क्या क़ुरान युद्ध की शिक्षा देता है।
बहुत से लोग कुरान की आयतों मे युद्ध की शिक्षाओं को दुनियाभर मे फैले "इस्लामी आतंकवाद" का कारण बताते हुए सीधे इस्लाम के अस्तित्व पर ही प्रहार करते हैं
इन सब लोगों से मेरा इतना ही कहना है कि इस्लाम मे तो युद्ध के बारे मे मुस्लिमों को सही और गलत की स्पष्ट शिक्षाएं देकर किसी पर हिंसा और अन्याय करना, समर्पित मुस्लिमों के लिए हराम, पूर्णतया निषेध ठहरा दिया है ।
और ऐसा तो नहीं हुआ कि जिन धर्मों मे युद्ध के विषय मे स्पष्ट शिक्षा नहीं थीं उसके अनुयायी युद्ध नहीं करते,..
वो भी बहुत क्रूरता के साथ युद्ध करते हैं, वो भी धर्म के नाम पर खून की नदियाँ बहाते हैं
अन्य "शान्ति के प्रतीक" धर्मों ने युद्ध के बारे मे स्पष्ट शिक्षाएं नहीं दीं, इसलिए इन सब धर्मों के लोग बिना ईश्वर के डर, बिना अपने धर्म के जाने के किसी डर, भयंकर मारकाट मचाया करते हैं, उसका क्या ???
ठीक है युद्ध की शिक्षाएं पवित्र कुरान मे हैं, पर उन सबसे ऊपर, और सबसे पहले ये दो शिक्षाएं हैं कुरान की
जैसे पवित्र कुरान की सूरत मायदा मे [5:32] पर ये तालीम है, कि एक भी निरपराध व्यक्ति की हत्या करना सारी मानवजाति की हत्या करने के बराबर जघन्य अपराध है जिसका दण्ड भी अपराध की गम्भीरता के समान ही गम्भीर होग,
फिर पवित्र कुरान मे कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मुस्लिमों को युद्ध की इजाजत तभी है जब मुश्रिक मुस्लिमों पर आक्रमण करें ...
‘‘जिन मुसलमानों से (खामखाह) लड़ार्इ की जाती है, उनको इजाजत हैं (कि वे भी लड़े), क्योकि उन पर जुल्म हो रहा हैं और खुदा (उन की मदद करेगा, वह) यकीनन उनकी मदद पर कुदरत रखता है।’’ (कुरआन, सूरा-22, आयत-39)
‘‘और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी खुदा की राह मे उनसे लड़ो, मगर ज्यादती (अत्याचार) न करना कि खुदा ज्यादती करनेवालो को दोस्त नही रखता।’’(कुरआन, सूरा-2, आयत-190)
इतने स्पष्ट नियमों के बाद जो व्यक्ति जन्मजात मुस्लिम होते हुएभी कुरान की इन आज्ञाओं की अवहेलना करे तो वह तो खुला काफिर और शरीयत के अनुसार सजा ए मौत का अधिकारी और नरकगामी हो गया
अत: इस्लाम के नियम तो स्पष्ट हैं, पर मेरा सवाल विश्व के अन्य सभी धर्मों से है ..ईसाईयत क्या कहती है अमेरिका द्वारा इराक़ मे की गई करोड़ों हत्याओं पर, हिन्दूइज़्म क्या कहता है गुजरात मे हजारों निर्दोष लोगों की जघन्य हत्याओं पर, यहूदियत क्या कहती है इजरायल द्वारा अनगिनत फलिस्तीनियों की हत्या पर, बुद्धिज़्म क्या कहता है म्यांमार मे रोहिंग्य मुस्लिमों की नस्लकुशी पर ???
क्या इन सब ईसााईयों, हिन्दुओं, यहूदियों, बौद्धों का धर्म गया ? या नहीं ?? कृपया धर्म ग्रंथों से सिद्ध कीजिए ।
~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या क़ुरान क़त्ल का हुक़ूम देता है।
आजकल कथित Isis द्वारा अमेरिकी स्वतंत्र पत्रकारों की नृसंश हत्याओं की वीडियो जारी करने के गैर इस्लामी कृत्य का बड़ा मीडिया प्रसार हो रहा है,
ईश्वर ही जानता है ये वीडियो फेक हैं, या वास्तव मे उन वीडियोज़ मे किन्हीं निहत्थे, निर्दोष व्यक्तियों के कत्ल किए गए हैं .......
परंतु एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, कि वीडियो मे जिस व्यक्ति को Isis का इस्लामी आतंकी सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है, वास्तव मे वो व्यक्ति मुस्लिम है ही नहीं ..... क्योंकि इस्लाम मुसलमानों को कभी बेगुनाह का कत्ल करने की इजाज़त नहीं देता, कुरान मे ईश्वर का स्पष्ट आदेश है :-
"यदि कोई व्यक्ति किसी हत्यारे को दण्ड देने, या धरती मे फसाद फैलाने के दोषी के अतिरिक्त किसी की हत्या कर देता है , तो ये ऐसा (गम्भीर अपराध) है, जैसे उसने सम्पूर्ण मनावता की हत्या कर दी हो ।और यदि किसी व्यक्ति ने किसी निर्दोष की जान बचा ली, तो जैसे सारी मानवता के प्राणों को बचा लिया"
[अल कुरान, 5:32 ]
अगर कोई हम पर जुल्म करे तो हम जुल्म का बदला सिर्फ उस ज़ुल्म करने वाले से ले सकते हैं, हम उस ज़ालिम के किसी ऐसे सगे सम्बन्धी को जो हम पर ज़ुल्म करने मे शामिल न रहा हो, उसको जरा भी तकलीफ पहुंचाने का हक नहीं रखते
इस विषय मे चेतावनी देते हुए कुरान स्पष्ट रूप से तमाम मुस्लिमो से कहता है
"ऐ ईमानवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं।"
[सूरह माइदह 5, आयत 8]
तो जब इन पत्रकारों ने जब किसी मुस्लिम का कभी अहित नहीं किया, फिर इनकी निर्मम हत्या कोई मुस्लिम कैसे कर सकता है ??
वैसे मुस्लिमों के दुश्मनों द्वारा खुद को मुस्लिम दर्शाते हुए आतंकी वारदातें कर के उनका शक मुस्लिमों पर डालने की साजिश कोई नयी या अनोखी बात नही...
फिर चाहे भारत मे समझौता, मालेगांव, मक्का मस्जिद आदि धमाके कर के, और कर्नाटक मे पाकिस्तान का झण्डा फहरा के उसका दोष मुस्लिमों पर डालने के कुत्सित प्रयास हों या फिर मिस्र और इसराइल के बीच कैंप डेविड समझौता होने के बाद मिस्र में समुद्र के किनारे उन जगहों पर बम धमाके किए जाना जहाँ विदेशी पर्यटकों का आना-जाना रहता था, और धमाकों के बाद अरबी में लिखा एक पत्र मिलना, जिसमे विदेशियों के अर्धनग्न होकर नहाने के गैर इस्लामी काम के कारण उनकी हत्या करने की बात कही गई होती थी...
लेकिन इन सारी घटनाओं मे जब गहराई से छानबीन की गई तो इन आतंकी कृत्यों मे मुस्लिम नहीं बल्कि मुस्लिमों के धुर विरोधियों को संलिप्त पाया गया
जहाँ भारत मे पहले निर्दोष मुस्लिमो को जेल मे डाला गया था पर बाद कर्नल पुरोहित, असीमानन्द और साध्वी प्रज्ञा जैसे नाम इन धमाकों मे सामने आए, वहीं मिस्र मे भी पहले पुलिस ने काहिरा विश्व विद्यालय के इस्लाम विभाग के अनेक निर्दोष छात्रों को शक के आधार पर गिरफतार किया.... पर अंत मे असली दोषी को पकड़ने मे सफलता मिली और मिस्र इंटिलीजेंसी ने एक यहूदी राजनयिक को रंगे हाथों अरबी मे लिखे वैसे ही पत्रों के साथ पकड़ा..... तो स्पष्ट है कि आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से इस्लाम के दुश्मन इस्लाम को बदनाम करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं .....
खैर, दो टूक कहूंगा, कि ऐसे वीडियोज़ मे किसी निर्दोष का कत्ल करते, या किसी स्त्री का बलात्कार करते, या निरीह लोगों पर अत्याचार को इस्लाम का अंग बताते आप जिसे भी देखें, जान लें कि वो मुस्लिम नहीं बल्कि इस्लाम से नफरत करने वाला, अल्लाह का दुश्मन है !!
~ ज़िया इम्तियाज़।
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इस्लामी हुक़ूमत क़ायम करने का हुक्म।
अल्लाह ने मुसलमानों पर ये ड्यूटी फ़र्ज़ नही की है कि जिस मुल्क में रहें वहां किसी भी तरह इस्लामी सल्तनत क़ायम करने की कोशिशों में लगे रहें, .... अफ़सोस कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के कुछ "अहले इल्मों" का ये ख्याल था कि हर मुसलमान को अल्लाह ने अपने मुल्क में इस्लामी सल्तनत कायम करने की ड्यूटी दी है, इसके बाद जिस तरह पाकिस्तान या उसके आसपास के इलाक़ों में इस्लामी सल्तनत क़ायम करने के नाम पर हथियार उठाकर कुछ नामनिहाद मुसलमान, मुसलमान अवाम का ही कत्लेआम किया करते हैं, दरगाहों और खानकाहों को शिर्क के अड्डे कहकर वहाँ बम फेंक देते हैं, बजाय कि उन भटके हुए मुसलमानों को दीन की तब्लीग करें, सीधे उनकी जान ही ले लेते हैं, सरकारी इदारों पर हमले करके सरकार को कमज़ोर किया करते हैं, जो सरकार मुसलमान ही चला रहे हैं, ऐसी बेवकूफियों को देखकर, क्या आप ये कहेंगे कि ऐसे लोग इस्लाम की तालीम पर अमल कर रहे हैं ??
... ये इस्लाम की तालीम हरगिज़ नही है, बल्कि क़ुरआन में भी और अहादीस में भी अल्लाह और रसूल सल्ल० ने मुसलमानों को अपने मुल्क के हाकिम से वफ़ादार रहने का हुक्म दिया है, ....
.... हक़ीक़तन कहा जाए तो एक मुसलमान की सही ड्यूटी इस्लाम के लिए ये है कि वो अपने मुल्क की सरकार का वफादार रहते हुए ही, इस्लामी तालीम को ज़माने में आम करे और कोशिश करे कि मुल्क और दुनिया में दीन की दावत के ज़रिये इस्लामी निज़ाम कायम हो सके,
रहा सवाल इस्लामी सल्तनत क़ायम होने का, तो जब किसी जगह अल्लाह इस्लामी सल्तनत कायम करना चाहेगा तो खुद ब खुद रास्ते बना देगा, इस्लामी सल्तनत कायम करने के नाम पर मुल्क की सरकार से बग़ावत करने की बात एक मुसलमान हरगिज़ हरगिज़ नही सोच सकता
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..... कुछ अहले इल्म ये दलील देते हैं कि जिस तरह नबी सल्ल० ने अरब में इस्लामी सल्तनत क़ायम की, अल्लाह ने उनको ग़लबा दिया उससे सबूत मिलता है कि मुसलमानों को भी नबी सल्ल० की तरह इस्लामी सल्तनत क़ायम करने की कोशिशें हमेशा करते रहना चाहिये....
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.... क्या वाक़ई ??? नबी सल्ल० की कोशिशें क्या जंग शुरू कर के अरब में अपनी सल्तनत क़ायम करने के लिए थीं ??
..... तो फिर आप सल्ल० क्यों मक्का छोड़कर मदीना शरीफ़ में बस गए थे और आप सल्ल० ने कभी कुफ़्फ़ार पर चढ़ाई नही की बल्कि कुफ़्फ़ार ने ही बार बार मुसलमानों पर हमले किये, अगर आप सल्ल० का मकसद मक्का की सल्तनत ही पाना था तो आप सल्ल० ने हमेशा मक्का के काफिरों के साथ जंगबन्दी के समझौते क्यों किये उन्हें तो जंग ही चलानी चाहिये थी, उन्हें तो खुद ही कुफ़्फ़ार पर हमले करने चाहिये थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, फिर जब कुफ़्फ़ार ने सुलह हुदैबिया को खुद तोड़ दिया, तब अल्लाह ने हुक्म दिया कि अब तुम काफिरों पर चढ़ाई करो, और फिर अल्लाह ने ही बगैर किसी का खून बहाये मुसलमानों को फतह ए मुबीन अता फरमाई .... क्योंकि ये अल्लाह का इंतज़ाम है कि जब वो किसी नबी को भेजता है तो बददीनों को हार और नबी को उनपर ग़लबा देता ही देता है, ये नबियों के लिए ही अल्लाह का ख़ास कानून है, जिसे क़ुरआन में यूं फ़रमाया गया है... "अल्लाह ने लिख दिया है, "मैं और मेरे रसूल ही विजयी होकर रहेंगे।" निस्संदेह अल्लाह शक्तिमान, प्रभुत्वशाली है (क़ुरआन, 58:21)
मगर अल्लाह ने नबी को कभी इसलिये खुद से जंग करने का हुक्म नही दिया था कि वो जंग छेड़ कर इस्लामी सल्तनत क़ायम करें, अगर जंग की पहल मुसलमानों को करनी मतलूब होती तो क़ुरआन जिहाद की इजाज़त देने के लिए ये अलफ़ाज़ न इस्तेमाल करता कि "जिनसे नाहक़ जंग की जाती हैं, उन्हें भी बदले में जंग की इजाज़त है" [ कुरआन, सूरा-2, आयत-190 ]
....... यानी अपनी तरफ से जंग शुरू करने का हुक्म अल्लाह ने मुसलमानों को क़ुरआन में नही दिया.... हदीस शरीफ़ में नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि "ऐ लोगों, खुद कभी लड़ाई भिड़ाई की आरज़ू न करो, और जब मजबूर किये जाओ, तो साबितक़दम रह के जंग करो" [ सहीह मुस्लिम, किताब-19, हदीस-4314 ]
.... तो ये क़ुरआन और हदीस के पैग़ाम यही साबित कर रहे हैं कि मुसलमान तब हथियार उठाएगा जब दूसरा पक्ष उसे जंग के लिए मजबूर कर देगा, उससे पहले हरगिज़ नही.... इन हुक्मों के बाद भी अगर किसी को ये महसूस होता हो कि मुस्लिमों ने खुद से जंगें छेड़ कर मक्का की सल्तनत पर कब्ज़ा किया, तो ऐसा शख़्स इस्लाम की इंसाफपसंद और सुलह-अमन की तस्वीर को धुंधला करता है,
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अल्लाह ने नबी सल्ल० को सिर्फ दीन फैलाने का हुक्म दिया था, ग़लबा उनको उनकी नबुव्वत के सदके दिया वरना नबी सल्ल० की कोशिशों को देखिये तो वो सल्तनत को पाने की कोशिश कभी नहीं कर रहे थे, आप सल्ल० सिर्फ और सिर्फ़ अल्लाह के दीन को मुहब्बत भरी दावत के ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा फैलाने की कोशिश कर रहे थे, .....
.... और ये भी सोचिये, जब इस्लाम इन कोशिशों से हर जगह फैल जाएगा, तो ख़ुद ब ख़ुद रियाया में मुसलमानों के साथ साथ इस्लामी सल्तनत में भी मुसलमान होंगे...
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.... इस्लाम के लिए यही शन्ति भरी कोशिशें हर मुसलमान को भी करनी चाहिये.... ये कोशिशें ही शरई कोशिशें कहलाएंगी जिनमें किसी के साथ धोखा नहीं, किसी के साथ बगावत नही होगी ...!!!
~ ज़िया इम्तियाज़।
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