बच्चे गोद लेना।
एक भाई ने प्रश्न किया ... किसी देश में अगर किसी दयालू मुसलमान को एक छोटा न बोल सकने वाला बच्चा कचरे में फेंका लावारिस मिलता है, पुलिस को सूचना दे कर उसके असली बाप का पता न चलने पर, कानूनी रूप से मुसलमान दयालू व्यक्ति उस न बोल सकने वाले बच्चे को गोद ले लेते हैं, चार साल बाद उस बच्चे का नाम मदरसे में लिखाने जाते है तो बाप की जगह अपना नाम लिखा देते है %सवाल% दयालू मुसलमान भाई ने शरीयत के अनुसार क्या अपराध किया ? शरीयत के अनुसार इसकी सजा क्या है ? (बच्चा जब मिला था तो 6 महीने का था )
उत्तर :- कुरआन कहता है कि गोद लिए हुए बच्चों को अपना बेटा नहीं, उनके बाप का बेटा कहो..... इस कारण भाई को ये भ्रम हो गया कि इस्लाम मे बच्चा गोद लेना पाप है
लेकिन भाई का भ्रम निर्मूल है, इस्लाम के अनुसार बच्चा गोद लेना कोई पाप नहीं, बल्कि ये तो इस्लाम मे बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है कि किसी अनाथ बच्चे को पूरे वात्सल्य और प्यार दुलार से पाल पोस कर बड़ा किया जाए और आत्मनिर्भर बनाया जाए .... इस विषय मे कुरान की अनेक आयतें और अनेक अहादीस मौजूद हैं, जो मुस्लिमों को अनाथ बच्चों का पूरे न्याय और प्रेम से पालन पोषण करने के दिशा निर्देश देती हैं ।
निसन्देह कुरान मे गोद लिए हुए पुत्रों को अपना नहीं बल्कि उनके पिता का नाम (जबकि उनके जैविक पिता का नाम मालूम हो ) देने का आदेश दिया गया है, ये इसका सबसे प्रमुख कारण तो ये है कि बड़ी उम्र मे गोद लिया गया गैर रक्त सम्बन्धी युवा लड़का गोद लेने वाली स्त्री के लिए नामहरम है, अत: स्त्री उस लड़के से पर्दा रखे, तथा उस लड़के की पत्नी से लड़के को गोद लेने वाला पिता भी पर्दा रखे, पर्दे के मामले मे ये लोग उतने उन्मुक्त न हों जितने उन्मुक्त रक्त सम्बन्ध मे हो सकते हैं, ताकि मर्यादा बनी रहे ॥
... दूसरा कारण गोद लिये बालक को उसके जैविक पिता का नाम देने के पीछे ये था कि बालक को अपनी वास्तविक पैतृक सम्पत्ति प्राप्त करने मे, पिता का नाम बदला हुआ होने की वजह से कोई अड़चन न आए...॥
अब भाई के प्रश्न की ओर लौटते हैं, यहाँ एक तो बालक छह महीने का है, अत: पालक माता बच्चे को अपना दूध पिलाकर उससे दुग्धजात सम्बन्ध स्थापित कर सकती है, जिसे इस्लाम मे सगे मां पुत्र के सम्बन्ध के बराबर प्रगाढ़ सम्बन्ध की मान्यता है, इसलिए इस रिश्ते मे अनावश्यक पर्दे की बाध्यता न होगी ।
दूसरे, बालक के जैविक पिता का नाम मालूम नहीं तो पालक पिता, स्कूल वगैरह मे अभिभावक की जगह अपना नाम बेखटक लिखवा सकता है, इस बालक को पूरे अपनत्व से पालकर किसी लायक बना सकता है, व अपनी जायदाद के 33 प्रतिशत भाग का उसे वारिस भी बना सकता है ...
... इस्लाम के अनुसार ऐसा मुस्लिम बहुत बड़े पुण्य का ही भागी होगा, न कि दण्ड का, जैसा कि भाई को भ्रम हो गया था ॥
~ ज़िया इम्तियाज़।
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अपंग बच्चे क्यों।
जैसा कि मैंने बताया था कि आजकल मैं क़ुरआन में इस ताल्लुक़ से पढ़ रहा हूं कि बेगुनाह इन्सान के आगे दुनिया में बहुत सी तकलीफें क्यों आ जाती हैं ?? ..... इंसान इन मुसीबतों से अक़्सर हौसला हार जाया करता है, फ़िर ऐसी मुसीबतें इंसान को देने के पीछे अल्लाह की मस्लेहत क्या है, जिन मुसीबतों के पड़ने से कई लोग दुनिया के किसी रब के होने की बात से भरोसा खो देते हैं, कि अगर कोई ख़ुदा होता तो हम पर बेवजह इतना ज़ुल्म न करता... अक्सर हम आप जैसे साधारण लोग भी जब बेगुनाह लोगों या अबोध बच्चों की निर्मम हत्याओं के मामले देखते हैं तो "सब कुछ अल्लाह की मर्ज़ी से होता है" और "अल्लाह बहुत रहम वाला है" इन दोनों किस्म की बातों में उलझ से जाते हैं....कि अगर अल्लाह रहम वाला है तो इन बेगुनाह लोगों पर ज़ुल्म क्यों होता
रहने दिया अल्लाह ने ???
अबोध बच्चों को बिना किसी कुसूर क्यों दुनिया में बड़ी पीड़ादायक स्थितियाँ झेलनी पड़ती हैं , अबोध उम्र में बिना कोई पाप पुण्य किये मर जाने वाले बच्चों का स्वर्ग और नरक के कांसेप्ट से कोई ताल्लुक कैसे हो सकता है ??? ऐसे कई सवाल हमें परेशान किया करते हैं !!
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देखिये दोस्तों, क़ुरआन से हम जानते हैं कि हमारी ये दुनियावी ज़िन्दगी एक इम्तिहान के सिवाय कुछ नहीं है, इस ज़िन्दगी में अल्लाह हमें सुख देकर भी आज़माता है और तकलीफ़ देकर भी.... हम ये बात जानते हैं, इसके बावजूद अपना या किसी और का दुःख देखकर हमें अगर अल्लाह के रहम या उसके वजूद पर शक़ होने लगे तो इसमें ज़रूर हमारे सोचने के गलत ढंग और हमारी लाइल्मी का क़ुसूर है,
.... सोचने का गलत ढंग ये है कि ये दुनिया हम इंसानों के इम्तिहान की जगह है, न कि अल्लाह के इम्तिहान की,
...... दुनिया में कहीं कोई इंसान किसी पर ज़ुल्म न करे ऐसे हालात बनाने के लिए लगातार कोशिश करने की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने हम इंसानों को सौंपी है, ... लेकिन हम इंसान दुनिया में लड़ाई झगड़ों को उभरते हुए हाथ पर हाथ रखे बैठे देखते रहते हैं, और जब खून खराबा मचने लगता है तो अल्लाह पर सवाल उठाने लगते हैं...
.... इसी तरह हमारी लाइल्मी ये है कि हमको लगता है कि जो ज़िन्दगी हम जी रहे हैं उसमें हमारी कोई मर्ज़ी नही थी, बल्कि अल्लाह ने सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से हमें जैसी तकलीफों में डालना चाहा, डाल दिया है... लेकिन ऐसा नहीं है ... हक़ीक़त ये है कि दुनिया में पैदा होने वाले हर शख़्स ने अपनी ज़िंदगी के इम्तिहानों का चुनाव ख़ुद अपनी मर्ज़ी से अपनी पैदाइश से पहले अल्लाह के सामने किया था, ... ये जानकारी अगर लोग अपने ज़हन में बिठा लें कि हर तकलीफ़ सहने वाले इंसान ने अपने लिये खुद अल्लाह से ऐसी ज़िन्दगी मांगी थी, तो हमारे बहुत से वसवसे और वहम दूर हो जाएंगे....
..... कुरआन में कुछ आयतों पर गौर करें तो पूरा मामला समझ में आता है कि हमारी पैदाइश से पहले हमने क्या क्या मुआहिदे अपने ख़ुदा के साथ कर रखे हैं....
.... क़ुरआन से मालूम चलता है कि अल्लाह ने दुनिया में जन्म से पहले तमाम इंसानों और अपनी अन्य रचनाओं की भी आत्मा/अंतर्चेतना को इकठ्ठा किया, उन्हें जन्नत की नियामतें साकार दिखाईं, फिर उन्हें बताया कि इस जन्नत को पाने के लिए उन्हें दुनिया में जन्म लेना होगा और कुछ इम्तिहानों से गुज़रना होगा, फिर उन्हें दुनिया में तमाम तरीक़े की तकलीफ़ों और आजमाइशों के साकार दर्शन कराए, और बताया गया कि इन हालात में भी अगर तुम धैर्य और सत्यनिष्ठा पर कायम रहोगे भले काम करते हुए ज़िन्दगी गुज़ारोगे तो जन्नत के अधिकारी होगे, और इसके विपरीत अगर दुनिया में कामना के वशीभूत होकर बुराई का मार्ग पकड़ोगे, दूसरे इंसानों पर ज़ुल्म करने लगोगे, तो दोज़ख़ के भयंकर दण्ड पाओगे.... अल्लाह की अन्य रचनाएं तो इस कठिन इम्तिहान का ख़ाका देखकर पीछे हट गईं, पर इंसान ने सब देखने समझने के बाद ही दुनिया की जिंदगी में उतरने का फ़ैसला किया,
..... सूरह अहज़ाब की 72वीं आयत में ज़िक्र है....
"हकीक़त में हमने यह अमानत आसमान और ज़मीन और पहाड़ों (वगैरह) के सामने पेश की तो उन्होंने उसे लेने से इनकार किया और वह डर गए, मगर इंसान ने उसे उठा लिया..."
... अमानत, यानी दुनियावी ज़िन्दगी लेने से अल्लाह की दूसरी तख़लीक़ात क्यों डर गईं ? बेशक़ उसमें दिखाए गए कठिन इम्तिहान का दुख, तकलीफ़ और आसानी से गुमराही की तरफ़ झुक जाने का ख़ाका देखकर...., उन्हें लगा कि वो इस इम्तिहान में सफल नहीं हो सकेंगे
लेकिन इंसान ने इस इम्तिहान का चैलेन्ज क़ुबूल कर लिया क्योंकि उसे लगा कि वो इस इम्तिहान को पार कर लेगा और जन्नत और उसकी बेशकीमत नियामतों का हक़दार बनेगा,
.... जब इतना हो चुका तो अल्लाह ने इंसान से दुनिया की ज़िंदगी में जाने से पहले कुछ वचन लिये, वचन लेने का अर्थ है इंसान की अंतर्चेतना में कुछ बातों को बैठा दिया, जो बातें दुनिया की ज़िंदगी में भी उसकी अंतर्चेतना में मौजूद रहीं, ये जिस घटना का ज़िक्र है, उसे इस्लामी विद्वान "अहद ए अलस्त" यानि सबसे पहली प्रतिज्ञा के नाम से जानते हैं, ....
सूरह आराफ़ की आयत 171-172 में ज़िक्र है.....
... "याद करो, जब तुम्हारे रब ने आदम की पुश्त से उनकी सन्तति को निकाला और उन्हें खुद पर गवाह बनाया, कि क्या मैं तुम्हारा रब नही हूं ? बोले "क्यों नहीं, हम गवाह हैं कि तू ही हमारा रब है" ऐसा इसलिये किया ताकि कयामत के रोज़ तुम ये न कहने लगो कि ऐ रब हमें तो दुनिया में पता ही नही था (कि हमारा कोई ख़ुदा भी है), या ये कहो कि शिर्क को हमारे बाप दादा ने किया था (हम तो बस उनके दीन पर चलते थे) क्या तू हमें उसपर दण्ड देगा जो कुछ उन्होंने किया"
..... यानी अल्लाह ने तमाम इंसानों के दुनिया में जन्म से पहले उनकी अंतर्चेतना में ईश्वर पर विश्वास की बात बिठा दी थी, दुनिया में इस विश्वास को झुटलाने के मौके आएंगे ये बताते हुए उन्हें तर्क से सही बात का फ़ैसला करने की अक़्ल भी दी थी, .... इसी तरह सूरह आले इमरान की 81वीं आयत में ज़िक्र है कि अल्लाह ने इसी समय इंसानों की अंतर्चेतना में ये बात भी बैठाई थी कि उन्हें दुनिया में बुराई के मार्ग से बचना चाहिए और नेकी के मार्ग पर चलना चाहिए और जब कोई रसूल उनके पास नेकी का मार्गदर्शन लेकर आए तो उसकी बातें माननी चाहिये... आयत के शुरुवाती अलफ़ाज़ हैं "और याद करो जब अल्लाह ने नबियों के बारे में तुमसे वचन लिया था..."
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.... तो हम ये भी देखते हैं कि दुनिया में ज़्यादातर इंसानी आबादी शांति, भाईचारे और मुहब्बत के माहौल को पसंद करती है, .... अंदरूनी तौर पर हर इंसान ऐसा ही होता है कि उसको दूसरे के साथ भला सुलूक करने से ख़ुशी मिलती है, ये बाहरी परिस्थितियां होती हैं जिनकी वजह से कुछ लोग बुराई और ज़ालिमाना आदतें अपना लेते हैं, ..... बहरहाल स्वाभाविक तौर पर अच्छाई की तरफ़ झुकाव इंसान की प्रकृति/फ़ितरत में होना दरअसल उसी "अहद ए अलस्त" की निशानी हैं, जब इंसान ने दुनिया में जाने से पहले अपने रब से ये अहद किया था कि वो नेकी और अच्छाई के रास्ते पर चलेगा ताकि वो अपने इम्तिहान में कामयाब हो सके !!
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इसके बाद हदीस लिटरेचर से हमें ये भी पता चलता है कि अबोध बच्चों की मौत होने पर वो जन्नत में जाते हैं, इसी तरह बेगुनाह इंसान को अगर दुनिया में कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो अल्लाह के यहाँ उस इंसान की नेकियों की तादाद भी बढ़ा दी जाती है.... यानी नवजात या अबोध उम्र में मौत या ज़िन्दगी की तकलीफें भी अपनी पैदाइश से पहले लोगों ने दुनिया की ज़िंदगी को "माया" जानते हुए मांगी थी ताकि उनका जन्नत में जाना पक्का हो जाए, ....
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लेकिन जब अपनी ज़िन्दगी में खुद तकलीफें मांगने वाले ये लोग "मायालोक" में पहुँचे तो माया को ही सच मानने लगे, और रोने तड़पने लगे... अपने फ़राइज़ उन्हें ऐसे मौके पर याद न रहे और वो अल्लाह की ज़ात से ही बदगुमान होने लगे.... बेशक़ ऐसे ही लोगों के लिए क़ुरआन में हिदायत है, बस ज़रूरत इसमें गौर और फ़िक्र करने की है !!!
दोस्तों, याद रखिये दुनिया की मुसीबतों में आप खुद अपनी मर्ज़ी से पड़े हैं, अपनी मुसीबतों के लिये अल्लाह को दोषी न ठहराईये .... बल्कि मुसीबतों के वक्त अल्लाह से बेतरह अपनी आज़माइश में आसानी की दुआ कीजिये... अपने ईमान की पुख्तगी का इस वक्त ज़्यादा ख्याल रखिये .... क्योंकि असल इम्तिहान आपके ईमान की पुख्तगी का ही है, आपके नेकी और ईमानदारी पर डंटे रहने का ही है, आप इस इम्तिहान में अल्लाह के अहकाम पर चल लीजिये, थोड़े वक्त बाद अल्लाह की रहमत आपको अपनी पनाह में यकीनन लेने ही वाली है, इस बात का यकीन रखिये.... क्योंकि क़ुरान हमें बताता है, कि "अल्लाह किसी जीव पर बस उसकी सामर्थ्य और समाई के अनुसार ही दायित्व का भार डालता है।" (2:286) ... यानी हमारा रब्ब किसी भी इंसान की ताकत से ज़्यादा उसपर बोझ नही डालता, कि उस तकलीफ को सहा ही न जा सके, बल्कि अल्लाह बस इतना बोझ डालता है कि जानदार उसे सह भी ले और उसकी परख, परीक्षा भी हो जाए ... तो मुसीबतों से इस ज़िन्दगी में भी निजात यकीनी है, ये यकीन रखिये...!!!
~ ज़िया इम्तियाज़।
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