हमारे एक हिन्दू भाई ने आक्षेप लगाते हुए कहा कि हिंदुओं में सती प्रथा कभी नहीं थी, रामायण या महाभारत में बहुत योद्धाओं के मारे जाने का ज़िक्र है, उनकी कौन विधवा सती हुई, .... इस सती प्रथा की शुरुआत हिन्दू स्त्रियों ने खुद, मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत पर हमले शुरू होने के बाद उनकी गन्दी नीयत से बचने के लिए की ..!!
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आदरणीय मित्र, अजीब सी बात है कि आप एक ओर रामायण और महाभारत को क्रमशः 10,000 और 5000 साल पुराना बताते हैं और फिर उनके उदाहरण देकर सीधा सातवीं शताब्दी पर आरोप लगाने लगते हैं, .... इसके बीच की अवधि के इतिहास की चर्चा से आँखे क्यों चुराना चाहते हैं आप और आप जैसे अन्य लोग ??
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और अपना ज्ञान बढाइये, महाभारत में पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री जो नकुल और सहदेव की माता थीं, उनके पाण्डु की चिता में सती होने का प्रसंग आता है, रामायण में भी अपने सतीत्व की परीक्षा देने के लिए सीता जी के अग्निकुंड में कूदने का प्रंसग है... और वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में सीता जी के पूर्वजन्म वेदवती के भी सती होने का वर्णन है कि दिग्पालों को जीतकर मार्ग में आते समय रावण ने वेदवती को देखा और उनके शील भंग का प्रयास किया इस पर वेदवती ने जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग दिए थे, और इससे पूर्व शिव जी की प्रथम पत्नी सती का ज़िक्र पुराणों में मिलता है, जिन माता सती के नाम पर इस प्रथा का नाम पड़ा है, कथा है कि माता सती के पिता ने शिव जी का अपमान किया था जिससे क्षुब्ध होकर सती ने हवन कुण्ड मे कूद कर प्राण त्याग दिए थे ...... सती माता ने अपने पति के लिए आत्मदाह किया था इसी कारण अपने पति के लिए जलने वाली हर स्त्री को सती कहा जाने लगा .....
.... बहरहाल पुराणों और आख्यानों से इतर हमको ये देखना चाहिए कि वास्तविक दुनिया में ये प्रथा कब प्रकाश में आई ?? क्या वास्तव में सातवीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों के बाद ??
यूँ तो स्ट्रैबो जैसे कुछ ग्रीक इतिहासकारों के विवरणों में आज से दो हज़ार वर्ष पूर्व ही भारत में सती प्रथा के कुछ विवरणों का उल्लेख किया गया है
.... पर चलिये श्री नागेन्द्र प्रताप सिंह जी की लिखित "भारतीय इतिहास" से कुछ स्वदेशी तथ्यों को उठाते हैं....
.... सती प्रथा का पहला अभिलेखीय प्रमाण गुप्त काल में मिलता है, गुप्त काल को हिन्दू इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जाता है, इसी गुप्त काल में 510 ईसवी के एरण अभिलेख में ये लिखा मिलता है कि गोपराज नाम के एक सेनापति की पत्नी उसके साथ सती हो गई थी
अंगिरा, हीरात और अपरार्क विज्ञानेश्वर जैसे स्मृतिकारों ने इसी काल में सती प्रथा की बड़ी प्रशंषा की है
यानी गुप्त काल के बाद राजपूत काल आते आते सती प्रथा बड़े पैमाने पर देश में फैल चुकी थी, याद रखिये कि ये समय अरब में मुहम्मद साहब सल्ल० के आगमन से पहले का है... तो फिर सोचिये कि यदि सती प्रथा के शुरू करने का दोष मुस्लिमों का है तो मुस्लिमों के भारत में आने से सदियों पहले सती प्रथा भारत में व्याप्त कैसे हो गई थी ???
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.... सच्चाई ये है कि ये एक व्यापक प्रथा थी जिसका कोई सम्बन्ध न किसी आक्रमणकारी के डर से था, न किसी स्त्री की अपनी इज़्ज़त बचाने की चेष्टा... बल्कि ये प्रथा पूरी तरह से इस विश्वास पर कायम थी कि पति के साथ यदि पत्नी भी अपना जीवन समाप्त कर ले तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है... इस प्रथा के प्रमाण मध्य एशिया में भी मिलते हैं और समान रूप से भारत में भी .. मुझे बहुत हैरत हुई थी जब मैंने यमन के ईसाई राजकुमार हातिम ताई की शौर्य गाथा में एक जगह ये पढ़ा कि हातिम एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहां एक बहुत सारी लकड़ियों को इकट्ठा कर के एक पुरूष की अर्थी को जलाने की तैयारी की जा रही थी और पूछने पर पता चला कि पुरुष की जीवित स्त्री भी इसी आग में जलने की तैयारी कर रही है, हातिम ने इसका विरोध किया तो वहां मौजूद लोगों ने कहा कि जब उस स्त्री को इससे कोई समस्या नही है तो तुझे क्यों... ??
... हातिम वहीं रुककर देखने लगे, थोड़ी देर में एक स्त्री हाथों में फूल लिये और मुस्कुराती हुई आई और खुद ही चिता में जाकर बैठ गई और जला दी गई, .... ध्यान दीजियेगा कि हातिम एक वास्तविक ऐतिहासिक पात्र हैं, हातिम नबी सल्ल० से एक पीढ़ी पहले के दौर के व्यक्ति हैं.... और हातिम ताई के पुत्र और पुत्री क्योंकि नबी सल्ल० के समकालीन थे इनके द्वारा इस्लाम कुबूल करने का ज़िक्र इस्लामी इतिहास में मिलता है....
...... बहरहाल हातिम ताई ने अपने यात्रा वृतांत में जब वो सती प्रथा का दृश्य देखा उस वक्त मे भी मुस्लिम आक्रमणकारी वाला एंगल फिट नहीं किया जा सकता
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..... ऐसा महसूस होता है कि सती प्रथा स्वेच्छा के आधार पर शुरू हुई थी, और स्त्री केवल अपनी इच्छा से सती होती थी, या नही होती थी.... लेकिन 1000 ईसवी तक पहुँचते पहुँचते इस प्रथा में कई जगह स्त्रियों को जबरन आग में फेंकने के वर्णन मिलने लगे....
अच्छा, वापस नागेन्द्र प्रताप सिंह जी की पुस्तक पर आते हैं जिसके अनुसार भारत में सती प्रथा को रोकने का पहला प्रयास कश्मीर के "धर्मान्ध" शासक सिकन्दर शाह (1389-1413) ने किया और सतीप्रथा को प्रतिबंधित कर दिया, पर सिकन्दर शाह का ये आदेश हिन्दू जनता ने कभी मन से नही स्वीकारा, वो सिकन्दर शाह के जीवित रहते तो इस प्रथा का पालन नही कर पाए, लेकिन जैसे ही सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र ज़ैनुल आबेदीन कश्मीर की राजगद्दी पर बैठा, लोगों ने उससे आग्रह किया कि सतीप्रथा पर लगी रोक हटा ली जाए जो रोक ज़ैनुल आबेदीन ने हटा दी
इसके बाद मुग़ल बादशाह अकबर ने सतीप्रथा पर रोक लगाने की कोशिश की, पर वो हिन्दू राजाओं के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने के दबाव में ये रोक ज़्यादा समय तक कायम नही रख सका...
.... इसके बाद सबसे ज्यादा मज़बूती से सतीप्रथा पर रोक औरंगजेब ने लगाई थी, सन 1663
से सतीप्रथा पर लगाई गई ये रोक 1707 औरंगजेब की मृत्यु तक कायम रही.... पर औरंगजेब के पुत्र ने भी राज्यारोहण करते ही हिन्दू जनता की मांग पर सतीप्रथा पर लगी रोक हटा दी थी.. !!!
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.... इन तथ्यों को देखने के बाद सतीप्रथा की शुरुआत का कारण तो मुस्लिम नज़र नहीं आते, बल्कि मुस्लिमों ने तो बार बार इस कुप्रथा पर रोक लगाने की कोशिश की, ये पता चलता है.... इसके उलट इस प्रथा को वापस चालू कराने के लिये बार बार मुस्लिम शासकों से आग्रह करने वाले लोग हिन्दू थे, ये इतिहास बताता है !!!
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