Monday, 10 August 2020

क्या क़ुरान में हर बात लिखी हुई है। क्या क़ुरान सुरक्षित है, क़ुरान का लेखन, क़ुरान की किताबी शक्ल, आयात संख्या, कुरान की हिफाज़त।

क्या क़ुरान में हर बात लिखी हुई है।

अल्लाह का कुरान करीम मे फरमान है कि उसने कुरान पाक मे कोई भी बात लिखने से नहीं छोड़ी है ...."सूरा -अल अनआम 6:38"

इस बात पर भी विरोधियों ने कुरान ए पाक को निशाने पर लेने की सोची ! एक जनाब ने कहा कि कुरान मे "बर्फ" का कहीं भी जिक्र नहीं आया है, और अल्लाह का कहना था कि उसने कुरान मे सब कुछ लिख डाला है ॥ फिर एक साहब ने सवाल उठाया कि अगर कुरान मे अल्लाह ने सभी कुछ लिख दिया है तो फिर इसमें भारत देश का नाम कहाँ लिखा है ??

और एक महाराज ये भी कहते पाए गए कि मुस्लिमों का अल्लाह कुरान मे हर बात लिखे जाने का दावा तो करता है मगर कुरान मे कहीं भी उसने टीवी, फ्रिज, एरोप्लेन वगैरह के नाम नहीं लिखे हैं .....

किस्सा तमाम ये कि हर कोई कुरान की बात को झूठा साबित करने की तिकड़मे लगाए पड़ा है ॥

इन सभी भोले भाईयों को मैं ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि कुरान कोई एटलस, भविष्यफल की कोई पोथी या विज्ञान पढाने वाली कोई किताब नहीं जो उपरोक्त बातों की चर्चा इस कुरान मे की जाए,  बल्कि कुरान धर्म की किताब है,  धर्म की ही इसमें चर्चा है, जिसमें केवल प्रसंगवश इतिहास, विज्ञान, खगोल और भूगोल की भी चर्चाएं की गई हैं।

और धर्म के क्षेत्र मे ही अल्लाह का ये कथन भी है कि उसने इस किताब कुरान मे ऐसी कोई बात शामिल करने से बाकी नहीं रखी जिसे मनुष्यों के लिए धर्म के रूप मे पालन करना आवश्यक था ... और वास्तव मे आप देखेंगे भी कि धार्मिक आचरण की सारी बातें कुरान मे मौजूद हैं ... इस विषय मे कोई संशय नहीं ॥

बहरहाल ...... ॥ तो देखिए पवित्र कुरान स्वयं इस सारे विश्व की हर एक बात खुद मे समाहित होने का दावा नहीं करता, इसी कारण कोई भी मुस्लिम सारा विज्ञान, सारी एटलस या सारा भविष्य कुरान मे लिखे होने का दावा नहीं कर सकता ...
हां, इस बात का दावा अवश्य हम मुस्लिम करते हैं कि कुरान मे जिस भी विषय की जो भी बात कही गई है वो बात शत प्रतिशत सही है, क्योंकि कुरान के विषय मे हमें पूर्ण विश्वास है कि कुरान मे उसी ईश्वर की वाणी है जिसने इस ब्रह्माण्ड और इसके सारे विषयों को रचा है,  तो जब रचयिता अपनी रचना के बारे मे कुछ कहेगा तो वो उसके बारे मे सब कुछ जानता होने के कारण एकदम ठीक और सटीक ही जानकारी देगा..... जैसे कि खगोल और भूगोल के बारे मे पवित्र कुरान मे काफी बार आयतें आईं हैं ... इस पर विरोधियों ने प्रश्न खड़े किए कि कुरान मे तो सूर्य को काले मटमैले दलदल मे डूबने वाला बताया गया है, और धरती को चपटी बताया गया है, लेकिन जब हमने इन आरोपों से व्यथित होकर, और इन आरोपों के उत्तर ढूंढने के लिए कुरान का अध्ययन किया तो इन सारे आरोपों को निराधार पाया और कुरान मे सूर्य तारों, चन्द्रमा और धरती के विषय मे जो भी लिखा पाया, वो पूरी तरह विज्ञानसम्मत पाया ....॥

~ ज़िया इम्तियाज़।

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क्या क़ुरान सुरक्षित है।

अक्सर एक सवाल मे मुस्लिमों को उलझाया जाता है कि अल्लाह ने कुरआन में कुरान की हिफाजत की जिम्मेवारी ली है (15:9). लेकिन हजरत आएशा एक हदीस मे बयान करती हैं कि जब नबी करीम स. का देहावसान हुआ तो हम सब उनके कफन-दफन की अफरा तफरी में थे. उस दौरान एक बकरी कुरआन की रजम और दुग्धजातता सम्बन्धी आयते, जो मेरे बिस्तर के नीचे रखी हुई थी, खा गयी". यानी अल्लाह अपने वादे को पूरा करने मे विफल रहा. यही कारण है की कुरआन में छोटे- छोटे जुर्मो की सजा मौजूद है पर व्यभिचार की सजा पत्थर मार कर मृत्युदण्ड सिरे से मौजूद नहीं. 

सबसे पहली बात तो
 मैं बताता रहता हूँ, और फिर बता रहा हूँ कि कुरान की प्रमाणिकता को मुस्लिम लोग हदीसों के आधार पर सुनिश्चित नहीं करते बल्कि हदीस की प्रमाणिकता को कुरान के आधार पर सुनिश्चित करते हैं ... और कुरान मे जब अल्लाह ने इसकी सुरक्षा का वादा कर लिया है तो इसके विपरीत जाने वाली ऐसी किसी हदीस की कोई प्रमाणिकता, कोई अर्थ नहीं रह जाता 

इसी कारण इस हदीस को अनेक विद्वानों ने अप्रमाणिक करार दिया है, इसका एक प्रमुख कारण ये बताया गया है, कि क्योंकि ये हदीस केवल अम्मी आएशा रज़ि. से रिवायत की गई है अत: ये 'खबर ए वाहिद' यानि केवल एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात है, और सभी इस्लामी धार्मिक विद्वानों का मत है कि कुरान के विरुद्ध खबर ए वाहिद मान्य नहीं है ॥
पर यदि इस हदीस को हम सहीह ही मान लें , तो भी क्या ये सिद्ध होता है कि कुरान अधूरी है  ??
हरगिज़ ऐसा कुछ सिद्ध नहीं होता ....

हमें पता है कि नबी स. के जीवनकाल मे ही लोग कुरान का पाठ करने के उद्देश्य से नबी स. पर अवतरित होने वाली कुरान की सभी आयतों का व्यक्तिगत रूप से संकलन करते थे ... जो कि इसी प्रकार सम्भव था कि नबी स. पर अवतरित होनेवाली हर आयत की अनेक प्रतिलिपियां बना ली जाएं ... 
आपको ये भी पता होगा ऐतिहासिक तथ्य ये है कि उस समय के लोगों ने लगभग सात अलग अलग प्रकार की कुरान लिख ली थीं, जो कि हज़रत उस्मान ग़नी रज़िअल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़त के दौर तक भी मौजूद थीं... तो सहज प्रश्न उठता है कि यदि अम्मी आएशा रज़ि. के यहाँ रखी कुरान की दो आयतें बकरी खा गई ... तो क्या यही बकरी कुरान की वो अनेक प्रतियां और सात प्रकार भी खा गई थी जो अन्य सहाबा के घर मे थे ... स्पष्ट है एक बकरी एक स्थान पर रखी हुई कुरान की ही दो आयतें खा जाती, तो उससे भी कुरान अधूरी नही हो सकती थी , क्योंकि उन आयतों की प्रतिलिपियां अन्य सहाबियों के पास तब भी सुरक्षित रखी हुई थीं 
पवित्र कुरान की अंतिम आयत का अवतरण नबी स. के देहावसान से तीन महीने पूर्व हुआ था वो आयत सूरह मायदा की थीं , यानि रजम और दुग्धजातता की आयतें इस से भी कुछ समय पूर्व अवतरित हुई थीं और उन आयतों की नकल बनाने के लिए सहाबा के पास पर्याप्त समय था यदि वो आयात कुरान मे शामिल की जाने वाली होती...

ये भी तथ्य है कि नबी स. के जीवनकाल से ही अनेक सहाबा ने नबी स. की सहायता से सम्पूर्ण कुरान को कंठस्थ किया था , तो क्या ये हो सकता है कि वही बकरी सहाबा की स्मृति से भी कुरान पाक की वो दो आयतें खा गई थी ?? 

पर वास्तविकता ये है कि हदीस के अनेक वृतांत कभी कुरान का हिस्सा नहीं थे बल्कि उस समय के लोगों के लिए विधान थे क्योंकि उस समय के कानून को अल्लाह ने एक झटके से नहीं बल्कि धीरे धीरे बदला ताकि नए नए इस्लाम ला रहे लोग पूर्व की आदतों से धीरे धीरे करके छुटकारा पा लें

उदारणस्वरूप शराब या मुताह सम्बन्धी विधान... शुरू मे मुताह यानी कॉन्ट्रेक्ट मैरिज की अनुमति नबी स. ने मुस्लिमों को यदि दी थी तो वह ईश्वरीय अभिप्रेरण से ही दी थी क्योंकि उस समाज के लोगों की पक्की आदतों में था कि वे शराब के आदी थे और मुताः करते थे इन आदतों को एक झटके में छोड़ देना उन लोगों के लिए बहुत कठिन था ... पर कुछ समय बाद जब लोग मानसिक तौर पर इस्लाम के नए नियमों को आत्मसात करने को तैयार हो चुके तो शराब और मुताह को इस्लाम मे नबी स. ने ईश्वरीय अभिप्रेरण से प्रतिबंधित कर दिया ... ये सभी बदलने वाले विधान हदीस मे तो बयान किए गए हैं क्योंकि हदीस एक ऐतिहासिक अभिलेख है, पर कुरान मे केवल अंतिम शब्द और सुदृढ़ आयतें ही अवतरित हुई हैं ... ताकि आने वाली तमाम नस्लो के लिए कुरान एक सुस्पष्ट हिदायत हो, और कुरान पढने वालों को उसे पढ़कर कोई दिग्भ्रम न हो ॥

नबी स. जानते थे कि रजम का विधान कुरान का अंग नहीं थे.. इसी कारण स्वयं नबी स. ने रजम से सम्बन्धित आयतों को कुरान मे लिखने से रोका ऐसा कुछ एक हदीस से सिद्ध होता है कि सहाबा ने रजम सम्बन्धी विधानों (जो सम्भवत: इन्जील की आयतें थीं, व जिनके अनुपालन की नबी सल्ल. ने उन समय के लोगों को शिक्षा दी थी) को कुरान मे लिखने की अनुमति चाही पर नबी स. ने उन्हें इस बात की इजाज़त नहीं दी ... (मुस्तदरिक़ अल हाकिम मे हदीस नम्बर 8184 पर हजरत ज़ैद बिन साबित रज़ि. की रिवायत, हाकिम ने इसे सही प्रमाणित किया है)

स्पष्ट है कि नबी सलल्लाहो अलैहि वसल्लम ही जानते थे कि कौन सी बात कुरान का अंग है और कौन सी बात नहीं, सहाबा ए किराम इस विषय मे खुद नहीं जानते थे बल्कि वो केवल नबी सल्ल. के बताए अनुसार कुरान को लिपिबद्ध करते थे...
नबी स. ने रजम सम्बन्धी विधान को कुरान मे लिखने से रोका इसका साफ अर्थ है कि रजम का विधान  यानी व्यभिचारी को पत्थर मार मार कर मृत्युदण्ड देने का विधान हर समुदाय और हर परिस्थिति के लिए न होकर केवल उस समुदाय और उस जैसी परिस्थितियों के लिए था ... जहाँ के लोग रक्तपात के आदी थे और बेहद सख्त दिल के थे जो किसी की साधारण ढंग से मृत्यु होते देखकर भी विचलित नहीं होते थे तो उनको भयाक्रान्त करने को उस समय रजम की सजा कायम रखी गई
क्योंकि इस्लाम मे हुदूद की सजाओं का एक मुख्य मकसद ये है कि उस सख्त सजा से समुदाय के व्यक्ति डर जाएं और पापकर्म से खुद को इस डर के कारण रोक लें

पर जो समुदाय ऐसे रक्तपात का आदी और सख्तदिल न हो उसमें वैवाहिक व्यभिचार, बलात्कार जैसे अपराध, जिन्हें इस्लामी विधि मे समाज मे अव्यवस्था पैदा करने वाले अपराध माना जाता है, ऐसे अपराधों के लिए किसी भी अन्य प्रकार से दण्ड दिया जा सकता है, जो कम वीभत्स लगे ... 
 धरती मे अव्यवस्था पैदा करने वाले इन अपराधों की गम्भीरता के अनुसार मृत्युदण्ड आदि के विधान कुरान 5:33 मे स्पष्ट रूप से वर्णित हैं,  जो दण्ड रजम या अन्य किसी विधि से दिया जा सकता है ॥

..इसी तरह दुग्धजात सम्बन्ध का विषय है, जैसा कि आप जानते ही हैं कि प्राचीन अरब में एक प्रचलन था कि दूसरों के बच्चों को दूध पिलाने का काम कुछ स्त्रियां व्यावसायिक तौर पर करती थीं और एक ही स्त्री कई परिवारों के बच्चों को दूध पिलाती थी... इस्लाम के अनुसार एक ही स्त्री का दूध पीने वाले दो अलग परिवारों के लड़का लड़की का सम्बन्ध आपस में सगे भाई बहन के समान होता है और आपस में इन लड़का लड़की का विवाह वर्जित होता है
... लोगों की आसानी के लिए इस विषय मे विधान धीरे धीरे बदले ऐसा अम्मी आएशा की सही मुसलिम मे वर्णित एक हदीस से ज्ञात होता है कि पहले 10 बार एक ही स्त्री का दूध पीने से अलग अलग परिवारों के लड़का और लड़की एक दूसरे के महरम हो जाते थे, फिर उस नियम को केवल पांच बार से बदल दिया गया... ये नियम धीरे धीरे इसलिए बदले गए, ताकि इस क़ानून के आने से पूर्व जो अभिभावक उन दो लड़के लड़की जिनका उनके युवा होने पर वो आपस में विवाह करवाना चाहते हों यदि वो कुछ बार उन दोनों बच्चों को एक ही स्त्री से दूध पिलवा रहे थे तो अब उनमें से एक अपने बच्चे की दाया को बदल दें ... थोड़े समय बाद इस नियम को और सीमित किया गया...
फिर इसके बाद जब इस्लामी विधान के अनुसार लोगों ने अपने को ढाल लिया तब पांच बार का नियम भी केवल एक बार ही दूध पिला देने से बदल दिया गया, ये हमें मलिक मोवत्ता किताब 30, हदीस 4 और 6 से ज्ञात होता है. हजरत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि. और अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ि० फरमाते हैं कि दुग्धजात सम्बन्ध केवल दो वर्ष से कम आयु के बालकों को और केवल एक ही बार दूध पिलाने से स्थापित हो जाता है "
स्पष्ट है कि यही अंतिम विधान है और इसी को कुरान मे सम्मिलित किया जाना था न कि 10 या 5 Suckling का विधान ।
दुग्धजात सम्बन्ध की सदैव रहने वाली ये शर्त कुरान (4:23) मे मौजूद है, कि एक मुस्लिम के लिए सभी दुग्धजात स्त्रियाँ और लड़कियां विवाह के लिए अवैध हैं !

इन सारे तथ्यों के सामने होने के बाद, ये जानने के बाद कि हर किस्म का विधान कुरान मे मौजूद है  क्या कोई ये कह सकता है कि कुरान अधूरी रह गई या सुरक्षित नही रही ??

~ ज़िया इम्तियाज़।

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क़ुरान का लेखन।

Kal ek group me ek non muslim bhai ne sawal kiya tha ki
//..Sabhi muslim ko mera salam..kya ye sach hai ki quran shareef mohmad shahab ne apne hatho se nahi likhi thi aur ye unke dehant k bad likhi gayi thi..kya ye bhi sach hai ki suruat me galat quran likhi gayi thi jisko jala diya gaya aur uske bad phir se quran likhi gayi..agar aisa sahi me hai to hum jaise log kyon is kitab ko mane jo mohhmaad shahb ne nahi likhe..kripya hindi me answer de..//

Jawab : Quran pak ko likhne ki jahan tak baat hai to bhai , Islam ke paigambar Nabi S.a.w. to Likh padh nahi sakte thy Isliye jab Aap S.a.w. par Quran ki koi ayat nazil hoti to Aap S.a.w. usy yaad kar lete thy phir jo Sahabi Aap S.a.w. ke paas hoty un sahabi ko bula kar us ayat ko un sahabi ko sunate taki us ayat ko wo sahabi jaise ka taisa likh den

Phir Jab Sahabi ayat likh lete to Aap S.a.w. us ayat ko padhwa kr sunte thy taki ayat jaisi nazil hui thi bilkul waisi he likhi jaay, usme zara sa bhi farq na paida ho

Aap S.a.w. ke zamane me sahaba ke paas alag alag Quran ki sura alag alag likhi rakhi thi... jinhe hazrat Usman razi. Ne apne daur e khilafat me sankalit karwa ke Quran ko iski maujooda shakl dilaai...

Jin Sahaba se Aap s.a.w. Quran ki ayaten likhwaya karte thy, unme se khas khas ke aam ye hain
1.Abu Bakr al-Siddeeq razi.

2.‘Umar ibn al-Khattaab razi.

3.‘Uthmaan ibn ‘Affaan razi., 

3.‘Ali ibn Abi Taalib razi. 

4.al-Zubayr ibn al-‘Awwaam razi.

5.‘Aamir ibn Fuhayrah razi.

6.‘Amr ibn al-‘Aas razi., Ubayy ibn Ka’b razi.

7.‘Abd-Allaah ibn al-Arqam razi., 

8.Thaabit ibn Qays ibn Shammaas razi.

9.Hanzalah ibn al-Rabee’ al-Usaydi razi.

10.al-Mugheerah ibn Shu’bah razi.

11. ‘Abd-Allaah ibn Rawaahah razi., Khaalid ibn al-Waleed razi.

12. Khaalid ibn Sa’eed ibn al-‘Aas razi.,

13.Mu’aawiyah ibn Abi Sufyaan razi.

Jahan tak Quran ke alag alag anek versions ko hazrat Usmaan Ghani razi. ke huqm par nasht kar dene ki baat hai to aapko bata du ki, 1400 saal pahle arab me 7 tarah ki arabi bhasha chalan me thi, jaise apne bharat me he hindi ke kai version chalan me hain jaise brij-bhasha, awadhi, bhojpuri aur khadi boli wagairah

to us zamane me logo ne 7 bhshao me quran likh liya tha jis se aage chal kar Quran me farq paida ho jane ka dar tha, isliye Quran jis bhasha "Quraishi Arabi" me originally nazil hua tha ye Quran Aap S.a.w. ki pavitr patni ummul momineen hazrat Hafsa razi. ke paas tha, to us Quran ke zariye kewal usi original bhasha me quran ko sankalit kiya gaya is baaki bhashao'n me likhe Quran nasht kar diye gaye

To bhai aapne dekha ki Quran me alag alag baate nhi likhi gai thi balki ek he baat ko logo ne alag alg bhasha me likh liya tha.....
isliye Quran me kisi baat ke kam ho jane ya badha diye jaane, ya kisi galat baat ke likh diye jaane ki na koi ghatna itihas me hui aur na aaj aisi koi baat Quran ke vishay me hone ka dar hai,
Wo isliye kyonki Quran ke nazil hone ke waqt se he is puri kitab ko Pahle anginat sahaba, aur tab se lekar aaj tak Saari Quran ko anginat musalman muh zabani Yad kar ke apne seene me mahfooz karte chale aaye hain, 
Isliye is kitab me raddo badal ki koi bhi koshish fauran pakad me aa jati hai

so bhai aap be-hichak quran par vishwas kar sakte hain

~ ज़िया इम्तियाज़।

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अक्सर कुछ हदीसों की बुनियाद पर ये कहा जाता है कि क़ुरआन नबी सल्ल० के ज़माने में एक किताब की शक्ल में नही लिखा गया था और क़ुरआन की सूरतों के पढ़ने या याद करने के लिए भी कोई क्रम नही था, नबी सल्ल० की वफ़ात के कई साल बाद जाकर क़ुरआन को एक किताब की शक्ल देने की कोशिश की गई और लकड़ी, चमड़े, हड्डी वगैरह पर लिखी आयतों को ढूंढ कर एक किताब में लिखा गया... इस बीच क़ुरआन की कई आयतों के खो जाने की हदीसें भी मिलती हैं और ये हदीसों में मिलता है कि अलग अलग प्रकार की क़ुरआन लिख ली गई थीं, जिन्हें बाद में हज़रत उस्मान रज़ि० ने जलवा दिया था... ऐसे में क़ुरआन की विश्वसनीयता का क्या प्रमाण रह जाता है ?? 
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उत्तर- ये एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी है कि नबी सल्ल० के सामने क़ुरआन एक किताब की सूरत में नही लिखा गया था... असलियत इसके उलट है, मैं हमेशा आपसे कहता हूं कि पहले क़ुरआन पढ़िये और फिर हदीसों को क़ुरआन की बात के मुताबिक़ समझिये, और क़ुरआन के मुताबिक बात कहने वाली हदीसों को कुबूल कीजिये और क़ुरआन से टकराने वाली बातों को छोड़ दीजिये....
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... क़ुरआन में सूरह क़ियामा, सूरह नम्बर 75 की 16 से 19 तक आयतों को पढ़िये "(ऐ रसूल) वही के जल्दी याद करने वास्ते अपनी ज़बान को हरकत न दो ! उसका जमा कर देना और पढ़वा देना तो यक़ीनी हमारे ज़िम्मे है ! तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह उस किरअत की इत्तेबा करना ! फिर उस के मुश्किलात का समझा देना भी हमारे ज़िम्में है"

... मौलाना हमीद्दुदीन फ़राही के मुताबिक़ यहां अल्लाह ने नबी सल्ल० को ये भरोसा दिलाया है कि जो काफ़िर इस क़ुरआन के एक ही बार में पूरा न नाज़िल होने का ताना देते हैं, उनके तानों से रसूल परेशान न हों बल्कि इस किताब का जमा करना (यानी सारी आयतों को एक जगह एक तरतीब से रखना) फिर किरअत करना/पढ़वा देना (यानी नई तरतीब के साथ याद भी करा देना) अल्लाह ने अपने ज़िम्मे लिया है और नबी सल्ल० की ज़िंदगी में ही ये काम कर देने का भरोसा अल्लाह ने उन्हें उसी दौर में दिला दिया था, जब आप सल्ल० मक्का में ही थे और मदीना तशरीफ़ नही लाये थे.... ज़ाहिर है जिब्रील नबी सल्ल० के ज़रिये ही अल्लाह की बात दुनिया तक पहुँचाते थे, सो अल्लाह के ये तमाम वादे नबी सल्ल० के ज़माने में ही पूरे होने ज़रूरी थे,
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 .... क़ुरआन की इन आयतों को देखने के बाद अब हदीसों को देखिये.... बुख़ारी शरीफ़ किताब 61, हदीस नम्बर-519 और 520 पर दर्ज हदीसें देखिये कि "हर साल रमज़ान में नबी सल्ल० के सामने जिब्रील क़ुरआन शरीफ़ पढ़ा करते थे, फिर आप सल्ल० उसे पूरा पूरा जिब्रील को सुनाया करते थे और जिस साल आप सल्ल० की वफ़ात हुई उस साल नबी सल्ल० ने दो बार पूरे क़ुरआन पाक को जिब्रील अलैहिस्सलाम के सामने दोहराया" तो पक्के तौर पर इस बात पर मुहर लग जाती है कि ये क़ुरआन को एक नई तरतीब से जमा करके, नबी सल्ल० के सामने वो किरअत पढ़कर आप सल्ल० को याद करा देने के अल्लाह के उसी वादे पर अमल था जो वादा क़ुरआन की सूरह क़ियामा मे मौजूद है,
 .... यही किरत और तरतीब आप सल्ल० ने तमाम सहाबा को भी बताई और अनगिनत सहाबा ने इसे पूरा पूरा क्रमवार याद कर लिया, 
.... इसके अलावा बुख़ारी शरीफ़ किताब-61, हदीस-525 में ये भी मिलता है कि उबई इब्ने क़ाब, मुआज़ बिन जबल, ज़ैद बिन साबित और अबू ज़ैद, इन चार अंसारी सहाबियों ने नबी सल्ल० के ज़माने में ही क़ुरआन को जमा कर लिया था.... 
....जबकि दूसरी अहादीस से मालूम चलता है कि क़ुरआन की आयतों को नबी सल्ल० के हुक़्म पर लिखने वाले कातिबों की तादाद कहीं ज़्यादा थी, तो सिर्फ इन चार लोगों का ज़िक्र क्यों ?? मालूम चलता है कि यहां पूरी क़ुरआन को जमा करके एक किताब की शक्ल देने का ज़िक्र है, न कि चन्द सूरतों को, और क्योंकि ज़ैद बिन साबित रज़ि० उस वक्त नबी सल्ल० के साथ होते थे जब आप सल्ल० जिब्रील को नई तरतीब के साथ क़ुरआन सुनाते थे, तो हम समझ सकते हैं कि ज़ैद बिन साबित और बाक़ी तीनों अंसारी सहाबा ने भी क़ुरआन के जमा करते वक्त नई तरतीब का एहतमाम किया था, तो इस तरह क़ुरआन अपनी मौजूदा तरतीब के साथ ही नबी सल्ल० के सामने ही किताब की शक्ल में भी मौजूद था और इसी तरतीब के साथ सैंकड़ों की तादाद में सहाबा को हिफ़्ज़ तो था ही...
 ... और आप सल्ल० ने हज्जतुल विदा में इसी किताब के भरोसे फ़रमाया था कि तुम्हारे बीच दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, एक तो अल्लाह की किताब और दूसरे अपनी सुन्नत, इनको मज़बूती से थामे रहोगे तो कभी गुमराह न होगे" ....
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.... और जब अलग अलग जगह लिखी हुई और सैंकड़ों सहाबा की स्मृति में क़ुरआन की सारी आयतें महफ़ूज़ थीं तो अलग अलग स्थानों पर रखी आयतों के खो जाने की हदीसों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, उनसे क़ुरआन की सम्पूर्णता को कोई फ़र्क नही पड़ता....!!
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 ....अब सवाल उठता है कि बुख़ारी की हदीस में फिर क्या लिखा है कि यमामा की जंग में जब बड़ी तादाद में क़ुरआन को बाय हार्ट याद करने वाले सहाबियों की शहादत हो गई तब ये डर दरपेश आया कि कहीं क़ुरआन न खो जाए इसलिए उसे लिखकर रख लेने का आइडिया आया....??
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..... देखिये, दरअसल वहां मामला क़ुरआन की आयतों के खो जाने का नही था, क्योंकि हदीसों के मुताबिक़ ही क़ुरआन तो किताब की शक्ल में नबी सल्ल० के ज़माने से ही मौजूद थी, तो यमामा की जंग के बाद के मौक़े पर क़ुरआन के खोने का नही बल्कि क़ुरआन के असल डायलेक्ट, जिसमें वो नाज़िल हुआ था उसके संरक्षण की फ़िक्र का मामला था.... यमामा की जंग में शहीद होने वाले सहाबियों के लिये हदीस में लफ़्ज़ "क़ुर्रा" आया है, जो लफ़्ज़ 'क़ारी' का बहुवचन है, और क़ारी का मतलब होता है वो शख्स जो क़ुरआन को विशेष लहजे और उच्चारण के  साथ यानी एक विशेष बोली में पढ़ सकता है, यानी ये शहीद वो लोग थे जिन्हें आप सल्ल० ने विशेष ढंग से क़ुरआन की किरअत सिखाई थी... दरअसल उस समय अरब में सात अलग अलग प्रकार की अरबी बोलियां (किरअतें) प्रचलित थीं .... ऐसा हर एक भाषा में होता है, हमारी हिंदी में भी अनेकों बोलियां प्रचलित हैं जिनमें एक ही शब्द को अनेकों तरह के उच्चारण के साथ बोला जाता है पर उससे उसका अर्थ नहीं बदलता, उदाहरण के लिए "विश्वास" शुद्ध हिंदी का शब्द है, लेकिन इसी शब्द के दूसरे डायलेक्ट "बिस्वास" को हमारे देश में बड़ी संख्या में बोला जाता है, इससे शब्द का अर्थ नहीं बदलता, लेकिन उच्चारण बदल जाता है और अगर कोई शुद्ध हिंदी बोलने वाला व्यक्ति देहात के किसी व्यक्ति को इमला बोलकर "विश्वास" लिखवाए तो अपनी आदत और सुविधा के कारण लिखने वाला व्यक्ति "बिस्वास" ही लिख देगा, हालांकि उससे कहा गया मैसेज नही बदलेगा, यही मामला क़ुरआन के साथ था, अरब में उस समय थोड़े थोड़े फ़र्क के साथ सात तरह की किरअत यानी बोलियां प्रचलित थीं, और जब वो सहाबा जिन्होंने क़ुरआन कंठस्थ किया था वो दूर के क्षेत्रों में जाकर कातिबों को क़ुरआन सुनाते तो क़ातिब कई स्थानों पर नेचुरली अपने उच्चारण के अनुसार किसी शब्द को लिख दिया करते थे, इससे अमूमन क़ुरआन की बात में कोई फ़र्क नही आता था, ... नबी सल्ल० के करीबी सहाबा ने जब इन अलग ढंग से कहे जा रहे शब्दों पर नबी सल्ल० का ध्यान दिलाया तो ग़ालिबन नबी सल्ल० ने ये कहा कि जिस किरअत में लोगों को ज़्यादा सुविधा हो रही है, उसी में उन्हें पढ़ने दो, क्योंकि क़ुरआन की बात तो बदल नही रही, इसलिए ये कोई बिग डील नहीं है... पर हदीस में लिखे जाने के वक्त तक आप सल्ल० की उस बात को इतना बदल दिया गया कि हदीस में बात ये लिख दी गई कि क़ुरआन सात अलग अलग किरअतों में नाज़िल हुआ है, जो बात सही नहीं है...!!
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.... बहरहाल, यमामा की जंग के बाद की हदीस पर आते हैं.... तो बुख़ारी शरीफ़ की किताब-61, हदीस-509 के मुताबिक हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने मिलने बुलाया, और जब वो हज़रत अबु बक्र रज़ि० के पास पहुँचे तो वहां हज़रत उमर रज़ि० भी मौजूद थे, हज़रत अबू बक्र ने हज़रत ज़ैद से फ़रमाया कि यमामा की जंग में बहुत बड़ी तादाद में कारियों (कुर्रा) की शहादत हुई, और अंदेशा ये है कि आनेवाले वक्त में जो जंगें होंगी उनमे और ऐसे किरअत जानने वाले लोगों की शहादत हो सकती है जो अभी ज़िंदा हैं, जिससे क़ुरआन का एक अहम हिस्सा (यहां मुराद उस किरअत से है जिसमें क़ुरआन नाज़िल हुआ था, और इसे ही नबी सल्ल० ने सहाबा को सिखाया था) हमसे खो न जाये, इसलिये ऐ ज़ैद क्योंकि आप सच्चे इंसान हैं और नबी सल्ल० के लिए क़ुरआन लिखा करते थे, इसलिए आप उन आयतों को ढूंढिये (जिन्हें पहली बार नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था और आप सल्ल० ने उनको सुनकर उसकी किरअत की तस्दीक की थी, ताकि उन सब आयतों को इकट्ठा करके मास्टर कॉपी के तौर पर सुरक्षित कर लिया जाए और उसी किरअत के आधार पर क़ुरआन की और कई प्रतियां तैयार कर ली जाएं जिनको पढ़कर जल्द से जल्द और नए क़ारी तैयार हो सकें....
..... सोचकर देखिये कि जब इसी हदीस के मुताबिक़ क़ुरआन को पूरा कंठस्थ करने वाले बहुत से क़ारी अभी ज़िंदा हैं और बुख़ारी 61-525 के अनुसार क़ुरआन को नबी सल्ल० के ज़माने में ही जमा कर लेने वाले ज़ैद बिन साबित रज़ि० से मुखातिब हुआ जा रहा है, तब क़ुरआन की मूल आयतों की खोज का मक़सद सिवाय इसके क्या हो सकता है कि कुरआन की असल डायलेक्ट की तस्दीक की जाए, क्योंकि इस हदीस में क़ुरआन की किसी आयत के खो जाने का तो कहीं ज़िक्र है नही )
... ज़ैद बिन साबित ने शुरू में इस बात की ज़रूरत न होने की बात कही कि जब नबी ने अपनी ज़िंदगी में ये काम नहीं किया (किसी एक किरअत को रखने का आग्रह नही किया) तो हम लोग क्यों ऐसा करें ?? लेकिन बाद में ज़ैद बिन साबित मान गए, और क्योंकि उन्होंने क़ुरआन को बाय हार्ट याद भी किया था और पूरी लिखी हुई भी उनके पास मौजूद थी जिसमें बस कहीं कहीं डायलेक्ट/किरअत का हल्का सा फ़र्क हो सकता था सो अपनी और अन्य सहाबा की याददाश्त और पास मौजूद क़ुरआन की प्रति के आधार पर उन्होंने क़ुरआन की प्रत्येक उस आयत को ढूंढ लिया जिसे नबी सल्ल० के सामने लिखा गया था, आख़िर में सूरह तौबा की कुछ आयतें जिनका ज़ैद बिन साबित रज़ि० को नबी सल्ल० द्वारा किरअत किया जाना याद था, वो कहीं नहीं मिलीं, और जाकर हज़रत अबी खुज़यमा रज़ि० के पास मिलीं, और जब इस तरह पूरा क़ुरआन शरीफ़ इकट्ठा हो गया तो इस पूरे ज़खीरे को हज़रत अबू बक्र के पास रखवा दिया गया, (क्योंकि ये खोज क़ुरआन के अहम हिस्से, उसकी असल किरअत के खो न जाने के डर से की गई थी, इसलिये इसकी बहुत सारी कॉपियां इसी समय बनाना ज़रूरी था, जो कि लगातार इस मास्टरकॉपी की मदद से बनवाई गईं) हज़रत अबु बक्र रज़ि० की वफ़ात के बाद ये हज़रत उमर के पास रहा और फिर हज़रत उमर के बाद बीवी हफ़सा रज़ि० के पास इसे महफ़ूज़ रखा गया....!!!
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... अब हमें ये मालूम है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में क़ुरआन की सारी मूल आयतों को एक जगह जमा करके रख दिया गया था, .... पर क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी अलग अलग वक्त की दो हदीसें मौजूद हैं जिनमें ज़ैद बिन साबित पर क़ुरआन की तरमीम का ज़िम्मा डाला गया था, एक हदीस यमामा के जंग के बाद की है और दूसरी इसके कई साल बाद हज़रत उस्मान की खिलाफत के दौर में इराक़ और शाम के लोगों में क़ुरआन की किरअत को लेकर इख़्तिलाफ़ के अंदेशे के वक़्त की.... दोनों अहादीस में रावियों ने हज़रत ज़ैद से एक ही बात कहलवाई है कि हमें नबी सल्ल० के वक्त में अलग अलग चीज़ों पर लिखी गई तमाम आयतें मिल गईं, मगर क़ुरआन की कुछ आयतें जो मुझे नबी सल्ल० की किरअत में याद थीं वो कहीं नही मिलीं, और आख़िरकार हज़रत खुज़यमा रज़ि० के पास वो मिलीं... फ़र्क़ इतना है कि पहली हदीस में अबी खुज़यमा रज़ि० के पास से मिली आयतें सूरह तौबा की बताई गई हैं और दूसरी हदीस में खुज़यमा बिन साबित रज़ि० के पास से सूरह अहज़ाब की"....
... लेकिन जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में सारी मूल आयतें इकट्ठा कर ली गई थीं, और उन्हें एक जगह सुरक्षित रख दिया गया था तो उन्हें दोबारा ढूंढने का सवाल कैसे उठता है ?? चाहे कोई भी आयत हो, हज़रत अबू बक्र के ज़माने की हदीस में बताया गया है कि तमाम आयतें मिल गई थीं.... यानी हज़रत ज़ैद बिन साबित का ये क़ौल पहली ही बार यानी हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने का है, रावियों ने जिसका वक्त भी गड्डमड्ड किया और आयतों के नाम भी और आयतें जिन सहाबियों से मिलीं उनके एक से नाम ज़ाहिर करते हैं कि ये एक ही बात एक ही सहाबी का ज़िक्र है जिसे ठीक से याद नहीं रखा गया
.... इसी तरह बुख़ारी किताब-61, हदीस-510 में लिखा है कि हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़माने में जब ज़ैद बिन साबित रज़ि० और दूसरे कातिबों को क़ुरआन की प्रतियां बनाने के लिए उस्मान रज़ि० ने नियुक्त किया तो बीवी हफ़सा रज़ि० से उन्होंने वो मास्टर कॉपी मंगाई जिसे हज़रत अबू बक्र के ज़माने में जमा किया गया था, इसके बाद हज़रत उस्मान ये बात कहते हैं कि किरअत में जहां बाक़ी के तीन कातिबों का हज़रत ज़ैद बिन साबित से इत्तेफाक न हो तो वो कुरैशी किरअत में क़ुरआन लिख लें, क्योंकि क़ुरआन क़ुरैशी किरअत में नाज़िल हुआ था.... सवाल ये उठता है कि जब उनके सामने क़ुरैशी किरअत में लिखी हुई तमाम आयतों का मजमुआ मौजूद है तो किरअत में हज़रत ज़ैद से इत्तेफाक, या नाइत्तेफाकी का सवाल ही क्या ? वो तो अपने सामने मौजूद मास्टर कॉपी से नकल करेंगे न ? क्योंकि किरअत के हिसाब से वो मास्टर कॉपी ही परफेक्ट थी, इसीलिये तो उसे मंगाया गया था
...... ज़ाहिर होता है कि जैसे क़ुरआन की एक आयत खुज़यमा रज़ि० के पास मिलने की बात को दोनों हदीसों में गड्डमड्ड कर दिया गया, उसी तरह किरअत के मामले में ज़ैद बिन साबित रज़ि० से नाइत्तेफ़ाक़ी होने पर क़ुरैशी किरअत में कातिबों को क़ुरआन लिखने का हुक़्म देने की बात का सही वक्त भी इन एक सी दो हदीसों में रावियों ने गड्डमड्ड कर दिया है....
.... तर्क से सोचें तो ये हुक़्म उस वक्त का मालूम होता है जब हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने में यमामा की जंग के बाद शुद्ध किरअत में जल्द से जल्द क़ुरआन की ढेर सारी कॉपियां बनाने का प्रयास किया जा रहा था, ताकि कारियों की एक बड़ी तादाद बनाई जा सके, लेकिन अभी तक पूरी मास्टर कॉपी को जमा नहीं किया जा सका था अलबत्ता काफ़ी सारी आयतों के मिल जाने बाद ये तय था कि पूरी क़ुरआन क़ुरैशी किरअत  में ही नाज़िल हुई है, और उसके पहले क्योंकि हज़रत ज़ैद बिन साबित के पास पूरी लिखित क़ुरआन मौजूद थी जिसमे कहीं कहीं क़ुरैशी किरअत नही थी सो अरब के लोगों के लिए क़ुरआन की अन्य प्रतियां बनाते हुए कातिबों के सामने ज़ैद बिन साबित की क़ुरआन मास्टर कॉपी के तौर पर रखी गई थी, इस हिदायत के साथ कि उसमें जहां ज़ैद बिन साबित ने क़ुरैशी किरअत न लिखी हो, वहां क़ुरैशी किरअत लिखकर कॉपीज़ बना ली जाएं....
.... फिर ये मालूम चलता है कि हज़रत उस्मान के ज़माने में किरअत को लेकर अरब में कोई नाइत्तेफ़ाकी नही थी, बल्कि नाइत्तेफ़ाकी का डर सिर्फ शाम और इराक़ के बीच था, यानी दूरदराज के इलाकों में जहाँ क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन नही पहुँची थी, इससे भी एक इशारा मिलता है कि हज़रत अबू बक्र रज़ि० के ज़माने से क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन के अरब में पढ़े सीखे जाने का सिलसिला जारी था....
.... सो हज़रत उस्मान रज़ि० ने अपनी ख़िलाफ़त के दौर में सिर्फ इतना किया कि उन्होंने उसी मास्टर कॉपी की मदद से और नई कॉपियां बनाने के लिए क़ुरआन के विशेषज्ञ हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ि० को भी बुलाया और अन्य कातिबों को भी, इन सबने क़ुरैशी किरअत में क़ुरआन की प्रतियां बनाईं जिन्हें शाम और ईराक़ के अलग अलग प्रांतों में भिजवाकर हज़रत उस्मान ने अन्य किरअतों में लिखी क़ुरआन की प्रतियों को जनता के पास से उठा लेने का हुक्म दिया.... 
.... अन्य किरअतों को जलवा देने का हुक्म भी एक गढ़ी हुई बात महसूस होती है क्योंकि एक तो अन्य किरअतों में लिखी अल्लाह की ही बात थी, जिसको नष्ट करने की बात से ही नबी सल्ल० के साथी डरेंगे, और फिर अगर अन्य किरअतों को हज़रत उस्मान रज़ि० ने इस हद तक जाकर नष्ट करवाया होता तो ये किरअतें आज तक अरब देशों में मौजूद न होतीं, और पढ़ी और पढ़ाई न जा रही होतीं....
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.... बहरहाल हज़रत अबु बक्र रज़ि० और हज़रत उस्मान रज़ि० के ज़मानों में क़ुरआन की तरमीम से जुड़ी दोनों हदीसों को देखकर पता चलता है कि वहां मामला क़ुरआन को एक किताब का रूप देने का नही बल्कि दोनों ही वाकयों में क़ुरैशी किरअत वाली क़ुरआन की कॉपियां बनाने का एक ही मामला था ....
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... और अंत में सूरह अबसा की वो आयतें, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि नबी सल्ल० के ज़माने में महज़ चमड़े और हड्डी पर नही, बल्कि क़ुरआन किताब की शक्ल में मौजूद थी..... "वे (क़ुरआन की आयतें) तो महत्वपूर्ण नसीहत हैं, तो जो चाहे उसे याद कर ले - पवित्र पन्नों में अंकित हैं, प्रतिष्ठि्त, उच्च !! ऐसे कातिबों के हाथों में रहा करते है, जो प्रतिष्ठित और नेक हैं" (क़ुरआन, 80:11-16)


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एक साहब हमसे पूछते हैं कि तुम अक्सर लोगो को बोलते हो कुरान सच्ची किताब है और पैगम्बर मुहम्मद पर नाजिल हुई . मुझे यह बताओ Kufi 6235, bsri 6216, shami 6250, mkki 6212,Iraqi 6214 और आम कुरान 6666 इनमे से कौन सी कुरान सच्ची है ? कुरानी आयत में क्यों फर्क है ? इन् में से कौन सी कुरआन असल हालत में है ? और कौन सी कुरआन पैगम्बर मुहम्मद पर नाजिल हुई थी ?? 

लीजिए उत्तर प्रस्तुत है ... क्योंकि इसका उत्तर जानना बहुत से मुस्लिम भाईयों के लिए भी आवश्यक है 

प्रश्न करते हुए उन भाई से ये गलती हुई कि वे अलग अलग आयतों की संख्या के कारण कुरान को ही अलग अलग समझ बैठे , जबकि ये सारे विद्वान सेम कुरान के विषय मे ही बता गए हैं ... आयात की संख्या मे फर्क सिर्फ इस कारण आया क्योंकि इन विद्वानों ने कुरान की आयतों की गणना अलग अलग दृष्टिकोण से की है ,

कुछ विद्वानों ने कुरान की हर सूरत के शुरू मे आनेवाले "बिस्मिल्लाह" को अलग आयत के रूप मे गिना है इसलिए उनके विचार मे कुरान मे अधिक आयात हैं बनिस्बत उनके विचार के जो विद्वान बिस्मिल्लाह को अलग आयत के रूप मे नहीं गिनते

कुछ विद्वान मानते थे कि लम्बी आयतों को एक नहीं बल्कि लम्बाई के अनुसार दो या तीन आयतों के रूप मे गिना जाना चाहिए, इसलिए इन्होंने इस प्रकार गणना की तो कुरान की आयतों की संख्या अधिक बताई

इसके विपरीत कुछ विद्वानों ने कुरान की कुछ सूरतों के आरंभ मे आनेवाले कुछ विशेष शब्दों,  जैसे "अलिफ लाम मीम", "यासीन", हामीम" आदि को अलग आयत के रूप मे नहीं गिना, इसलिए इनकी गणना मे कुरान की आयतें अन्यों से कम लगीं

एक आम धारणा है कि एक आम कुरान मे 6,666 आयतें होती हैं ... लेकिन ये धारणा बिस्मिल्लाह को गिनकर और बड़ी आयतों को छोटी छोटी तीन चार आयतें मानकर गणना कर के बनाई गई,
यदि आप खुद कुरान की वास्तविक आयतों को गिनिए तो ये 6,236 निकलती हैं ... इसलिए कुफा का मत आज पूरे विश्व के मुस्लिम विद्वान स्वीकार करते हैं कि पवित्र कुरान मे कुल 6,236 आयात हैं ॥

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सवाल : अगर खुदा कयामत तक कुरान की हिफाजत की गारंटी ले सकता है, तो उसने ऐसा ही इंतजाम पहले की किताबों के साथ क्यों न किया ? क्या यह उसे न पता रहा होगा कि उसकी अलग-अलग किताबें अलग-अलग मजहब पैदा करेंगी और उनके नाम पर अलग-अलग फाॅलोवर्स यहूदी, इसाई, मुसलमान के रूप में एक दूसरे से नफरत करेंगे.. एक दूसरे के खिलाफ साजिश करेंगे.. एक दूसरे का कत्लेआम करेंगे.. ??
कितना अच्छा होता कि वह पहली किताब के साथ यही स्टेप ले लेता और न अलग-अलग किताबें होतीं और न उनके अलग-अलग फाॅलोवर्स एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे होते।

जवाब : क़ुरआन से पूर्व की किताबों के बाद भी नबियों को आना था, और अल्लाह की निशानियां बहुत स्पष्ट तौर पर दुनिया को दिखानी थीं, इसलिये कुरआन से पूर्व की किताबों की सुरक्षा करने की इतनी ज़्यादा आवश्यकता नहीं थी, हाँ जितनी आवश्यकता थी उतनी सुरक्षा ज़रूर होती थी उन किताबों की, उन में लोग थोड़े कुछ बिगाड़ डाल कर कुछ कुरीतियां बना लेते थे, मगर उन किताबों का मूल सन्देश फिर भी ख़त्म नहीं हो जाता था, और वो किताबें एकदम भ्रष्ट नही हो जाती थीं, जैसे आज भी तौरेत और इंजील में क़ुरआन की शिक्षाओं से बहुत ज्यादा साम्य दीखता है, तो उस समय उन किताबों में अपने से आगे आने वाले नबी की तस्दीक़ होती थी, जब वो नबी आता था तो स्पष्ट पहचान होती थी और अपनी किताबों को मानने वालों के पास स्पष्ट निर्देश होता था कि वह उस नबी को मानें, और अगर न भी मानें तो भी भलाई का तकाज़ा ये था कि उस नबी के विरुद्ध संघर्ष न करें बल्कि उसका सम्मान करें
... कुरआन के आगे सुधार करने के लिए किसी नबी को नही आना था, सो इसमें थोड़ा सा भी बदलाव न किया जा सके ऐसा इंतज़ाम किया गया !!

..... रहा सवाल कि किताबों में बिगाड़ होते रहने देकर अल्लाह ने ख़ुद लोगों को क्यों भटकाया और लड़ाया ?? तो क्या वाक़ई किताबों के एक दूसरे से अलग होने की ही वजह से लड़ाइयां होती हैं वरना नही होतीं ?? एक कुरआन के मानने वालों की आपसी जंगों पर आप रोज़ ही कोई न कोई तब्सिरा करते हैं, इसके बाद भी आपको ये मलाल है कि अगर अल्लाह एक ही किताब रखता तो लोग न झगड़ते ?
धर्म का अलग होना आपस में मारकाट करने के हज़ारों बहानों में से सिर्फ़ एक बहाना है, और अगर ये बहाना न भी होता तो भी एक ही धर्म के लोग आपस में किन किन बहानों से लड़ मर सकते हैं, ये मिसाल आपकी आँखों के सामने ही है
.... वास्तव में अल्लाह ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा दी है, उसकी प्रकृति में अच्छाई और बुराई को समझने और इंसाफ़ करने की समझ दी है, और दुनिया में उसे एक परीक्षा के लिये भेजा है, कि उसके सामने दुनिया में भलाई और बुराई, ये दो रास्ते होंगे... और अपनी स्वतंत्र इच्छा से वो जिस रास्ते को चुनेगा उस आधार पर उसको पारलौकिक ज़िन्दगी में दण्ड या पुरूस्कार दिया जाएगा 
..... और आप देखिये, न क़ुरआन में कहीं आपस में बंट जाने को लिखा हुआ है, न पिछली किताबों में विधर्मियों की जान लेने की शिक्षा दी गई है, 
... ये मारकाट और लड़ाई झगड़े तो इंसान खुद करता है, यहोवा, अल्लाह या मसीह ने नही कहा कि केवल किसी का धर्म अलग हो तो उससे लड़ो
आपके सवाल का जवाब बड़ी खूबसूरती से अल्लाह ने सूरह मायदा की 45 से 48वीं आयत में दिया है.... कि तौरेत वाले तौरेत से फ़ैसला करें, और इंजील को तौरेत की पुष्टि में उतारा गया है, इंजील वालों को इंजील से फ़ैसला करना चाहिए, इसी तरह क़ुरान इन दोनों किताबों की पुष्टि में उतारी गई है और उनकी संरक्षक है, और क़ुरआन वालों को क़ुरआन से फ़ैसला करना चाहिए, अल्लाह ने सबके लिए एक ही शरीयत तय की है, अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक समुदाय बना देता। पर जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसमें वह तुम्हारी परीक्षा करना चाहता है। "अतः भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे बढ़ो।" तुम सबको अल्लाह ही की ओर लौटना है। फिर वह तुम्हें बता देगा, जिसमें तुम विभेद करते रहे हो....
.... यही बाते अल्लाह ने सूरह हज में भी बयान की हैं "प्रत्येक समुदाय के लिए हमने बन्दगी की एक रीति निर्धारित कर दी है, जिसका पालन उसके लोग करते है। अतः इस मामले में वे तुमसे झगड़ने की राह न पाएँ। तुम बस अपने रब की ओर लोगों को (भले ढंग से) बुलाओ, निस्संदेह तुम सीधे मार्ग पर हो" (22:67)

यानि ये मनुष्यों की स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ा गया है कि वो अंतिम नबी के धर्म को मानें या न मानें, लेकिन अगर न भी मानें तो भी लड़ने का नही बल्कि नेकी के कामों में एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा करने का आदेश दिया है अल्लाह ने सभी समुदायों को, इस आदेश के बावजूद अगर लोग अत्याचारी बनते हैं तो वो उस परीक्षा में बहुत बड़े घाटे में जा रहे हैं, जिस परीक्षा के लिए उन्हें यहाँ भेजा गया था, और अत्याचारी अपने लिये अनन्तकाल की यातना तैयार कर चुके हैं !!




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