क्या मुहम्मद सल्ल० को बायोपोलर डिसऑर्डर था?
कई बार इस्लाम विरोधियों को ये कोशिश करते देखा है कि हज़रत मोहम्मद सल्ल० को नबुव्वत का झूठा दावा करने वाला या ऐसे डिसऑर्डर से ग्रसित साबित कर सकें जिसमें इंसान खुद को भगवान समझने लगता है.....
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....लेकिन ऐसी बचकानी कोशिशें वही इंसान करता है जिसे साइकोलॉजी का थोड़ा भी ज्ञान नही रहता, .... इस तरह खाली अंधविरोध में औसत बुद्धि से सोचा जाए तो ये बातें हर धर्म के संस्थापक पर फिट बैठाई जा सकती हैं.... औसत बुद्धि से तो आप हर धर्म संस्थापक को बाइपोलर डिसऑर्डर का शिकार कह सकते हैं...
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.... पर बाइपोलर डिसऑर्डर के बारे में एक बात बड़ी मार्के की है कि इसमें इंसान पकी पकाई खिचड़ी खाने की कोशिश करता है, यानी अपने समाज में पहले से चली आ रही मान्यताओं का विरोध नही करता बल्कि पूरी तरह सोच समझकर खुद को समाज द्वारा स्वीकार करवाने की पूरी योजना बनाकर पुरानी मान्यताओं को ही मानते हुए उसका देवता या अवतार खुद को घोषित करता है, ये दावा वो ये जानकर ही करता है कि मेरे समाज में देवता के आने पर विश्वास है इसलिये मुझे स्वीकार लिया जाएगा .... बाइपोलर डिसऑर्डर का शिकार इंसान इससे ज़्यादा कुछ नहीं करता.... मानसिक रूप से अस्थिर इंसान से इससे ज़्यादा अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है, कि वो कोई नई धर्म संहिता ला पायेगा ....
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..... लेकिन अगर कोई व्यक्ति बिना किसी पूर्व इच्छा के अचानक ईश्वर के सम्पर्क का अनुभव करे, समाज के कानूनों का विरोध करे और क़ुरआन जैसी एक शानदार धर्म सहिंता ले आये तो कोई दुराग्रही ही उस व्यक्ति को झूठा या रोग ग्रसित समझेगा...
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...... नबी सल्ल० के मामले मे बायपोलर डिसऑर्डर के दो मुख्य कारण, नशा और अवसाद दोनों ही कारण नही थे.... मक्का में हालांकि नशा आम था, पर इस विषय में नबी सल्ल० स्वाभाविक रूप से नबी बनने से पहले ही रुचि नहीं रखते थे
.... नबी सल्ल० के होश सम्हालने से पहले ही उनके माता पिता नही रहे थे, पर इसका मतलब ये नही था कि उनका बचपन दुखी या कष्ट में बीता बल्कि हज़रत अबू तालिब उनके चचा ने उन्हें अपनी औलाद से बढ़कर प्यार दिया
..... रिवायतों में ये मिलता है कि नबी सल्ल० के कई चाचा थे सारे ही उन्हें बहुत प्रेम करते थे, हज़रत अबू बक्र रज़ि० जैसे स्नेही मित्र के साथ बहुत से अन्य लोगों से भी मित्रवत सम्बन्ध थे नबी सल्ल० के... आप सल्ल० के व्यवहार में एक विनोदप्रियता थी, ऐसे व्यवहार के लोग अवसादग्रस्त नही होते
..... किसी दिन अचानक ऐसे किसी स्वस्थ, खुश और सामाजिक इंसान के साथ कोई अजीब सी घटना हो जाये तो इसे डिप्रेशन से जोड़ा नही जा सकता, डिप्रेशन में लंबे वक्त तक इंसान का व्यवहार असामान्य हो जाता है उसका समाज से सम्बन्ध कट जाता है लेकिन नबी सल्ल० के सारे समाज के साथ मधुर सम्बन्ध थे और अच्छी सामाजिक प्रतिष्ठा थी ये बात बुख़ारी शरीफ़ की किताबे वही में ही ख़दीजा रज़ि० के नबी सल्ल० को दिलासा देने के शब्दों से पता चलती है, खुद जितने प्रेम से ख़दीजा रज़ि० ने नबी सल्ल० को सम्हाला उससे पता चलता है कि उनका दाम्पत्य जीवन भी नबी सल्ल० के उनसे अच्छे व्यवहार के चलते बहुत सुखी था..... तो एक दिन अचानक उनपर वही आने की घटना को महज़ नबी सल्ल० के वहम या किसी डिप्रेशन से जोड़ा नही जा सकता....
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.. अच्छा और..... किसी नबी के आने का इंतज़ार नबी सल्ल० के पैतृक धर्म के लोग हरगिज़ नही कर रहे थे, हां यहूदी ईसाई धर्म के लोग कर रहे थे... लेकिन अरब में जितनी प्रतिष्ठा मूर्तिपूजकों को हासिल थी उतनी न यहूदियों को हासिल थी न ईसाईयों को, ज़ाहिर है अगर मूर्तिपूजक अरब में कोई व्यक्ति बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रस्त होता तो वो खुद पर किसी बड़े देवता के आने का दावा करता और उसे स्वीकारा जाता .... लेकिन नबी सल्ल० के मामले में उन्होंने अपने पैतृक धर्म के लोगों द्वारा स्वीकार्य होने वाली कोई बात ही नहीं की
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..... और अंतिम बात.... बायपोलर डिसऑर्डर में व्यक्ति की पूरी स्वेच्छा होती है कि वो खुद को अवतार या नबी साबित करे, जबकि नबी सल्ल० को जब नबी बनाया गया तो वो बुरी तरह घबरा गए थे, और लोगों से ये बात बताना नही चाहते थे....!!!
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...... पर जब इस धर्म के बारे में उन्होंने लोगों को बताया और शुरुआती विरोध के बाद जब लोगों ने इस्लाम को सुना और समझा तो मानवीय समानता, दया और न्याय की अद्भुत शिक्षाएं इसमें पाईं, आप सल्ल० पर एक ऐसी किताब अवतरित हुई जिसमें लिखी संहिता का दुनिया में दूसरा जोड़ नही मिलता, तमाम दुनिया आज तक इस क़ानून का लोहा मानती है जो क़ानून क़ुरआन लाया है
...... निश्चित ही जो लोग क़ुरआन की अद्भुत बातों पर, इस्लामी न्याय व्यवस्था पर गौर नही करते वही लोग ये कह सकते हैं कि नबी सल्ल० ने अपने मन से बातें गढ़ ली थीं, पर क़ुरआन में उन्हें बार बार चैलेंज किया गया कि तुम अगर इस क़ुरआन को गढ़ी हुई मानते हो तो ऐसी एक सूरह ही ला कर दिखा दो... ये चैलेंज आज तक कायम है !!
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..आप ऐसे शब्द बहुत से धर्म ग्रन्थों में भी पाएंगे कि धर्म संस्थापक खुद ही अपनी प्रशंसा कर रहा होता है कि मैं ही भगवान हूँ, लेकिन जब आप क़ुरआन पाक पढ़ते हैं तो वहां बार बार नबी सल्ल० को एक साधारण व्यक्ति बताया गया है, जो किसी का भला बुरा करने की शक्ति नही रखते हैं, कहीं नबी सल्ल० को अल्लाह की ओर से तम्बीह दी जा रही है, .... यह पढ़कर हम नबी सल्ल० को तो किसी डिसऑर्डर के इल्ज़ाम से बरी पातें हैं, पर बाक़ी लोग जिन्होंने "अनल हक़" या "अहम ब्रह्मास्मि" के दावे किए उन पर बड़ा प्रश्नचिन्ह ज़रूर लग जाता है।
~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या मुहम्मद सल्लo के वालिदैन जहन्नुमी है?
नबी सल्ल. के वालिदैन जन्नती होंगे या नहीं, अक्सर ये सवाल इस गलतफहमी मे पूछा जाता है कि इस्लाम के मुताबिक हर गैर मुस्लिम दोज़ख मे जाएगा .... हालांकि ऐसा नहीं है और नबी की विलादत से पहले के लोगों पर ये हुज्जत कायम नहीं होती है इसलिए उनके अच्छे कर्मो के आधार पर उनके जन्नत ही जाने की ज्यादा उम्मीद होती है, सो पैगंबर सल्ल. के वालिदैन के बारे मे भी है ....!!
लोग सवाल करते हैं कि नबी सल्ल. से पहले तो तमाम अरब बुरी तरह बहुदेववाद के शिकार थे और उन्हीं अरबों के बीच पैगंबर सल्ल. के माता पिता भी रहते थे ..... यानि सवाल पूछने वालों के ख्याल से नबी सल्ल. के वालिदैन भी बहुदेववादी होंगे ....
लेकिन सच्चाई ये है कि उस दौर मे बहुदेववाद मे विश्वास करने वालों के साथ ही एक अल्लाह को सबसे ज्यादा प्रभुत्वशाली मानने, और इस नाते केवल अल्लाह की पूजा करने वाले लोग भी मौजूद थे गौर कीजिए, नबी सल्ल. के जन्म से कुछ दिन पहले का एक मशहूर वाकया है अबाबीलों द्वारा काबा की रक्षा का, उसको पढ़कर ये ज्ञात होता है कि नबी सल्ल. के दादा हजरत मुत्तलिब एकेश्वरवादी थे, इनकी अल्लाह मे भक्ति इस बात से भी परिलक्षित होती है कि इन्होंने अपने पुत्र (यानि नबी सल्ल. के पिता) का नाम "अब्दुल्लाह" रखा था जिसका अर्थ है "एक सर्वशक्तिमान ईश्वर का भक्त" ....
फिर नबूवत के ऐलान से पहले भी नबी सल्ल. का रूझान एकेश्वरवादिता की ओर होना भी ये संकेत देता है कि आप सल्ल. की आनुवंशिकता एकेश्वर पर विश्वास की थी ... इन बातो से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि नबी सल्ल. के पिता, माता और दादा एकेश्वरवादी भी थे ...
सो हमें आप सल्ल. के वालिदैन के जन्नत मे भेजे जाने की ही ज्यादा आशा और उम्मीद है ...
~ ज़िया इम्तियाज़।
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