Friday, 15 January 2021

बुद्ध और ईसा।

एक दिन संयोग से मैंने डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय की किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्य नन्दा को अपने अंतिम समय में बताई गई भविष्यवाणियां पढ़ीं, जिनमें महात्मा बुद्ध ने कहा था कि "मैं न पहला बुद्ध हूँ, न ही अंतिम, .... मेरे बाद एक पवित्र अन्तःकरण वाला बुद्ध मैत्रेय आएगा" गौतम बुद्ध ने अगले बुद्ध की जो निशानियां बताई थीं, जैसे कि वो धन-ऐश्वर्य वाला होगा, पत्नी बच्चों वाला होगा किन्तु सादा जीवन जियेगा, वो धर्म प्रचारक होगा, उसका एक राज्य होगा, और सबसे मुख्य निशानी कि वो पीछे गर्दन मोड़कर देखने की बजाय पूरा पीछे घूमकर देखता होगा... ये तमाम निशानियां हज़रत मोहम्मद सल्ल० पर फिट बैठ रही थीं.... ये पढ़कर ऐसा लगा कि महात्मा बुद्ध जिस बुद्ध परम्परा की बात कर रहे थे, अगर उस परम्परा में हज़रत मुहम्मद सल्ल० शामिल हैं तो वो नबी परम्परा ही है....
.... लेकिन मैं जानता था कि जो भी हो, नबी सल्ल० के पूर्ववर्ती नबी बुद्ध नही बल्कि ईसा थे, और ये महात्मा बुद्ध ने नही बल्कि हज़रत ईसा ने कहा था कि मेरे बाद जो नबी आएगा उसका नाम अहमद होगा, यानी हज़रत मोहम्मद सल्ल० के आगमन की भविष्यवाणी जिस नबी ने की थी, वो ईसा थे बुद्ध नही.....
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 .... ख़ैर मेरे ये विचार समय के साथ आये गए हो गए... तभी एक दिन नेट पे किसी साइट पर मैंने ये पढ़ा कि एक रूसी गुप्तचर एवं पत्रकार निक़ोलस नोटोविच को उन्नीसवीं शताब्दी में लद्दाख के ‘हेमिस’ नामक तिब्बती बौद्ध-मठ से ईसा का एक प्राचीन हस्तलिखित जीवनचरित प्राप्त हुआ था, इसी के बाद ये विचार फैलने लगा कि ईसा अपने अज्ञातवास में भारत आये थे और बौद्धों के सम्पर्क में रहे थे... उस वेबसाइट पर ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया था कि ईसा मसीह बौद्ध धर्म से प्रेरित थे, लेकिन मेरा ध्यान वहां किसी और बात पर गया ... कि ईसा का जीवन चरित बौद्ध मठ में क्यों ? कहीं बुद्ध परम्परा वास्तव में नबी परम्परा ही तो नही थी...??
इस दिशा में मैंने और पढ़ा तो ईसा और बुद्ध के जीवन वृतांतों में ज़बरदस्त समानता पाई 
... जैसे ईसा के जन्म से पूर्व जिब्रील आकर मरियम को बताते हैं कि मुझे ईश्वर ने भेजा है ताकि तुम्हें एक पुत्र होने का शुभ समाचार दूँ जो ईश्वर का दूत होगा
बुद्ध के जन्म से पूर्व उनकी माँ महामाया के स्वप्न में सुमेध नाम का बुद्ध आकर कहता है कि मैं तुम्हारे गर्भ से जन्म लेने वाला हूँ
.... प्रसव पीड़ा होने पर मरियम खजूर के पेड़ के नीचे जा पहुँची थीं, जहाँ उन्हें रब ने खजूर का तना हिलाने की सलाह दी थी, क़ुरआन में ये ज़िक्र है
उधर बुद्ध के जन्म की कथा में ये ज़िक्र है कि प्रसव पीड़ा होने पर महामाया ने शाल वृक्ष की डाल पकड़ी थी यानी ये दो घटनाएं एक समान हैं.... माता के नाम भी मिलते जुलते (मरियम-महामाया) हैं
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फिर ईसा की कथा में ज़िक्र है कि वो बालपन से ही शांत और करुणामय स्वभाव के थे और धर्मगुरुओं के साथ शास्त्रार्थ करने लगे थे
महात्मा बुद्ध के बारे में भी उनके बचपन से ही शांत स्वभाव, करुणामय और विचारशील होने की कथाएं प्रचलित हैं ....!!
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.... ईसा के बारे में कहा जाता है कि जब शैतान ने उन्हें बरगलाने का प्रयास किया तब ईसा ने 40 दिन तक उपवास करके सिद्धावस्था पाई और बुद्ध पर जब "मार" का आक्रमण हुआ तब बुद्ध ने 49 दिन तक उपवास करके सिद्धि प्राप्त की !!

ईसा ने एक धार्मिक वर्ग फरीसियों का प्रबल विरोध किया जो फरीसी खुद को ईश्वर के प्रिय कहा करते थे, वहीं बुद्ध ने ब्राह्मणों का प्रबल विरोध किया था... इसके अतिरिक्त  ग्रहस्थ जीवन का त्याग, प्राणियों पर दया वेश्याओं का जीवन सुधारना, चोर डाकुओं का जीवन सुधारना, ध्यान मग्न रहना ये तमाम बातें दोनों की जीवनी में एक समान हैं, दोनों की अहिंसा की शिक्षा भी काफ़ी एक जैसी ही है....!!!

.... ईसा और बुद्ध, दोनों के जीवन में ये तमाम समानताएं, बौद्ध मठ में ईसा की जीवनी होना, ये तो सिद्ध कर देते हैं कि ईसा मसीह को भी एक मैत्रेय माना गया था... लेकिन बुद्ध धर्म की बहुत सी पांडुलिपियों को जला डाले जाने की वजह से इस बाबत अधिक जानकारी नही फैल सकी कि ईसा और गौतम बुद्ध एक ही परम्परा का अंग थे... उल्टे देखकर लगता है कि बौद्ध अनुयायियों के यहां भी दो बुद्ध यानी ईसा और गौतम के जीवन चरितों को आपस में गड्डमड्ड कर दिया गया, और गौतम के काफी बाद हुए मैत्रेय बुद्ध ईसा के जन्म और सिद्धि प्राप्ति व शिक्षाओं को गौतम बुद्ध की कथा में जोड़ दिया गया....यदि ईसा को बुद्ध के रूप में बौद्धों ने स्वीकारा होगा तभी उनके जीवन चरित शिक्षाओं और भविष्यवाणियों को भी संकलित किया होगा, जिनमें अगले बुद्ध के बारे में भविष्यवाणी भी थी..

इन समानताओं और भविष्यवाणियों को देखने के बाद ये ही विचार और प्रबल हो जाता है कि हो न हो गौतम बुद्ध नबी परम्परा से ही सम्बन्धित हैं... और सम्भवतः गौतम बुद्ध वो ही नबी हैं, जिन्हें "ज़ुल किफ़ल" यानी कपिल (कपिलवस्तु) वाला कहा गया है ....!!!

~ zia

Thursday, 14 January 2021

सती प्रथा।

हमारे एक हिन्दू भाई ने आक्षेप लगाते हुए कहा कि हिंदुओं में सती प्रथा कभी नहीं थी, रामायण या महाभारत में बहुत योद्धाओं के मारे जाने का ज़िक्र है, उनकी कौन विधवा सती हुई, .... इस सती प्रथा की शुरुआत हिन्दू स्त्रियों ने खुद, मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत पर हमले शुरू होने के बाद उनकी गन्दी नीयत से बचने के लिए की ..!!
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आदरणीय मित्र, अजीब सी बात है कि आप एक ओर रामायण और महाभारत को क्रमशः 10,000 और 5000 साल पुराना बताते हैं और फिर उनके उदाहरण देकर सीधा सातवीं शताब्दी पर आरोप लगाने लगते हैं, .... इसके बीच की अवधि के इतिहास की चर्चा से आँखे क्यों चुराना चाहते हैं आप और आप जैसे अन्य लोग ??
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और अपना ज्ञान बढाइये, महाभारत में पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री जो नकुल और सहदेव की माता थीं, उनके पाण्डु की चिता में सती होने का प्रसंग आता है, रामायण में भी अपने सतीत्व की परीक्षा देने के लिए सीता जी के अग्निकुंड में कूदने का प्रंसग है... और वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में सीता जी के पूर्वजन्म वेदवती के भी सती होने का वर्णन है कि दिग्पालों को जीतकर मार्ग में आते समय रावण ने वेदवती को देखा और उनके शील भंग का प्रयास किया इस पर वेदवती ने जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग दिए थे, और इससे पूर्व शिव जी की प्रथम पत्नी सती का ज़िक्र पुराणों में मिलता है, जिन माता सती के नाम पर इस प्रथा का नाम पड़ा है, कथा है कि माता सती के पिता ने शिव जी का अपमान किया था जिससे क्षुब्ध होकर सती ने हवन कुण्ड मे कूद कर प्राण त्याग दिए थे ...... सती माता ने अपने पति के लिए आत्मदाह किया था इसी कारण अपने पति के लिए जलने वाली हर स्त्री को सती कहा जाने लगा ..... 
.... बहरहाल पुराणों और आख्यानों से इतर हमको ये देखना चाहिए कि वास्तविक दुनिया में ये प्रथा कब प्रकाश में आई ?? क्या वास्तव में सातवीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों के बाद ??
यूँ तो स्ट्रैबो जैसे कुछ ग्रीक इतिहासकारों के विवरणों में आज से दो हज़ार वर्ष पूर्व ही भारत में सती प्रथा के कुछ विवरणों का उल्लेख किया गया है
.... पर चलिये श्री नागेन्द्र प्रताप सिंह जी की लिखित "भारतीय इतिहास" से कुछ स्वदेशी तथ्यों को उठाते हैं....
.... सती प्रथा का पहला अभिलेखीय प्रमाण गुप्त काल में मिलता है, गुप्त काल को हिन्दू इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जाता है, इसी गुप्त काल में 510 ईसवी के एरण अभिलेख में ये लिखा मिलता है कि गोपराज नाम के एक सेनापति की पत्नी उसके साथ सती हो गई थी 
अंगिरा, हीरात और अपरार्क विज्ञानेश्वर जैसे स्मृतिकारों ने इसी काल में सती प्रथा की बड़ी प्रशंषा की है 
यानी गुप्त काल के बाद राजपूत काल आते आते सती प्रथा बड़े पैमाने पर देश में फैल चुकी थी, याद रखिये कि ये समय अरब में मुहम्मद साहब सल्ल० के आगमन से पहले का है... तो फिर सोचिये कि यदि सती प्रथा के शुरू करने का दोष मुस्लिमों का है तो मुस्लिमों के भारत में आने से सदियों पहले सती प्रथा भारत में व्याप्त कैसे हो गई थी ???
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.... सच्चाई ये है कि ये एक व्यापक प्रथा थी जिसका कोई सम्बन्ध न किसी आक्रमणकारी के डर से था, न किसी स्त्री की अपनी इज़्ज़त बचाने की चेष्टा... बल्कि ये प्रथा पूरी तरह से इस विश्वास पर कायम थी कि पति के साथ यदि पत्नी भी अपना जीवन समाप्त कर ले तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है... इस प्रथा के प्रमाण मध्य एशिया में भी मिलते हैं और समान रूप से भारत में भी .. मुझे बहुत हैरत हुई थी जब मैंने यमन के ईसाई राजकुमार हातिम ताई की शौर्य गाथा में एक जगह ये पढ़ा कि हातिम एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहां एक बहुत सारी लकड़ियों को इकट्ठा कर के एक पुरूष की अर्थी को जलाने की तैयारी की जा रही थी और पूछने पर पता चला कि पुरुष की जीवित स्त्री भी इसी आग में जलने की तैयारी कर रही है, हातिम ने इसका विरोध किया तो वहां मौजूद लोगों ने कहा कि जब उस स्त्री को इससे कोई समस्या नही है तो तुझे क्यों... ?? 
... हातिम वहीं रुककर देखने लगे, थोड़ी देर में एक स्त्री हाथों में फूल लिये और मुस्कुराती हुई आई और खुद ही चिता में जाकर बैठ गई और जला दी गई, .... ध्यान दीजियेगा कि हातिम एक वास्तविक ऐतिहासिक पात्र हैं, हातिम नबी सल्ल० से एक पीढ़ी पहले के दौर के व्यक्ति हैं.... और हातिम ताई के पुत्र और पुत्री क्योंकि नबी सल्ल० के समकालीन थे इनके द्वारा इस्लाम कुबूल करने का ज़िक्र इस्लामी इतिहास में मिलता है....
...... बहरहाल हातिम ताई ने अपने यात्रा वृतांत में जब वो सती प्रथा का दृश्य देखा उस वक्त मे भी मुस्लिम आक्रमणकारी वाला एंगल फिट नहीं किया जा सकता
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..... ऐसा महसूस होता है कि सती प्रथा स्वेच्छा के आधार पर शुरू हुई थी, और स्त्री केवल अपनी इच्छा से सती होती थी, या नही होती थी.... लेकिन 1000 ईसवी तक पहुँचते पहुँचते इस प्रथा में कई जगह स्त्रियों को जबरन आग में फेंकने के वर्णन मिलने लगे....

अच्छा, वापस नागेन्द्र प्रताप सिंह जी की पुस्तक पर आते हैं जिसके अनुसार भारत में सती प्रथा को रोकने का पहला प्रयास कश्मीर के "धर्मान्ध" शासक सिकन्दर शाह (1389-1413) ने किया और सतीप्रथा को प्रतिबंधित कर दिया, पर सिकन्दर शाह का ये आदेश हिन्दू जनता ने कभी मन से नही स्वीकारा, वो सिकन्दर शाह के जीवित रहते तो इस प्रथा का पालन नही कर पाए, लेकिन जैसे ही सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र ज़ैनुल आबेदीन कश्मीर की राजगद्दी पर बैठा, लोगों ने उससे आग्रह किया कि सतीप्रथा पर लगी रोक हटा ली जाए जो रोक ज़ैनुल आबेदीन ने हटा दी

इसके बाद मुग़ल बादशाह अकबर ने सतीप्रथा पर रोक लगाने की कोशिश की, पर वो हिन्दू राजाओं के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने के दबाव में ये रोक ज़्यादा समय तक कायम नही रख सका...
.... इसके बाद सबसे ज्यादा मज़बूती से सतीप्रथा पर रोक औरंगजेब ने लगाई थी, सन 1663 
से सतीप्रथा पर लगाई गई ये रोक 1707 औरंगजेब की मृत्यु तक कायम रही.... पर औरंगजेब के पुत्र ने भी राज्यारोहण करते ही हिन्दू जनता की मांग पर सतीप्रथा पर लगी रोक हटा दी थी.. !!!
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.... इन तथ्यों को देखने के बाद सतीप्रथा की शुरुआत का कारण तो मुस्लिम नज़र नहीं आते, बल्कि मुस्लिमों ने तो बार बार इस कुप्रथा पर रोक लगाने की कोशिश की, ये पता चलता है.... इसके उलट इस प्रथा को वापस चालू कराने के लिये बार बार मुस्लिम शासकों से आग्रह करने वाले लोग हिन्दू थे, ये इतिहास बताता है !!!

अंतर्धार्मिक विवाह, बहुतपत्नी।

इस्लाम में किसी गैरमुस्लिम से मुस्लिमों के विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया गया है.... अक्सर ही ये सवाल किया जाता है कि जब कोई मुस्लिम लड़का या लड़की किसी गैरमुस्लिम स्त्री या पुरूष से शादी करते हैं तो अपना धर्म हमेशा गैरमुस्लिम पक्ष को ही क्यों बदलना पड़ता है, कभी विवाह के लिए मुस्लिम पक्ष क्यों नहीं अपना धर्म बदलते ???
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..... देखिये, सबसे पहली बात तो ये समझ लें कि इस्लाम में कहीं किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध जबरन उसका धर्म बदलवाने की शिक्षा नही दी गई, बल्कि कहा गया है कि "ला इकराहा फिद्दीन" अर्थात धर्म के विषय में किसी से ज़ोर ज़बरदस्ती न कि जाए....
.... तो जो ये आजकल प्रेम विवाह के लिये गैरमुस्लिम अपना धर्म बदलकर मुस्लिम बन जाते हैं इन गैरमुस्लिमों को पूरी सामर्थ्य प्राप्त होती है कि वो विवाह के लिये अपना धर्म बदलने का निर्णय न लें, और इसकी बजाय ऐसे विवाह का विचार त्याग दें....!!!
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.... जहां तक मुस्लिमों द्वारा विवाह के लिए धर्म न बदलने का सवाल है, तो इसका उत्तर ये है कि इस्लाम की मुख्य शिक्षा एकेश्वरवाद पर पूर्ण विश्वास रखने की, और ईश्वरीय सत्ता में किसी को भागीदार न मानने की है, मुस्लिमों से आस्था के इस मामले में कोई समझौता न करने पर ज़ोर दिया गया है, सिवाय तब के जब व्यक्ति की जान पर ख़तरा बन आया हो
.... आम हालात में मुसलमानों को ऐसे किसी काम में हाथ डालने से मना किया गया है जिसमें उनकी आस्था को नुकसान पहुँचने का डर हो, तो ज़ाहिर है एक आस्थावान मुस्लिम अपनी इच्छा से विवाह के लिए अपना धर्म परिवर्तन नही करेगा...
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. लेकिन ऐसा हो सकता था कि मुस्लिम बिना धर्म परिवर्तन किए किसी गैरमुस्लिम से विवाह कर ले और विवाह के बाद उसका गैरमुस्लिम जीवनसाथी उसपर इस्लाम छोड़ने का दबाव डालने लगे और उसे बुरी तरह मजबूर कर दे 
.. इसी कारण अंतर्धार्मिक विवाह को हराम ठहराते हुए क़ुरआन में सूरह बक़रह की 221वीं आयत में ये आदेश दिया गया है कि "चाहे वो तुम्हें कितने अच्छे लगते हों, पर न बहुदेववादी स्त्रियों से विवाह करो, न बहुदेववादी पुरुषों से, जब तक वो ईमान न लाए हों !! क्योंकि बहुदेववादी तुम्हें जहन्नम की ओर बुलाते है, यानी इस आयत में ऐसे विवाह की मनाही का कारण भी स्पष्ट कर दिया गया है कि विवाह के बाद बहुदेववादी लोग मुस्लिम स्त्री या पुरुष पर दबाव डालेंगे कि मुस्लिम अपना धर्म छोड़कर उनमें मिल जाये... इसलिये आयत में ये कहा गया कि बहुदेववादी स्त्री या पुरुष से उत्तम एक मुस्लिम के लिए ईमानवाले दास या दासी (यानी कम सामाजिक प्रतिष्ठा वाले मुस्लिम) से विवाह करना है, ... ताकि एक मुस्लिम को अपनी आस्था को लेकर कोई समझौता न करना पड़े 
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.... यहां स्पष्टता से मुस्लिमों को ये आदेश दिया गया है कि वो किसी ग़ैरधर्म के व्यक्ति के प्रति चाहे जितना आकर्षण महसूस करते हों, लेकिन आस्था की सुरक्षा के लिए उनसे विवाह न करना बेहतर है, अलबत्ता यदि वो बहुदेववादी स्वेच्छा से इस्लाम का वरण कर लेते हैं तो मुस्लिमों को उनसे विवाह करने की अनुमति दी गयी है....
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..... यहां कुछ भाई ये आक्षेप कर सकते हैं कि आयत में ये शब्द "जब तक बहुदेववादी ईमान न लाएं उनसे विवाह न करो" बहुदेववादी लोगों पर विवाह के लिए धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने की शिक्षा है, ... पर ऐसा नहीं है, जैसा मैंने पहले बताया धर्म परिवर्तन के दबाव की इस्लाम इजाज़त नहीं देता, तो इस आयत में भी दबाव देने की बात नही है बल्कि गौर कीजिये, आयत में बात ऐसे बहुदेववादी स्त्री पुरुषों की, की गई है जिनके प्रति मुस्लिम स्त्री-पुरुष आकर्षण रखते हैं, न कि उन बहुदेववादी लोगों को मुस्लिमों के प्रति आकर्षण है, तो आयत में बताई स्थिति में स्पष्ट है कि विवाह के लिए कोई भी शर्त अपनी ओर से रखने की स्थिति में मुस्लिम पक्ष नही होगा.... बल्कि क्योंकि मुस्लिम पक्ष को उनकी चाह है, इसलिए ऐसी स्थिति में तो गैरमुस्लिम पक्ष अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में होगा, और इस स्थिति में आयत में बहुदेववादी लोगों से आकर्षण महसूस करने के बावजूद उनकी बजाए ईमान वाले गरीब व्यक्ति से विवाह को वरीयता दी गई है..
. और आयत में ईमान लाने की बात बहुदेववादी लोगों की स्वेच्छा पर कही गई है... कि उनका दिल स्वयं अगर इस्लाम की ओर झुक गया हो तो तुम उनसे विवाह कर सकते हो !!
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.... आस्था के मामले में वैवाहिक जीवन में कोई पक्ष किसी पर दबाव न डाले इसी का ध्यान रखते हुए मुस्लिम पुरुषों को मुस्लिम स्त्रियों के अतिरिक्त केवल एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाली अहले किताब स्त्रियों से विवाह की अनुमति है, जहां स्त्रियों के पूर्वधर्म का उनको पालन करने की आज़ादी देने में मुस्लिमों को अपनी आस्था में ख़राबी का कोई डर न हो... क़ुरआन में अहले किताब पुरुषों से मुस्लिम स्त्रियों के विवाह पर कुछ नहीं कहा गया, अतः मुस्लिम विद्वानों की अधिकांश राय ये है कि क्योंकि स्त्रियों को पुरुषों के मातहत रहना पड़ता है, इसलिए अहले किताब पुरुष से विवाह की स्थिति में ये डर है कि पुरूष स्त्री को इस्लामी ढंग से रोज़ा नमाज़ करने से रोकेंगे, इसलिए मुस्लिम स्त्रियों को ऐसे विवाह नही करने चाहिये !!
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..... तो हम देखते हैं कि क़ुरआन में जो स्थिति बताई गई है वो मुस्लिमों से विवाह करने के लिए गैरमुस्लिमों पर धर्म परिवर्तन का दबाव देने की नही है, .... और सोचिये कि अगर क़ुरआन में ये स्थिति बताई भी होती तो भी क़ुरआन या इस्लाम के आदेशों का पालन करने के लिए गैरमुस्लिम प्रतिबद्ध नहीं हैं, ..... क़ुरआन के आदेशों का पालन करने के लिए मुस्लिम प्रतिबद्ध हैं, जिन्हें "ला इकराहा फिद्दीन" सिखाया गया है और आदेश दिया गया है कि अपनी आस्था की सुरक्षा के लिए मनपसंद गैरमुस्लिमों से विवाह करने की बजाय वो गरीब मुस्लिम से विवाह को वरीयता दें .... 
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......और गैरमुस्लिम जब मुस्लिमों से विवाह के इच्छुक हों तो ज़ाहिर है वो क़ुरआन के आदेश से नही बल्कि अपने विवेक से फ़ैसला करने को स्वतंत्र होंगे....!!!

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इस्लाम में पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति के होने पर कई भाई आपत्ति जताते हैं कि स्त्री पुरूष समानता तो तभी सिद्ध होगी जब जिस तरह गरीब स्त्रियों को सहारा देने के लिए पुरुषों को एक से अधिक पत्नियों का भार वहन करने की शिक्षा दी गई, उसी तरह निर्धन पुरुषों का भार वहन करने के लिए सम्पन्न स्त्रियों को भी एक से अधिक पति रखने की शिक्षा दी जाती....!!!
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.... देखिये विवाह के बहुत से उद्देश्य होते हैं, जीवनसाथी का भरण पोषण उनमें से केवल एक उद्देश्य है, लेकिन विवाह के लिए इसके अलावा भी बहुत सी बातें ध्यान में रखनी होती हैं....  इस्लाम मे विवाह का उद्देश्य बताया गया है कि व्यक्ति अपनी पाक दामनी की सुरक्षा के लिए विवाह करे, न कि उन्मुक्त यौन सम्बन्ध बनाने के लिए.... यानी विवाह का मतलब ये हो कि इस विवाह में व्यक्ति को यौन संबंधों की सन्तुष्टि मिल जाये और उसके इधर उधर व्यभिचार करने की संभावना खत्म हो जाये, तथा एक साफ सुथरे दाम्पत्य जीवन के साथ वो समाज में सम्मान के साथ रह सके.. विवाह का मतलब ये न हो कि बिना किसी सामाजिक उत्तरदायित्व के व्यक्ति खाली उन्मुक्त यौन संबंध बनाए और फिर विवाह खत्म कर दे....!!!
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.... विवाह संस्था में स्त्रियों और पुरुषों को इस्लाम में वही कर्तव्य निभाने को दिये गए जिनके साथ प्राकृतिक तौर पर वो न्याय कर सकें यानी स्त्री जो प्राकृतिक तौर पर रचनात्मक कार्यों में रुचि रखती है, जिसका रुझान एक स्थान पर रुक कर चीज़ों की साज सम्हाल का अधिक होता है, इसलिए उसे अपने घर की साज सम्हाल की, बच्चों को पालने पोसने की ज़िम्मेदारी दी गई, जबकि पुरूष शक्ति प्रदर्शन और भागदौड़ के कामों में रुझान रखता है, तो उसको श्रम करके धनोपार्जन करने व अपने पत्नी बच्चों के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी दी गई..
.... देखा जाए तो स्त्री और पुरूष को दाम्पत्य जीवन में दी गई भूमिकाएं इसलिए भी परफेक्ट हैं क्योंकि गर्भावस्था के समय स्त्री को यूँ भी लम्बे समय तक एक जगह रहकर आराम करने की ज़रूरत होती है, यदि स्त्री पुरूष की भूमिका अदल बदल होतीं, पुरुष पर घर की साज सम्हाल और स्त्री पर धनोपार्जन के लिये भागदौड़ की ज़िम्मेदारी डाली गई होती तो हर बार गर्भधारण के समय और फिर शिशु के दूध पीने की अवस्था तक औरत को मजबूरन घर पर रहना पड़ता और दम्पत्ति का घर चलने में परेशानी खड़ी होती, 
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.... अब विवाह संस्था के भीतर यौन संबंधों की संतुष्टि एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है इसलिए स्त्रियों और पुरुषों दोनों पर इस विषय में भी ऐसी ज़िम्मेदारियाँ डाली जानी आवश्यक थीं, जिनको प्रत्येक आराम से पूरा कर सके, तो इस्लाम में पुरुषों को तो बहुपत्नी की अनुमति दी गई है, जब वो प्रत्येक पत्नी के प्रति कर्तव्य (आर्थिक और दैहिक दोनों ही कर्तव्य) पूरे कर सके (यदि वो प्रत्येक पत्नी के प्रति कर्तव्य पूरे न कर सके तो उसे भी एक ही पत्नी रखने का आदेश दिया गया है, क़ुरआन (4:3) में आया है कि "..किन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोंगे, तो फिर एक ही पर बस करो, इसमें तुम्हारे न्याय से न हटने की अधिक सम्भावना है"), 
....पर इस्लाम मे स्त्री को बहुपति की इजाज़त नही दी गई, 
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.... ऐसा इसलिये क्योंकि पुरुषों की शारिरिक बनावट  प्राकृतिक तौर पर ऐसी होती है कि वो यौन संबंधों को लेकर ज्यादा व्यग्र होते हैं और अपनी साथी से बार बार सेक्स की मांग किया करते हैं, और अगर एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियां भी हों तो भी वो सेक्स की दृष्टि से एक से अधिक स्त्रियों की दैहिक मांग सरलता से पूरी कर सकता है...
.... जबकि स्त्रियों की प्राकृतिक बनावट ऐसी होती है कि वो यौनेच्छा को लेकर बहुत कम व्यग्र होती हैं और अक्सर किन्ही भी कारणों से अपने पुरुष साथी की सेक्स की मांग को टाल दिया करती हैं.... आप पत्रिकाओं में यौन परामर्श के कॉलम्स में बहुतायत में यही सवाल पढ़ सकते हैं कि पत्नी सेक्स से भागती रहती है ... उसका कारण उपरोक्त ही है कि स्त्री प्राकृतिक तौर पर बहुतायत में सेक्स की चाह नही रखती, और इस कारण वो केवल एक ही पुरुष साथी से संतुष्ट हो जाती हैं, बल्कि उनका साथी ही अधिक सेक्स की चाह रखता है, और इनके सेक्स की मांग ठुकरा दिया करने पर इनसे असन्तुष्ट रहता है.... सोचिये अगर एक स्त्री के एक से अधिक पति हों और उनकी एक ही कॉमन पत्नी हो तो वो पति सेक्स को लेकर कभी सन्तुष्ट हो सकेंगे ??
.... एक पति अपनी गर्भवती पत्नी के आगे सेक्स की मांग नही रखता क्योंकि पत्नी के गर्भ में उसका ही शिशु पल रहा है, ये सोचकर वो अपने शिशु की सुरक्षा के लिए खुद ही पत्नी से सेक्स करने से रुकता है, पर सोचिये बहुपति की स्थिति में जब पत्नी एक पुरुष से गर्भवती होगी तो दूसरा पुरूष, या दूसरे दो तीन पुरुष अपनी सेक्स की मांग पूरी करने से किसी और के बच्चे के लिए क्यों रुकना चाहेंगे, और अगर पत्नी के ही मूड को वे ध्यान में रखेंगे तो मासिक धर्म के समय दूसरे पुरुषों से गर्भधारण के समय पत्नी उनके साथ सेक्स के लिए तैयार नहीं होगी, ऐसे में एक से अधिक पतियों में से प्रत्येक पति की बारी कितने दिनों पर आ सकेगी ?? और पुरूष इतना लंबा इंतज़ार बिना किसी लाभ क्यों करेंगे ??
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..... बहुपति का नियम इसलिए भी नहीं रखा गया था ताकि होने वाली सन्तान के पिता को लेकर कोई संशय न रहे, जब एक पति हो और उसकी एक पत्नी हो, या एक से अधिक पत्नी हों, अपनी पत्नियों की प्रत्येक सन्तान के विषय में पुरूष को पूरा विश्वास रहता है कि ये मेरी ही सन्तान है और वो सहर्ष सन्तानों को अपना नाम देता है और उनकी जिम्मेदारी उठाता है, लेकिन बहुपति की स्थिति में सन्तान के पिता को लेकर भारी संशय बना रहेगा.. आप आज डीएनए टेस्ट से बच्चे के सही पिता का पता लगाने की बात कह सकते हैं, लेकिन अगर चार पतियों की महिला के बच्चे से जिस पति का डीएनए मैच हो उसे फिर भी शक हो कि डीएनए रिपोर्ट बच्चे के असली पिता ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए बदल दी है, और वो बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने से इनकार कर दे तो ?? जब तक डीएनए टेस्ट नही था ये खतरा पूरी तरह से बना हुआ था कि सारे पतियों की सन्तानों के जीवन यापन का भार अंततः उनकी माँ पर डालकर पुरुष चले जाते... और आज भी ये खतरा पूरी तरह टला नही है, क्योंकि जब इंसान के मन में शक पड़ जाए तो फिर उसे टेक्नोलॉजी में हेरफेर का शक भी ज़रूर होगा.... इसलिए पहले से ही विश्वास बनाए रखने वाली व्यवस्था ज़्यादा ठीक है...
या फिर इस लड़ाई झगड़े की स्थिति आने वाली बात को भूल भी जाएं तब भी क्या एक से अधिक पतियों की एक पत्नी उनके बीच बिना सेक्स की इच्छा किये, सेक्स डॉल बनकर नही रह जाएगी ?? पतियों के भरण पोषण का अधिकार देकर बहुपति जायज़ कर देने का प्रश्न करने वाले ये भी नही सोचते कि बच्चे तो अंततः एक स्त्री को ही पैदा करने पड़ेंगे, और उसका हर पति जब उस स्त्री से अपनी दो तीन सन्तानें चाहेगा तो ये स्त्री बच्चे पैदा करती रहेगी या पतियों के भरण पोषण के लिए कारोबार करेगी ??
.... अब इन सब सवालों पर आपका जवाब ये हो कि पुरूष कॉमन पत्नी के अलावा भी दूसरी स्त्रियों से विवाह कर लें तो इस स्त्री पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा.. तो हम ये पूछेंगे कि फिर इस स्त्री से उनके विवाह का अर्थ क्या होगा सिवाय उन्मुक्त काम सम्बन्ध के ? और जब पुरुष को केवल अपने प्रति समर्पित किसी स्त्री से विवाह करना ही पड़ेगा तो उसका कई पुरुषों के प्रति समर्पित स्त्री से विवाह करना बेमानी साबित होता है, तो फिर उसका न करना बेहतर...!!

असल बात ये है कि इस्लाम में स्त्री को जो भी कर्तव्य और अधिकार दिए गए, वो उसकी क्षमताओं के साथ पुरी तरह से न्याय करने वाले हैं, ....वो लोग जो कुतर्क करते हैं कि इस्लाम मे स्त्री यहां पुरुष के समान नही आंकी गई, वहां समान नही आंकी गई, उन लोगों के आक्षेप सतही होते हैं, ध्यान से सोचें तो समझ में आ जाता है कि जो व्यवस्था इस्लाम ने दी, उससे बेहतर व्यवस्था वहां हो ही नहीं सकती थी...!!

और हां इस्लाम ने स्त्री को मां, बहन, बेटी, नर्स, गुरु और धर्म गुरु, बिजनेस वुमेन और पत्नी की अनेक भूमिकाओं मे पूरा सम्मान और असंख्य अधिकार सौंपे हैं, उनमें से  एक भूमिका "पत्नी" के पति के प्रति कर्तव्यों की यहाँ चर्चा की गई है, और स्पष्ट है इस भूमिका की चर्चा करते समय शरीर सुख और वंश वृद्धि का जिक्र होगा ही क्योंकि ये बातें विवाह के मुख्य उद्देश्यों मे सम्मिलित हैं, और न सिर्फ स्त्री बल्कि पुरुष भी स्त्री को शरीर सुख और संतान देता है, अत: शब्दजाल न फैलाइएगा कि इस्लाम में स्त्री को केवल भोग की वस्तु समझा गया है, सवाल भोग पर किया जाएगा, तो जवाब भी भोग पर ही दिया जाएगा... धन्यवाद !!!


गैर मुसलमानों को सलाम और दुवा।

... हमारे मुआशरे में ये एक गलतफहमी फैल गई है कि मुसलमानों को गैरमुस्लिमों से सलाम नही करना चाहिए, इसकी बुनियाद में दो हदीसें पेश की जाती हैं, लेकिन उनको देखने से पहले हमको ये देखना चाहिए कि क़ुरआन इस बारे में क्या हुक़्म दे रहा है ?
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... क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है "और जब कोई शख्स सलाम करे तो तुम भी उसके जवाब में उससे बेहतर तरीक़े से सलाम करो या वही लफ्ज़ जवाब में कह दो बेशक ख़ुदा हर चीज़ का हिसाब करने वाला है....(सूरह निसा, आयत 86) इस आयत में ये नहीं कहा गया कि सिर्फ मुस्लिम के सलाम का जवाब दो, बल्कि इस हुक़्म में पूरी मानवजाति आ जाती है, जिनको हमें सलाम का जवाब बेहतर अल्फ़ाज़ में देना है..

क़ुरआन में कहीं भी गैरमुस्लिमों को सलाम करने पर रोक नही लगाई गई है, बल्कि क़ुरआन की कुछ आयतें तो ये साफ़ ज़ाहिर कर देती हैं कि आम अच्छी आदत के गैरमुस्लिमों की बात तो पीछे रही, इससे आगे बढ़कर जो लोग काफ़िर भी हों, मुस्लिमों से झगड़ने वाले भी हों, उन्हें भी मुस्लिमों को सलाम कह देना चाहिए .."और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ, तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) को नहीं चाहते...(सूरह कसस, आयत 55).
.... "और रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर विनम्रता के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे भिड़ जाते हैं, तो कहते हैं कि तुम को सलाम"....(सूरह फुरकान, आयत 63)
... इसी तरह सूरह मरियम (19:47) में हज़रत इब्राहीम द्वारा अपने गैरमुस्लिम पिता को सलाम कर के घर छोड़ने की आयत से पता चलता है कि अम्बिया गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे !!
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.... क़ुरआन में गैरमुस्लिमों को सलाम करने की दलील देने वाली इन आयतों के बाद अब उन हदीसों की बात कर ली जाए...
.... एक तो ये हदीस है कि यहूद और नसारा को सलाम में पहल न करो, (यानी वो सलाम करें तब जवाब दो) वो मदीना के एक ख़ास ग्रुप के लिए थीं जो मुसलमानों के खुले दुश्मन थे, और मुसलमानों के साथ बुरा सुलूक करते थे, तो ये बात उस छोटे से ग्रुप के लिए थी, न कि रहती दुनिया तक के यहूद और नसारा के लिये... और अगर यहूद और नसारा पर अप्लाई भी कर दें तो दूसरी गैरमुस्लिम कम्युनिटीज़.. हिन्दू, सिखों बौद्धों पर तो नही कर सकते.. 
... इसी तरह दूसरी हदीस यानी गैरमुस्लिम को सलाम के अधूरे जवाब वाली हदीस भी एक यहूदी की शरारत पर बेस्ड थी, उसने नबी सल्ल० से आकर कहा "साम अलैकुम" जिसका मतलब 'तुमपर मौत हो', इसके जवाब में नबी सल्ल० ने केवल इतना कहा "व अलैकुम" यानी "तुम पर भी" Same to you.... यहूदी लज्जित होकर चला गया.... यहां ध्यान दीजिये नबी सल्ल० पूरे पूरे वही अल्फ़ाज़ लौटा सकते थे कि "व अलैकुम साम" यानी "तुम पर भी मौत हो" .... लेकिन नबी सल्ल० ने जो लफ़्ज़ नही नही लौटाए, उनका मतलब बुरा था, यानी नबी सल्ल० ने बुराई करने वाले यहूदी के लिये भी बुरा लफ़्ज़ नही बोला.... इस हदीस से ये मतलब नही निकलता कि अच्छी नीयत से सलाम करने वाले गैरमुस्लिम को जवाब देते वक्त हम दुआ के अल्फ़ाज़ रोक लें, बल्कि उस हदीस में तो नबी सल्ल० ने बद्दुआ के अल्फ़ाज़ रोके थे... और ज़ाहिर है जब कोई गैरमुस्लिम हमको सलाम करेगा तो अधूरे जवाब "व अलैकुम" का मतलब भी व अलैकुम अस्सलाम ही होगा !!
.... सही बात ये है कि साफ़ दिल के गैरमुस्लिमों को सलाम करने और उनके सलाम का पूरा जवाब देने से रोकने वाली बात कोई हदीस भी नहीं करती, और प्यारे नबी नबी सल्ल० अपनी अमली ज़िन्दगी में गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे, इस बात का पता हमें चलता है, जब हम नबी सल्ल० का बहरीन के हाकिम "मुन्ज़िर इब्न सवा अल तमीमी" को इस्लाम की दावत देने के लिए लिखे गए ख़त का मज़मून पढ़ते हैं, जिसमें आप सल्ल० ने मुन्ज़िर को "सलाम अलैक" के अल्फ़ाज़ लिखे हैं, जबकि अभी मुन्ज़िर मुस्लिम नही बने थे, ये मज़मून आपको सीरत की किसी भी अच्छी किताब में मिल जाएगा और इंटरनेट पर भी नबी सल्ल० के इस खत का मज़मून मौजूद है, .... किस्सा तमाम ये कि क़ुरआन और सुन्नत बताते हैं कि आप गैरमुस्लिमों से सलाम करें, .... ये उनके हक में एक अच्छी दुआ है, और ज़िंदा इंसानों के हक में भलाई की दुआ करने से इस्लाम कहीं नही रोकता !!

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गैरमुस्लिमों को सलाम" कल की पोस्ट में अलग अलग दो जगहों पर इतना और अपडेट किया है-
... "प्यारे नबी सल्ल० अपनी अमली ज़िन्दगी में गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे, इस बात का पता हमें चलता है, जब हम नबी सल्ल० का बहरीन के हाकिम "मुन्ज़िर इब्न सवा अल तमीमी" को इस्लाम की दावत देने के लिए लिखे गए ख़त का मज़मून पढ़ते हैं, जिसमें आप सल्ल० ने मुन्ज़िर को "सलाम अलैक" के अल्फ़ाज़ लिखे हैं, जबकि अभी मुन्ज़िर मुस्लिम नही बने थे, ये मज़मून आपको सीरत की किसी भी अच्छी किताब में मिल जाएगा और इंटरनेट पर भी नबी सल्ल० के इस खत का मज़मून मौजूद है, .... इसी तरह सूरह मरियम (19:47) में हज़रत इब्राहीम द्वारा अपने गैरमुस्लिम पिता को सलाम कर के घर छोड़ने की आयत से पता चलता है कि अम्बिया गैरमुस्लिमों को सलाम किया करते थे !!"

इसी तरह हब्शा के ईसाई हाकिम नजाशी को लिखे ख़त में भी आप सल्ल० ने "सलाम अलैक" के अल्फ़ाज़ नजाशी को लिखवाए थे।

मंदिर ध्वस्त के आरोप, राजपूतानी जौहर, पाक हिन्दू संख्या।




आज मुगल इतिहास के एक महत्वपूर्ण शासक "औरंगज़ेब आलमगीर" की जन्मतिथी है, (3 या 4 नवम्बर 1618 ईसवी) .... मुग़ल शासक औरंगजेब को अंग्रेज इतिहासकारों ने बहुत ज़्यादा क्रूर, हिन्दू द्वेषी और मंदिरों को तोड़ने वाला बताया है.... लेकिन जब औरंगज़ेब के समय के अभिलेखों का अध्ययन किया जाता है तो कहानी कुछ और ही नज़र आती है इस विषय में पहले बहुत सी पोस्ट्स में मैं आपको बताता रहा हूँ.... संगीत के विषय में औरंगजेब के क्या रवैया था, ये बताना रह गया था... चलिए वो भी किसी दिन बताऊंगा पर आज शबनम शुक्ला जी की पोस्ट के कुछ अंश शेयर कर रहा हूँ... पढ़ियेगा
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...... "इतिहासकार ईटन के मुताबिक औरंगजेब के शासन में जिन मन्दिरों के तोड़े जाने का उल्लेख मिलता है तो वास्तविकता ये है कि केवल वही मंदिर तोड़े गए जिनमें विद्रोहियों को शरण मिलती थी या जिनकी मदद से बादशाह के खिलाफ़ साजिश रची जाती थी।उस समय मंदिर तोड़ने का कोई धार्मिक उद्देश्य नहीं था। उसके शासनकाल में मंदिर ढहाने के उदाहरण बहुत ही दुर्लभ हैं (ईटन इनकी संख्या 15 बताते हैं) और जो हैं उनकी जड़ में राजनीतिक कारण ही रहे हैं। उदाहरण के लिए औरंगजेब ने दक्षिण भारत में कभी-भी मंदिरों को निशाना नहीं बनाया जबकि उसके शासनकाल में ज्यादातर सेना यहीं तैनात थी।
उत्तर भारत में उसने जरूर कुछ मंदिरों पर हमले किए जैसे मथुरा का केशव राय मंदिर लेकिन इसका कारण धार्मिक नहीं था। मथुरा के जाटों ने सल्तनत के खिलाफ़ विद्रोह किया था (मन्दिर का उपयोग विद्रोही छिपने के लिए कर रहे थे) इसलिए यह हमला किया गया।
ठीक इसके उलट कारणों से औरंगजेब ने मंदिरों को संरक्षण भी दिया। यह उसकी उन हिंदुओं को भेंट थी जो बादशाह के वफादार थे। किंग्स कॉलेज, लंदन की इतिहासकार कैथरीन बटलर तो यहां तक कहती हैं कि औरंगजेब ने जितने मंदिर तोड़े, उससे ज्यादा बनवाए थे. कैथरीन फ्रैंक, एम अथर अली और जलालुद्दीन जैसे विद्वान इस तरफ भी इशारा करते हैं कि औरंगजेब ने कई हिंदू मंदिरों को अनुदान दिया था जिनमें बनारस का जंगम बाड़ी मठ, चित्रकूट का बालाजी मंदिर, इलाहाबाद का सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर और गुवाहाटी का उमानंद मंदिर सबसे जाने-पहचाने नाम हैं।
इसी से जुड़ी एक दिलचस्प बात है कि मंदिरों की तोड़फोड़ भारतीय इतिहास में सिर्फ मुगलकाल तक सीमित नहीं है। 1791 में मराठा सेना ने श्रृंगेरी मठ पर हमला कर शंकराचार्य मंदिर में तोड़फोड़ की थी क्योंकि इसे उसके दुश्मन टीपू सुल्तान का संरक्षण हासिल था।
.... औरंगजे़ब की सेना में वरिष्ठ पदों पर बड़ी संख्या में राजपूत नियुक्त थे।मराठा और सिखों के खिलाफ औरंगजे़ब के हमले को धार्मिक चश्मे से देखा जाता है लेकिन यह निष्कर्ष निकालते वक्त इस बात की उपेक्षा कर दी जाती है कि तब युद्ध क्षेत्र में मुगल सेना की कमान अक्सर राजपूत सेनापति के हाथ में होती थी।उसके सेनापति और खजांची हिन्दू थे।
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.... औरंगज़ेब नृत्य-संगीत के विरोध में भी नहीं था, लेकिन इसमें लिप्त हो कर काम- काज में लापरवाही एकदम नापसंद करता था, इसलिए अंकुश रखता था
.... औरंगजेब को कट्टरपंथी साबित करने की कोशिश में एक बड़ा तर्क यह भी दिया जाता है कि उसने संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन यह बात भी सही नहीं है। कैथरीन बताती हैं कि सल्तनत में तो क्या संगीत पर उसके दरबार में भी प्रतिबंध नहीं था। बादशाह ने जिस दिन राजगद्दी संभाली थी, हर साल उस दिन उत्सव में खूब नाच-गाना होता था। कुछ ध्रुपदों की रचना में औरंगजे़ब नाम शामिल है जो बताता है कि उसके शासनकाल में संगीत को संरक्षण हासिल था। कुछ ऐतिहासिक तथ्य इस बात की तरफ भी इशारा करते हैं कि वह खुद संगीत का अच्छा जानकार था। “मिरात-ए-आलम” में बख्तावर खान ने लिखा है कि बादशाह को संगीत विशारदों जैसा ज्ञान था। मुगल विद्वान फ़क़ीरुल्लाह ने “राग दर्पण” नाम के दस्तावेज में औरंगजे़ब के पसंदीदा गायकों और वादकों के नाम दर्ज किए हैं। औरंगजे़ब को अपने बेटों में आज़म शाह बहुत प्रिय था और इतिहास बताता है कि शाह अपने पिता के जीवनकाल में ही निपुण संगीतकार बन चुका था। बादशाह के बेटे आज़म शाह की ब्रज कविता में खासी दिलचस्पी थी। ब्रज साहित्य के कुछ बड़े नामों जैसे महाकवि देव को उसने संरक्षण दिया था। 
एक बड़े कवि वृंद तो औरंगजे़ब के प्रशासन में भी नियुक्त थे।"

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तीन साल पहले आज के दिन, यानि 26 नवम्बर, 2017 को ये पोस्ट संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पद्मावत के लेकर चल रहे विवाद के समय लिखी थी, आज फिर हवाई किस्सों की बजाय इतिहास के तथ्य देखे जाएं.....
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.... "भारतीय क्षेत्र में शासक की हार पर जौहर एक अतिप्राचीन प्रथा थी जिसमे जब भारत के किसी राजा की किसी युद्ध में हार हो जाती थी तो उसके रनिवास की रानियां आत्महत्या कर लिया करती थीं.... सम्भवतः ये प्रथा सती प्रथा का ही वैविध्य थी... कुछ लोग जौहर के लिये मुस्लिम आक्रमणकारियों की कुदृष्टि को दोष देते हैं... लेकिन इतिहास में तो जौहर प्रथा की जड़ें ईसा से भी 300 वर्ष पहले से मिलती हैं
सिकंदर के समय में भी ये प्रथा थी जिसका ज़िक्र एरियन ने दूसरी शताब्दी ईस्वी में किया है कि जब सिकंदर की सेना ने उत्तर पश्चिम भारत के "अगलासोई" जाति की सेना को परास्त कर दिया तो ये सुनकर इस जाति की पूरी बस्ती के स्त्री पुरुषों ने बच्चों सहित आत्मदाह कर लिया था... 
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.... ये प्रथा अपने साथ खुद एक किस्म की क्रूरता और जल्दबाज़ी ही कही जाएगी, क्योंकि हर आक्रमणकारी आपकी अस्मिता पर ही आक्रमण करने आया हो ऐसा नही होता था... सिकंदर ने जिन भारतीय क्षेत्रों पर हमला किया वहां जनसंहार या स्त्रियों के अपहरण नही किए उसका उद्देश्य केवल राज्य विस्तार था.... इसी तरह अकबर जो हिन्दू रीती रिवाजों को प्रश्रय देने के लिये प्रसिद्ध है, उस अकबर का भी उद्देश्य राज्य विस्तार ही होता था, परंतु जब अकबर की सेना ने चित्तौड़ विजय किया तो अबुल फजल ने उस घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि चित्तौड़ के पुरुषों ने अपनी स्त्रियों को आग में झोंक दिया और फिर खुद आत्महत्या कर ली....
... इससे पूर्व अलाउद्दीन खिलजी द्वारा जीते गए कुछ क्षेत्रों की रानियों (पद्मावती नही) द्वारा भी जौहर का उल्लेख है, पर अलाउद्दीन का उद्देश्य भी रानियों के शील भंग की बजाये राज्य विस्तार था... जीते हुए क्षेत्रों के शासकों के साथ अलाउद्दीन खिलजी का व्यवहार देखना हो तो हमे देवगिरि के शासक रामचंद्र देव के साथ खिलजी का व्यवहार देखना चाहिये... जब परास्त हुए रामचन्द्र देव को अलाउद्दीन खिलजी के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो खिलजी ने उसके साथ उदारता का व्यवहार करते हुए ‘राय रायान’ की उपाधि प्रदान की। उसे सुल्तान ने गुजरात की नवसारी जागीर एवं एक लाख स्वर्ण टके देकर वापस भेज दिया, इस तरह राजा रामचन्द्र देव और अलाउद्दीन का में मित्रता का संबंध बन गया था....!!!"

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हमारे कुछ भाइयों को लगातार गोदी मीडिया के द्वारा ये गलत आँकड़े बताए गये हैं कि पश्चिमी पाकिस्तान यानी आज के पाकिस्तान में 1947 में हिंदुओं का प्रतिशत करीब 23% था जो आज महज़ 2% के आसपास रह गया है, वहीं पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में 1947 में हिन्दू करीब 22% थे जो आज 7% से कुछ कम हो चुके हैं।.... ये आबादी की गिरावट दोनों ओर के पाकिस्तान में गैरमुस्लिमों के धार्मिक उत्पीड़न के कारण हुई है...और आंकड़ों के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ बहुत बुरा व्यवहार होता है क्योंकि वहां अल्पसंख्यक आबादी में भयंकर गिरावट आई है.... हमारे कुछ भाई जब तब ये आपत्ति उठाते रहते हैं, सो इस आपत्ति का उत्तर देना मैने ज़रूरी समझा है !!
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.... सही बात ये है कि ये आंकड़े काफी गलत हैं, कुछ ऐसे ही आंकड़े पिछले साल संसद में सीएए के पक्ष में माहौल बनाने के लिए अमित शाह जी भी दे रहे थे कि "1947 में पाकिस्तान में 23% अल्पसंख्यक थे और आज वहां अल्पसंख्यक मात्र 3.7% रह गए, ... बाक़ी लोग कहां गए ? या तो उन्हें मार दिया गया होगा, या उनका धर्मपरिवर्तन कर दिया गया होगा"
.... अमित शाह जी के इस व्यक्तव्य के बाद न्यूज़ एजेंसी इंडिया टुडे ने इन आंकड़ों की सच्चाई पता लगाने के बाद एक रिपोर्ट पब्लिश की थी, जहां पाया गया कि अमित शाह जी के ये आंकड़े सरासर झूठे थे....
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.... इंडिया टुडे की रिपोर्ट मे पता लगा था कि 1947 में पाकिस्तान के गठन के समय ऐसे कोई धर्म आधारित जनसंख्या के आंकड़े प्रस्तुत ही नहीं किये गए थे जो 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या पर अमित शाह जी कोई सही दावा प्रस्तुत कर सकें.... सबसे पहले 1951 में पाकिस्तान के गठन के बाद जनगणना के 
आंकड़े प्रस्तुत किये गए, जिसके आधार पर हिंदुओं की जनसंख्या पश्चिमी और पूर्वी दोनों ओर के पाकिस्तान को मिलाकर कुल आबादी की 14.20% थी, न कि अमित शाह जी के दावे के अनुसार 23%
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..... 1951 में आज के पाकिस्तान और तब के पश्चिमी पाकिस्तान में गैरमुस्लिम आबादी का प्रतिशत 3.44% था, और वहां हमेशा गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 3% के आसपास ही बना रहा है बल्कि बाद के वर्षों में ये प्रतिशत बढ़ा है .... 1961 के आंकड़ों में ज़रूर पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी में गिरावट रिकॉर्ड की गई थी तब वहां ये प्रतिशत घटकर 2.83% हो गया था, इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक ये भी हो सकता है कि इनमें से कई अल्पसंख्यक, गैरमुस्लिम जनसंख्या के अधिक घनत्व वाले क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में चले गए हों, 
बहरहाल 1972 में पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक आबादी का प्रतिशत बढ़कर 3.25%, ... फिर 1981 में बढ़कर 3.33% और 1998 में बढ़कर 3.70% हो गया था... यानी पश्चिमी पाकिस्तान में उत्तरोत्तर अल्पसंख्यकों की आबादी के प्रतिशत में बढ़ोतरी ही हुई है, न कि भाजपा के दावे के मुताबिक कमी....!!!
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... 1951 में आज के बांग्लादेश में हिंदुओं की अधिक आबादी थी, लगभग 23.20% गैरमुस्लिम वहां 1951 में थे, 1972 में बांग्लादेश के गठन के समय वहां गैरमुस्लिमों की आबादी 22% थी.... बांग्लादेश में ज़रूर उत्तरोत्तर गैरमुस्लिमों की आबादी के प्रतिशत में गिरावट आई है और आज के समय मे बांग्लादेश में गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 9% के पास है.... लेकिन यहां गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत घटने का कारण धार्मिक उत्पीड़न नही है, बल्कि बांग्लादेश के गठन के पहले वहां से आने वाले शरणार्थियों के लिए भारतीय सीमा के दरवाज़े खुले रखना और बांग्लादेश के गठन के बाद में मित्र देश होने के नाते  उसकी सीमाओं पर निगरानी न रखने के कारण वहां से लगातार गैरमुस्लिमों का भारत आते रहना कारण है....
... बांग्लादेश अपने गठन से लेकर आज तक मित्र देश है, वहां से कई हिन्दू यहां हिन्दू बहुल देश मे उनके विकास के ज़्यादा मौके होने के लालच में घुसपैठ करते आये हैं, जो असम में रहते हैं और एनआरसी का मुद्दा इन्ही घुसपैठियों की वजह से असम में ये समझकर उभरा था कि बांग्लादेश से शायद मुस्लिम आ गए हैं 
.... बांग्लादेश के गठन से लेकर आज तक वहां की अल्पसंख्यक आबादी के प्रतिशत में जितनी गिरावट हुई है, ये जनसंख्या क़रीब 2 करोड़ के आसपास बैठती है, .... क्या वाकई इतनी बड़ी संख्या में भारत में बांग्लादेशियों ने घुसपैठ की होगी ?? 2016 के आखिरी में संसद में एक प्रश्न का जवाब देते हुये गृहराज्य मंत्री किरन रिजिजू ने बताया था कि उस वक्त भारत में करीब 2 करोड़ गैरकानूनी बांग्लादेशी प्रवासी है. किरण रिजिजू के बताये आंकड़ों से करीब एक दशक पहले 14 जुलाई, 2004 को संसद में गैर कानूनी बांग्लादेशी घुसपैठियों के बारे में संसद में बोलते हुये तत्कालीन गृहराज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने कहा था कि देशभर में अलग-अलग हिस्सों में करीब 1.2 करोड़ घुसपैठिए रह रहे हैं. जिसमें से 50 लाख लोग केवल असम में रह रहे हैं.
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.... ख़ैर, ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अमित शाह जी ने संसद में बांग्लादेश के आंकड़ों को भूलवश पाकिस्तान के आंकड़े समझ लिया होगा क्योंकि उन्होंने अपने उसी व्यक्तव्य में अलग से बांग्लादेश के आंकड़ों का भी ज़िक्र किया था और 1947 में बांग्लादेश में गैरमुस्लिमों की आबादी का प्रतिशत 22% और वर्ष 2011 में 7.9% बताया था, जो लगभग लगभग बांग्लादेश के सही आंकड़ों के आसपास है.... इससे स्पष्ट है कि पश्चिमी पाकिस्तान के बारे में बताते हुए अमित शाह जी को सारी वास्तविकता पता थी, पर उन्होंने धर्म आधारित राजनीति के कारण सही आंकड़े बताने की बजाय जनता की भावनाओं को भड़काने वाला बयान दिया था
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https://www.indiatoday.in/india/story/pakistan-bangladesh-non-muslim-population-citizenship-amendment-bill-bjp-1627678-2019-12-12?



तस्वीर और मुजतसमे, संगीत, डार्विन।

दीन में बुत और तस्वीरों को लेकर रुख
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....अहादीस में ज़िक्र आता है कि नबी सल्ल० ने फरमाया कि कयामत के रोज़ सबसे ज्यादा अज़ाब उनपर होगा जो तस्वीरें बनाते थे, एक दूसरी हदीस में है कि अल्लाह की बनाई तख़लीक़ (रचना) की नक़ल करने वालों से अल्लाह सख़्त नाराज़ होता है,
और एक तीसरी हदीस है कि तस्वीर बनाने वालों से कयामत के दिन अल्लाह कहेगा कि इनमें जान डालो, और वो नही डाल सकेंगे, तो फिर उन लोगों को दोज़ख़ में डाल दिया जाएगा
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.... तीसरी हदीस की बुनियाद पर आलिमों ने क़यास किया है कि सिर्फ़ जानदार जैसे चिड़िया, जानवरों और इंसानों की तस्वीर बनाना मना है पर फूल, पत्ती, इमारतों वगैरह की तस्वीर बनाना गुनाह नही है...
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क़ुरआन में तस्वीर बनाने की मनाही का जिक्र कहीं भी नहीं आता, और आमतौर पर मान लिया गया है कि तस्वीर की मनाही का मामला बुत की मनाही के हुक्म में ही आता है, अल्लाह ने क़ुरआन में बुत को हराम फ़रमाया है, क़ुरआन में बुत को हराम फरमाने की वजह उसका पूजा जाना है, इस हुक्म के बाद मुस्लिम उलमा ने एहतियातन पूजे जाने और न पूजे जाने वाले तमाम बुतों के बनाने और अपने घरों में रखने की मनाही कर दी कि कहीं न पूजे जाने वाले बुतों की गलती से पूजा चल पड़ी तो गुनाह होगा, यही रुख तस्वीरों को लेकर भी अपनाया गया कि न पूजे जाने वाले जानदारों की तस्वीर इसलिये न बनाई जाएं कि कहीं गलती से उनकी पूजा न चल पड़े
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..... लेकिन क़ुरआन के इस हुक़्म कि बुत हराम है, के बाद अगर हम हदीस का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि हदीस ने बुत के हराम होने के हुक्म पर कुछ और तफ्सील भी दी है जो हमें बताती है कि हर किस्म का बुत हराम नही है बल्कि एक खास मकसद से बनाये जाने वाले बुतों का ही बनाना और इस्तेमाल करना हराम है,
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.... बुख़ारी, मुस्लिम, निसाई और इब्ने माजाह समेत कई हदीस की किताबों में, बहुत मशहूर अहादीस में बीवी आयशा रज़ि० की गुड़ियों का ज़िक्र है, और अबू दाऊद शरीफ़ की किताब उल अदब में नम्बर 4914 (इंग्लिश ट्रांसलेशन) में सही दर्जे की हदीस में हज़रत आयशा रज़ि० के पास मौजूद  एक दो परों वाले खिलौने घोड़े का ज़िक्र है जिसके ज़िक्र पर आप सल्ल० ने तबस्सुम फ़रमाया था... ज़ाहिर है ये खिलौने छोटे साइज़ के बुत ही होते हैं, और प्राचीन इतिहास से लेकर आज तक की मिसालें मौजूद हैं कि बहुत से समाजों में गुड़ियों की भी पूजा होती है,
.... लेकिन मुस्लिमों के लिए गुड़ियों को बनाने और घर में रखने का मक़सद इनकी पूजा हरगिज़ न था बल्कि मनोरन्जन था, इसलिये नबी सल्ल० ने मुस्कुरा कर इनकी इजाज़त दे दी थी.... यानी इन गुड़ियों के बनाने पर अल्लाह की रचना की नकल करने  से अल्लाह के नाराज़ होने की बात नहीं है, वरना नबी सल्ल० मुस्कुरा कर चुप न रहते, बल्कि इन खतरों से लोगों को पहले ही की तरह आगाह करते.......
... ये बहुत मशहूर, और कुबूल की जाने वाली हदीस ये बात साफ़ करती है कि किसी मुबाह मकसद से अल्लाह की बनाई रचना की नकल अल्लाह को ऐसे सख्त गुस्से में नही डालती, कि अल्लाह बनाने वाले से उस चीज़ में जान डालने का सवाल करें और दोज़ख़ में डाल दें, यानी अल्लाह को किसी एक खास मकसद से बनाए गए बुत ही नाराज़ करते हैं, अगर इंसान अल्लाह के आदेशों को ठुकराते हुए, ऐसे किसी दावे से अल्लाह की बनाई रचना की नकल बनायेगा कि उसकी बनाई गई चीज़ में भी जान है, तो ये दावा अल्लाह को ज़रूर गुस्से में डालने वाला होगा, और ऐसे ही सरकश आदमी से अल्लाह कयामत में सवाल करेगा कि अपनी बनाई तख़लीक़ में जान डालो, ..... खिलौनों की शक्ल में छोटे बुत बनाने वाला शख्स अपने बनाए खिलौनों में कभी जान होने का दावा करता भी नहीं, लेकिन पूजे जाने वाले बुतों को बनाने और पूजने वाले लोग, बुतों के बारे में ये ही अक़ीदा रखते थे कि ये बुत ज़िंदा ख़ुदा हैं, और ये दावा करते थे कि ज़िंदा होने के सबब ये बुत उनकी प्रार्थना सुनते हैं और पूरी करते हैं, बुतों के जिंदा रहने की इसी धारणा को गलत बताते हुए अल्लाह ने क़ुरआन में जगह जगह फ़रमाया है कि जिनको तुम अल्लाह से इतर पूजते हो ये बुत ज़िंदा नही हैं, बल्कि मुर्दा हैं, ये तुम्हारी पुकार को सुन नही सकते ...ख़ासकर क़ुरआन में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बचपन का जो क़िस्सा बयान हुआ है, उसे देखें, नबी इब्राहीम किस किस तरीके से लोगों के इस दावे का विरोध करते हैं कि उनके बनाये बुतों में जान है, या कुछ शक्ति है, इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने समुदाय के लोगों से कहते हैं कि इन बुतों को तुम लोग तराशते हो और फिर उनकी पूजा करने लगते हो, जबकि इन बुतों में कोई शक्ति नही है, न ये बोल सकते हैं, न खा सकते हैं, न हिल ही सकते हैं, तुम लोग खुली गुमराही में  पड़े हुए हो... क़ुरआन ने ये बात रोज़े रौशन की तरह साफ़ बता रखी है कि बुतों को बनाकर उनके ज़िंदा होने का दावा करना और ये मानकर उनकी पूजा करना, करवाना ही अल्लाह को गुस्से में डालने वाला गुनाह है
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... अहादीस से हम ये बात भी जानते हैं कि पुराने नबियों और सन्तों की तस्वीरें बनाकर भी लोग उन्हें पूजा करते थे... यानी वहाँ तस्वीर को भी जिंदा सन्त मान लेने, और दुआएं कुबूल करने की कुदरत रखने वाला मानने की प्रवृत्ति मौजूद थी .... ज़ाहिर है, तस्वीरों की मनाही, और उनके बनाने पर अज़ाब की बात कहने वाली तमाम अहादीस में किसी और किस्म की तस्वीर की बात नहीं है, बल्कि सिर्फ इसी किस्म की तस्वीरों के बनाने वालों पर अज़ाब की बात है कि बनाने वाले ये दावा करते थे कि तस्वीर में मौजूद शख़्स ज़िंदा है और तसवीर के ज़रिये इंसानों की पूजा और प्रार्थना सुन और कुबूल कर सकता है... यही सरकश दावा करने वालों पर अल्लाह क्रोध करता है, और कयामत के रोज़ उनसे कहेगा कि अपनी बनाई हुई तस्वीरों में जान डालो, यानी जिनको दुनिया में बनाकर ये उन तस्वीरों में जान होने का दावा करते थे, अब अल्लाह के सामने अपने उस दावे को साबित करें, जो कि वो हरगिज़ न कर सकेंगे, और अज़ाब के मुस्तहिक़ होंगे, 
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... लेकिन अक्सर मुसव्विर अल्लाह की बनाई रचना यानी फूल पत्तियों और सीनरी वगैरह की खूबसूरती से प्रभावित होकर इनकी तसवीर बनाते हैं, इसी तरह अल्लाह की बनाई जानदार चीज़ों की खूबसूरती से प्रभावित होकर भी अक्सर मुसव्विर उनकी तसवीर बनाते हैं, ऐसी तस्वीरों के बनाने पर अल्लाह नाराज़ होगा ??
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...... क़ुरआन से ही एक इशारा मिलता है कि ऐसी तस्वीरों के बनाये जाने से अल्लाह को कोई आपत्ति नहीं है.....
.... क़ुरआन में सूरह सबा में अल्लाह सुलैमान अलैहिस्सलाम पर अपनी अनुकम्पा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि हमने सुलैमान की सेवा में कुछ जिन्न कर दिये थे जो सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिये बड़े बड़े महल, तमासील, और बड़ी बड़ी देगें बनाते थे" (34:13) यहां तमासील का अर्थ तस्वीरें या प्रतिमाएं हैं जिनमें जानदार और बेजान दोनों किस्म की चीज़ों का चित्रण शामिल है.... यहाँ इन तमासील का ज़िक्र बहुत सुंदर सजावटी चीज़ों के तौर पर अल्लाह ने किया है, यानी इन तस्वीरों के बनाने की अल्लाह ने तारीफ़ की, न कि किसी नाराज़गी का ज़िक्र
.... यानी क़ुरआन में तस्वीरों की मनाही का तो ज़िक्र नही, पर उनकी तारीफ़ ज़रूर है .... इससे ज़ाहिर है कि अगर अल्लाह को नाराज़ करने के मकसद से नही, बल्कि किसी साफ़ सुथरे मक़सद से कोई शख्स किसी जानदार की साफ़ सुथरी तस्वीर बनाता है तो इसमें कोई भी गुनाह या ख़राबी की बात नहीं होगी, बल्कि जिस तरह इंसान की शक्ल की गुड़ियों को बनाने पर इस्लाम को कोई ऐतराज़ नही उसी तरह ऐसे जानदारों की तस्वीरों के बनाने पर भी ऐतराज़ नही है जिनके बनाने का मक़सद उनकी पूजा न हो, 
.... आज तो मुस्लिम उलमा की एक बड़ी तादाद इस बात पर मुत्तफ़िक हो गई है कि लोगों को एजुकेट करने के मकसद से जानदार की तस्वीर बनाई जा सकती है, किसी मुजरिम को पकड़वाने के लिए उसकी पोट्रेट बना सकते हैं, और भी कई वजहों से तस्वीर बनवाई जा सकती है
लेकिन आपको बताऊं कि अल्लाह की नाफरमानी का मकसद न हो तो किसी सही मकसद से एक मुसलमान किसी जानदार की तस्वीर बना सकता है, ये ख़्याल नया नही बल्कि हमेशा से इस खयाल के लोग मुसलमानों के बीच रहे हैं, 
मुझे अभी पिछले ही दिनों सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम साइंटिस्ट इमाम अबु अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद द्वारा अब से आठ सौ साल पहले बनाई गई एक मगरमच्छ और उसके दांतों में से अपना खाना कुरेदते एक परिंदे की तस्वीर का ध्यान आता है जो तस्वीर उन्होंने लोगों को एजुकेट करने के मकसद से बनाई थी

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मैंने कई गैरमुस्लिम दोस्तों के मुंह से सुना कि मोटे तौर पर इस्लाम के नियम उन्हें पसन्द आते हैं.. पर कुछ चीज़ों में इस्लाम की सख़्ती उन्हें इस्लाम के क़रीब आने से डराती है...
... इस्लाम में संगीत को हराम ठहराया जाना, ऐसी ही सख्ती है, जिसका कारण उन्हें समझ नहीं आता... मैंने कई भाइयों से ये शिकायत सुनी, उनमें कुछ तो यूँ ही आपत्ति जता रहे थे, लेकिन कई भाइयों के लहजों से महसूस हुआ कि वाक़ई संगीत को पसन्द करने वाली सांस्कृतिक पृष्टभूमि में रहने वाले मेरे भाई इस्लाम को पसन्द करने के बावजूद इससे एक ऐसे विचार को लेकर दूर हैं, जो विचार वास्तव में पूरी तरह उन्हें नही बताया गया...
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... आम ख्याल है कि इस्लाम में गीत संगीत को मना किया गया है, लेकिन दूसरी ओर हम ये भी जानते हैं कि मदीना के लोग नबी सल्ल० के स्वागत में गीत गाते थे और आप सल्ल० ने उन्हें वो गीत गाने से नही रोका....!!!
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.... क़ुरआन में गीत संगीत का नाम लेकर उसकी मनाही के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, ... अलबत्ता ये कहा जाता है कि क़ुरआन की कुछ आयतों में इनडायरेक्टली संगीत की मनाही की गई है
... दूसरी ओर कुछ अहादीस से पता चलता है कि नबी सल्ल० ने संगीत की मनाही की थी, पर जब इस विषय की सारी हदीसों को इकट्ठा कर के उनका अध्ययन किया जाता है तो पता चलता है कि गीत संगीत अपने आप मे कोई बुरी चीज़ नहीं हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल व्यभिचार, कुफ्र और शिर्क और शराबनोशी जैसे हराम कामों को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है.... (इसका एक उदाहरण बुख़ारी शरीफ़, किताब-59, हदीस-340 में दर्ज रिवायत से पता चलता है कि उस दौर में गाने बजाने की महफिलों में शराब पी पिलाई जाती थी, व गायिकाएं लोगों को अपने गीतों से उत्तेजित करने का काम किया करती थीं) तो नबी सल्ल० ने उन मौकों पर, जहाँ संगीत का इस्तेमाल हराम कामों को बढ़ोतरी देने के लिए किया जा रहा था, वहां संगीत पर प्रतिबंध लगाया ... पर अन्य मौक़े, जहां इंसान केवल आनन्द लेने के लिए या ख़ुशी ज़ाहिर करने के लिए ऐसे गीत संगीत का आयोजन कर रहा था, जिसमें कुफ्र या हराम चीज़ों को बढ़ावा देने वाली कोई बात न थी, वहां आप सल्ल० ने न सिर्फ़ संगीत की इजाज़त दी बल्कि अपनी ओर से सलाह भी दी कि ऐसे मौकों पर जो संगीत पसन्द करते हैं वो संगीत सुन लें
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... बुख़ारी शरीफ़ क़िताब-59, हदीस-336 पर अल-राबी बिन्त माऊध रज़ि० से रिवायत हदीस है, वो फ़रमाती हैं कि मेरी शादी वाले दिन मेरे घर में कुछ गाने वाली लड़कियां जंग ए बद्र के शहीदों के सम्मान ने डफ़ली पर गीत गा रही थीं, तभी आप सल्ल० तशरीफ़ लाये, उन्हें देखकर एक गानेवाली गाने लगी "हमारे बीच वो पैगंबर हैं जो जानते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है"
....इस पर नबी सल्ल० ने गाने वाली को रोका और फ़रमाया "ये न कहो, बल्कि वही कहो जो पहले गा रही थीं" .... इस हदीस में नबी सल्ल० ने गानेवालियों से कहा कि पहले जो गा रही थीं, "वो ही गाओ"... यानी आप सल्ल० ने नात और हम्द से अलग भी किसी गीत को गाने की अनुमति दी है, बशर्ते उसमें साफ सुथरी शायरी हो, और गुनाह की तरफ उकसाने वाली कोई बात न हो...
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... .. सही बुख़ारी, किताब-62, हदीस-92 में, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा रज़ि० को बारात के साथ किसी एम्यूजमेंट को भेजने की सलाह अपनी ओर से दी है कि "अंसार मनलुभावन कला को पसन्द करते हैं तो बारात के साथ उसे भेजा जाता" ... इब्ने माजा, किताब-9, हदीस-56 में ये हदीस अधिक विस्तार में आई है, वहां पता चलता है कि नबी सल्ल० ख़ास गाने वालों को भेजने की सलाह दे रहे हैं ....
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... कुछ अहादीस से पता चलता है कि नबी सल्ल० ने कुछ साज़ों (वाद्ययंत्रों) को शैतान के साज़ कहकर उनसे दूर रहने का हुक़्म दिया था... इन हदीसों को ध्यान में रखते हुए मुसलमानों ने संगीत को लेकर ये रवैया अपनाया है कि गीत के साथ कोई साज़ मिलाया जाना पाप है.... 
.... लेकिन बुख़ारी और मुस्लिम से पता चलता है कि मदीना में एक ईद के दिन माँ आयशा रज़ि० के घर में दो अंसार लड़कियां "बुआत की जंग" का गीत गा रही थीं और कोई ढोल जैसा वाद्ययंत्र बजा रही थीं, हज़रत आयशा उन्हें सुन रही थीं, और नबी सल्ल० उनके घर में मुँह दूसरी ओर करके लेटे हुए थे, जब आयशा रज़ि० के पिता अबूबक्र रज़ि० घर में आये तो क्रोध करने लगे कि "नबी सल्ल० के घर में ये शैतान का साज़ क्यों बजाया जा रहा है", .... तब नबी सल्ल० ने हज़रत अबूबक्र रज़ि० को रोक दिया और उन लड़कियों को गाने बजाने दिया, फिर इस दिन हब्शी लोग ढाल और भालों के साथ नृत्य और करतब दिखाने का खेल करते थे, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा को उनकी इच्छा पर ये करतब भी उनका दिल भर जाने तक दिखाए और करतब दिखाने वालों का उत्साह भी ये कह कहकर बढ़ाते रहे "ओ बनी अफरीदा, लगे रहो" (सही बुख़ारी, किताब-15 हदीस नम्बर-70)
... यहाँ ध्यान दीजिये, हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने उस वाद्ययंत्र को 'शैतान का साज़' कहा, यानी ये वही साज़  था जिसकी मनाही के हुक़्म की हदीस अन्य स्थानों पर आई है, लेकिन यहाँ नबी सल्ल० ने उस साज़ को बजाने से न ख़ुद उन लड़कियों को रोका, न हज़रत अबू बक्र रज़ि० को रोकने दिया, बल्कि ये कहा कि "रहने दीजिये अबूबक्र रज़ि० (उन्हें गाने बजाने दीजिये), क्योंकि आज त्योहार का दिन है".... ज़ाहिर है, वो साज़ खुद में कोई हराम चीज़ नही थे, वरना इस्लाम त्योहार के दिन में किसी हराम काम करने की आपको इजाज़त दे देता हो, ऐसा कोई उदाहरण नही है.... यानी उपरोक्त हदीस से सिद्ध होता है कि कोई भी साज़ बजाना या गीत के साथ संगत करना भी इस्लाम में पूर्णतः मना नही किया गया है.... 
...फिर दूसरे स्थान पर इन साज़ों  की मनाही के हुक़्म के पीछे क्या वजह हो सकती है ?? 
.... असल मे हदीस अध्ययन में ये बात अक्सर मिलती है कि कई हदीसों में किन्हीं चीज़ों से दूसरी किसी चीज़ की ओर संकेत किया गया होता है, और कई हदीसें संक्षेप में भी बयान होती हैं और संक्षिप्त बात से किस ओर इशारा किया जा रहा है इसका पता तभी चलता है जब उस विषय की अन्य कई हदीसों को पढ़ लिया जाए
.... अब जिस तरह साज़ों की मनाही के हुक़्म की हदीसें हैं, उसी तरह सुनन निसाई शरीफ़ में बुक ऑफ ड्रिंक्स में सही इसनाद के साथ ऐसी कई अहादीस हैं कि नबी सल्ल० ने कुछ ख़ास बर्तनों के नाम ले लेकर उनको ममनुआ करार दिया है, इनमें कुछ मिट्टी के बर्तन, लौकी के खोल को सुखा कर बनाए गए बर्तन, और पॉलिश किये गए जग, खोखले तने से बनाये गए बर्तनों वगैरह के नाम शामिल हैं ..... ज़ाहिर है, बर्तन अपने आप में कोई गुनाह वाली चीज़ नहीं होते, इसलिये इन अहादीस से किसी दूसरी तरफ संकेत को समझा जाता है और अन्य विस्तार से आई हदीसों को पढ़ने पर पता चलता है कि इन बर्तनों को मना नही किया गया, बल्कि इन बर्तनों में "नबीज़" (एक किस्म की शराब) बनाने से मना किया गया है...
... उसी तरह कुछ साज़ों की मनाही के पीछे भी किसी अन्य बात की तरफ़ संकेत है, और एक ख़ास पृष्ठभूमि है... एक तो ये पृष्ठभूमि ये मालूम होती है कि संगीत की महफिलों को उस समय बेहयाई के और हराम कामों में संगत देनेवाली चीज़ बना दिया गया था... दूसरे, सूरह लुक़मान की छठी आयत जिसे कुरआन में इनडायरेक्टली संगीत की मनाही का हुक़्म कहा जाता है, उसमें लिखा है कि "लोगों में से कोई ऐसा भी है जो दिल को लुभानेवाली बातों का ख़रीदार बनता है, ताकि बिना किसी ज्ञान के अल्लाह के मार्ग से (दूसरों को) भटकाए और उनका परिहास करे। वही है जिनके लिए अपमानजनक यातना है" ... इस आयत से पता चलता है कि नबी सल्ल० के दौर में जब मुस्लिम कहीं अल्लाह का ज़िक्र कर रहे होते थे, या इबादत कर रहे होते थे तब वहां इस्लाम विरोधी लोग मुस्लिमों का ध्यान भटकाने के लिए कुछ खेल तमाशे और बाजे बजाने लगते थे ताकि मुसलमान अल्लाह का ज़िक्र न कर पाएं और जो लोग अल्लाह के ज़िक्र को सुन रहे हैं वो खेल तमाशों से आकर्षित होकर मुसलमानों के पास से उठकर खेल तमाशों के पास आ जाएं,
... इस आयत के बारे में हज़रत इब्न अब्बास रज़ि० का क़ौल बताया जाता है कि यहां संगीत के बारे में बात की जा रही थी.... यानी मुसलमानों को अल्लाह की इबादत से डिस्ट्रैक्ट करने के लिए साज़ों का इस्तेमाल किया जाता था... ऐसे समय में ही आप सल्ल० ने उन साज़ों को शैतान के साज़ फ़रमाया, जब उन साज़ों का पापकर्म में इस्तेमाल किया जा रहा था... लेकिन उसी साज़ की मनाही आप सल्ल० ने तब नही की जब ईद के दिन हज़रत आयशा रज़ि० उसे सुन रही थीं, क्योंकि तब उन साज़ों से कोई पापकर्म नही किया जा रहा था...!!

.... एक अन्य बहुत मशहूर हदीस है  कि आप सल्ल० ने फ़रमाया कि "एक ख़राबी का वक़्त मेरी उम्मत पर ऐसा आएगा जब लोग शर्मगाह को, रेशम को, संगीत को और शराब को अपने लिये हलाल कर लेंगे, और अल्लाह ऐसे लोगों के चेहरे बिगाड़ कर उन्हें बन्दर और सुअर में तब्दील कर देगा"....
... इस हदीस के शब्दों पर ध्यान दें तो इनमें एक (शराब) को छोड़कर कोई चीज़ कतई हराम नही है, .... यानी हर एक शर्मगाह मुसलमान के लिए हराम नही होती बल्कि निकाह में आए मर्द औरत एक दूसरे के लिये हलाल होते हैं, इसी तरह रेशम मर्दों के लिए तो मना है, मगर मुसलमान औरतों के लिए हलाल है, और फिर बात आती है संगीत की तो ये भी सही अहादीस जो ऊपर बयान की गईं उनसे साबित है कि जहां कुफ्र और हराम कामों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो वहां हराम है और बाक़ी जगह गुनाह नही !!! 
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... तो इस सारे अध्ययन से पता चलता है कि ख़ुशी व्यक्त करने के लिए, या मनोरंजन के लिए भी गीत संगीत हो, या अन्य कोई भी खेल तमाशा, उसकी मनाही इस्लाम में नही की गई है जब तक कि उनमें किसी कुफ्र, या ज़ुल्म, या शराब पीने और व्यभिचार या अन्य किसी गुनाह पर उभारने वाले तत्व शामिल न हों..
.... और ऐसे गुनाह पर उभारने वाले तत्व गीत संगीत के अलावा भी जिस खेल तमाशे में होंगे, वो हर खेल-तमाशा गुनाह होगा... इसीलिए क़ुरआन में स्पेशली गीत संगीत का नाम लेकर नही, बल्कि अल्लाह की राह से भटकाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले किसी भी प्रकार के खेल तमाशों का आयोजन करने वालों पर बद्दुआ की गई है !!

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अक्सर डार्विन की थ्योरी और इस्लाम को आमने सामने खड़ा किया जाते देखता हूँ... लोग समझते हैं कि डार्विन की थ्योरी फैक्ट बन चुकी है, लेकिन मुझे लगता है कि डार्विन महोदय ने एक बने बनाये फैक्ट पर एक अनुमान लगाया है, तो पहले से बनाया फैक्ट  तो ठीक है, लेकिन उनके अनुमान के सही होने का अब तक पता नहीं चल पाया है...
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..... चार्ल्स डार्विन की थ्योरी में दो बातें हैं, 
एक तो ये कि जीवों की दो अलग अलग नस्लें मिलकर एक तीसरी नस्ल को पैदा कर सकती हैं. 
...और दूसरी बात ये कि सारा जीवजगत एक ही जीव से पैदा हुआ ...
....तो डार्विन की थ्योरी में यहां दूसरा पॉइंट जो है वो तो सिर्फ़ एक अंदाज़ा है और अभी तक उसके पक्ष में कोई सबूत मिल नही सका है, जबकि इस थ्योरी का पहला पॉइंट, यानी दो अलग नस्लों से एक तीसरी नस्ल पैदा करना, ये सदियों से आज़माया हुआ तरीक़ा है, .... खच्चर को दुनिया का पहला मानवनिर्मित हाइब्रिड जीव माना जाता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे घोड़े और गधे के संयोग से आज से लगभग तीन हज़ार साल पहले मनुष्यों ने बनाया था.... ऐसा लगता है कि डार्विन महोदय ने इसी हायब्रिड तकनीकी के आधार पर अपनी थ्योरी बनाई.... और अंदाज़ा लगाया कि इसी तरह अपने आप दुनिया में नए नए जीव पैदा होते गए होंगे....
पर इस थ्योरी के वास्तविक धरातल पर सही होने की संभावना बहुत कम दिखती है, .... ये तो है कि दो अलग अलग नस्ल के जीवों की इन्टरब्रीडिंग करा के उस जीव की एक तीसरी नस्ल पैदा की जा सकती है, लेकिन उसमें भी बहुत सीमित सम्भावनाएं होती हैं, उदाहरण के लिए आप दो अलग अलग नस्लों के कुत्तों की तो इन्टरब्रीडिंग कराके एक नई नस्ल का कुत्ता तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन दो मुख्तलिफ किस्म के जानवरों, यानी कुत्ता और भेड़ की इन्टरब्रीडिंग करा कर एक नया जानवर पैदा नही कर सकते, वैज्ञानिक ऐसा भ्रूण विकसित कर भी लें तो भी नया जानवर पैदा होने से पहले भ्रूण प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते हैं..... ऐसे में एक ही जीव से सारी दुनिया अपने आप बनती बसती गई, इसमें संदेह बना रह जाता है
.... श्रीमान चार्ल्स डार्विन की ये थ्योरी कि संसार के सारे जीव जगत की उत्पत्ति केवल एक जीव से हुई और उसी जीव की संतानों में बदलाव आते रहने से दुनिया में करोड़ों किस्म के जीव जंतु बन गए" ये थ्योरी देने के पीछे उनका कारण ये था कि उन्हें बताना था कि ये संसार बिना किसी क्रियेटर के, अपने आप बनता चला गया है... अब इस विचार के लिए ज़रूरी था कि वो आसान पोसिबिलिटीज़ पर विचार करते.... और ज़ाहिर है कि दुनिया में जीव जगत करोड़ों अलग अलग रूप में जन्मा, ये बात "अपने आप" वाले खांचे में फिट बैठ ही नहीं सकती थी... पर डार्विन की थ्योरी के सही होने में सबसे बड़ी चुनौती भी यही बात है कि जब एक जीव से बदल बदल कर नए जीव बनते हुए ये जीव जगत बना है तो अब ये नए जीव बनना बन्द क्यों हो गए ?? पिछले सैकड़ों सालों में कोई भी नया जीव बनता नोटिस नही किया गया, बल्कि इस बीच सैकड़ों जीव विलुप्त ज़रूर होते पता चले हैं
... पिछले कुछ दशकों में तो अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में पूरी सुरक्षा के साथ पुराने जीवों की कोशिकाओं से नए जीव बनाने की कोशिशें की गईं लेकिन नए जीव पैदा करने में सफ़लता नही मिल सकी.. ऐसे में डार्विन महोदय का ये विचार ध्वस्त होता दिखता है कि संसार में पुराने जीवों से नए जीव बनते गए... और वो भी अपने आप !!!
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... फिर जिस तरह होमो सेपियंस की उत्पत्ति के बाद के ज़मानों तक भी एप्स के जीवाश्म बरामद हुए हैं.... उनको देखने के बाद, ये कहने का भी कोई कारण नही बचता कि ये इंसानों के पूर्वज हैं और बन्दर से इंसान बनने की प्रक्रिया की एक कड़ी हैं.... क्योंकि इंसान तो ढाई लाख साल पहले वजूद में आ चुका था, और अभी कुछ समय पहले फिलीपींस से अब से केवल 50,000 साल पहले के कपिमनुष्यों के जीवाश्म बरामद हुए हैं, जिन्हें "होमो लुजोनेसिस" का नाम दिया गया है, यानी ये होमो सेपियंस के दुनिया आने के लगभग दो लाख साल बाद तक मौजूद थे.... अगर किन्हीं प्राकृतिक कारणों से कपिमनुष्यों की बनावट बदलते बदलते इंसान बनने की थ्योरी सही होती तो होमो लुजोनेसिस का अस्तित्व अबसे 50,000 पहले हो ही नहीं सकता था....इसका मतलब ये है कि इन जीवों का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व था, जैसे बिल्ली और शेर का अलग अलग अस्तित्व है ठीक वैसे....!!!
...... दिखता तो ये है कि दुनिया के इतिहास में हम जितना पीछे जाते हैं, उतनी ही प्रचुर जैव विविधता का पता चलता है... और इसके साथ ही दिमाग में ये सवाल पैदा होता है कि जब संसार अपेक्षाकृत कम आयु का था तब उसमें इतनी ज्यादा जैव विविधता थी, तो विकासवाद के नियम के मुताबिक अब जब दुनिया की उम्र कई हज़ार साल ऊपर हो चुकी है तो जैव विविधता को और बढ़ जाना चाहिए था पर ये नही बढ़ी, बल्कि उत्तरोत्तर ये जैव विविधता कम होती जा रही है... 
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... ख़ैर तो डार्विनवाद को अभी पूरी तरह फैक्ट साबित होना बाक़ी है, अलबत्ता एवोल्यूशन के मामले में वो बात जो डार्विन से पहले ही फैक्ट थी कि दो अलग अलग नस्ल के जीव तीसरी नस्ल को जन्म दे सकते हैं, उसका इनकार नही है, लेकिन ऐसा संयोग अपने आप बन सकता हो इसका भी कोई उदाहरण पता नहीं है.....
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..... मुस्लिम समुदाय में जो विद्वान हज़रत आदम के जन्म के बारे में वैज्ञानिक सम्भावनाओं पर विचार करते हैं, वो थ्योरी किसी जीव की पुरानी नस्ल के एक हाइब्रिड नस्ल में तब्दील हो जाने के फैक्ट पर आधारित है.... और उस थ्योरी को आप कुछ कुछ डार्विन की थ्योरी जैसा कह सकते हैं, लेकिन डार्विन और मुस्लिम थ्योरी के बीच बड़ा फ़र्क ये है कि डार्विन के हिसाब से वर्तमान मनुष्य भी (होमो सेपियंस) अपने जन्म के समय जानवर जैसा था, जबकि मुस्लिम विद्वानों के अनुसार वर्तमान मनुष्य अपने जन्म से ही अभूतपूर्व रूप से बुद्धिमान था, इसी बुद्धिमानी के कारण वो मनुष्य बना, और उससे पूर्व के लोग यही बुद्धि न होने के कारण मनुष्य नही कहलाये जा सकते थे !!
.... उनके इस ख्याल का बेस, क़ुरआन की दो आयतें हैं
... जिनमें से एक तो सूरतुल इंसान की पहली आयत है कि "बेशक इन्सान पर एक ऐसा वक्त भी गुज़र चुका है जबकि वह कोई क़ाबिले ज़िक्र चीज़ न था (76:1)
.... और दूसरी आयत सूरह अल-अनआम की 133वीं आयत ये कि "तुम्हारा रब निस्पृह, दयावान है। यदि वह चाहे तो तुम्हें (दुनिया से) ले जाए और तुम्हारे स्थान पर जिसको चाहे तुम्हारे बाद ले आए, जिस प्रकार उसने तुम्हें कुछ और लोगों की सन्तति से उठाया है" (6:133)
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...... इन आयतों की बुनियाद पर कई मुस्लिम विद्वान ये ख्याल ज़ाहिर करते हैं कि ऐसा मुमकिन है कि इंसान को अल्लाह ने किसी ग़ैरइंसांनी मख़लूक़ से पैदा किया हो, और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से पहले के वो जीव जिनमें इंसानी शऊर नही था, उन्हीं गैर इंसानी मख़लूक़ के बारे में सूरतुल इंसान में अल्लाह ने फ़रमाया है कि वो कोई क़ाबिल ए ज़िक्र चीज़ नही था 
.... कुछ अरसा पहले मैंने डॉ० इसरार अहमद रह० का एक बयान सुना था, जिसके मुताबिक़ आदम अलैहिस्सलाम से पहले अल्लाह ने हैवाने इंसान को दुनिया में भेज रखा था, जिसमें जान थी, बाक़ी जानवरों की तरह खाने जीने की प्राकृतिक क्षमता भी उसमें थी, मगर उसमें इंसानी रूह नही थी, यानी वो मानवीय चेतना नही थी, जो अच्छाई और बुराई में फ़र्क करना जानती है, जो चेतना मनुष्य को निरन्तर नई नई चीज़ें सीखने, निरन्तर नए अविष्कार करने लायक बनाती है....
.... मुस्लिम विद्वानों के मुताबिक़ ये मानवीय चेतना/रूह, अल्लाह ने सबसे पहले आदम अलैहिस्सलाम के भीतर डाली, और इसलिए दुनिया में इंसानियत की शुरुआत हज़रत आदम से कहलाई...
... हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के विषय में क़ुरआन में कुछ एक स्थानों पर ये लिखा मिलता है कि अल्लाह ने उन्हें एक अकेली जान से पैदा किया (जैसे 7:189 के शुरुआती अल्फ़ाज़ कि "वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे" ...और 3:59 जिसमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश के बारे में उनकी मिसाल हज़रत आदम की तरह बताई, और हज़रत ईसा अकेली मरियम अलैहिस्सलाम से पैदा हुए थे, इस बारे में क़ुरआन विस्तार से बताता है)
.... अल्लाह ने हज़रत आदम का पुतला बनाया और उसमें जान डाली, और फिर आदम अलैहिस्सलाम की पसली से हव्वा को बनाया, ये सब बातें क़ुरआन में नही हैं, हां क़ुरआन में ये ज़रूर लिखा है कि अल्लाह ने इंसान को मिट्टी से पैदा किया, .... अगर हम डॉ० इसरार अहमद साहब के बताए मुताबिक़ सोचकर देखें तो मिट्टी से हैवाने इंसान के बनाने की बात हो सकती है, जिसका जिस्म तो इंसान से मिलता जुलता था, लेकिन उसमें इंसानी चेतना न थी... बहरहाल इस विषय में सही बात तो केवल अल्लाह ही जानने वाला है, हां जब हम इंसान के दुनिया में जन्म की संभावना पर गौर करते हैं तो इतना ज़रूर पाते हैं कि अपने आप विविधता भरे जीव जगत का बन जाना, एक ही जीव से खुद बखुद करोड़ों जीवों का बन जाना तो सम्भव ही नहीं है, अलबत्ता कोई ईश्वरीय शक्ति अगर इन्हें डिज़ाइन कर रही थी, तो सब मुमकिन है !!!....





अल तकिया।

अक्सर गैरमुस्लिम भाई हमसे पूछते हैं कि इस्लाम में ये "अल-तकिया" क्या चीज़ है ?? क्या ये गैरमुस्लिमों को बहकाने के लिए मुसलमानों को झूठ बोलने का धार्मिक आदेश नही है ??
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...... देखिए मेरे भाइयों, .... जैसा आपको समझाया गया है, बात वो नही है... असल में वास्तविकता सिर्फ़ इतनी है कि जब किसी मुसलमान को उसके धर्म के कारण जान का खतरा दिखाया जाए और अपने ईमान के बारे में झूठ बोलने से उसकी जान बच सकती हो तो उस मुसलमान को अपने ईमान के बारे में अपनी जान बचाने के लिए झूठ बोलने पर कोई गुनाह नही है, यही अल-तकिया है, 
ये मामला उस दौर से जुड़ा हुआ है जब मक्का के गैरमुस्लिम मुसलमानों पर बुरी तरह ज़ुल्म तोड़ते थे और उन्हें कहते थे कि या तो इस्लाम छोड़ दो या हम तुम्हें कत्ल कर देंगे.... इस मुद्दे पर क़ुरआन पाक में एक आयत 
नाज़िल हुई है और अल तकिया के नियम उसी आयत के आधार पर इस्लामी कानूनविदों ने तय किये हैं... वो आयत ये है... 
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..."जिस किसी ने अपने ईमान के पश्चात अल्लाह के साथ कुफ़्र किया -सिवाय उसके जो इसके लिए विवश कर दिया गया हो और दिल उसका ईमान पर सन्तुष्ट हो - बल्कि वह जिसने सीना कुफ़्र के लिए खोल दिया हो, तो ऐसे लोगो पर अल्लाह का प्रकोप है और उनके लिए बड़ी यातना है" (सूरह नहल, 16:106)
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इस आयत में ये ज़िक्र है कि ईमान के विषय में वास्तविकता से विपरीत बात कहना सिर्फ तब के लिए है जब उस मुसलमान को ऐसा करने के लिए बुरी तरह विवश कर दिया गया हो... 
... इस आयत पर कमेंट्री करने वाले तमाम इस्लामी दुनिया के विद्वान ये कहते हैं कि ये आयत केवल तब के लिए है जब गैरमुस्लिम मुसलमान को मुसलमान होने की वजह से क़त्ल कर देने पर उतारू हों, इसके अलावा किसी सिचुएशन के लिए नही
....सूरह नहल की इस आयत के विषय मे शिया विद्वान्  और सुन्नी विद्वान, दोनों ही मानते हैं कि ये आयत हज़रत अम्मार बिन यासिर रज़ि० के सम्बंध में नाज़िल हुई थी...
हज़रत अम्मार मक्का में रहने वाले एक ग़रीब व्यक्ति थे जो नबी सल्ल० की शिक्षाओं से प्रभावित हो कर उस दौर में अपने माता पिता समेत मुस्लिम बन गए थे जब मक्का के मूर्तिपूजक समुदाय के लोग मुस्लिमों को इस्लाम छुड़ा देने के उद्देश्य से भयंकर शारीरिक प्रताड़नाएं दिया करते थे, यही दुष्ट व्यवहार मक्का के मूर्तिपूजकों ने हज़रत अम्मार रज़ि० और उनके बूढ़े माता पिता, हज़रत यासिर रज़ि० और बीवी सुमैय्या रज़ि० के साथ किया, यहां तक कि हज़रत यासिर और बीवी सुमैय्या रज़ि० की निर्मम हत्याएं तक कर डालीं ...

.तो जब मक्का के मूर्तिपूजकों की दी हुई प्रताड़नाओं को बर्दाश्त न कर पाने और जिस तरह हज़रत अम्मार के वालिदैन को मूर्तिपूजकों ने प्रताड़ित कर करके मार डाला, इसी तरह वो हज़रत अम्मार की भी हत्या न कर डालें, इस भय से विवश हो कर हज़रत अम्मार ने झूठ बोल दिया था कि मैंने इस्लाम को छोड़ दिया, 
पर अंदर से वो इस्लाम पर ही कायम थे और केवल अपनी जान बचाने के लिए ये झूठ बोला था, पर ये झूठ बोल कर वो बुरी तरह अपराधबोध में ग्रस्त हो गए थे, तब सूरह नहल की ये आयत इस उद्देश्य से उतारी गई कि अम्मार दुःखी न हों उनपर कोई गुनाह नही है, वो विवश थे
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..... सुन्नी इस्लाम में केवल गैरमुस्लिमों से जान का भय होने की एकमात्र सिचुएशन पर अपने ईमान के विषय में झूठ बात बोलकर अपनी जान बचा लेने की अनुमति भर ही अल तकिया है, किसी गैरमुस्लिम को बहकाने के लिए लेशमात्र भी नहीं
... शिया इस्लाम मे सम्भवतः इस नियम को थोड़ा और विस्तार दिया गया है, पर जहां तक मेरी जानकारी है शिया इस्लाम में भी किसी गैरमुस्लिम को धोखा देने के लिए नही बल्कि चूंकि शिया समुदाय मुसलमानों के भीतर ही एक अल्पसंख्यक समुदाय रहा, और सुन्नी बहुल इलाकों में रहने वाले शिया मुसलमान शिया सुन्नी विभेद के किसी विवाद में न पड़ें इसलिए सुन्नी बहुल इलाकों में रहते हुए अपनी शिया आस्थाओं का प्रदर्शन न करने और सुन्नी आस्थाओं के मुताबिक सार्वजनिक धार्मिक क्रियाकलापों को कर लेने की वैधानिक अनुमति भर का ही विस्तार शिया समुदाय में भी है, यानी वहां भी किसी गैरमुस्लिम को धोखा देने की गुंजाइश वहां भी नहीं ही है ...!!!
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.... लेकिन हमारे देश के कुछ गैरमुस्लिम "धर्मरक्षक" संगठन अकारण ही ये साबित करना चाहते हैं मुसलमान को इस्लाम को फैलाने के लिए, या दुश्मनों को छलने के लिये किसी भी तरह का झूठ बोलने की शिक्षा दी गई है, ऐसे झूठे प्रचारों का कोई सबूत नहीं है, जब मेरे साफदिल मित्र कोई ऐसा झूठा प्रचार मुस्लिमों के विरुद्ध सुनें तो आंख बंद करके विश्वास करने की बजाय अगर वो एक बार नेट पर अल तकिया के बारे में किसी इस्लामी साइट पर सर्च कर लेंगे तो ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा...
.... अपने शत्रुओं को धोखा देने के लिए झूठ बोलने का क़ानून भले ही दूसरों के यहां हो सकता हो, पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इस्लाम में धोखाधड़ी करने का ऐसा कोई कानून और इजाज़त नहीं है...!!!

हुरूफ़ ए मुक़ातात, मिलादुन्नबी, ईसा रिटर्न्स।

क़ुरआन पाक की बाज़ आयतें ऐसी हैं जो कुछ राज़ भरे हर्फ़ से शुरू होती हैं, 
इन हुरूफ़ को अलग अलग पढ़ा जाता है, जैसे "या-सीन", "अलिफ़-लाम-मीम", "ता-हा" वगैरह.... इसीलिए इनको "हुरूफ़ ए मुक़त्तआत" कहा जाता है, अभी तक इन हर्फ़ों का सही मतलब हम नही जान सके हैं....

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 हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के बारे में आमतौर पर उलमा की राय ये है कि ये क़ुरआन में कुछ कोड वर्ड हैं, और  इन हुरूफ़ का मतलब सिवाय अल्लाह के कोई भी नहीं जानता.... इनको क़ुरआन में नाज़िल करने की हिकमत अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते होंगे हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते, लेकिन ये जिस तरह क़ुरआन में नाज़िल हुए थे उसी तरह हमें इन्हें लिखते और पढ़ते रहना चाहिए !!
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.... यहां तक तो ठीक है कि हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते,.... लेकिन कुछ मज़हबी रहनुमाओं को मैंने ये कहते देखा है कि हुरूफ़ ए मुक़त्तआत का मतलब समझने की इंसान को बिल्कुल कोशिश भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये इंसानी इख़्तियार की बात ही नही है...
.... इस हाल में एक सवाल लाज़मी पैदा होता है कि जब अल्लाह क़ुरआन में ये फरमाता है कि क़ुरआन को नस्ले इंसानी की हिदायत के लिए नाज़िल फ़रमाया गया है, तो इसमें ऐसे हुरूफ़ अल्लाह ने क्यों नाज़िल किये जिन हुरूफ़ को समझना इंसानों के बस के बात ही न हो....??? अगर क़ुरआन हिदायत के लिए है तो इसमें न समझ में आने वाले कोड वर्ड का क्या काम ??
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..... इस बारे में मैंने मौलाना इसरार अहमद रह० की एक तक़रीर सुनी थी कि नबी सल्ल० के ज़्यादातर सहाबियों ने भी हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की कोई तशरीह नही निकालने की कोशिश की और तमाम उलमा का इसी बात पर इज्मा है कि हम इन हुरूफ़ का मतलब नहीं जानते लेकिन इन्हें ये सोचकर क़ुरआन में पढ़ते रहें कि हमें नही, पर हो सकता है हमसे आगे आने वाली नस्लों में इन हुरूफ़ के मानी समझने वाले लोग भी हो जाएं, और कुछ नए राज़ खुल जाएं इसलिए इन हुरूफ़ के साथ ही क़ुरआन को नई नस्लों तक पहुँचाया जाता रहना चाहिए, ..... लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इन हुरूफ़ की तशरीह करने की सहाबा के ज़माने में किसी ने कोशिश नही की उस वक्त भी अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि० जैसे जलील उल क़दर सहाबी ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के मतलब समझने की कोशिश की, उन्होंने खयाल ज़ाहिर किया कि "अलिफ़ लाम मीम" दरअसल एक पोशीदा आयत है जिसका खुलासा "अनल्लाहो आलमो" है, यानी "मैं अल्लाह, जानने वाला हूं" .... इसमे पहले हर्फ़ अलिफ़ से "अना", दूसरे हर्फ़ लाम को लफ़्ज़ "अल्लाह" के बीच में लिया, और तीसरे लफ़्ज़ मीम को "आलमो" के आख़ीर में...
.... हालांकि इस ख्याल को बाक़ी लोगों ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ि० की ज़ाती राय माना, और इस खयाल को ज़्यादा मकबूलियत हासिल न हुई....
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.... बहरहाल नबी के सहाबी ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की तशरीह की कोशिश की, इससे मेरी समझ में एक बात तो ये साफ़ हो जाती है कि आप सल्ल० ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत को लेकर ऐसी कोई मनाही नही की थी कि इन हुरूफ़ का मतलब निकालने की कोई मुसलमान कोशिश न करे...
... चुनांचे बाद के ज़मानों में भी कुछ दानिशवरों ने हुरूफ़ ए मुक़त्तआत की तशरीह समझने की कोशिश की, .... जैसे मौलाना हमीद्दुदीन फराही रह० ने ख़्याल ज़ाहिर किया कि ये हुरूफ़ दरअसल जिस सूरत के शुरू में हैं, उस सूरत में बयान की गई किसी ख़ास बात की तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए अल्लाह ने इन हुरूफ़ के ज़रिये इशारा किया है, .... मसलन उन्होंने बताया कि इब्रानी ज़बान में लफ़्ज़े "ता" से इशारा "साँप" की तरफ़ होता है, तो हुरूफ़ ए मुक़त्तआत से शुरू होने वाली सूरह "ता-हा" में हज़रत मूसा अस० की असा के सांप बन जाने का वाकया बयान किया गया है और, सूरह की शुरुआत में लफ़्ज़ "ता" से उसी साँप की तरफ़ इशारा किया गया है, 
.... इसी तरह "नून" अरबी में मछली को कहा जाता है और हर्फ़ "नून" से शुरू होने वाली सूरह "नून वल क़लम" में उस ख़ास वाकये का ज़िक्र है जब हज़रत यूनुस अस० एक तवील अरसे तक के लिए एक मछली के पेट में फंसे रहे थे....!!!
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.... बहरहाल, मेरा ये मानना है कि इस मसले पर अभी कोई आख़री राय क़ायम कर लेना जल्दबाजी होगी, .... जिस तरह हमारे बुज़ुर्गों ने ये सोचा कि हम नही, पर शायद अगली नस्लों में इन हुरूफ़ का राज़ जानने वाले लोग आ जाएं... यही मेरा भी सोचना है..
...... मैंने ये जाना है कि इससे पहले भी क़ुरआन पाक की बहुत सी आयतों के राज़ हमसे पहले के लोग नहीं जान पाए थे, जैसे फ़िरऔन की लाश किस तरह बची है, इस बात को सौ साल से पहले क़ुरआन में पढ़ने वाले लोग नही समझ पाते होंगे, इंसान की पैदाइश लोथड़े या जोंक से किस तरह हुई, इस बात को आज के ज़माने से पहले के मुसलमान क़ुरआन में पढ़ कर किस हद तक समझ पाते होंगे ?? लेकिन वो क़ुरआन को जस का तस आगे बढ़ाते रहे, और तरक़्क़ी ए ज़माना के साथ हम क़ुरआन के इन राज़ों को बेहतर ढंग से समझते गए....
.... तो बेशक हुरूफ़ ए मुक़त्तआत में भी कोई हिदायत ही पोशीदा है, जो शायद बाद के ज़मानों की तरक़्क़ी के साथ इंसानों को समझ में आएगी... 
.... लेकिन बाद के ज़माने के लोगों को इनके पीछे का राज़ भी तभी पता चल सकता है, जब हुरूफ़ ए मुक़त्तआत को समझने की कोशिश करने वालों की मुखालिफत न की जाए... क़ुरआन पाक में अल्लाह बार बार इसकी आयतों पर ग़ौरो फ़िक्र करने की दावत इंसानों को देता है, लिहाज़ा ये सोच पालना कि हुरूफ़ ए मुक़त्तआत के मतलब ढूंढने वाला शख़्स मज़हब के हिसाब से कोई गुस्ताखाना अमल कर रहा है, ये सोच पालना दुरुस्त नही !!!

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मीलादुन्नबी का जश्न ......!!!
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इस्लामी दुनिया के एक नामवर आलिम शेख़ अब्दुल्लाह बिन बय्यह फ़त्वा देते हैं कि ' जो नबी स० की मव्लिद मनाना चाहता है उसे चाहिए कि इस प्रकार मनाए कि इस्लाम के विरुद्ध कोई अमल इस में ना हो, तब इसके मनाने में कोई बुराई नही' .... जानिये ये फ़त्वा उन्होंने किस बुनियाद पर दिया है.....!!!
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..... नबी (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की पैदाइश का दिन (मव्लिद) मनाना, उलमा में एक विवादास्पद मुद्दा है। इस लिए, कई उलमा ने इस को एक नापसंद बिदअत समझा है, कुछ ने इस के निषेध का हुक्म दिया और कुछ इसे एक पसंदीदा बिदअत समझते हैं।
इस इख्तिलाफ़ की बुनियाद, बिदअत के तसव्वुर और परिभाषा में है, और बिदअत की क़िस्मों की समझ में इख्तिलाफ़ से पैदा होती है। कुछ उलमा ने इस तरह की बिदआत को वैध (जायज़) माना। इस विचार को रखने वाले इमाम शाफई (र) थे और इस विचार के मुख्य आलिम इज़्ज़ुद्दीन अब्दुस सलाम (र) थे। इसके अतिरिक्त, इमाम अल-कराफि (र) जो एक 'मालिकी' आलिम थे, उनका भी यही विचार था। उनहों ने इसे खास तवज्जुह दिया और इसकी विस्तृत व्याख्या भी की। इस व्याख्या में इमाम कराफ़ी (र) ने बिदअत को पाँच तबकों मे विभाजित किया 1) फर्ज़ (अनिवार्य) 2) मुस्तहब (सराहनीय) 3) मुबाह (जायज़/वैध) 4) मकरूह (नापसंद) 5) हराम (अवैध)
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लेकिन कुछ उलमा ने इस विभाजन को कुबूल नहीं किया। उनहों ने हज़रत उमर (रआ) के नमाज़े तरावीह के बारे में कहे शब्द 'बिदअते हसन' (अच्छी बिदअत) को पारिभाषिक अर्थों में न लेते हुए सीमित शाब्दिक अर्थों में स्वीकार किया। इस मत को अपनाने वाले उलमा की बड़ी संख्या है जिन में तकी अद्दीन अहमद इबने तेमियह (र), इमाम शातिबी (र), और मालिकी एवं हमबली मत के कई उलमा काबिले ज़िक्र हैं।
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जिन उलमा ने 'मव्लिद' मनाने के समर्थन में लिखा उन में इमाम जलालुद्दीन सुयूती (र) प्रसिद्ध हैं। इस से मालूम होता है कि इस विषय में दोनों पक्षों ने इसके समर्थन एवं विरोध में लिखा है। इस लिए, मेरे विचार में, इस विषय को लंबा खींचने की ज़रूरत नहीं है और इस पर अनावश्यक बहस नहीं होनी चाहिए।
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निर्णय - फत्वा
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जो भी मव्लिद मनाना चाहता है उसे चाहिए कि इस प्रकार मनाए कि इस्लाम के विरुद्ध कोई अमल इस में ना हो (जैसे शिर्क, फजूल खर्ची, धमाल मचाना आदि)। 'मव्लिद' इस निय्यत से मनाने चाहिए कि यह 'सुन्नत' (अर्थात दीनी हुक्म) नहीं है नाही यह कोई 'फर्ज़' अमल है। यदि यह शर्तें स्वीकार करके, और कोई भी गैर इस्लामी अमल किए बिना इस को मनाया जाता है, नबी (स) से सच्ची मोहब्बत के जज़्बे के अंतर्गत, तब, इनशा अल्लाह, इस में कोई खराबी नहीं है और मनाने वाले को ज़रूर अजर मिलेगा।
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इसी पर टिप्पणी करते हुए, शेख इबने तेमियह (र) ने फरमाया, "बेशक ऐसे व्यक्ति को उसकी निय्यत के कारण अजर मिलेगा"। इसी प्रकार जो इस 'मव्लिद' को  सुन्नत से जुड़े रहने और बिदअत में गिरने के खौफ से नहीं मनाते, ऐसे व्यक्ति भी अजर/इनाम को पाएंगे, इनशा अल्लाह। यह याद रखना ज़रूरी है कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, नाही इसको ज़्यादा एहमियत देने की ज़रूरत है।
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मंहज- तरीक ए कार -कार्यप्रणाली
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इस विषय पर मेरा ध्यान देना मुसलमानों को मुत्तहिद (एकत्र) करने के उद्देश से है। मैं इस विचार को दोनों पक्षों का एक दूसरे को समझने पर आदारित करता हूँ। यह इस कारण कि हमारे कुरआन ने और नबी (स) के फरमान ने मुसलमानों के आपसी इत्तेहाद पर अधिक ज़ोर दिया है। यदि एक विवादास्पद मुद्दा उठता है, हम उस मुद्दे पर अधिक ध्यान देते हैं, दोनों पक्षों का सम्मान रखते हुए। यह ध्यान केवल लोगों को खुश करने के लिए नहीं दिया गया, या फिर कमजोर राय रखने वालों पर आरोप लगाने के लिए। यह सम्मान और इख्तिलाफ़ को बर्दाश्त करने का विचार इस लिए कहा है, कि दोनों पक्ष अपने प्रमाण इस्लामी ग्रन्थों से ही दे रहे हैं। कुछ मामलों में प्रमाण स्पष्ट होते हैं, और कुछ में नहीं। इसी कारण कई उलमा ने इस अमल की वैधता के प्रमाण दिये हैं, और कुछ ने इस के विरोध में। अंत में, मेरा मौकिफ दोनों पक्ष अच्छाई पर हैं, इन शा अल्लाह, जब तक कि इस मव्लिद में बुरे आमाल नहीं मिलाए जाते और लोगों की नियात साफ हो।
वल्लाहु आलम (अल्लाह ही बेहतर जानने वाला है)
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(प्रस्तुत लेख में शेख अब्दुल्लाह बिन बय्यह के शब्द हैं, जिनके मूल अंग्रेजी लेख का अनुवाद मुश्फिक सुल्तान साहब ने किया है, ... शेख अब्दुल्लाह बिन बय्यह इस्लामी गणराज्य मौरितानिया मूल के इस्लामी विद्वान और राजनीतिज्ञ हैं, ये मौरितानिया में शरिया मामलों के विभाग के हेड और मौरितानिया के हाई कोर्ट के जज रहने के साथ साथ यूके, आयरलैंड, लेबनान, भारत, जॉर्डन, कुवैत, सऊदी अरब जैसे कई अन्य देशों में भी इस्लामी ज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दे चुके हैं, विशेषकर मैं ज़िक्र करना चाहूंगा कि शेख़ बिन बय्यह जेद्दा की किंग अब्दुल अज़ीज़ यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर रह चुके हैं और, मक्का शरीफ़ में मुस्लिम लीग द्वारा गठित मस्जिदों के इंटरनेशनल हाई काउंसिल के मेम्बर भी रह चुके हैं )

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कुछ लोग ये कहते हैं कि हज़रत ईसा के दोबारा दुनिया में आने का अक़ीदा तमाम मुस्लिम उम्मत का अक़ीदा है, और जो ये अक़ीदा न रखे वो क़ादियानी मज़हब का सपोर्टर है, क्योंकि क़ादियानी ही नुज़ूल ए ईसा सानी का इनकार करते हैं... 
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... ये एक झूठ है कि कभी उम्मत का इज्माई अक़ीदा रहा हज़रत ईसा के नुज़ूल ए सानी पर, पहली बात तो इस मामले की जानकारी अवाम को अक्सर रही ही नही है, ये मामला उलमा तक सीमित रहा है, तो जिस बात की जानकारी चन्द लोगों के सिवा किसी को रही न हो उस बात को "उम्मत का इज्मा" कह देना ही झूठ है... फिर उलमा भी कभी इस पर एक मत नही रहे, ... आज के ज़माने में भी कई अहले हदीस उलमा ने इन रिवायतों के ख़िलाफ़ दलीलें दी हैं .... इसलिए जब कोई ये कहता है कि सिवाय एक शख़्स के, कुल उम्मत का इज्मा इस पर है कि हज़रत ईसा दुनिया में दोबारा उतारे जाएंगे, तो वो शख्स अपने अक़ीदे को दूसरों से मनवाने के लिए उसपर मानसिक दबाव बनाने को ये झूठ बोल रहा होता है....!!!
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हज़रत ईसा आज भी ज़िंदा हैं, वो दुनिया में दोबारा आएंगे ये अक़ीदा असल में ईसाइयों का है, क्योंकि उनके लिए ईसा ख़ुदा के बेटे हैं खुदा के बेटे पर मौत का असर नहीं होने का ख्याल पालना उनके लिए आसान है....
... लेकिन मुस्लिमों ने ये हज़रत ईसा को सब नबियों में बरतरी का दर्जा दिए जाने का अक़ीदा क्या सोचकर पाल लिया ?? जबकि क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है "लानुफर्रिकु बैन अहदिम मिर्रुसुलिही" 
...... मुसलमानों में ये नुज़ूले ईसा सानी का अक़ीदा ईसाइयों के ज़रिए आया है, जबकि क़ुरआन पाक में हज़रत ईसा की सेकेण्ड कमिंग का कहीं ज़िक्र नही है, ...... हां अवाम में मशहूर कहानियों के ज़हन में बसा होने की वजह से कोई कुछ आयतों पर कयास लगा सकता है
.... इस अक़ीदे कि हज़रत ईसा आज तक ज़िंदा हैं, और नबी सल्ल० की वफ़ात हो गई, इसकी बुनियाद पर मुसलमानों को ईसाई बनाने के प्रोग्राम चल भी रहे हैं और कामयाब भी हो रहे हैं, आप यूट्यूब पर भारत के एक मुस्लिम इमाम के ईसाई पादरी बनने की वीडियो देख सकते हैं जिसमें वो कहता है कि मुझे मुसलमान होते हुए भी हज़रत ईसा के ख़ुदा होने का यक़ीन इस बात से आया कि इस्लामी किताबों में लिखा है कि मुहम्मद सल्ल० की तो वफ़ात हो गई लेकिन हज़रत ईसा ज़िंदा हैं और वापस आएंगे... इस गलत अक़ीदे ने उस मुसलमान को ईसाई बना दिया, सोचिये कितना संगीन मामला है ये....!!!!
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..... सूरह निसा की आयत 159 पर कयास लगाकर हज़रत ईसा के आज तक जिंदा होने की बात कही जाती है, कहा जाता है कि उनकी सेकेंड कमिंग में तमाम अहले किताब उन पर ईमान लाएंगे... लेकिन यही लोग ये भी मानते हैं कि सेकेंड कमिंग में हज़रत ईसा नबी की हैसियत से अपने दीन की दावत देने का काम नहीं करेंगे.... तो भला ये कैसे हो सकता है कि जब नबी अल्लाह की किताब सुनाकर लोगों को बुलाये, तो वो ईमान न लाएं, और जब दीन की दावत देने का काम न करें तो तमाम लोग उनपर ईमान ले आएं ?? फिर इसी आयत 159 में है कि इन ईमान लाने वालों पर कयामत के रोज़ ईसा गवाह होंगे, क़यामत के रोज़ लोगों पर गवाह होने का काम उस उम्मत के नबियों का है, तो जब ईसा नबवी हैसियत से नही आएंगे तो इस आयत में कयामत के करीब के यहूदियों की बात कैसे हो सकती है ??
दरअसल वो आयत उन तमाम अहले किताब के बारे में उतरी है जिनको हज़रत ईसा ने बतौरे नबी दीन की दावत दी थी और शुरू में उन्होंने ठुकरा दी थी, लेकिन नबी को ग़लबा देने का अल्लाह का कानून है इसलिये ईसा अलैहिस्सलाम को देखने और सुनने वाले इन अहले क़िताब को अपनी ज़िंदगी में हज़रत ईसा पर ईमान लाना ही पड़ा.... कुरआन 4:159 में किसकी मौत का ज़िक्र है, हज़रत ईसा की, या उन अहले किताब की, ये भी सोच का विषय है, फिर भी हज़रत ईसा की ही मौत समझें, तो जिस वक्त अल्लाह ने ईसा को सलीब से बचाया उस वक्त रोमन मन्दिर का पर्दा फटने और मौसम में अचानक डरा देने वाली तब्दीलियों का ईसाइयों के यहां ज़िक्र किया जाता है, फिर इसके बाद कई दिनों तक हज़रत ईसा को ज़िंदा और भला चंगा देखे जाने का भी बाइबल में ज़िक्र है, ऐसी निशानियां देखकर उन तमाम अहले किताब को हज़रत ईसा की हक्कानियत पर यकीन आ जाना ऐन मुमकिन है !!!
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.... ख़ैर, दीन के तमाम अहम मामलात के बारे में अल्लाह ने फरमाया है कि उसने क़ुरआन में कुछ भी लिखने से नही छोड़ा (अल अनआम 6:38), तो फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि दीन के मामले में इतनी अहम और ज़रूरी बात नुजूले ईसा सानी का क़ुरआन में रत्ती भर भी ज़िक्र न किया जाए...??
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..... मसीह अलैहिस्सलाम की सेकेण्ड कमिंग का ज़िक्र होने का सबसे बेहतर मौका जब क़ुरआन 5:116-118 में आया था तो वहाँ ख़ुद हज़रत ईसा एक बार दुनिया से उठाये के बाद दुनिया के हालात से नावाकफियत का इज़हार करते हुए अल्लाह से अर्ज़ करते हैं कि जब तक मैं दुनिया वालों के बीच रहा, उन्हें देखता रहा, फिर जब तूने मुझे उनके बीच से उठा लिया उसके बाद, ऐ रब तू ही उनकी निगरानी करता था और उनका गवाह है.... यानि उठा लिए जाने के बाद ईसा अलैहिस्सलाम दुनिया वालों के हालात से ख़बरदार नही थे
.... ये ध्यान रखिये कि ये कयामत के दिन ईसा अलैहिस्सलाम और अल्लाह के बीच के मुकालमे का ज़िक्र है जबकि अल्लाह की तमाम निशानियां और आज़माइशें पूरी हो चुकी हैं, और अगर ईसा अलैहिस्सलाम को दो बार दुनिया में आना था तो वो बात भी पूरी हो चुकी है, तो फिर इस मौके पर हज़रत ईसा ने ये क्यों नहीं फ़रमाया कि ऐ अल्लाह, तूने मुझे दो बार दुनिया में भेजा, और मैंने लोगों को दोनों बार नसीहतें कीं...
....ये बात सौ फीसदी सच है कि क़ुरआन की आयतों में किसी तरह की कमी ढूंढे नही मिलती, ऐसे में यहाँ हज़रत ईसा के दोबारा नुज़ूल का ज़िक्र न होना, एक बड़ी बात है जिसपर लोग गौर नही करते
.... इसी तरह सूरह आले इमरान की 55वीं आयत है, जहां अल्लाह ने हज़रत ईसा को उन्हें सूली पर चढ़ाने की साज़िश करने वालों की शरारत से बचाकर अपने पास उठाने का ज़िक्र किया है वहां अल्लाह ने हज़रत ईसा के लिए लफ्ज़ "मुत'वफ्फिका" यानि वफ़ात देने का लफ्ज़ इस्तेमाल किया है, कि "हम तुझे वफ़ात देंगे, और अपनी तरफ़ बुला लेंगे" ... इस लफ्ज़ का रूट "व-फ़-य" है, और क़ुरआनी लुग़त में इसका मतलब किसी चीज़ को मुकम्मल करने से है, या किसी को मौत आने से है... बस..!! 
यानी आयत में अल्लाह ने हज़रत ईसा की दुनियावी ज़िन्दगी और उस ज़िन्दगी की ज़िम्मेदारियों को मुकम्मल करने का ऐलान किया है, इसी तरह सूरह मायदा की आयत 117 में भी हज़रत ईसा यही फ़रमाते हैं, कि (तवफ्फयतनी) अल्लाह ने मुझे "वफ़ात" दी,

क़ुरआन पाक में बार बार मौत के लिये वफ़ात लफ्ज़ का इस्तेमाल किया गया है, फिर भी आप नही मानते कि हज़रत ईसा को मौत दे दी गई है ?? दूसरा मतलब यानि किसी बात को मुकम्मल करने का मतलब भी लें, तो अल्लाह ने नबी ईसा की दुनियावी ज़िन्दगी और उनकी ज़िम्मेदारियों को मुकम्मल कर दिया, यही बात निकलती है, इसमें भी उनके दोबारा आने की सूरत नही बचती ..

वहीं क़ुरान पाक में अल्लाह गाहे गाहे इस बात की तरफ भी तवज्जोह दिलाता है, कि मसीह अलैहिस्सलाम को बाकी नबियों पर कोई बरतरी नही दी गई है, सूरह माएदा की 75वीं आयत में लिखा है : "मरयम का बेटा मसीह एक रसूल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। उससे पहले भी बहुत-से रसूल गुज़र चुके हैं। उसकी माँ अत्यन्त सत्यवती थी। दोनों ही भोजन करते थे। देखो, हम किस प्रकार उनके सामने निशानियाँ स्पष्ट करते है; फिर देखो, ये किस प्रकार उलटे फिरे जा रहे हैं" .... 
इसी तरह सूरह अम्बिया की सात, आठ और नौ नम्बर की आयतों को पढ़िए, अल्लाह ने नबी सल्ल० से फ़रमाया है कि "आप सल्ल० से पहले भी हमने आदमियों ही को रसूल बनाकर भेजा, उनको हमने कोई ऐसा जिस्म नहीं दिया था कि वो खाना न खाते हों और न वो हमेशा रहने वाले ही थे, फिर हमने उनके साथ वादे को सच्चा कर दिखाया और उन्हें हमने छुटकारा दिया"
..... इन आयतों में हज़रत ईसा समेत नबी सल्ल० से पहले के तमाम नबियों का ज़िक्र "गुज़रे हुए इंसानो' के तौर पर अल्लाह ने किया है, यहाँ ये तो नही फ़रमाया कि बाक़ी नबी तो हमेशा रहने वाले नहीं थे, और गुज़र चुके अलबत्ता ईसा अभी हयात हैं ...
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... इन आयतों को पढ़ने समझने के बाद ये मानना कि हज़रत ईसा अभी तक अपने जिस्म के साथ हयात हैं, और दोबारा उसी जिस्म के साथ आसमान से उतार के दुनिया में भेजे जाएंगे, सही साबित नही होता,
...... हज़रत ईसा का नुज़ूल ए सानी क़ुरान शरीफ में नही बयान किया गया, बल्कि नबी सल्ल० के ज़माने के 150 साल बाद मदीना शरीफ के लोगों से अहादीस ले लेकर लिखी गई हदीस की पहली किताब "मालिक मुवत्ता" में भी कहीं नही लिखा गया कि हज़रत ईसा का दोबारा इस दुनिया में नुज़ूल होगा जबकि किसी बड़े नबी का दोबारा ज़िंदा हो जाना मज़हब की एक बहुत बड़ी बात है, फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि इमाम मालिक रह० छोटी छोटी बातों का ज़िक्र तो करें, और मज़हब की इतनी बड़ी बात उनके सुनने में ही न आये ??
आप सल्ल० के अहादीस बयान करने के ढाई सौ साल बाद हज़रत ईसा के नुज़ूल ए सानी की पेशीनगोइयों को किताबों में पहली बार लिखा जाने लगा..... तब तक ये बातें सिर्फ ज़बानी ज़िक्र के ज़रिये आगे बढ़ीं... और इतने अर्से में इन बातों का अपनी असली शक्ल से बदल जाना कोई गैरमुमकिन बात नही
...बल्कि ये ज़िक्र अपनी असली शक्ल से वाकई बदला है ये बात मुवत्ता इमाम मालिक में नबी सल्ल० की एक रिवायत पढ़कर साफ़ पता चलती है ... मुवत्ता इमाम मालिक की किताब 49, हदीस नम्बर 49.2.2 पर एक हदीस है, अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि० रिवायत करते हैं कि नबी सल्ल० ने फरमाया "रात मैंने एक ख्वाब देखा कि मैं काबा शरीफ में हूँ, वहां मैंने एक काले रंग के शख्स को देखा, जो इतने ज़्यादा खूबसूरत थे जितना ज्यादा खूबसूरत मर्द तुमने कभी काले लोगों में देखा हो, .. उनके बाल उनके कानों और कंधों के दरम्यान पहुँच रहे थे, और उनके बाल भी बेहद खूबसूरत थे, उन्होंने अपने बालों को काढ़ा हुआ था, और उन बालों से पानी के क़तरे टपक रहे थे, उन्हें दो लोग काबा का तवाफ़ करा रहे थे, मैंने पूछा कि ये शख्स कौन हैं, मुझे बताया गया कि ये मसीह इब्ने मरियम हैं !
फिर मैंने एक और शख्स को देखा जिसके बाल कड़े थे और वो दाहिनी आँख से काना था, मैंने पूछा कि ये शख्स कौन है ? ... मुझे बताया गया कि ये "मसीह ए दज्जाल" है !!"

..... यहां नबी सल्ल० ने कोई पेशीनगोई नही की बल्कि अपने एक ख्वाब का ज़िक्र किया है इस हदीस में... नबी सल्ल० ने इस ख्वाब में हज़रत ईसा का जो हुलिया देखा था, बाद की किताबों में उसी हुलिए को भविष्यवाणी के तौर पर लिखा गया है .... यानि बाद की किताबों में जितने भी ज़िक्र हैं वो सब इस एक ख्वाब के बड़े वर्ज़न हैं, या लोगों ने ख़्वाब की ताबीर निकालनी चाही है, लेकिन बाद की अहादीस में जो भी लिखा है उसका "एज़ इट इज़" पूरा होने का ख्याल इसलिये दुरुस्त नही क्योंकि वो नबी सल्ल० का ख़्वाब है
...... हालांकि नबी सल्ल० के क़रीब के ज़माने से मिली हदीस इस बात पर भी ज़ोर नही देती कि इस ख़्वाब में कोई पेशीनगोई है, लेकिन फिर भी इसको पेशीनगोई की तरह लिया जाए तो इसके कुछ इस्तिलाही मायने लेने होंगे...
..... मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब हिन्दोस्तान के उन चंद एक इस्लामी उलमा में शामिल हैं जिन्हें आलमी सतह पर शोहरत हासिल है... मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब खुद देवबंदी मकतब ए फ़िक्र से हैं,
अपनी किताब "क़यामत का अलार्म" में मौलाना साहब ने पेज 49 और 50 पर लिखा है कि "हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम का दोबारा अपने जिस्म के साथ दुनिया में उतरने का ख्याल न क़ुरान से दुरुस्त साबित होता है और न हदीस से ... बल्कि ये किसी "आम इंसान" के मसीही रोल अदा करने की पेशीन गोई है, और हज़रत ईसा अपने जिस्म के साथ दोबारा ज़मीन पर नही उतरेंगे ये बात कोई नया ख़याल नही है बल्कि हमेशा से उलमा की एक क़ाबिल ए लिहाज़ तादाद इस ख़्याल की हामी रही है जिनमे बाज़ नाम सय्यद जमालुद्दीन अफ़गानी, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मुफ़्ती मुहम्मद अब्दुह, शेख मोहम्मद शलतूत, अबू ज़हरा, डॉक्टर मुहम्मद इक़बाल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, वगैरह के हैं"
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..... ऐसे न जाने कितने अरबी और दुनियाभर के इस्लामी विद्वान हुए हैं जिन्हें हज़रत ईसा के दोबारा दुनिया में आने की बात से इख्तिलाफ रहा है... किसी मसीहा के आने के इंतज़ार की बजाय मैं भी उन अहादीस की ये इस्तिलाह समझता हूं कि ग़ालिबन आख़री ज़माने में हज़रत ईसा के मानने वाले तमाम लोग मुसलमानों के साथ हो जाएंगे.. !!!
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.....जो लोग ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि हज़रत ईसा की सेकेंड कमिंग का इनकार करना क़ादियानी मज़हब की पैरोकारी करना है, उनको अपनी अक़्ल पर ज़ोर देकर ये बात समझनी होगी .... अगर क़ादियानी यही मानते हैं कि हज़रत ईसा का नुज़ूल ए सानी नहीं होगा, तो फिर ऑटोमैटिकली उन्होने ये भी तस्लीम कर लिया है कि उनका बानी गुलाम अहमद झूठा साबित हुआ, क्योंकि गुलाम अहमद ने खुद को हज़रत ईसा कहा था, और इसी नुज़ूल ए सानी के अक़ीदे का फ़ायदा उठाकर खुद को अल्लाह का नबी कहते हुए अपना एक अलग मज़हब पैदा कर दिया था.... जब अपने पीर को झूठा मान चुके तो फिर ये क़ादियानी तौबा कर के इस्लाम की तरफ लौट क्यों नहीं आते ??
..... असल बात ये है कि क़ादियानी मज़हब हज़रत ईसा के नुज़ूल ए सानी की रिवायतों पर यक़ीन के नतीजे में पैदा हुआ और पल बढ़ रहा है, अगर इन रिवायतों पर अंधा यक़ीन न होता तो इस्लाम मे ये टूट भी न पड़ती...!!!
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.... हम कहते हैं कि हज़रत ईसा को सिरे से दोबारा आना ही नही था और कादियानियों का मानना है कि अब उनके पीर की शक्ल में ईसा आ चुके हैं और अब कोई और ईसा नही आएंगे... इस तरह गुलाम अहमद को ईसा मानने वाले कादियानियों का नुज़ूल ए सानी पर पक्का अक़ीदा है और अगर वो हमारी दलाइल मान लेंगे तो तौबा कर के मुस्लिम बन जाएंगे....!!!



Sunday, 16 August 2020

इफरात और तफरीत, मुर्तद की सज़ा।







इफरात और तफ़रीत का मामला,
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मुसलमानों के बारे में नबी सल्ल० ने पेशीनगोई फ़रमाई थी, कि "तुम क़दम दर कदम, अहले क़िताब की पैरवी करोगे यहाँ तक कि वो अगर गोह के बिल में घुसे होंगे तो तुम भी घुस जाओगे..."
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.... मैंने कहीं पढ़ा था कि यहूदियों ने दीन में इफ़रात (हद से आगे बढ़ने) का मामला किया और अपनी तरफ़ से खुद पर ऐसी चीज़ें भी हराम कर लीं जिनपर दीन में कोई पाबंदी लगाई ही नही गई थी, जैसे यहूदियों ने ख़ुद पर ऊंट का गोश्त खुद ही हराम कर लिया, जबकि उनके लिए वो हलाल था, इसके बरअक्स ईसाइयों ने दीन में तफ़रीत यानि बिलकुल आज़ादी लेने और हराम को भी हलाल ठहरा लेने का मामला किया और सूअर जैसी हराम चीज़ को हलाल ठहरा लिया
.... अल्लाह ने न यहूदियों की इफ़रात का मामला पसन्द किया न ईसाइयों की तफ़रीत का, बल्कि यहूद ओ नसारा के इफ़रात ओ तफ़रीत के अमल पर सूरह आराफ़ में ये बयान किया कि इस्लाम के नबी तुम्हारे लिए तय्यबात को हलाल और खबाइस को हराम ठहराते हैं, और यहूद ओ नसारा पर से उनके वह बोझ उतारते हैं, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलते हैं, जिनमें वे जकड़े हुए थे... (7:157)
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.... इस आयत का मतलब ये था कि दीन में सिर्फ़ उतना ज़रूरी है जितना फरमाने इलाही में बयान किया गया है, न उससे कम पर अल्लाह राज़ी है, न उससे ज्यादा ही बढ़ना अल्लाह के नज़दीक पसंदीदा है...
..... अहादीस में भी ये बात इस तरह बयां की गई है हलाल वो चीज़ें हैं जिन्हें क़ुरआन में हलाल किया गया, और हराम वो तमाम बातें हैं जिन्हें क़ुरआन में हराम ठहराया गया, और रही वो बातें जिनका तज़किरा क़ुरआन में नही किया गया, ये बातें "मुआफ़" हैं...!!!
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... इतनी साफ़ वजाहत के बावजूद मैंने मुसलमानों में इफ़रात का मुआमला देखा है.... जी हां वैसी ही इफ़रात का मामला जैसी इफ़रात यहूदियों ने अपनाई थी... उम्मीद है आप हज़रात भूले नही होंगे वो तमाम जानवरों की टैन खाल को पाक मानने की इमाम इब्ने हज़्म रह० की फ़िक़्ह को मेरी ताईद, और उस पर लोगों का बवाल, जबकि वो फ़िक़्ह हदीस शरीफ़ पर मबनी थी और क़ुरआन की आयतों के गहरे अध्ययन पर इफ़रात और तफ़रीत के अमल से बचने के ख़्याल से तरतीब दी गई थी, इसके बावजूद मुझे हराम को हलाल साबित करने की कोशिशें करने वाला बताकर ख़ूब गालियां दी गईं, 
मैंने उन लोगों का रद्दे अमल देखकर यही जाना कि भले ही ये लोग यहूदियों से हद से ज़्यादा नफ़रत दिखाते हों, मगर कदम दर कदम हैं ये लोग यहूदियों के नक़्शे कदम पर ही, जैसा कि नबी सल्ल० पेशीनगोई फ़रमा चुके हैं, ये लोग पूरा कर रहे हैं... यहूदी मज़हबी मामलात में इफ़रात करने के आदी थे, आज का मुसलमान भी देख लीजिये कई मामलों में इफ़रात कर रहा है, यहूदियों में एक आदत मज़हब को लेकर चरमपंथी बनने की थी कि अपने बनाए अक़ाइद से अलग दूसरी बात सुनने पर हज़रत ईसा का क़त्ल करने पर आमादा हो गए थे, और आज के मुसलमानों में भी ये चरमपंथ आप बख़ूबी देख सकते हैं, ये अपना अपना फ़िरक़ा पकड़कर दूसरों को क़त्ल करने पर आमादा हैं....
..... बेशक़ हुज़ूर सल्ललल्लाहो अलैहे वसल्लम की पेशीनगोई सच्ची साबित हुई।

~ ज़िया इम्तियाज़।



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क़ुरआन में इरतिदाद करने वालों का ज़िक्र बार बार आया है और कुरआन में कहीं वक़्त के हाकिम को ये हुक्म नही दिया गया कि वो मुर्तद को मौत की सज़ा दे
.... सिर्फ़ एक मुख्तसर रिवायत की बुनियाद पर कुछ भाईयों के हिसाब से इस्लाम से धर्म परिवर्तन करने के हर मामले पर मौत की सज़ा नाफिज़ होगी ..... हालांकि बड़े बड़े उलमा ने यही फ़तवा दिया है कि आम इर्तिदाद के मामलों पर हुदूद नाफ़िज़ नही होते....
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....... फिर भी जाने क्यों हमारे कुछ भाईयों के खयाल मे जो इंसान एक बार मुस्लिम से गैर मुस्लिम बना फिर उसे ज़िन्दा रहने का कोई हक नहीं .....
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लेकिन भाईयों क्या आप ये मानोगे कि अल्लाह और रसूल का कोई हुक्म कभी गलत साबित हो सकता है ??
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 गाज़ी धर्मपाल के बारे मे आपने कभी न कभी ज़रूर पढ़ा या सुना होगा .... उन्होने भी इस्लाम त्याग दिया था और कई साल मुर्तद के रूप मे गुज़ारे, और इस्लाम की खूब धज्जियां उड़ाई.....
....... किस्सा तमाम ये है कि सन् 1903 मे अब्दुल गफूर नाम के इक्कीस साल के नौजवान ने गुजरांवाला की आर्यसमाज में दाखिल होकर इस्लाम छोड़ कर वैदिक धर्म अपना लिया और अपना नाम धर्मपाल रखा इसके बाद धर्मपाल ने इस्लाम की बुराइयों से भरी किताबें लिखनी शुरू कर दीं, और तमाम हिन्दोस्तानी मुसलमानों को हिलाकर रख दिया
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ग़ाज़ी महमूद धर्मपाल जो इस्लाम के खिलाफ़ आर्यसमाज की मदद से कई किताबों के लेखक थे आपको सभी किताबों के इस्लामी स्कॉलरों ने जवाब भी दिये थे, 
.... तो मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी लेखक ‘हक प्रकाश बजवाब सत्यार्थ प्रकाश‘ से 11 साल के बहस मुबाहिसे के बाद धर्मपाल वापस इस्लाम की सच्चाई को मान कर 14 जून 1914 मे फिर से मुसलमान हुए और अपने 11 साल के आर्यसमाजी अनुभव से इस्लाम को अपनी कई किताबों से तक़वियत बख़्शी 
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 ..... ये अल्लाह का ही करना था कि इर्तिदाद के बरसों बाद उन्हें अपनी गल्ती का एहसास हुआ, और वो वापस मुस्लिम बन गए और इसके बाद उन्होंने इस्लाम की जो खिदमत की और अपने और दूसरों के लगाए इल्ज़ामात को इस्लाम पर से धो डाला,  वो हरगिज़ न हो पाता अगर उन्हें कत्ल कर दिया जाता...
..... तो भाईयों क्या ये मुमकिन है कि एक तरफ़ अल्लाह और रसूल मुर्तद को मौत की सज़ा के लायक़ बताएं, और दूसरी तरफ इर्तिदाद करने वाले को इस तरह क़ुबूल कर लें कि उससे इस्लाम की बेहतरीन ख़िदमात लें.....
...... सोचिये, अल्लाह का करना बता रहा है कि इस मामले में कहीं, मिसइन्फॉर्मेशन का मामला हुआ है, एक आम मुर्तद से मुसलमान का क्या रवैया हो, इस पर उस सज़ा वाली रिवायत से हम तक पूरी बात नहीं पहुँची है
..... तो ऐसी अधूरी बात पर कोई क़ानून तय करने की बजाय कुरआन की तरफ़ आएं, वहां देखें कि इस मामले पर क्या बताया गया है....
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...... क़ुरआन में सूरह आले इमरान की आयतें 86 से लेकर 90 तक, ईमान के बाद इर्तिदाद करने वालों का ज़िक्र किया जा रहा है कि अगर ये मुर्तद होकर अपनी गुमराही में बढ़ते गये तो अल्लाह भी इनको हमेशा की जहन्नुम में डाल देगा, .... लेकिन इसी बीच आयत 89 में पढ़िए, यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो इरतिदाद के बाद फिर मुस्लिम बन गया तो अल्लाह भी माफ़ करने वाला है, .... यानी इरतिदाद करने वाला अगर अपनी गलती का एहसास होने पर वापस दाखिल ए इस्लाम हो जाएगा, तो अल्लाह भी उस बन्दे का जुर्म माफ कर के उसे क़ुबूल कर लेगा, इन शा अल्लाह !!!
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....... अब यहां खुद देखिए, मुर्तद का वापस मुस्लिम बनना तभी सम्भव है जब वो इंसान ज़िंदा रहे, उसे अपने फैसले पर सही-गलत सोचने का मौका और मोहलत मिले.... आज आप थोड़ा ही इंटरनेट सर्च करें तो ऐसे लोगों की वीडिओज़ भरी पड़ी पाएंगे जो ये कहते हैं कि हम मुसलमान से मुर्तद हो गए थे और बरसों बाद हमें वापस इस्लाम के वाहिद सच्चा मज़हब होने का एहसास हुआ और हम वापस पहले से कहीं ज़्यादा पुख़्ता ईमान के साथ इस्लाम में दाख़िल हो गए....
.... मैं खुद अपनी आपबीती देखता हूँ तो पाता हूँ कि इस्लाम पर शक और फिर तहक़ीक़ के बाद इस्लाम पर जो मज़बूत यक़ीन बनता है, उसका कोई मुक़ाबला नही.... मुझे लगता है कि अपने बन्दों को दीन की तरफ़ लाने की ये भी अल्लाह की एक मस्लेहत है, .... उम्मीद है आप भी अल्लाह की इस मसलेहत को समझने की कोशिश करेंगे !!

क्या अल्लाह साकार हैं।

क्या अल्लाह साकार है।

पिछले कुछ दिनों में दो तीन बार इस किस्म के सवाल मेरे सामने आये कि मुस्लिम तो ये दावा करते हैं कि अल्लाह निराकार है, उसका कोई आकार नही, लेकिन क़ुरान पाक में तो लिखा है कि अल्लाह ने आदम अस० को अपने हाथों से बनाया जिससे सिद्ध होता है कि मुस्लिमों का अल्लाह शरीर वाला है, तथा क़ुरान में अल्लाह के एक कुर्सी पर बैठे होने का वर्णन है जिसका अर्थ ये हुआ कि अल्लाह एक आकार और एक स्थान में सीमित है, वो सर्वव्यापी नही है जैसा कि मुस्लिम दावा करते हैं !!!
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उत्तर : देखिये, पहली बात तो ये है जिसे मैंने अक्सर बताया है कि क़ुरान की भाषा को अलंकृत, या लयात्मक यानि शायरी जैसा रखा गया है ताकि ये रूचि से सुनी जाये और इसे याद रखने और कंठस्थ करने में आसानी हो... सो, शायरी या काव्य का तरीका ये है कि उसमें मिसालों और मुहावरों का इस्तेमाल कर के बात को बयान किया जाता है .....

..... जहाँ तक क़ुरआन पाक में इस सांसारिक जीवन से परे की स्थितियों की बात है, इसके बारे में सच्चाई तो ये है कि ये ऐसी बातें हैं जो अपने वास्तविक रूप में इंसान की समझ में नही आ सकतीं जब तक इंसान उस अगली दुनिया में जाकर खुद उन परिस्थितियों और चीज़ों का अनुभव न कर ले, मुस्लिम शरीफ में एक हदीस का सार ये है कि परलोक की बातों का कोई मनुष्य न वर्णन कर सकता है, न उन दृश्यों की सही सही कल्पना ही करना उसके वश में है, (सही मुस्लिम, किताब-40, हदीस संख्या- 6780, 6781 और 6782 से मफ़हूम) .... ऐसा इसलिये, क्योंकि धरती पर ऐसा कभी कुछ किसी व्यक्ति ने देखा ही नही जिसकी तुलना के आधार पर वो परलोक की दुनिया के रूप पर कोई अनुमान लगाये..
पर क्योंकि क़ुरान का काम इंसान को आख़िरत के बारे में चेतावनी देना था, इसलिये इंसान को परलोक के बारे में एक अनुमान देना ज़रूरी था, इसलिये क़ुरान में इंसानी ज़बान में इंसानों के समझने में आसान मिसालें दे देकर बात को समझाया गया है, ताकि लोग कुछ हद तक बातों को समझ सकें, और कम से कम बात के मर्म तक पंहुच पाएं ..
..... इन बातों को दिमाग में बिठाकर क़ुरान की इन आयतों को समझना चाहिये....
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.... इस्लामी आस्था बिलकुल यही कहती है कि अल्लाह को निराकार स्वीकार करते हुए उसकी बन्दगी की जाए, और जिस तरह विश्व के अनेकों समुदायों ने ईश्वर के आकार की कल्पना करके झूटी मूर्तियों और तस्वीरों को गढ़ के उन्हें ईश्वर का रूप बता दिया इस कुचेष्टा से मुसलमान कोसों कोसों दूर रहें और बिना किसी मूर्ति की कल्पना के ईश्वर की इबादत करें.... कुरआन में कई स्थानों पर ये बात दोहराई गई है कि अल्लाह "बेमिस्ल" है, यानी यानी वो किसी भी प्रकार की "भौतिक" तुलनाओं से परे है.... तो स्पष्ट है कि पवित्र क़ुरआन की जिन आयतों से विरोधीजन अल्लाह के आकार प्रकार का पता लगाना चाह रहे हैं, उन आयतों का वास्तविक मन्तव्य कुछ और ही है,
........ ..... देखिये, जहाँ तक सवाल अल्लाह के "कुर्सी" पर बैठने का है तो जैसा कि हमारा ईमान है कि अल्लाह किसी भी किस्म की बनावट, जगह और वक्त की हदों से परे है, सो स्पष्ट है कि यहां उसके किसी "भौतिक" सिंहासन या कुर्सी पर बैठने की बात नही कही गई है, यहां दरअसल कुर्सी पर बैठने के शब्दों का प्रयोग मिसाल के तौर पर, या मुहावरतन किया गया है, और वो मुहावरा ये है कि जैसे एक बात कही जाती है, कि इस वक्त देश की गद्दी पर फलां शख्स बैठा है, इस बात का मतलब ये नही होता कि इस लम्हे वो शख्स किसी गद्दी पर बैठा ही होगा, बल्कि इस मुहावरे का मतलब ये है कि मौजूदा दौर में इस देश का हाकिम वो शख्स है, .... यही मुहावरा क़ुरान में अल्लाह ने अपने लिये इस्तेमाल किया है कि उसने दुनिया बनाई और इस दुनिया की सर्वोच्च सत्ता की बागडोर खुद सम्हाली यानि सबसे ऊंची कुर्सी पर वो विराजमान हुआ, ....!!!

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इसी तरह हज़रत आदम को अल्लाह द्वारा अपने "हाथों से" बनाए जाने की बात कहना भी एक इंसानों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला आम मुहावरा ही है, ..... क्योंकि क़ुरान ही तस्दीक करता है कि किसी भी चीज़ के निर्माण के लिये अल्लाह को खुद परिश्रम नही करना पड़ता, बल्कि अल्लाह जब किसी चीज़ का निर्माण करना चाहता है तो केवल आदेश करता है, और उस चीज़ का निर्माण होने लगता है, याद कीजिये क़ुरआन का प्रसिद्ध वाक्य "कुन फह्या कुन" जिसका खुलासा ये है कि जब अल्लाह किसी चीज़ का निर्माण करना चाहता है तो वो सिर्फ उस चीज़ को निर्मित होने का आदेश देता है और उस चीज़ का निर्माण हो जाता है...!!
... दरअसल किसी काम के पीछे किसी का "हाथ" होने के मुहावरे का अर्थ ये है कि फलां काम करने के पीछे, फलां व्यक्ति ज़िम्मेदार है, फिर भले ही वो काम उसने वास्तव में अपने हाथ से न किया हो लेकिन मुहावरे में यही कहा जाता है कि इस काम में उसका हाथ है....
.. और जब कोई व्यक्ति ख़ुद ये बात कहता है कि ये काम मैंने ख़ुद अपने "हाथों" से किया है, तो इसका सीधा मतलब ये समझा जाता है कि ये शख्स इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि फलां बात करने का ज़िम्मेदार मैं हूँ, जैसे एक उदाहरण लीजिये... हमारे समाज में अक्सर बूढ़े बाप अपने जवान बेटों पर जब गुस्सा होते हैं तो कहते हैं कि "मैंने तुझे अपने इन्हीं हाथों से पाल पोसकर बड़ा किया, और आज तू मुझे जवाब दे रहा है ?" .... जबकि वास्तव में अपने हाथों से पालने पोसने का काम तो माँएं करती हैं, हां बच्चों को पालने में बराबर के ज़िम्मेदार बाप भी होते हैं, और बच्चे को पालने के साधन जुटाने के ज़िम्मेदार होते हैं
... तो इसी मुहावरे का इस्तेमाल इंसानों को बात का मर्म अच्छे ढंग से समझाने के लिये किया गया इस आयत के पार्श्व में वृतांत ये है कि जब आदम अलैहिस्लाम का निर्माण करने के बाद अल्लाह ने अपने दासों को आदम के सम्मान में झुकने का आदेश दिया तो इब्लीस ने आदम अस० को अपने से हेय मानते हुए, अल्लाह के इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया, तब अल्लाह ने शैतान पर क्रोध करते हुए खासतौर पर इस बात बात पर ज़ोर देकर कहा कि शैतान ने उस आदम को तुच्छ कैसे समझ लिया जिस आदम का निर्माण करने का ज़िम्मेदार सर्वोच्च शक्तिशाली ईश्वर है, ...यानी आदम से अल्लाह के सम्बन्ध का ध्यान इब्लीस को दिलाने पर अल्लाह ने जोर दिया और इसी बात को इंसानी मुहावरे में क़ुरान में यूँ बयान किया गया है..."अल्लाह ने कहा, ऐ शैतान, तुझे आदम को सजदा करने से किस बात ने रोका ?? जिस आदम को मैंने अपने हाथों से बनाया है, क्या तूने घमण्ड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है ??" (38:75)
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......... तो वास्तव में बात यहां कुछ और है और विरोधीजन कुछ और सिद्ध करना चाहते थे...... इसी तरह कुछ हदीसें जिनमे बताया गया है कि कयामत के दिन बन्दे अपने रब्ब को देखेंगे, ... इन हदीसों को कोट करके भी लोग ये सिद्ध करना चाहते हैं कि देखा तो साकार को ही जा सकता है, निराकार को नही !! जबकि मामला यहाँ भी वही है कि मानवीय शब्दावली पारलौकिक दुनिया की बातों का सही सही वर्णन करने के लिये अपर्याप्त है, .... कयामत के रोज़ हर बन्दा अल्लाह के समक्ष होगा और उसके सामने अपने रचयिता को लेकर कोई संशय नही रहेगा जो संशय सांसारिक जीवन में उसके साथ रहे थे, इस स्थिति को अल्लाह को देखना के शब्दों से व्यक्त करने का प्रयास किया गया है, पर अल्लाह के आकार प्रकार पर कोई चर्चा नही की गई, वास्तव में मरने के बाद क्या होगा और कैसा होगा इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य की गर्त में हैं... और बेहतर ये है कि इन प्रश्नों में उलझने की बजाए हम सांसारिक जीवन के अपने कर्तव्यों को पूरा करने में ध्यान लगाएं, जिन कर्तव्यों को निभाने की हमारा रब्ब हमसे अपेक्षा रखता है !!!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

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बुद्ध और ईसा।

एक दिन संयोग से मैंने डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय की किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्य नन्दा को अपने अंत...