, अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि पवित्र कुरान की ये चुनी हुई 24 आयतों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ये आयतें बहुत हानिकारक हैं और घृणा की शिक्षा देती हैं, जिनसे एक तरफ मुसलमानों और दूसरी ओर देश के शेष समुदायों के बीच मतभेदों की पैदा होने की सम्भावना है, ....

इस पोस्ट को सर्कुलेट करने का आशय ये बताना है कि कुरान की इन 24 आयतों से ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, कपट, लड़ाई-झगड़ा, लूटमार और हत्या करने के आदेश मिलते हैं। इन्हीं कारणों से देश व विश्व में मुस्लिमों व गैर मुस्लिमों के बीच दंगे हुआ करते हैं। लेकिन पोस्ट सर्कुलेट करने वाले ये भूल जाते हैं मुस्लिम कुरान मे केवल ये 24 आयतें पढ़कर ही फैसला नही करने लगते, बल्कि मुस्लिम सम्पूर्ण कुरान पढ़कर, व हर आयत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखकर ही कुरान पाक की किसी शिक्षा को अमल मे लाते हैं .... और सम्पूर्ण कुरान पाक समस्त मानवजाति के लिए दयालुता है , ये बात पवित्र कुरान से परिचित हर व्यक्ति जानता है 

कुरान की  इन चौबीस आयतों मे मुख्यत: 3 बातें की गई हैं 1- काफिरों की भर्त्सना, 2- काफिरों से युद्ध के लिए मुस्लिमों को आदेश देना और 3- काफिरों से मित्रता करने की मुस्लिमों को मनाही.....

तो भाई ध्यान दीजिए कि 
1- अक्सर कुछ भाई इस बात पर आपत्ति जताते हैं कि पवित्र कुरान मे काफिरों की भर्त्सना क्यों की गई है, और काफिरों अपवित्र क्यों कहा गया है ?? ये सवाल ये समझकर पूछे जाते हैं क्योंकि लोगों का सोचना है कि काफिर का अर्थ होता है हर वो व्यक्ति जो इस्लाम धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को मानता हो, जबकि वास्तव मे ऐसा नहीं है, 
.. काफिर किसी धर्म विशेष का नाम नही , यानी यहूदी, ईसाई, हिंदू, सिख, या कोई भी अन्य धर्म के व्यक्ति यूं ही काफिर नहीं कहलाए जा सकते, बल्कि उस व्यक्ति का नाम है जो दिल मे तो ईश्वर के एक और निराकार होने की बात स्वीकारता है, पर किसी भौतिक लाभ, या केवल अपनी हेकड़ी मे ही बहुदेववाद का प्रचार करता है, और एकेश्वरवादियों को प्रताड़ित करता है, ऐसे व्यक्ति की भर्त्सना से जिसे समस्या हो उसे चाहिए कि वो ऐसा व्यक्ति न बने, यानि यदि वो जानता है कि ईश्वर एक ही है तो बहुदेववाद से खुद को बचाए, और सब व्यक्तियों के साथ प्रेम और शांति के सम्बन्ध बनाए, फिर पवित्र कुरान की वो भर्त्सनाएं उस व्यक्ति को नहीं जाएंगी

2- कुरान मे कहीं भी मुस्लिमों को खुद किसी युद्ध को शुरू करने की पहल करने की शिक्षा नहीं दी गई है , लेकिन जब शत्रु खुद बार बार मुस्लिमों पर आक्रमण करने आए तो आत्मरक्षा के लिए मुस्लिमों को तलवार उठाने की अनुमति दी गई, पवित्र कुरान मे ये बात स्पष्ट तौर पर लिखी है 
‘‘और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी खुदा की राह मे उनसे लड़ो, मगर ज्यादती (अत्याचार) न करना कि खुदा ज्यादती करनेवालो को दोस्त नही रखता।’’
(कुरआन, सूरा-2, आयत-190)

जिन लोगों से युद्ध करने की बात कुरआन मे कही गई है, वे निर्दोष नही बल्कि ऐसे अत्याचारी थे जो इस्लाम और उसके अनुयायियों पर घोर अत्याचार करते थें उन्हें खत्म करने के लिए साजिशे करते थे, मुसलमानो पर खुद बढ़-चढ़ कर हमले करते थे, और मुसलमानों को इस्लाम पर अमल करने से रोकते थे,
इस्लाम मे कही भी निर्दोषों से लड़ने की इजाजत नही हैं, भले ही वे काफिर या मुशरिक या दिल मे मुस्लिमों से दुश्मनी रखने वाले ही क्यो न हों, ॥ कुरान की सूरह मुम्ताहना की आठवीं आयत मे लिखा है कि जिन लोगों ने तुम मुस्लिमों से तुम्हारे धर्म के कारण जंग नही की और न तुम को तुम्हारे घरो से निकाला, उनके साथ भलाई और इंसाफ का सुलूक करने से खुदा तुमको मना नही करता। खुदा तो इंसाफ करने वालों को दोस्त रखता हैं। 

3- मुस्लिमों को किन लोगों से मित्रता करने से रोका गया उसे कुरान मे स्पष्ट किया गया है 

"ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।"
[सूरह आले इमरान, आयत 118]

यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूं कि मुस्लिमों को हर काम पूरी सच्चाई और निष्ठा से करने का आदेश है , अत: इस्लाम मे मित्रता का अर्थ है मित्र पर पूरा विश्वास रखना, और उससे मित्रता निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध होना, 
ज़ाहिर है, जो व्यक्ति हमें पीड़ा पहुंचाने के प्रयास खुलेआम कर चुका है, और हमारी हत्या की उधेड़बुन मे लगा है, उसपर कैसे हम पूरा विश्वास कर सकते हैं, और कैसे उससे मित्रता कर सकते हैं ??
ये तो रही बात दुष्टों की, और रही बात नेक आदत वाले गैर मुस्लिमों की , तो इस्लाम में गैर धर्म के भले लोगों से दोस्ती करना हरगिज़ मना नहीं किया गया है। एक बार फिर पवित्र कुरआन की सूरह 60 का उदाहरण देना चाहूँगा जहाँ लिखा है :-

"अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है।"
[सूरह मुम्ताहना; 60, आयत 8-9]

~ ज़िया इम्तियाज़।

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काफिरों से युद्ध का आदेश।

बहुत से भाई प्रश्न करते हैं कि क़ुरान में काफिरों से युद्ध करने का आदेश क्यों दिया गया है, केवल धर्म अलग होने मात्र से किसी के साथ युद्ध करना कहाँ का न्याय है ??
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.... एक बात समझ लेनी चाहिए कि क़ुरान सभी काफिरों से युद्ध की बात कभी कह ही नहीं रहा, इसलिये ये अंदाज़ लगाना कि केवल धर्म अलग होने मात्र पर इस्लाम मुस्लिमों को युद्ध के लिए उकसाता है, ये अनुमान गलत है, पवित्र कुरान मे जिन काफिरो से युद्ध के समय आत्मरक्षा मे मुस्लिमों को भी युद्ध की अनुमति दी गई है, वे मक्का के मूर्तिपूजक हैं, आइए देखें कि उन काफिरो का स्वभाव क्या था, अपराध क्या था ??


चौदह सौ वर्ष पहले के अरब मूर्ति-पूजक गैर मुसलिम समाज के व्यवहार की ओर हम ध्यान दें तो पता चलता है, वे अरब बड़े ही हिंसक प्रवृत्ति के लोग हुआ करते थे... इसी माहौल मे जब नबी स. ने मक्का के लोगों को इस्लाम की दावत देनी शुरू की, लोगों को नवजात बच्चियों की हत्या करने से रोकने लगे, गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने से लोगों को रोकने लगे , मूर्ति पूजा से लोगों को रोका और एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया और आप स. की इन बातों से प्रभावित होकर मक्का के कुछ गरीब लोगों और कुछ गुलामों ने इस्लाम कुबूल कर लिया तो अरब के अमीर और प्रभावशाली वो लोग जो अपने हिंसक रीति रिवाज़ो से प्रेम करते थे, इस बात से चिढ़ गए ,और उन्होने उन गरीब नव मुस्लिमों को मार पीटकर उनका धर्म छुड़वा देना चाहा ताकि इस्लाम की कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाए।

लेकिन ऐसा न हुआ, उन गरीब मुसलमानों ने खुद को बुरी तरह प्रताड़ित किए जाने के बावजूद इस्लाम का त्याग न किया .. और उन नव मुस्लिमों का इस्लाम से इस कदर प्रेम देखकर अरब के गैर मुस्लिम और बौखला गए और मुस्लिमों पर और सख्ती से अत्याचार करने लगे ... लेकिन इसका असर उल्टा ही हुआ, और नव मुस्लिमों के मुंह से इस्लाम की प्यारी प्यारी तालीमात का जिक्र सुनकर इस्लाम कुबूल करने वालो की तादाद बढ़ती गई.

लगभग 11 वर्ष तक मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुस्लिमों पर अमानवीय अत्याचार किए ..... उन्होंने अपने अनेक गुलामो के यातनाएँ देकर अंग भंग कर दिए क्योंकि उन गुलामो ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, और कुछ गरीब मुसलमानों को यातनाएँ दे देकर मार डाला....... लेकिन मुस्लिम शांति और इस्लाम के मार्ग पर अडिग रहे .... न मुस्लिमों ने पलटकर कभी किसी पर वार किया और न ही इस्लाम से हटे कई मुसलमान इन भयंकर तकलीफो से बचने के लिए प्यारे नबी स. की सलाह पर मक्का से बाहर ऐसी जगहों पर चले गए जहाँ वे शांति से अपने धर्म इस्लाम का पालन करते हुए जीवन गुज़ार सकें.

और जब मक्का मे रहना एकदम दूभर हो गया और पैगंबर स. के कत्ल की कोशिशें मक्का के गैर मुस्लिम करने लगे तो पैगंबर मोहम्मद स. भी बाकी मुसलमानों के साथ मक्का से मदीना प्रस्थान कर गए।


~ ज़िया इम्तियाज़।


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