Wednesday, 5 August 2020

गिरगिट को मारना।

क्या गिरगिट को मारने का हुकुम है।

एक भाई ने गिरगिट का फोटो दिखा के मुझसे पूछा है कि इस्लाम का इस बेजुबान जीव ने क्या बिगाड़ा है जो इस्लाम इसकी हत्या करने की शिक्षा मुस्लिमो को देता है ?

पहले तो मैं भाई की ये गलतफहमी दूर करना चाहता हूँ, कि नबी स. ने गिरगिट जो कि अहितकर और विषहीन सरीसर्प ( reptile ) है, को मारने का हुक्म दिया था.... नहीं भाई ऐसा नहीं है, नबी स. ने गिरगिट या छिपकली आदि को मारने का आदेश नहीं दिया । 

बल्कि एक विषैले रेगिस्तानी उभयचर जीव सैलामैन्डर "Salamander" जो कि छिपकली या गिरगिट की तरह दिखता है पर ये सरीसर्प नहीं है, इसे मारने की बात कुछ हदीस मे है, 

छिपकली आदि को अरबी मे "अल-ज़ब्बा" कहा जाता है जबकि जबकि इस उभयचर सैलामैन्डर को अरबी में "अल-वज़क" कहा जाता है, और यही शब्द हदीस मे है

.... इस जीव वज़क या सैलामैंडर को मारने की बात कुछ हदीसों में क्यों आई है, उसका एक स्पष्ट कारण भी है..... सैलामैंडर की कुछ प्रजातियों की त्वचा पर "टेट्रोडोटॉक्सिन" ( tetrodotoxin ) नाम का तेज जहर पाया जाता है, जो मनुष्यों की जान के लिए खतरनाक है, तो जो जीव मनुष्यों की जान के लिए खतरा बनने की स्थिति पैदा करता हो, उस जीव को आत्मरक्षा में मारना गलत तो नही है न ??

...... लेकिन क्या इस जीव को हमेशा बिना किसी डर के भी यूं ही मार देना चाहिए ??
....इस बात पर कोई भी निर्णय लेने से पूर्व हमें मां आयशा रज़ि. से सम्बन्धित हदीसो का भी अध्ययन करना चाहिए जिनमें आप रज़ि. फरमाती हैं कि नबी स. ने सैलामैन्डर जीव का जिक्र मेरे सामने करते हुए बताया कि वो एक बुरा जीव है, जो गलत काम करता है, पर मैने नबी स. को इसे मारने का हुक्म देते नहीं सुना
( सहीह बुखारी, किताब-29, नम्बर-57 , और किताब-54, नम्बर-525 ) 

सिद्ध होता है कि सैलामैन्डर को मारने की शिक्षा न तो धार्मिक थी न ही अनिवार्य या पुण्यकारी... क्योंकि यदि सैलामैन्डर को मारना एक अनिवार्य धार्मिक कार्य होता तो सदा नबी स. के साथ रहने वाली, और धार्मिक ज्ञान लेने मे बढ़ चढ़ के रुचि लेने वाली अपनी प्रिय पत्नी, हजरत आएशा सिद्दीका रज़ि. को नबी स. इस धार्मिक ज्ञान से कतई वंचित न रखते.... पर सैलामैन्डर को मारने की बात मां आएशा रज़ि. को न मालूम होने से ये स्पष्ट होता है कि सैलामैन्डर को मारना अनिवार्य नहीं ..... 

हां यदि ये जहरीला जीव आक्रामक दिखे , या घर मे ऐसी जगहों पर चलता फिरता दिखे जहाँ किसी परिवार के सदस्य को इसके द्वारा काटे जाने कि भय हो, तो इस जीव को मार देना ही ठीक है !!

~Zia Imtiyaz

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सलेमेंडर

उम्मे शरीक रिवायत करती हैं कि नबी सल्ल० ने उनसे सैलामैंडर को मार देने की बात कही, और आप सल्ल० ने ये भी फ़रमाया कि इस जीव ने हज़रत इब्राहीम की आग को फूंका था..." (बुख़ारी, किताब-54, हदीस-526 और बुख़ारी, किताब-55, हदीस-579)
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.... इस हदीस के शब्दों से अक्सर लोग ये गलत अर्थ लेते हैं कि सैलामैंडर ने हज़रत इब्राहीम की आग को भड़का कर गुनाह किया था, उस गुनाह की सज़ा के तौर पर इस जीव को मारना चाहिये... हालांकि हदीस में कहीं ऐसे शब्द नही हैं कि सैलामैंडर के गुनाह की सज़ा के तौर पर उसको मारो, 
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.... देखिए, बहुत सीधी सी बात है कि अल्लाह ने पाप और पुण्य कर सकने की क्षमता इस दुनिया में केवल इंसान को दी है ऐसा क़ुरआन में अहद ए अलस्त से सम्बंधित आयतों से साफ पता चलता है, कि पाप और पुण्य केवल और केवल इंसान कर सकता है, शेष जीव जगत ने इस परीक्षा को स्वीकारने से इनकार कर दिया था.... !! 

.... दूसरी बात, अगर एकबारगी मान लें कि किसी एक जीव में कभी अचानक से पापशक्ति पैदा हो गई थी और उसने चार हज़ार साल पहले कोई पाप किया, फिर वो जीव तो मर खप गया, उसके वंश में जो जीव पैदा हुए वो उसके पाप के भागी तो हो नही सकते क्योंकि क़ुरआन में स्पष्ट लिखा है कि कोई शय किसी का बोझ नही उठाएगी यानी किसी भी एक जीव को किसी दूसरे जीव के किये पाप का दोषी नही ठहराया जा सकता...

.... तो फिर नबी सल्ल० अपने से ढाई हजार साल पहले किसी जीव द्वारा किए पाप की सज़ा उसके वंशजों को देने की बात कैसे कह सकते हैं ??
...स्पष्ट है कि उपरोक्त हदीस को अक्सर जिस रूप में ले लिया जाता है वो  साफ़तौर पर क़ुरआन पाक के खिलाफ जाती हुई बात है, .... मतलब साफ है कि इस हदीस को सही रूप में समझा नही जा रहा,
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.... उपरोक्त हदीस में दो अलग अलग बातें कही गई हैं, एक तो नबी सल्ल० ने सैलामैंडर को मारने का हुक्म (सही शब्द का चुनाव किया जाए तो वो हुक्म की बजाय सलाह है) दिया है, और दूसरी बात नबी सल्ल० ने फ़रमाई है कि हज़रत इब्राहीम के लिये जो आग जलाई गई थी उसको  सैलामैंडर ने फूंका था, यानी भड़काया था" .... हदीस में बताई इन दोनों बातों में आपसी सम्बन्ध जोड़ने वाला शब्द नही है...  निश्चित ही एक आपसी सम्बन्ध है, जिसे लोगों के अज़्यूम करने पर छोड़ दिया गया है, ..... पर इस हदीस पर लोग जो अज़्यूम करते हैं देखने में आ रहा है कि वो क़ुरआन के हिसाब से गलत साबित हो रहा है, क़ुरआन के कानून के खिलाफ साबित हो रहा है
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... तो फिर ज़ाहिर है इन दोनों बातों का कुछ और आपसी सम्बन्ध अज़्यूम करना होगा जो क़ुरआन के हिसाब से ठीक हो
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आइये वास्तविक तथ्यों से सही बात को समझने का प्रयास करें और पहले सैलामैंडर के बारे में कुछ जान लें, सैलामैंडर की कुछ प्रजातियां सड़ी लकड़ियों में बैठती हैं, प्राचीनकाल में जब मनुष्य लकड़ियां इकट्ठी कर के जलाया करता था, तब उसमें से सैलामैंडर निकल कर भागते थे, जिसे देखकर ये मिथ भी बड़े पैमाने पर फैल गया था कि सैलामैंडर आग से जन्मने वाला जीव है, बहरहाल जब ये जीव जलती आग से निकलकर भागता, तो अपनी पीठ पर राख व चिंगारीयां ले कर उन हिस्सों में भी आग फैला सकता था जहां आग न लगी हो, हज़रत इब्राहीम के लिये नमरूद ने जो बहुत सारी लकड़ियों को इकट्ठा कर के आग जलवाई थी हो सकता है कि उन लकड़ियों से भी सैलामैंडर निकल कर भागे हों, और उन्होंने आग का घेराव बढ़ा दिया हो, ... और उम्मे शरीक के घर में जब आप सल्ल० ने जलावन की लकड़ियों में छिपे सैलामैंडर को देखा हो तो कहीं वो उनके घर में आग लगाने का कारण न बन जाये इसलिये आप सल्ल० ने सुरक्षा की दृष्टि से उसे मारने के लिए कहा हो साथ ही ये बताया हो कि किस तरह सैलामैंडर ने हज़रत इब्राहीम के लिये लगाई गई आग को और विकराल बना दिया था, इसलिये आग के खतरे से बचने के लिए इसे मार डालो.... 

.... एक अन्य  हदीस भी सुनी जाती है कि सैलामैंडर को एक वार में मार दो तो इतना सवाब और दो वार में मार पाओ तो उतना... उधर अन्य कई स्थापित हदीसों में  ये शिक्षा नबी सल्ल० ने दी है कि समस्त जीवजगत के साथ नेकी करने पर सवाब मिलता है और अकारण किसी जीव की हत्या करने पर पाप होता है, 
एक हदीस का विशेषकर ज़िक्र करना चाहूंगा जिसमे बताया गया है कि एक महिला जिसने एक बिल्ली को भूखा प्यासा बंधक बनाकर मार डाला था, इस पाप के बदले अल्लाह ने उस स्त्री के लिए दोज़ख नियत कर दी थी.....

.....ऐसे में अकारण सैलामैंडर को मारने पर सवाब मिलने की बात तो पूरी तरह इस्लामी शिक्षा के खिलाफ हो जाएगी

.... केवल एक स्थिति में ही अपनी त्वचा पर भयंकर प्राणघातक विष रखने वाले और किसी स्थान पर आग भड़का सकने वाले जीव सैलामैंडर को मारने पर पुण्य मिलने की बात सही हो सकती है, जब ये जीव अन्य लोगों की जान पर खतरा बन रहा हो और दूसरों की जान बचाने के उद्देश्य से कोई व्यक्ति इस जीव को मारे, तब उसके परोपकार की भावना के कारण उसे इस जीव को मारने पर भी पुण्य मिल सकता है... प्रतीत होता है कि ऐसे ही किसी समय नबी सल्ल० ने किसी के पूछने पर बताया होगा कि दूसरों की प्राणरक्षा के लिये अगर इस जीव को मारा जाएगा तो पुण्य ही होगा, पाप नही.... संयोग से ये बात सैलामैंडर को मारने के विषय में कही गई और पुण्य मिलने का कारण सैलामैंडर को समझ लिया गया, पर ऐसा था नही।

उपरोक्त दोनों ही हदीस की बातें, स्पष्ट हैं कि केवल एक विशेष परिस्थिति के लिए कही गई थीं, ये कोई आवश्यक या बाध्यकारी धार्मिक दिशानिर्देश कतई नहीं थे क्योंकि बुख़ारी शरीफ़ में हज़रत आयशा रज़ि० की रिवायत है कि मैंने कभी नबी सल्ल० को सैलामैंडर को मारने का हुक्म देते हुए नही सुना, (बुख़ारी, किताब-29, हदीस-57 और बुख़ारी, किताब-54, हदीस-525)

....आपको ये मालूम ही होगा कि नबी सल्ल० किसी भी तरह के धार्मिक ज्ञान की बात हज़रत आयशा रज़ि० को अवश्य बताते थे, पर ये बात नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा रज़ि० को नही बताई, यानी ये धार्मिक बातें नहीं थीं, न ही ये सब तक पहुंचाई जाने लायक महत्वपूर्ण बातें थीं, . परन्तु क्योंकि ये बातें नबी सल्ल० ने कही थीं इसलिये लोगों ने इन्हें महत्वपूर्ण बात समझकर याद कर लिया था !!!

~ ज़िया इम्तियाज़।


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