Sunday, 16 August 2020

धरती चपटी, अंतरिक्ष पार, चांद के टुकड़े।

क़ुरान में धरती चपटी।

कुछ लोग कहते हैं कि कुरान मे धरती को फैली हुई और चपटी बताया गया है, और सूरह नाज़ियत की आयत 30 मे लफ़्ज़ "दहाहा" का मतलब होता है फैलाना या विस्तार करना । बेशक "दहाहा" का अर्थ होता है किसी चीज को फैलाना और विस्तार देना, और सूरह नाज़ियत की 30वीं आयत का अनुवाद भी अकसर यही किया गया है कि अल्लाह ने धरती को विस्तार दिया या फैलाया है... जाहिर सी बात है हमारी धरती विस्तृत ही है ... जो लोग फैलाने का अर्थ चपटा लगाते हैं, ये उनके अपने दिमाग का फितूर है, क्योंकि आयत मे किस दिशा मे धरती को फैलाया इस बात को तो कहा ही नही गया, अत: हम सामान्य नियम लगाकर इसे हर दिशा से फैलाना मानते है और यदि किसी भी वस्तु को हम हर ओर से अधिक से अधिक विस्तार देना चाहें तो वो वस्तु गोल ही बनकर आएगी ...

और साथ ही साथ "दहाहा" का अर्थ ये भी है कि "किसी चीज का आकार अण्डे जैसा बनाना"

यानी अगर सूरह नाज़ियत 79:30 का तरजुमा ये किया जाए कि "अल्लाह ने धरती का आकार अण्डे जैसा बनाया" तो भी एकदम ठीक है ॥

क्या ये हैरत की बात नही है कि कुरान मे दुनिया के आकार का ज़िक्र करते वक्त एक ऐसा लफ़्ज़ दिया गया जिसका मतलब निकला है कि दुनिया का आकार गोल है, जैसा गोल आकार अण्डे का होता है ,और इस बात को विज्ञान ने साबित भी कर दिया है ....

बेशक ये कुरान का करिश्मा ही माना जाएगा, वरना लफ्ज़ दहाहा का कोई भी अलग मतलब निकल सकता था जो दुनिया की बनावट से बिल्कुल भी मेल न खाता 

और लोगों का क्या है वो सिर्फ अपनी खीज निकालते हैं, क्योंकि दुनिया की बनावट के बारे मे ऐसा सटीक लफ्ज़ दुनिया की और किसी भी धार्मिक पुस्तक मे नही आया है।


~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या क़ुरान में धरती को चपटी कहा गया है।

कुरान मे धरती को चपटा कहा गया है, अंतहीन और अथाह गहराई वाला समझा गया है, और आकाश मे बिना सहारे लटका न मानकर, जमीन को किसी सहारे पर टिका माना गया है और स्थिर माना गया है ... ॥
ऐसी बहुत सी आशंकाएं, पूर्वाग्रह, आक्षेप कुरान के विषय मे कुछ भाई लोग करते रहते हैं ...

मेरा उन सभी भाईयों से निवेदन है कि वे कुरान मे सूरह ज़ुमर की 5 वीं आयत देखे इसी आयत से आपकी सारी शंकाओं का समाधान हो जाएगा .... इस आयत मे स्पष्ट तौर पर लिखा है कि अल्लाह रात को दिन पर और दिन को रात पर "लपेटता" है .... रात और दिन का अर्थ आप जानते ही हैं कि ये धरती पर प्रकाश और अंधकार पड़ने का नाम है
.....

1- क्या कुरान के अनुसार धरती अंतहीन , चपटी और अथाह है ? : लपेटने का अर्थ है किसी चीज को ऊपर नीचे हर ओर से गोलाई मे कवर करना, यानि कुरान के अनुसार अल्लाह दुनिया पर ऊपर नीचे, हर ओर से सूर्य का प्रकाश डालता है, इसका अर्थ है कि कुरान मे धरती को अंतहीन और अथाह गहराई वाला नहीं समझा गया है क्योंकि आयत मे धरती को ऐसा बताया गया है जिसपर कोई चीज "लपेटी" जा सकती है .... अगर धरती को अंतहीन और चपटा माना गया होता तो आयत मे लपेटने का शब्द न आता बल्कि धरती पर रात और दिन को "ओढ़ाने" या "बिछाने" का शब्द प्रयोग किया जाता ।
लेकिन लपेटने के शब्द से स्पष्ट होता है कि कुरान ने धरती को स्पष्ट रूप से चार आयामो वाला ग्रह माना है

2- धरती का आकार : अब इस चार आयामी ग्रह का निश्चित रूप चट्टान की तरह ऊबड़ खाबड़, चौकोर, षट्कोण या कैसा है , ये भी देखिए ...... क्योंकि दिन और रात के कोई ठोस स्वरूप तो होते नहीं हैं , बल्कि ये तो धरती पर प्रकाश और अंधेरा पड़ने का नाम हैं ... यानि रातऔर दिन मतलब प्रकाश और अंधेरा धरती पर पड़कर उसी आकार मे ढल जाएंगे जिस आकार की धरती होगी ... इसका अर्थ ये हुआ कि दिन और रात धरती के आकार मे ढले होकर ही धरती पर "लपेटे" यानि गोलाकार मे कवर किए जाते हैं ... तो स्पष्ट है धरती का आकार भी गोल ही है ...॥

3- धरती कुरान के अनुसार किसी सहारे पर टिकी हुई है या नहीं : इस बात को समझने के लिए ये बात भी ध्यान मे रखिए कि कुरान पाक मे रात मे नजर आने वाले चन्द्रमा को आकाश मे स्थित बताया गया है [71:16] फिर इस चन्द्रमा को अपने दायरे मे तैरता हुआ भी बताया गया है [अम्बिया/33] ... 
अब क्योंकि चन्द्रमा रात मे दिखता है, यानी ये धरती पर लपेटी जाती रात का पीछा करता है, अर्थात् धरती पर लपेटे जाने के क्रम मे चलता है, और आकाश मे रहते हुए धरती पर लपेटे जाने के क्रम मे, यानी धरती के ऊपर और नीचे ,हर ओर से धरती की परिक्रमा करते हुए चन्द्रमा तभी चल सकता है जब धरती भी आकाश मे बिना किसी सहारे वैसे ही स्थित हो जैसे चन्द्रमा, सूर्य ,तारे और अन्य ग्रह आकाश मे बिना किसी सहारे स्थित हैं ॥

4- धरती स्थिर है या चलायमान : इस बात का पता भी धरती पर दिन और रात के लपेटे जाने की आयत से चल जाता है ...
..... क्योंकि वैज्ञानिक तथ्य ये है कि अंधकार मूल, स्थायी और स्थिर रूप से पूरे ब्रह्माण्ड मे व्याप्त है , कुरान के मुताबिक भी, अल्लाह ने आकाश मे एक जलता हुआ दीप "सूर्य" स्थापित किया [25:61]... और दीपक की आवश्यकता तभी होती है जब पहले से मूल रूप से अंधेरा व्याप्त हो... ॥ इसके अतिरिक्त ये भी तथ्य है कि प्रकाश तो स्थान परिवर्तन करता रहता है जबकि अंधेरा सदा अपनी जगह स्थिर रहता है, कुरान मे इस बात की भी पुष्टि की गई है.... कुरान मे अल्लाह फरमाता है कि " रात मनुष्यों के लिए एक निशानी है और जब अल्लाह उसपर से दिन को खींच लेता है तो लोग देखते हैं कि वो अंधेरे मे "रह" जाते हैं" [36:37] ,
स्पष्ट है कि कुरान के अनुसार दिन का प्रकाश हटा लिया जाता है, यानि दिन का स्थान परिवर्तन कर दिया जाता है, और दिन की अनुपस्थिति मे "अंधेरा रह जाता है", (न कि कहीं से अंधकार आ जाता है), और दिन के हटने पर अंधेरे का स्वत: रह जाना तभी सम्भव है जबकि अंधकार वातावरण मे स्थिर रूप से विद्यमान हो, 

कुरान मे रात और दिन, यानी प्रकाश और अंधकार को धरती पर लपेटा जाता बताया गया है.. और किसी भी चीज को किसी चीज पर दो प्रकार से लपेटा जा सकता है , पहला प्रकार तो ये है कि जिस चीज पर कुछ लपेटा जाना है उस चीज को स्थिर रखते हुए लपेटी जाने वाली चीज को उसके चारों ओर घुमाया जाए,
इसके विपरीत किसी चीज पर कुछ लपेटने का दूसरा प्रकार ये है कि जो चीज किसी चीज पर लपेटी जानी है उस चीज को स्थिर रखते हुए, उस चीज को अपनी धुरी पर गोल गोल घुमाया जाए जिस पर कुछ लपेटा जाना है ....

..... जबकि अंधेरा स्थिर होता है , इसके बावजूद जब कुरान मे इसी अंधेरे को रात के रूप मे धरती पर लपेटे जाने की बात कही गई है, तो इसका साफ अर्थ है कि आयत मे धरती पर रात को लपेटने के लिए, लपेटने की प्रक्रिया के उपरोक्त दूसरे प्रकार का उल्लेख किया गया है, यानि अंधेरे को स्थिर ही रखते हुए धरती को धरती की अपनी धुरी पर गोल गोल घुमाया जाता है ॥ यानी धरती स्थिर नहीं बल्कि क़ुरआन के अनुसार चलायमान साबित होती है  ॥
और जब धरती, सूरज चांद सितारों की तरह आकाश में स्थित एक पिंड साबित होता ही है, तो धरती चांद की तरह चल क्यों न सकती ? क़ुरआन इस संभावना को रखता है... लिहाज़ा जो लोग ये कहते हैं कि कुरआन में धरती को स्थिर बताया गया है वो केवल एक पूर्वाग्रह पर बात कहते हैं न कि सारे तथ्यों को देखने के बाद।


~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या इंसान अंतरिक्ष के पार जा सकता है।

एक प्रश्न आया कि कुरान गलत साबित हो गई क्योंकि कुरान 55:33 मे कहा गया है कि मनुष्य और जिन्न बिना अधिकार शक्ति के अंतरिक्ष मे नहीं जा सकता पर आज दर्जनों लोग बिना अल्लाह की अनुमति के अंतरिक्ष मे जा चुके हैं।

जिस आयत  पर प्रश्न किया गया है, वास्तव मे वहाँ ये लिखा है कि 
"बिना अधिकार शक्ति" कोई मनुष्य या जिन्न आकाश की सीमाओं को पार नहीं कर सकता... "
मुझे नहीं पता था कि ये सवाल भी पूछा जा सकता है .. और इस बात के आधार पर भी कुरान की विश्वसनीयता पर कोई संदेह व्यक्त कर सकता है क्योंकि कुरान तो पहले ही कई स्थानों पर स्पष्ट तौर से कहता है कि मनुष्यों से पहले ही कुछ प्राणी आयतरिक्ष की सैर किया करते हैं परंतु आकाश की सीमाओं को पार नहीं कर पाते , ये प्राणी वो ही जिन्न हैं जिनका आकाश की सीमा पार करना कुरान 55:33 मे मनुष्य के साथ ही प्रतिबंधित किया गया है 

"हमने आकाश मे बुर्ज (तारा समूह) बनाए, और देखने वालों के लिए उसे सुसज्जित किया, और हर फिटकारे हुए शैतान से उसे सुरक्षित रखा, ये बात और है कि किसी ने चोरी छिपे उसकी कुछ सुन गुन ले ली तो फिर एक प्रत्यक्ष अग्निशिखा ने भी उसका पीछा किया ।" [ पवित्र कुरान 15:16-18] 
( यही सब कुरान 7:6-10 मे भी लिखा हुआ है )

और सूरह जिन्न 72:8 मे लिखा है कि "(जिन्नात ने कहा) और ये कि हमने आकाश को टटोला तो उसे सख्त पहरेदारों और उल्काओं से भरा हुआ पाया" 

आप चाहे जिन्न के अस्तित्व को मानते हों या इसे कोरा अंधविश्वास ही मानें, पर आपको ये तो मानना ही पड़ेगा कि कुरान पाक के अनुसार अंतरिक्ष मे तारा मण्डल के पास तक किसी प्राणी के जा सकने पर ईश्वर ने रोक नहीं लगाई.. रोक उस के पार जाने के प्रयास पर लगाई गई है , यानी आकाश की जिन सीमाओं की बात पवित्र कुरान मे कही गई है वो सीमा तारा समूह के आगे कहीं है ।
सो ये अनुमान लगाना कि मनुष्य का अंतरिक्ष मे जाना ईश्वर की अनिच्छा से होगा, सही नहीं है ... यदि आज मनुष्य अंतरिक्ष मे पहुंच सका है तो केवल इस कारण कि ईश्वर ने उसे वहाँ पहुंचने दिया ... और मनुष्य अंतरिक्ष मे जितनी भी दूर तक गया है वो आकाश की सीमाओं के अन्दर ही रहा है , उस सीमा को पार नहीं कर सका है 

आप इन आयतों को लेकर कुरान को गलत साबित न करने की कोशिश करते अगर आपने इसके आगे की दो आयतों पर भी नजर डाल ली होती क्योंकि वहाँ अल्लाह ने इस बात की भविष्यवाणी कर रखी है कि जिन्न की तरह ही मनुष्य भी अंतरिक्ष की सैर एक निश्चित सीमा के अंदर कर सकता है ... सूरह रहमान की 35 वीं आयत पढ़िए, वहाँ लिखा है कि "(जो जिन्न और मनुष्य आकाश की सीमा पार करने जाएगा ) तुम दोनों पर आग की ज्वालाएं और दहकता धुआं छोड़ दिए जाएंगे फिर तुम मुकाबला न कर सकोगे ।"
........... स्पष्ट है कि आकाश की सीमा के करीब (तारों के समीप) तो मनुष्य तभी पहुंच पाएगा जब वो ऊपर उड़ कर अपने सौर मण्डल से बाहर निकलेगा ... और कुरान 55:35 ने मनुष्य के लिए इस सम्भावना की घोषणा की है , जबकि आज से 1400 वर्ष पहले अंतरिक्ष यान तो क्या , किसी मनुष्य ने वायुयान तक की कल्पना न की थी ॥

( जब कुरान की आयत 55:33 को पढ़ता हूँ, तो मुझे इस बात की सम्भावना भी दिखती है कि जहाँ तक जिन्न और मनुष्य के जाने पर ईश्वर ने रोक लगाई हुई है, मनुष्य उस सीमा से भी आगे जा सकता है, और इसके बावजूद कुरान की आयत गलत न सिद्ध होगी .... गौर कीजिए यदि आयत मे स्पष्ट रूप से ये लिखा होता कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी प्राणी आकाश की सीमाओं को कभी पार नहीं कर सकता, तब तो वाकई आकाश मे मनुष्य के जाने पर कुरान का वाक्य गलत सिद्ध होता पर क्योंकि आयत मे स्पष्ट लिखा है कि "बिना अधिकार शक्ति" कोई मनुष्य या जिन्न आकाश की सीमाओं को पार नहीं कर सकता... यानी एक कंडीशन मे मनुष्य व जिन्न आकाश की सीमाओं को पार कर सकते हैं , यदि अल्लाह उन्हें "अधिकार शक्ति" दे दे..... और आयत मे अधिकार शक्ति की शर्त लगाकर इस बात की सम्भावना भी अल्लाह ने मनुष्य के लिए बना दी है )

~ ज़िया इम्तियाज़।
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चांद के दो टुकड़े।

बहुत समय से गैर मुस्लिम भाईयों को मुस्लिमों के इस विश्वास का मजाक उडाते देख रहा हूँ कि नबी स. ने चांद के दो टुकड़े कर दिए थे ..
ये लोग कहते हैं कि मुसलमान बार बार इस्लाम धर्म को विज्ञान पर खरा उतरने वाला धर्म बताते हैं, पर इस्लाम मे वर्णित चांद के तोड़ने और नबी के द्वारा बिना किसी विमान के आकाश की सैर जैसी इन अवैज्ञानिक बातों के जरिए इस्लाम भी झूठ और अंधविश्वास ही फैलाता है ....

पहली बात तो मै इन भाईयों से यही कहून्गा कि इस्लाम को फैलाने के लिए के लिए अल्लाह और रसूल स. ने चमत्कार दिखाने का सहारा नही लिया बल्कि इस्लाम फैला अपने उच्च नैतिक नियमों के कारण .... लेकिन आप कुरान और हदीस पढ़ेन्गे तो पाएंगे कि नबी स. का चमत्कार न दिखाना भी कुफ्फार की नजरों मे नबी स. के झूठे होने का प्रमाण था और ये कुफ्फार लोगों को ये कह कहकर भड़काया करते थे कि ये कैसा नबी है जो साधारण आदमियों की तरह बाजारों मे घूमता फिरता है, यदि ये वास्तव मे नबी होता तो अल्लाह ने इसके साथ एक फरिश्ता रखा होता और ये चमत्कार दिखाता होता 
इस कारण , कुछ एक चमत्कार जो अल्लाह के हुक्म से नबी सल्ल. ने दिखाए, वे एक तो इसलिए ताकि कुफ्फार के आरोपों को झुठलाया जा सके,
और दूसरा कारण ये कि वे गैर मुस्लिम जो चमत्कार को ही ईश्वर की निशानी मानते थे और सम्मोहन करने वाले जादूगरो के जादू के कारण ही उन्हें ईश्वर का साथी मानने लगे थे , वे लोग भी अल्लाह के द्वारा किए गए सच्चे चमत्कार को देखकर ये जान लें कि मोहम्मद सल्ल. को ईश्वर का सच्चा साथ प्राप्त है ... 

चांद के दो टुकड़े करने के लिए भी कुफ्फारे मक्का ने प्यारे नबी स. को बहुत उकसाया और ये वादे किए कि अगर मोहम्मद स. सच्चे हैं और सचमुच अल्लाह के रसूल हैं, तो वे चांद को तोड़कर दिखा दें, फिर हम इनका नबी होना तस्लीम कर लेंगे और मुसलमान हो जाएंगे ....

अल्लाह और उसका नबी जानते थे कि कुफ्फार के ये दावे और वादे सिर्फ नबी स. को झूठा साबित करने की नीयत से किए गए हैं, इस्लाम कुबूल करने की नीयत से नहीं .... लेकिन यहाँ नबी स. की सच्चाई को दांव पर लगाया गया था सो अल्लाह की मर्ज़ी से नबी स. ने चांद के दो टुकड़े कर के अपनी सच्चाई का सबूत भी कुफ्फार को दिया, और कुफ्फार का ये झूठ भी दुनिया के सामने ले आए कि चांद के टूटते ही वो मोहम्मद स. का नबी होना तस्लीम कर के ईमान ले आएंगे .... कुफ्फारे मक्का चांद के तोड़े जाने को जादू कहकर इस सच से इनकार करने लगे,और न नबी स. को उन्होंने नबी तस्लीम किया, न मुसलमानों को यातनाएँ देनी बंद कीं...

बहरहाल ... चांद के दो टुकड़े होने का ये वाकया सच्चा था ये हम आज भी पूरे दावे से कहते हैं ... नबी स. द्वारा चन्द्रमा के तोड़े जाने की इस घटना ने कई वैज्ञानिक तथ्यों को भी स्पष्ट कर दिया जिनकी पुष्टि आज भी अंतरिक्ष विज्ञानी करते हैं 

1- चांद को देखकर दुनिया मे पहले की आबादियां उसे एक ठण्डी रौशनी का पुन्ज समझती थीं जैसे सूरज एक गर्म प्रकाश पुंज है, और रौशनी को न छुआ जा सकता है न ही तोड़ा जा सकता है , इस्लाम से पहले चांद को कोई भी व्यक्ति ऐसी ठोस वस्तु नहीं मानता था जिसे स्पर्श किया जा सकता हो .... ये खयाल बीसवीं शताब्दी तक लोगों मे बना रहा जब तक नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर उतर कर ये साबित न किया कि चांद मिट्टी और चट्टानों से बना एक विशाल उपग्रह है ... लेकिन चांद के तोड़े जाने के वाकये से इस्लाम ने 1400 साल पहले ही ये सिद्ध कर दिया कि चांद एक ठोस आकाशीय संरचना है ...

2- पूरी दुनिया के लोगों मे चांद को देवता या दैवीय शक्ति आदि मानने का भी चलन था इस्लाम से पूर्व ... लेकिन चांद को तोड़कर नबी स. ने ये सिद्ध किया कि चांद एक ठोस निर्जीव आकाशीय पिण्ड से अधिक कुछ नहीं और उसमें कोई दैवीय शक्ति नहीं, और न ही वो कोई देवता है.... दुनिया भर के अनेक गैर मुस्लिम अब तक चांद मे दैवीय शक्तियों का वास समझते थे, लेकिन अपने इतिहास से लेकर आज तक मुस्लिमों ने ऐसा अंधविश्वास चांद के विषय मे कभी नहीं रखा ॥

3- चांद के तोड़ने के मुस्लिमो के इस दावे ने इस सम्भावना को भी दुनिया के सामने रखा कि यदि 1400 वर्ष पहले चांद को तोड़कर जोड़ा गया था, तो इस बात के चिन्ह आज भी चांद की सतह पर मिलने चाहिए,
आज हमारे पास NASA द्वारा लिये गये चांद की सतह के कुछ चित्र हैं, जिनमें चांद की सतह पर एक विशाल दरार दिखाई पड़ रही है .... जैसे किसी टूटी हुई चीज़ दोबारा जोड़कर रखने पर बन जाती है ..... मैं जानता हूँ कि विरोधी इस दरार के चन्द्रमा की सतह पर होने के भी अलग अलग कयास निकालेंगे पर चांद के टूटने की बात नहीं मानेंगे... पर इस्लाम मे चांद के टूटने के विश्वास का मजाक ये लोग तब उड़ा सकते थे जब चांद पर ऐसी कोई दरार न मिली होती ..... इस दरार के पाये जाने के बावजूद यदि लोग चांद के टूटने की सम्भावना पर विचार न करें तो इसे उन लोगों के पूर्वाग्रह का ही परिणाम कहा जाएगा... 

बहरहाल जो लोग चांद के टूटने को इस्लाम का अंधविश्वास साबित करना चाहते हैं, वे अपनी इस बात कि चांद कभी नहीं टूटा था को सिद्ध करने का कोई प्रमाण नहीं दे सकते .... लेकिन चांद टूटा था इस बात का एक बड़ा प्रमाण मुस्लिमों के पास अवश्य है !!


~ ज़िया इम्तियाज़।
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