Tuesday, 11 August 2020

सूरज का पानी में डूबना।

सूरज का पानी में डूबना।

कुरान पाक के खिलाफ अक्सर कुछ भाई लोग ये कहते मिल जाते हैं कि कुरान के अनुसार सूरज काले मटमैले पानी मे जा के डूबता है, अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए कई लोग कुरान पाक की ये आयत भी दिखाते हैं 

" यहाँ तक कि वह ( ज़ुलकारनैन ) उस जगह पहुंच गया ,और उसने सूरज को काले मटमैले पानी के स्रोत मे डूबते हुआ पाया"
सूरा -अल कहफ़ 18:86

लेकिन ये कोई वीर बताने की ज़हमत नहीं करता कि इस आयत के आगे और पीछे क्या लिखा है ... अगर बता दें तो उनकी पोल न खुल जाएगी 

दरअसल इन आयतों मे महान चक्रवर्ती सम्राट "ज़ुल्कारनैन" जो कि एक इन्सान ही थे, कोई देवता या नबी नही जिनके पास चमत्कारी शक्तियां हों, उनका किस्सा है और उनके विजय अभियानों का जिक्र है
ये राजा ही कई देशों को जीतते हुए जब अति पश्चिम मे गए और समुद्र के किनारे पहुंचे तो शाम का समय था, सूरज डूब रहा था, ज़ुल्कारनैन ने जैसा मंज़र उस वक्त देखा, उसी का वर्णन कुरान 18:86 मे है ॥

सूरज पानी मे डूबा, ये एक इन्सान का व्यू है जो आसमान मे उड़ कर धरती से दूर जाकर ये नहीं देख सकते थे कि सूरज कहाँ गया,
न कि यहाँ ये ज़िक्र है कि अल्लाह ने सूरज के साथ क्या किया
जिसको ये देखना है कि कुरान के अनुसार रात मे सूरज कहाँ जाता है, वो सूरह ज़ुमर की 5वीं आयत देखे जिसमे स्पष्ट तौर पर लिखा है कि अल्लाह रात को दिन पर और दिन को रात पर "लपेटता" है .... लपेटने का अर्थ है किसी चीज को ऊपर नीचे हर ओर से गोलाई मे कवर करना, यानि कुरान के अनुसार अल्लाह दुनिया पर हर ओर से सूर्य का प्रकाश डालता है, इसका अर्थ है कि जब रात मे सूरज छिप जाता है तो वो दुनिया के उल्टी तरफ के गोलार्ध पर उजाला फैला रहा होता है .. न कि समुद्र मे डूब कर उजाला फैलाना बंद कर देता है !!

और रही बात पानी के काला मटमैला होने की तो फैक्ट ये है कि समुद्र तट पर सूरज डूबते समय पानी का रंग काला और मटमैला ही दिखता है, ये आप समुद्र के किनारे जाकर देख सकते हैं, या समुद्र के छोर पर अस्त होते हुए सूरज के फोटो देख कर भी चेक कर सकते हैं...!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

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सूरज का गर्म पानी में डूबना।

अबू दाऊद शरीफ़ में हज़रत अबू ज़र रज़ि० द्वारा बयान की गई एक हदीस है जिसमे हज़रत अबू ज़र रज़ि० बयान करते हैं कि "नबी सल्ल० ने अस्त होते सूरज को देखकर मुझसे पूछा कि क्या तुम जानते हो कि ये सूरज कहाँ जाता है, मैंने कहा कि अल्लाह और उसके नबी ही इस विषय में सही बात जानते हैं, इस पर नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि सूरज जब अस्त होता है तो वो गर्म पानी के स्रोत में डूब जाता है"...

... इस हदीस का अक्सर विरोधीजन मज़ाक उड़ाया करते हैं कि ये मुस्लिमों के रसूल का विज्ञान का ज्ञान है....!!!

उत्तर: हदीस के विशेषज्ञों ने उपरोक्त हदीस के रावियों की चेन सही होने के बावजूद, इस हदीस को अप्रमाणिक माना है क्योंकि एक तो इस हदीस के एक रावी सुफ़ियान बिन हुसैन के विषय में ये सूचना मिलती है कि वे सच्चे तो थे परंतु हदीस के शब्द सही प्रकार से याद न रख पाते थे।

दूसरे, उपरोक्त हदीस, हदीस की सर्वाधिक मान्यताप्राप्त दोनों ही किताबों, बुख़ारी एवं मुस्लिम में नही है, बल्कि हज़रत अबू ज़र रज़ि० की ही इसी विषय में बयान की हुई सही सनद की एक दूसरी हदीस बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ़ में दर्ज की हुई है, जिस हदीस के शुरुवात के शब्द तो उपरोक्त हदीस के ही समान हैं, पर आगे जाकर बात कुछ और हो जाती है...

..... हदीस के विद्वानों की राय है कि ऐसा होना मुमकिन नहीं है कि एक ही व्यक्ति एक ही विषय पर दो बिलकुल अलग अलग बातें रिवायत करता हो, इसलिये इन दोनों हदीसों में जिस हदीस के रावियों की याददाश्त के विषय में भी कोई संशय नहीं है उसे स्वीकार किया जाता है, और उस हदीस में सूर्य के गर्म पानी के स्रोत में डूबने की बात नही है...
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.... बुख़ारी, मुस्लिम में अबू ज़र रज़ि० से रिवायत है कि "नबी सल्ल० ने अस्त होते सूरज को देखकर मुझसे पूछा कि क्या तुम जानते हो कि ये सूरज कहाँ जाता है, मैंने कहा कि अल्लाह और उसके नबी ही इस विषय में सही बात जानते हैं, इस पर नबी सल्ल० ने फ़रमाया "ये जाता है और "अर्श" के नीचे पहुँच जाता है और सजदा करता है, फिर ये इजाज़त मांगता है (पूरब से निकलने की) और इसे इजाज़त दी जाती है, और वो दिन भी करीब है (प्रलय का दिन) जब ये सजदा करेगा तो न क़ुबूला जाएगा और जब इजाज़त मांगेगा तो न दी जाएगी और कहा जाएगा कि जहाँ से आया था वहीँ वापस चला जा, फिर उस दिन सूरज पश्चिम ही से निकलेगा (सही बुख़ारी, किताब:-54, हदीस:- 421)
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.... मैंने विरोधियों को इस हदीस का मज़ाक उड़ाते भी देखा है कि सूरज का रात में अल्लाह के सिंहासन के नीचे जाना और सुबह निकलने के लिए इजाज़त माँगना कोई विज्ञानसम्मत बातें नही हैं... पर मैं यदि कहूँ कि इस हदीस में वाकई विज्ञानसम्मत बातें ही कही गई हैं, तो .....??
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....दरअसल इस हदीस, जिसे विद्वानों ने सही के रूप में स्वीकारा है, इस में शब्द "अर्श" का अर्थ कई अनुवादकों ने "सिंहासन" किया है, जो अनुवाद ये समझते हुए किया जाता है कि हदीस में अल्लाह के सिंहासन की बात की गई होगी.... परन्तु ये समझना चाहिए कि "अर्श" का केवल एक ही अर्थ नहीं होता....
 बल्कि इस अरबी शब्द का मूल "ऊँचाई" से है, जब अल्लाह के साथ इस शब्द अर्श का प्रयोग किया जाता है तो ये किसी भौतिक दिशा की बजाय उपमा के रूप में प्रयुक्त होता है, और ब्रह्माण्ड में अल्लाह के "सबसे ऊंचे" पद की ओर इंगित किया जाता है, 
.. क़ुरआन में शब्द अर्श का प्रयोग छत के लिये भी किया गया है, जैसा कि आप जानते हैं कि छत हमेशा ऊंचाई पर होती है (देखिये क़ुरआन 22:45 और 2:259 पर), ऊँचा उठाने के लिए भी (क़ुरआन 7:137) और ऊंचाई पर उठाने के लिए प्रयुक्त होने वाली वस्तु के लिए भी (6:141और 18:42) ... 
क्योंकि प्राचीन काल में शासकों के सिंहासन भी दरबार में सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित होते थे, अतः सिंहासन को भी उसकी ऊंचाई के कारण ही अर्श कहा जाता है और धरती से ऊंचाई पर होने के कारण ही सामान्य तौर पर आकाश को भी अर्श कहा जाता है। अब उपरोक्त हदीस में शब्द "अल्लाह का अर्श" नही  है, तो समझा जा सकता है कि यहाँ अल्लाह के स्थान की बात नही, बल्कि सूरज की भौतिक दिशा के बारे में बात की जा रही है, ... यानि यहाँ "अर्श" का अर्थ आकाश से है
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.... हदीस में ये बताया गया है कि जब सूरज अस्त हो कर हमारी आँखों से ओझल हो जाता है तो वो आकाश से कहीं और नही जाता, बल्कि अर्श यानि आकाश में ही नीचे की ओर चला जाता है, यानि धरती पर हमारे गोलार्ध के नीचे की ओर....
हदीस की इस बात से ये पता चलता है कि नबी सल्ल० जानते थे कि ज़मीन के नीचे की ओर भी आकाश है,
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....सूरज द्वारा सजदा करना और पूरब से उदय होने की इजाज़त माँगना, स्पष्ट रूप से सूरज की भौतिक स्थितियों के बारे में कोई ज्ञान देने वाली बातें नही हैं... यदि इस हदीस से कोई ऐसा अनुमान लगाता हो कि सजदा करने, या पूरब से उदित होने की इजाज़त मांगने के लिए सूरज अपनी कक्षा छोड़ कर कहीं चला जाता हो, या दिन और रात की परिक्रमाएं रुक जाती हों, तो ये उस इंसान की अपनी सोच है, क्योंकि हदीस में सूरज के अपनी कक्षा छोड़ देने या रुक जाने का पता देने वाला कोई शब्द नही आया है... बल्कि अपने स्थान पर रहते हुए और दिन रात की परिक्रमा चलते रहते हुए, सूरज आध्यात्मिक तौर पर सजदा और उदित होने की आज्ञा मांगने के काम करता है.... दरअसल इन दोनों बातों का अर्थ ये है कि ब्रह्माण्ड को गतिमान रखने का सामर्थ्य केवल अल्लाह ही के पास है...
..... और क़ुरआन विभिन्न आयतों में बताता है कि अल्लाह ब्रह्माण्ड, सूरज, चाँद आदि को निरंतर गतिमान रखता है... और सारे ग्रह उपग्रह सदा अपनी नियत कक्षाओं में ही चलते हैं...
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...तो वास्तव में सूरज के अस्त और उदय होने के विषय में जो प्रामाणिक हदीस है, उसमे विज्ञान विरुद्ध कोई बात नहीं, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से जो कहा गया है वो विज्ञानसम्मत ही सिद्ध होता है !!

~ ज़िया इम्तियाज़।


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