Tuesday, 11 August 2020

काबा मूर्तिस्थल। हजरे अस्वद।

काबा मूर्तिस्थल।

काबा के विषय में हमारे कुछ भाइयों को बड़ी पीड़ा है कि काबा मूल रूप से एक मूर्ति स्थल था, जिस पर पैग़म्बर मोहम्मद (सल्ल०) ने एक दिन जबरन अधिकार कर के काबा के भीतर की मूर्तियों को ध्वस्त कर डाला.... इन भाइयों के हिसाब से काबा के भीतर जमाई गई मूर्तियों को वहां से हटाना अन्याय और अत्याचार था क्योंकि काबा में हमेशा से मूर्तियां थीं और काबा के किसी निराकार ईश्वर के उपासना स्थल होने का जो दावा पैग़म्बर (सल्ल०) ने किया था वो केवल अनुमान या झूठ पर आधारित था !!!
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..... हम कहते हैं कि काबा को मूलतः मूर्तिस्थल मानना दरअसल हमारे इन भाइयों का पूर्वाग्रह है... क्योंकि उस समय के इतिहास और क़ुरआन के प्रमाणों से सिद्ध होता है कि क़ाबा अदृश्य ईश्वर, सर्वशक्तिमान अल्लाह का उपासना स्थल था इस बात को वहां के मूर्तिपूजक भी स्वीकारते थे, .... 
.... ये बात सबसे पहले पता चलती है कि नबी सल्ल० के जन्म से भी पूर्व क़ाबा शरीफ़ पर अब्रहा के आक्रमण की घटना से, जब अब्रहा भारी लश्कर लेकर क़ाबा को ध्वस्त करने आगे बढ़ा, और मक्का के नगरवासी बेहद चिंतित हो कर क़ुरैश के सरदार हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पास पहुँचे तो अब्दुल मुत्तलिब ने नगरवासियों से ये कहा कि हम अपने सामान की रक्षा करें और काबा अल्लाह का घर है, तो अल्लाह ही इसकी रक्षा करेगा, उनकी इस बात को मानकर समस्त नगरवासी काबा को छोड़कर दूर चले गए थे, इस बात से सिद्ध होता है कि मक्का के लोग पैग़म्बर मोहम्मद सल्ल० के जन्म से पहले से क़ाबा को अल्लाह का ही उपासना स्थल मानते थे और अल्लाह को सर्वोच्च ईश्वर भी स्वीकारते थे, इसी बात पर विश्वास के कारण वो क़ाबा को छोड़कर दूर चले गए, व उन्होंने अब्रहा के लश्कर को आश्चर्यजनक रूप से तहस नहस होते भी देखा, जिसने उन लोगों का अल्लाह की शक्ति पर और विश्वास बनाया.... इसी विश्वास के कारण मक्कावासी अल्लाह के विरुद्ध कभी अपमानजनक बातें नहीं करते थे जब अब्रहा वाली घटना के चालीस वर्ष बाद नबी सल्ल० उन्हें केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाने लगे थे, बल्कि तब अल्लाह की बजाए मक्कावासी हज़रत मोहम्मद सल्ल० के लिए अपमानजनक बातें किया करते थे....
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सूरह अकंबूत (सूरह-29) में आयत 61 से 65 तक ये प्रमाण मिलते हैं कि मक्का के मूर्तिपूजक इस बात को मानते थे कि संसार की रचना करने वाला, ज़िन्दगी और मौत देने वाला अल्लाह ही है, और मनुष्यों की सुरक्षा भी अल्लाह ही करता है .... पर अन्य सांसारिक लाभों के लालच में वो शिर्क किया करते थे.... मक्का के मूर्तिपूजकों को मुश्रिक कहा गया है, मुश्रिक का अर्थ होता है ऐसा विश्वास करने वाले लोग जो अल्लाह पर रब होने का विश्वास करने के साथ ही अन्य देवी देवताओं को भी अपना संरक्षक मानते हों.. अर्थात मक्का वासी मूर्तिपूजक होने के साथ साथ अल्लाह में भी विश्वास रखते थे
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..... फिर सूरह जुमर की तीसरी आयत (39:3) में पता चलता है कि मक्का के मूर्तिपूजक कहा करते थे कि हम तो इन मूर्तियों को इसलिए पूजते ताकि ये हमें अल्लाह से क़रीब कर दें.... यानी इनके मन में ये भावना थी कि अल्लाह ही सुप्रीम गॉड है, वो महान है उसकी बन्दगी करनी चाहिए, और बन्दे को अल्लाह के ही करीब होना चाहिए, .... "हम असल में तो अल्लाह को ही महान ईश्वर मानते हैं" मक्का के मूर्तिपूजकों की ये स्वीकारोक्ति ये भी साबित करती है कि वो अंदर से एक अपराधबोध में भी थे कि हमने अल्लाह के उपासना स्थल में अनाधिकृत रूप से अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां रखीं हुई हैं, .... इसी कारण वो मूर्तिपूजक अपनी मूर्तियों को न्यायोचित ठहराने के लिए तर्क दिया करते थे !!
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..... सूरह नजम 53 में आयत 18-22 तक में मालूम चलता है कि मक्का में जिन देवियों, लात, मनात व उज़्ज़ा को पूजा जाता था, उन देवियों के भक्त उन देवियों को अल्लाह की बेटियां माना करते थे, यानी सुप्रीम अल्लाह को ही माना करते थे, और अन्य देवी देवताओं को दर्जे में अल्लाह से छोटे माना जाता था....!!!
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..... फिर ये भी ज़िक्र मिलता है कि नबी सल्ल० से पूर्व काबे में मरियम अस०, हज़रत ईसा और हज़रत इब्राहीम के चित्र भी मौजूद थे, जिससे तत्कालीन मक्कावासियों के इस विश्वास का भी पता चलता है कि वे भी मानते थे कि काबे को नबी इब्राहीम अ.स. ने बनाया था....!!!
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.... इन सभी प्रमाणों से ये स्पष्ट मान्यता पता चलती है कि मक्का के मूर्तिपूजकों के अनुसार भी अल्लाह के उपासना स्थल काबे मे अनाधिकृत रूप से बुत जमाए गए थे, ..... हमें पता चलता है कि वास्तव में मूल रूप में काबा एक अल्लाह की मस्जिद थी इसलिए न्यायसंगत ही था कि वहाँ से मूर्तियों को निकाल दिया जाता !!
... फिर क़ाबा की मूर्तियों को तोड़ने वाले तमाम वो ही लोग थे जो पहले उन मूर्तियों को पूजते थे, और जब उन मूर्तियों से उनकी आस्था हट गई थी तो उन्होंने उन मूर्तियों को अपनी एकेश्वरवादी आस्था के स्थल से हटा दिया... इस घटना से कुछ समय पूर्व क़ाबा के संरक्षक अबु सुफ़यान ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया था... फ़तह मक्का के दिन क़ाबा के पास कोई भी संघर्ष नही हुआ, इससे हमें ये भी इशारा मिलता है कि काबे से मूर्तियों को हटा दिए जाने की न्यायोचितता पर उन लोगों को भी अब कोई संदेह नहीं रहा था जिन्होंने अब तक इस्लाम स्वीकार भी नहीं किया था, अल्लाह के सर्वशक्तिमान ईश्वर होने में ये पहले से आस्था रखते थे, अन्य देवी देवताओं का दर्जा अल्लाह से छोटा मानते थे, इसलिये क़ाबा से मूर्तियां हटा दिये जाना उन्हें उतना गम्भीर नही लगा जितना गम्भीर पुष्यमित्र शुंग द्वारा भारत में हज़ारों बौद्ध स्तूपों को तोड़ दिया जाना बौध्दों को लगा था, .... यदि मेरे भाई को क़ाबा की इमारत में अनाधिकृत रुप से रखी गई मूर्तियों के हटाने पर तो पीड़ा हो, पर वे पुष्यमित्र शुंग के कार्यों पर मौन धारण करें तो इसके अलावा क्या समझें कि भाई अपने पक्ष के पापों को दूसरों पर थोप कर के खुद के निर्दोष होने का भ्रम बनाना चाहते हैं  !!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

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हजरे अस्वद।

... अक्सर कुछ दिग्भ्रमित हिंदू भाई हमें ये कहते मिल जाते हैं, कि मक्का मदीना मे मुस्लिमों ने भगवान शिव को कैद कर के रखा है,और काबा शरीफ की दीवार पर लगे जिस काले पत्थर को मुस्लिम हजरे अस्वद कहते हैं वो पत्थर वास्तव मे शिवलिंग है जिसकी ये मुस्लिम पूजा करते हैं ।

..... अपने भोले हिंदू भाईयों का ये तर्क सुनकर मै चकित रह जाता हूँ, कि भला त्रिकालव्यापी सर्वशक्तिमान ईश्वर को कोई व्यक्ति कहीं बंधक बनाकर कैसे रख सकता है ....??? .. क्या आप सोच सकते हैं कि भगवान इतना शक्तिहीन होगा कि 1400 वर्षों मे भी खुद को बंधक बनाने वाले अधर्मियों की कैद से मुक्त नही करा पाया ??

.............. खैर, 
... मै समझता हूँ कि हजरे अस्वद का सही परिचय और स्पष्ट इतिहास न जानने के कारण मेरे हिन्दू भाईयों को ये भ्रम हो गया है कि काबा शरीफ मे लगा हजरे अस्वद किसी प्रकार शिव जी से सम्बन्धित है .....तो भाईयों मैं आपका भ्रम दूर करना चाहूँगा
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...हजरे अस्वद काबा के दक्षिणी कोने में लगा एक काला पत्थर है जो ज़मीन से डेढ़ मीटर की उंचाई पर काबा की दीवार में लगाया गया है. हजरे अस्वद , जन्नत से आया हुआ पत्थर है जो कि काबा का तवाफ़ (परिक्रमा) करने वालों के लिए एक निशानी है और वोह यहीं से अपना तवाफ़ आरम्भ करते हैं तथा यहीं पर समाप्त करते हैं, ताकि तवाफ की गिनती बिना किसी कन्फ्यूजन के सही सही पूरी की जा सकें.... हजरे अस्वद काबा शरीफ मे कब और किस प्रकार आया इस विषय ये रिवायत है , कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम जब काबा का निर्माण कर रहे थे तथा पत्थर जोड़ते जोड़ते एक कोने तक पहुंचे जहां उपयुक्त पत्थर लगाने के लिए उन्होंने अपने पुत्र इस्माइल अलैहिस्सलाम जो निर्माण में उनकी सहायता कर रहे थे एवं पत्थर ढो कर ला रहे थे, से कहा कि एक ऐसा पत्थर लाओ जिसे मैं इस स्थान पर लगा दूं, अतः इस्माइल अलैहिस्सलाम पत्थर लाने गए.... जब वापस आये तो देखा कि एक पत्थर उस स्थान पर पहले से लगा मौजूद है,  तो हजरत इस्माईल ने पूछा : अब्बा यह पत्थर कहाँ से आया ? इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया कि ये पत्थर जिब्रील अलैहिस्सलाम ने लाकर दिया है....
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.... क्योंकि दुनिया मे अपने आगमन से लेकर आज तक हजरे अस्वद लगातार काबा शरीफ़ की पवित्र दीवार मे लगा हुआ है, इसलिए इस पत्थर को कभी शिवलिंग के रूप मे पूजे जाने की सम्भावना क्षीण है... हज के दौरान जब मुसलमान काबा शरीफ के सात चक्कर लगाते हैं, तो परिक्रमा इसी हजरे अस्वद से शुरू होती है, और काबे के चारों ओर घूम कर वापस इसी पत्थर के सामने पहुंच कर एक परिक्रमा पूरी होती है ...प्रत्येक बार इस पत्थर के सम्मुख पहुंच कर हाजी इस पत्थर को चूमते हैं, इस कारण गैर मुस्लिमों को ये भ्रम होता है कि मुस्लिम उस काले पत्थर की पूजा करते हैं.... लेकिन ऐसा नही है, पूजा का अर्थ है किसी वस्तु को ईश्वर मानकर या किसी वस्तु को हमारी इच्छापूर्ति करने वाली दैवीय शक्तियों से युक्त मानकर उसके साथ कोई कर्मकाण्ड करना, लेकिन मुस्लिम न तो हजरे अस्वद को ईश्वर मानते हैं, न ही उसे इच्छापूर्ति करने वाली दैवीय शक्तियों से युक्त ही मानते हैं 

..... बल्कि हजरे अस्वद को चूमते वक्त मुस्लिमों के ध्यान मे हजरत उमर बिन खत्ताब रज़ि. का ये बयान हमेशा रहता है जो उन्होंने हजरे अस्वद को चूमते वक्त फरमाया था कि," मैं जानता हूँ कि तू केवल एक पत्थर है न तू मुझे कुछ नफा पहुंचा सकता है और न ही हानि अगर मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तुझे चुमते हुए न देखा होता तो तुझे नहीं चूमता" इस कौल की व्याख्या करते हुए इमाम तबरी फरमाते हैं कि : " हजरत उमर रज़ि. ने ऐसा इसलिए कहा है, क्योंकि उस समय अरब के लोगों ने कुछ ही दिनों पहले बुतों कि पूजा को छोड़ा था इस कारण हजरत उमर रज़ि. ने सोचा कि कहीं यह लोग ये न समझने लगें कि पत्थर को चूमना उसकी पूजा करना है जैसा कि इस्लाम में दीक्षित होने से पूर्व अरब के लोग किया करते थे इसलिए हजरत उमर ने लोगों को यह बताया कि हजरे अस्वद का चूमना केवल अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कार्यों का अनुसरण करना है, और हजरे अस्वद को इसलिए नहीं चूमा जाता कि उसके अन्दर हमें कोई लाभ पहुंचाने अथवा कोई हानि पहुंचाने की कोई शक्ति है...

..... तो ये स्पष्ट है कि हजरे अस्वद को चूमना उसकी पूजा करना भी नही है, जैसा कि हमारे कुछ भाईयों को भ्रम हुआ था ॥


~ ज़िया इम्तियाज़।


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