Monday, 10 August 2020

बनू क़ुरैज़ा। तौहीने रसूल और काब बिन अशरफ।


बनू क़ुरैज़ा।

इज़राईल द्वारा हालिया फिलिस्तीन के बेगुनाह मुस्लिमों पर किए गए ज़ुल्मो ज़बर को जायज़ ठहराने के लिए कुछ मुस्लिमों से ख़ार खाने वाले लोग बनू कुरैज़ा के यहूदी युद्ध बन्दियों को मौत की सज़ा देने , और उनके औरतों व बच्चों को गुलाम बनाने का नबी सल्ल. पर आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि इजराईल के यहूदी भी मुस्लिमों से बनू कुरैज़ा के दयनीय यहूदियों के खून का बदला लेकर बिल्कुल ठीक कर रहे हैं !

आईए इसका भी मामला साफ कर दिया जाए, बनू कुरैज़ा एक यहूदी कबीला था जिसने मुसलमानों के साथ ये सन्धि की थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे काफिरों की सहायता नही करेंगे, बल्कि मदीना की हिफाज़त मे मुस्लिमों का साथ देंगे
लेकिन अस्ल मे उन यहूदियों के दिलों मे मुस्लिमों से नफरत और दुश्मनी भरी थी, और सन्धि उन्होंने केवल दिखावे के लिए की थी ताकि ये यहूदी खुद तो अन्दर ही अन्दर मुस्लिमों की जड़ें काटते रहें, पर मुस्लिम इन साज़िशों से अनजान रहें और इन यहूदियों के विरुद्ध कोई कदम न उठा पाएँ..
अपनी इसी छिपी रणनीति के तहत ये बनू कुरैज़ा के यहूदी  मुस्लिमों के दुश्मनों की मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे चुपके चुपके मदद करते रहते थे, पहले बद्र की लड़ाई मे मुस्लिमों पर हमला करने वाले कुरैश की मदद बनू कुरैज़ा वालों ने हथियारों से की थी,  जिसका पता भी प्यारे नबी सल्ल. को लगा, मगर उस वक्त रहमतुल्लिल आलमीन सल्ल. ने बनू कुरैज़ा का ये कसूर माफ कर दिया

फिर अहज़ाब की लड़ाई के वक्त ये यहूदी खुलकर सामने आ गए और इन यहूदियों ने खुद जा जाकर मुसलमानों के दुश्मनों को लड़ाई के लिए उकसाया , और उनको मुस्लिमों के विरुद्ध पूरी मदद देने के वायदे किए,  ताकि तमाम मुसलमानों का इसी लड़ाई मे खात्मा हो जाए 
अहज़ाब की लड़ाई मे बनू कुरैज़ा की इस गद्दारी की वजह से बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा
इसलिए अहज़ाब की लड़ाई खत्म हो जाने के बाद बनू कुरैज़ा का घेराव किया गया, इन यहूदियों को सज़ा देना जरूरी था, वरना अगर मुस्लिम इन यहूदियों को सबक न सिखाते तो ये यहूदी हमेशा काफिरों को उकसा कर मुसलमानों पर हमले करवाते रहते, मुस्लिमों को खत्म करवाते रहते...
जब इन यहूदियों ने खुद को मुसलमानों की पकड़ मे पाया तो मुसलमानों के सामने ये मांग रखी कि "हज़रत साद बिन मुआज़ को हमारे (बनु कुरैज़ा) के मामले मे मुंसिफ (सरपंच) बना दिया जाए ,और जो फैसला साद बिन मुआज़ करें वो हमें भी मन्ज़ूर होगा, और उस फैसले को नबी सल्ल. भी मान लें ! "

आप सल्ल. ने यहूदियों की ये मांग मान ली, शायद यहूदियों की नज़दीकी हज़रत साद बिन मुआज़ से थी जिस वजह से बनू कुरैज़ा को फैसले मे हज़रत साद से यहूदियों की तरफदारी की उम्मीद थी ... मगर ज़रूरी तहकीकात के बाद हज़रत साद ने ये फैसला दिया कि मुसलमानों से युद्ध करने वाले बनू कुरैज़ा के वाले मर्दों को सज़ा ए मौत दी जाए, जबकि उनके साथ की औरतों और बच्चों को गुलाम बनाया जाए ..
ये बात ध्यान मे रखनी चाहिए खुद उन यहूदियों के चुने हुए न्यायाधीश ने उन यहूदियों के ही कानून के मुताबिक उन्हें सज़ा दी थी जिस तरह वो यहूदी अपने दुश्मनों को सज़ा देते थे ... इस तरह की सज़ा यहूदी और ईसाईयों द्वारा अपने दुश्मनों को देने का हुक्म आज भी बाइबल के लेविटिकस, अध्याय 20, आयत 10 मे आप देख सकते हैं ....  सो अगर सज़ा सख्त थी तो इसके लिए इस्लाम को दोष नहीं दिया जा सकता , यदि दोष ही दिया जाए तो वह यहूदियों के अपने कानून को जाएगा ॥

और क्योंकि बनू कुरैज़ा का फैसला उन यहूदियों की ही मांग पर नबी सल्ल. ने नही किया था, इसलिए बनू कुरैज़ा को मिली सख्त सजा का दोष नबी सल्ल. को नही दिया जा सकता बल्कि नबी सल्ल. से नफरत या दुश्मनी के चलते बनू कुरैज़ा वालों ने नबी सल्ल. से अपना फैसला न करवाकर, और नबी सल्ल. से साद बिन मुआज़ का फैसला मानने का वादा लेकर अपना ही नुकसान कर लिया, वरना हमें पूरा यकीन है कि अगर बनू कुरैज़ा वालों ने अपना फैसला नबी सल्ल. पर छोड़ा होता तो उन यहूदियों को आप सल्ल. मौत की सज़ा तो न ही सुनाते , जैसे आप सल्ल. ने पहले भी ऐसे ही अपराधों पर बनू केनुक़ाअ और बनी नज़ीर जैसे कबीलों को मौत की सजा न दी थी
फिर भी आप सल्ल. ने मुसलमानों के खून के प्यासे इन बनू कुरैज़ा मे से भी कुछ की सज़ा माफ करवा दी थी, जैसे ज़ुबैर यहूदी और रिफ़ाआ बिन शमूईल यहूदी दोनों की जां बख्शी फरमा दी थी (तारीखे तबरी)
याद रखिए गुलाम बनाने या कत्ल करने की सजा उन्हीं स्त्री पुरुष और बच्चों को दी गई थी जो लोग युद्ध मे मुस्लिमों के विरुद्ध शामिल थे, और मुस्लिमों की हत्याओं के दोषी थे ... और एक बात और याद रखनी चाहिए कि मुस्लिमों द्वारा गुलाम बनाए गए लोगों का कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेशों के कारण, कभी किसी तरह से शोषण नहीं किया जाता था, जैसा गम्भीर शोषण गैरमुस्लिम अपने युद्धबंदियों के साथ उन्हें गुलाम बनाकर करते थे ॥

अब फैसला कीजिए कि कहां मुसलमानों को मिटा डालने के लिए लगातार मुसलमानों पर जानलेवा हमले करवाने वाले, और खुद मुसलमानों के कत्ल करने को लड़ने वाले यहूदियों के सिर्फ मर्दों को मौत की सज़ा देने वाले, और उसमें से भी कुछ यहूदियों की जान बख्श देने वाले मुसलमान

और कहाँ फिलिस्तीन के निर्दोष, निहत्थे और लड़ाई से दूर रहने वाले मज़लूम औरतों, बच्चों और मर्दों के खून की नदियाँ बहाने वाला इजराइल .... कोई मुकाबला है ??

~ ज़िया इम्तियाज़।

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तौहीने रसूल और काब बिन अशरफ।

कुछ लोगों के मुंह से सुनने को मिला कि नबी सल्ल. का अपमान करने वाले व्यक्ति के लिए इस्लाम मे मौत की सजा का प्रावधान है, और इस प्रावधान का मूल वो हदीस है जिसमें एक यहूदी कवि काब बिन अल अशरफ को नबी सल्ल. की आलोचना करने के अपराध मे नबी सल्ल. के आदेश से कत्ल कर डाला गया था

मैं पूछता हूँ अगर ऐसा ही प्रावधान था तो नबी सल्ल. की आलोचना और नबी को बुरा भला कहने वाला क्या केवल काब ही था जिसकी हत्या कर के आलोचना से छुट्टी पा ली गई ???

जी नहीं नबी सल्ल. की आलोचना करने वालों की उस दौर मे कोई कमी न थी, स्वयं कुरान ही कई स्थानों पर इस बात की तस्दीक करता है  माज़अल्लाह हमारे प्यारे नबी सल्ल. को अरब के काफिर लोग पागल व्यक्ति कहा करते थे (हिज्र :6) इसके अतिरिक्त नबी सल्ल. को जादूगर, और एक झूठा शायर कह कह कर आप सल्ल. का अपमान किया जाता, आप सल्ल. पर हिकारत से  मक्का के काफिर जो फब्तियां कसते, वो अब भी कुरान पाक  मे दर्ज हैं कि वो लोग आप सल्ल. का मजाक उडाते हुए कहते थे अगर तुम नबी हो तो हम पर कोई विपत्ति लाकर दिखाओ, वे लोग नबी को देखकर ताने मारते कि अल्लाह को मोहम्मद सल्ल. के सिवा कोई और आदमी न मिला था नबी बनाने के लिए। कभी मजाक उड़ाते हुए नबी सल्ल. को झूठा साबित करने को कहते कि तुम नबी हो तो तुम्हारे साथ अल्लाह का कोई फरिश्ता क्यों नहीं रहता। न सिर्फ बातों के तीर नबी सल्ल. की मुबारक ज़ात पर छोड़े जाते बल्कि दूसरे भी कई तरीकों से नबी सल्ल. को परेशान किया जाता,  जब आप सल्ल. लोगों को दीन की दावत देने निकलते तो आप के पीछे आप सल्ल. का ही चचा अबू लहब आप सल्ल. को बुरा भला कहता और आप सल्ल. पर मिट्टी फेंकता चलता था पर आप सल्ल. कोई जवाबी कार्यवाही न करते। काफिर लोग, नबी सल्ल. के घर के आगे कंटीली झाड़ियाँ डाल दिया करते थे ताकि आप सल्ल. रात को घर से निकल कर बाहर जाएं तो ज़ख्मी हो जाएं ... आप सल्ल. के घर के दरवाज़े पर गन्दगी फेंक दी जाती, इन बातों पर नबी सल्ल. बस इतना फरमा देते कि "ऐ अब्दे मनाफ की औलाद, पड़ोस का हक खूब अदा करते हो (तारीखे तबरी)।

... एक दिन नबी सल्ल. खाना ए काबा मे नमाज़ पढ़ रहे सज्दे मे गए तो उक्बा बिन अबी मुईत ने अपनी चादर उमेठ के आप सल्ल. की गर्दन मे डालकर कसना शुरू कर दी , हजरत अबूबक्र रज़ि. आए तो धक्का मारकर उक्बा को हटाया (सही बुखारी)

.... इसी तरह एक बार नमाज़ पढ़ते हुए नबी सल्ल. की पीठ पर उक्बा ने ऊंट की ओझड़ी (मलाशय) लाकर रख दी थी 

लेकिन नबी सल्ल. ने न ज़हनी तकलीफ पहुंचाने वालों को पलटकर न बुरा भला कहा न शारीरिक चोट पहुंचाने वालों से कभी बदला लिया (हदीस मे है कि नबी सल्ल. ने ऊंट की ओझड़ी रखने वाले को पलटकर बुरा भला नहीं कहा बल्कि अल्लाह से उन लोगों को सजा देने की दुआ की ... यानि अपने प्रतिशोध को अल्लाह पर छोड़ दिया .... ये दण्ड की दुआ भी सम्भवत: नबी सल्ल. ने अपने कष्ट से दुखी होकर नही, बल्कि इसलिए की थी क्योंकि अल्लाह की इबादत करने मे वो लोग व्यवधान डाल रहे थे और अल्लाह का हक अदा नही होने दे रहे थे .... अन्यथा नबी सल्ल. को तो जब जंग ए उहद मे काफिरो ने घायल कर के एक गड्ढे मे डाल दिया था तब भी नबी सल्ल. ने किसी को बद्दुआ नहीं दी थी, और जब ताअफ के मैदान मे आप सल्ल. को पत्थरों से लहूलुहान कर दिया गया था, आप सल्ल. ने तब भी किसी का अहित नहीं चाहा )  बल्कि मक्का विजय के मौके पर नबी सल्ल. ने इन्हीं काफिरो को इनके धर्म पर छोड़ते हुए आम माफी का ऐलान किया था,

तो मेरे वो नबी, जिन्होने अपमान, ताने, मजाक, मखौल, गालियों  को छोड़िए, खुद को भयंकर शारीरिक पीड़ा देने वालो को भी माफ कर दिया था, वो नबी केवल नबी सल्ल. की आलोचना करने पर एक टुच्चे से शायर काब बिन अल अशरफ की हत्या क्यों करवाएंगे ??

 दरअसल बात जैसी बताई और समझाई जा रही है वैसी है नही...

काब बिन अल अशरफ मदीना का एक यहूदी कवि था, ये इस्लाम का सख्त दुश्मन था और अपनी कविताओं के जरिए काफिरो को मुस्लिमों के विरुद्ध लड़ाई के लिए उकसाया करता था ..... इतिहासकार इब्न इस्हाक के अनुसार बद्र के युद्ध मे मुस्लिमों की जीत से क्षुब्ध होकर, काब मक्का गया और वहाँ जाकर अपनी कविताओं के जरिए काफिरों को तब तक भड़काता रहा जब तक उन काफिरों ने मुस्लिमों से दोबारा युद्ध करने की ठान न ली।

.... इसके बाद भी मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ उकसाऊ कविताएं लिखता रहा जिससे काफिरो मे मुस्लिमों पर आक्रमण कर के उनकी हत्या करने और उनकी स्त्रियों को उठा लेने की उत्तेजना और बढ़ी... 

इसी जुर्म के कारण काब की हत्या की गई कि वो मुस्लिमों की हत्याओं का कारण बन रहा था, और लगातार मुस्लिमों की सुरक्षा और जान माल को खतरे मे डाल रहा था,  न कि उसे इसलिए मारा गया कि उसने नबी सल्ल. का अपमान किया, सही बुखारी और अबू दाऊद शरीफ़ की अहादीस मे भी ये कहीं नहीं लिखा कि रसूल सल्ल. ने काब को मारने का हुक्म अपनी शान मे गुस्ताखी के एवज मे दिया था .... अबू दाऊद शरीफ़ (English translation) की किताब 19, हदीस 2994 मे साफ लिखा है कि काब काफिरो को मुस्लिमों के खिलाफ उकसाया करता था और उसकी वजह से काफिर लोग मुस्लिमों को बुरी तरह प्रताड़ित किया करते थे, काब द्वारा अपनी इन हरकतों से बाज़ रहने की शर्त से इनकार कर देने की सजा दी गई ... 

युद्ध भड़काने के जुर्म मे काब को दिया गया मृत्युदण्ड भी पूरी तरह न्यायोचित था 
... किसी देश मे रहते हुए दूसरे देश को उसपर आक्रमण के लिए उकसाना विश्वभर के कानूनो मे देशद्रोह के अपराध के अन्तर्गत आता है, और अधिकांश देशों मे इस अपराध के लिए मौत की सजा है, स्वयं भारत मे भी यही कानून है ....
 या फिर स्वयं अक्ल लगाइए अगर मैं एक मुस्लिम होकर अन्य किसी समुदाय के लोगों की हत्याओं को मुस्लिमों को उकसाता रहूँ ,और सैकड़ों लोगों की हत्या का कारण बन जाऊं तो मुझे क्या सजा दी जाएगी  ???

~ ज़िया इम्तियाज़।

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