दीन में बुत और तस्वीरों को लेकर रुख
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....अहादीस में ज़िक्र आता है कि नबी सल्ल० ने फरमाया कि कयामत के रोज़ सबसे ज्यादा अज़ाब उनपर होगा जो तस्वीरें बनाते थे, एक दूसरी हदीस में है कि अल्लाह की बनाई तख़लीक़ (रचना) की नक़ल करने वालों से अल्लाह सख़्त नाराज़ होता है,
और एक तीसरी हदीस है कि तस्वीर बनाने वालों से कयामत के दिन अल्लाह कहेगा कि इनमें जान डालो, और वो नही डाल सकेंगे, तो फिर उन लोगों को दोज़ख़ में डाल दिया जाएगा
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.... तीसरी हदीस की बुनियाद पर आलिमों ने क़यास किया है कि सिर्फ़ जानदार जैसे चिड़िया, जानवरों और इंसानों की तस्वीर बनाना मना है पर फूल, पत्ती, इमारतों वगैरह की तस्वीर बनाना गुनाह नही है...
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क़ुरआन में तस्वीर बनाने की मनाही का जिक्र कहीं भी नहीं आता, और आमतौर पर मान लिया गया है कि तस्वीर की मनाही का मामला बुत की मनाही के हुक्म में ही आता है, अल्लाह ने क़ुरआन में बुत को हराम फ़रमाया है, क़ुरआन में बुत को हराम फरमाने की वजह उसका पूजा जाना है, इस हुक्म के बाद मुस्लिम उलमा ने एहतियातन पूजे जाने और न पूजे जाने वाले तमाम बुतों के बनाने और अपने घरों में रखने की मनाही कर दी कि कहीं न पूजे जाने वाले बुतों की गलती से पूजा चल पड़ी तो गुनाह होगा, यही रुख तस्वीरों को लेकर भी अपनाया गया कि न पूजे जाने वाले जानदारों की तस्वीर इसलिये न बनाई जाएं कि कहीं गलती से उनकी पूजा न चल पड़े
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..... लेकिन क़ुरआन के इस हुक़्म कि बुत हराम है, के बाद अगर हम हदीस का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि हदीस ने बुत के हराम होने के हुक्म पर कुछ और तफ्सील भी दी है जो हमें बताती है कि हर किस्म का बुत हराम नही है बल्कि एक खास मकसद से बनाये जाने वाले बुतों का ही बनाना और इस्तेमाल करना हराम है,
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.... बुख़ारी, मुस्लिम, निसाई और इब्ने माजाह समेत कई हदीस की किताबों में, बहुत मशहूर अहादीस में बीवी आयशा रज़ि० की गुड़ियों का ज़िक्र है, और अबू दाऊद शरीफ़ की किताब उल अदब में नम्बर 4914 (इंग्लिश ट्रांसलेशन) में सही दर्जे की हदीस में हज़रत आयशा रज़ि० के पास मौजूद एक दो परों वाले खिलौने घोड़े का ज़िक्र है जिसके ज़िक्र पर आप सल्ल० ने तबस्सुम फ़रमाया था... ज़ाहिर है ये खिलौने छोटे साइज़ के बुत ही होते हैं, और प्राचीन इतिहास से लेकर आज तक की मिसालें मौजूद हैं कि बहुत से समाजों में गुड़ियों की भी पूजा होती है,
.... लेकिन मुस्लिमों के लिए गुड़ियों को बनाने और घर में रखने का मक़सद इनकी पूजा हरगिज़ न था बल्कि मनोरन्जन था, इसलिये नबी सल्ल० ने मुस्कुरा कर इनकी इजाज़त दे दी थी.... यानी इन गुड़ियों के बनाने पर अल्लाह की रचना की नकल करने से अल्लाह के नाराज़ होने की बात नहीं है, वरना नबी सल्ल० मुस्कुरा कर चुप न रहते, बल्कि इन खतरों से लोगों को पहले ही की तरह आगाह करते.......
... ये बहुत मशहूर, और कुबूल की जाने वाली हदीस ये बात साफ़ करती है कि किसी मुबाह मकसद से अल्लाह की बनाई रचना की नकल अल्लाह को ऐसे सख्त गुस्से में नही डालती, कि अल्लाह बनाने वाले से उस चीज़ में जान डालने का सवाल करें और दोज़ख़ में डाल दें, यानी अल्लाह को किसी एक खास मकसद से बनाए गए बुत ही नाराज़ करते हैं, अगर इंसान अल्लाह के आदेशों को ठुकराते हुए, ऐसे किसी दावे से अल्लाह की बनाई रचना की नकल बनायेगा कि उसकी बनाई गई चीज़ में भी जान है, तो ये दावा अल्लाह को ज़रूर गुस्से में डालने वाला होगा, और ऐसे ही सरकश आदमी से अल्लाह कयामत में सवाल करेगा कि अपनी बनाई तख़लीक़ में जान डालो, ..... खिलौनों की शक्ल में छोटे बुत बनाने वाला शख्स अपने बनाए खिलौनों में कभी जान होने का दावा करता भी नहीं, लेकिन पूजे जाने वाले बुतों को बनाने और पूजने वाले लोग, बुतों के बारे में ये ही अक़ीदा रखते थे कि ये बुत ज़िंदा ख़ुदा हैं, और ये दावा करते थे कि ज़िंदा होने के सबब ये बुत उनकी प्रार्थना सुनते हैं और पूरी करते हैं, बुतों के जिंदा रहने की इसी धारणा को गलत बताते हुए अल्लाह ने क़ुरआन में जगह जगह फ़रमाया है कि जिनको तुम अल्लाह से इतर पूजते हो ये बुत ज़िंदा नही हैं, बल्कि मुर्दा हैं, ये तुम्हारी पुकार को सुन नही सकते ...ख़ासकर क़ुरआन में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बचपन का जो क़िस्सा बयान हुआ है, उसे देखें, नबी इब्राहीम किस किस तरीके से लोगों के इस दावे का विरोध करते हैं कि उनके बनाये बुतों में जान है, या कुछ शक्ति है, इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने समुदाय के लोगों से कहते हैं कि इन बुतों को तुम लोग तराशते हो और फिर उनकी पूजा करने लगते हो, जबकि इन बुतों में कोई शक्ति नही है, न ये बोल सकते हैं, न खा सकते हैं, न हिल ही सकते हैं, तुम लोग खुली गुमराही में पड़े हुए हो... क़ुरआन ने ये बात रोज़े रौशन की तरह साफ़ बता रखी है कि बुतों को बनाकर उनके ज़िंदा होने का दावा करना और ये मानकर उनकी पूजा करना, करवाना ही अल्लाह को गुस्से में डालने वाला गुनाह है
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... अहादीस से हम ये बात भी जानते हैं कि पुराने नबियों और सन्तों की तस्वीरें बनाकर भी लोग उन्हें पूजा करते थे... यानी वहाँ तस्वीर को भी जिंदा सन्त मान लेने, और दुआएं कुबूल करने की कुदरत रखने वाला मानने की प्रवृत्ति मौजूद थी .... ज़ाहिर है, तस्वीरों की मनाही, और उनके बनाने पर अज़ाब की बात कहने वाली तमाम अहादीस में किसी और किस्म की तस्वीर की बात नहीं है, बल्कि सिर्फ इसी किस्म की तस्वीरों के बनाने वालों पर अज़ाब की बात है कि बनाने वाले ये दावा करते थे कि तस्वीर में मौजूद शख़्स ज़िंदा है और तसवीर के ज़रिये इंसानों की पूजा और प्रार्थना सुन और कुबूल कर सकता है... यही सरकश दावा करने वालों पर अल्लाह क्रोध करता है, और कयामत के रोज़ उनसे कहेगा कि अपनी बनाई हुई तस्वीरों में जान डालो, यानी जिनको दुनिया में बनाकर ये उन तस्वीरों में जान होने का दावा करते थे, अब अल्लाह के सामने अपने उस दावे को साबित करें, जो कि वो हरगिज़ न कर सकेंगे, और अज़ाब के मुस्तहिक़ होंगे,
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... लेकिन अक्सर मुसव्विर अल्लाह की बनाई रचना यानी फूल पत्तियों और सीनरी वगैरह की खूबसूरती से प्रभावित होकर इनकी तसवीर बनाते हैं, इसी तरह अल्लाह की बनाई जानदार चीज़ों की खूबसूरती से प्रभावित होकर भी अक्सर मुसव्विर उनकी तसवीर बनाते हैं, ऐसी तस्वीरों के बनाने पर अल्लाह नाराज़ होगा ??
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...... क़ुरआन से ही एक इशारा मिलता है कि ऐसी तस्वीरों के बनाये जाने से अल्लाह को कोई आपत्ति नहीं है.....
.... क़ुरआन में सूरह सबा में अल्लाह सुलैमान अलैहिस्सलाम पर अपनी अनुकम्पा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि हमने सुलैमान की सेवा में कुछ जिन्न कर दिये थे जो सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिये बड़े बड़े महल, तमासील, और बड़ी बड़ी देगें बनाते थे" (34:13) यहां तमासील का अर्थ तस्वीरें या प्रतिमाएं हैं जिनमें जानदार और बेजान दोनों किस्म की चीज़ों का चित्रण शामिल है.... यहाँ इन तमासील का ज़िक्र बहुत सुंदर सजावटी चीज़ों के तौर पर अल्लाह ने किया है, यानी इन तस्वीरों के बनाने की अल्लाह ने तारीफ़ की, न कि किसी नाराज़गी का ज़िक्र
.... यानी क़ुरआन में तस्वीरों की मनाही का तो ज़िक्र नही, पर उनकी तारीफ़ ज़रूर है .... इससे ज़ाहिर है कि अगर अल्लाह को नाराज़ करने के मकसद से नही, बल्कि किसी साफ़ सुथरे मक़सद से कोई शख्स किसी जानदार की साफ़ सुथरी तस्वीर बनाता है तो इसमें कोई भी गुनाह या ख़राबी की बात नहीं होगी, बल्कि जिस तरह इंसान की शक्ल की गुड़ियों को बनाने पर इस्लाम को कोई ऐतराज़ नही उसी तरह ऐसे जानदारों की तस्वीरों के बनाने पर भी ऐतराज़ नही है जिनके बनाने का मक़सद उनकी पूजा न हो,
.... आज तो मुस्लिम उलमा की एक बड़ी तादाद इस बात पर मुत्तफ़िक हो गई है कि लोगों को एजुकेट करने के मकसद से जानदार की तस्वीर बनाई जा सकती है, किसी मुजरिम को पकड़वाने के लिए उसकी पोट्रेट बना सकते हैं, और भी कई वजहों से तस्वीर बनवाई जा सकती है
लेकिन आपको बताऊं कि अल्लाह की नाफरमानी का मकसद न हो तो किसी सही मकसद से एक मुसलमान किसी जानदार की तस्वीर बना सकता है, ये ख़्याल नया नही बल्कि हमेशा से इस खयाल के लोग मुसलमानों के बीच रहे हैं,
मुझे अभी पिछले ही दिनों सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम साइंटिस्ट इमाम अबु अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद द्वारा अब से आठ सौ साल पहले बनाई गई एक मगरमच्छ और उसके दांतों में से अपना खाना कुरेदते एक परिंदे की तस्वीर का ध्यान आता है जो तस्वीर उन्होंने लोगों को एजुकेट करने के मकसद से बनाई थी
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मैंने कई गैरमुस्लिम दोस्तों के मुंह से सुना कि मोटे तौर पर इस्लाम के नियम उन्हें पसन्द आते हैं.. पर कुछ चीज़ों में इस्लाम की सख़्ती उन्हें इस्लाम के क़रीब आने से डराती है...
... इस्लाम में संगीत को हराम ठहराया जाना, ऐसी ही सख्ती है, जिसका कारण उन्हें समझ नहीं आता... मैंने कई भाइयों से ये शिकायत सुनी, उनमें कुछ तो यूँ ही आपत्ति जता रहे थे, लेकिन कई भाइयों के लहजों से महसूस हुआ कि वाक़ई संगीत को पसन्द करने वाली सांस्कृतिक पृष्टभूमि में रहने वाले मेरे भाई इस्लाम को पसन्द करने के बावजूद इससे एक ऐसे विचार को लेकर दूर हैं, जो विचार वास्तव में पूरी तरह उन्हें नही बताया गया...
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... आम ख्याल है कि इस्लाम में गीत संगीत को मना किया गया है, लेकिन दूसरी ओर हम ये भी जानते हैं कि मदीना के लोग नबी सल्ल० के स्वागत में गीत गाते थे और आप सल्ल० ने उन्हें वो गीत गाने से नही रोका....!!!
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.... क़ुरआन में गीत संगीत का नाम लेकर उसकी मनाही के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, ... अलबत्ता ये कहा जाता है कि क़ुरआन की कुछ आयतों में इनडायरेक्टली संगीत की मनाही की गई है
... दूसरी ओर कुछ अहादीस से पता चलता है कि नबी सल्ल० ने संगीत की मनाही की थी, पर जब इस विषय की सारी हदीसों को इकट्ठा कर के उनका अध्ययन किया जाता है तो पता चलता है कि गीत संगीत अपने आप मे कोई बुरी चीज़ नहीं हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल व्यभिचार, कुफ्र और शिर्क और शराबनोशी जैसे हराम कामों को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है.... (इसका एक उदाहरण बुख़ारी शरीफ़, किताब-59, हदीस-340 में दर्ज रिवायत से पता चलता है कि उस दौर में गाने बजाने की महफिलों में शराब पी पिलाई जाती थी, व गायिकाएं लोगों को अपने गीतों से उत्तेजित करने का काम किया करती थीं) तो नबी सल्ल० ने उन मौकों पर, जहाँ संगीत का इस्तेमाल हराम कामों को बढ़ोतरी देने के लिए किया जा रहा था, वहां संगीत पर प्रतिबंध लगाया ... पर अन्य मौक़े, जहां इंसान केवल आनन्द लेने के लिए या ख़ुशी ज़ाहिर करने के लिए ऐसे गीत संगीत का आयोजन कर रहा था, जिसमें कुफ्र या हराम चीज़ों को बढ़ावा देने वाली कोई बात न थी, वहां आप सल्ल० ने न सिर्फ़ संगीत की इजाज़त दी बल्कि अपनी ओर से सलाह भी दी कि ऐसे मौकों पर जो संगीत पसन्द करते हैं वो संगीत सुन लें
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... बुख़ारी शरीफ़ क़िताब-59, हदीस-336 पर अल-राबी बिन्त माऊध रज़ि० से रिवायत हदीस है, वो फ़रमाती हैं कि मेरी शादी वाले दिन मेरे घर में कुछ गाने वाली लड़कियां जंग ए बद्र के शहीदों के सम्मान ने डफ़ली पर गीत गा रही थीं, तभी आप सल्ल० तशरीफ़ लाये, उन्हें देखकर एक गानेवाली गाने लगी "हमारे बीच वो पैगंबर हैं जो जानते हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है"
....इस पर नबी सल्ल० ने गाने वाली को रोका और फ़रमाया "ये न कहो, बल्कि वही कहो जो पहले गा रही थीं" .... इस हदीस में नबी सल्ल० ने गानेवालियों से कहा कि पहले जो गा रही थीं, "वो ही गाओ"... यानी आप सल्ल० ने नात और हम्द से अलग भी किसी गीत को गाने की अनुमति दी है, बशर्ते उसमें साफ सुथरी शायरी हो, और गुनाह की तरफ उकसाने वाली कोई बात न हो...
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... .. सही बुख़ारी, किताब-62, हदीस-92 में, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा रज़ि० को बारात के साथ किसी एम्यूजमेंट को भेजने की सलाह अपनी ओर से दी है कि "अंसार मनलुभावन कला को पसन्द करते हैं तो बारात के साथ उसे भेजा जाता" ... इब्ने माजा, किताब-9, हदीस-56 में ये हदीस अधिक विस्तार में आई है, वहां पता चलता है कि नबी सल्ल० ख़ास गाने वालों को भेजने की सलाह दे रहे हैं ....
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... कुछ अहादीस से पता चलता है कि नबी सल्ल० ने कुछ साज़ों (वाद्ययंत्रों) को शैतान के साज़ कहकर उनसे दूर रहने का हुक़्म दिया था... इन हदीसों को ध्यान में रखते हुए मुसलमानों ने संगीत को लेकर ये रवैया अपनाया है कि गीत के साथ कोई साज़ मिलाया जाना पाप है....
.... लेकिन बुख़ारी और मुस्लिम से पता चलता है कि मदीना में एक ईद के दिन माँ आयशा रज़ि० के घर में दो अंसार लड़कियां "बुआत की जंग" का गीत गा रही थीं और कोई ढोल जैसा वाद्ययंत्र बजा रही थीं, हज़रत आयशा उन्हें सुन रही थीं, और नबी सल्ल० उनके घर में मुँह दूसरी ओर करके लेटे हुए थे, जब आयशा रज़ि० के पिता अबूबक्र रज़ि० घर में आये तो क्रोध करने लगे कि "नबी सल्ल० के घर में ये शैतान का साज़ क्यों बजाया जा रहा है", .... तब नबी सल्ल० ने हज़रत अबूबक्र रज़ि० को रोक दिया और उन लड़कियों को गाने बजाने दिया, फिर इस दिन हब्शी लोग ढाल और भालों के साथ नृत्य और करतब दिखाने का खेल करते थे, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा को उनकी इच्छा पर ये करतब भी उनका दिल भर जाने तक दिखाए और करतब दिखाने वालों का उत्साह भी ये कह कहकर बढ़ाते रहे "ओ बनी अफरीदा, लगे रहो" (सही बुख़ारी, किताब-15 हदीस नम्बर-70)
... यहाँ ध्यान दीजिये, हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने उस वाद्ययंत्र को 'शैतान का साज़' कहा, यानी ये वही साज़ था जिसकी मनाही के हुक़्म की हदीस अन्य स्थानों पर आई है, लेकिन यहाँ नबी सल्ल० ने उस साज़ को बजाने से न ख़ुद उन लड़कियों को रोका, न हज़रत अबू बक्र रज़ि० को रोकने दिया, बल्कि ये कहा कि "रहने दीजिये अबूबक्र रज़ि० (उन्हें गाने बजाने दीजिये), क्योंकि आज त्योहार का दिन है".... ज़ाहिर है, वो साज़ खुद में कोई हराम चीज़ नही थे, वरना इस्लाम त्योहार के दिन में किसी हराम काम करने की आपको इजाज़त दे देता हो, ऐसा कोई उदाहरण नही है.... यानी उपरोक्त हदीस से सिद्ध होता है कि कोई भी साज़ बजाना या गीत के साथ संगत करना भी इस्लाम में पूर्णतः मना नही किया गया है....
...फिर दूसरे स्थान पर इन साज़ों की मनाही के हुक़्म के पीछे क्या वजह हो सकती है ??
.... असल मे हदीस अध्ययन में ये बात अक्सर मिलती है कि कई हदीसों में किन्हीं चीज़ों से दूसरी किसी चीज़ की ओर संकेत किया गया होता है, और कई हदीसें संक्षेप में भी बयान होती हैं और संक्षिप्त बात से किस ओर इशारा किया जा रहा है इसका पता तभी चलता है जब उस विषय की अन्य कई हदीसों को पढ़ लिया जाए
.... अब जिस तरह साज़ों की मनाही के हुक़्म की हदीसें हैं, उसी तरह सुनन निसाई शरीफ़ में बुक ऑफ ड्रिंक्स में सही इसनाद के साथ ऐसी कई अहादीस हैं कि नबी सल्ल० ने कुछ ख़ास बर्तनों के नाम ले लेकर उनको ममनुआ करार दिया है, इनमें कुछ मिट्टी के बर्तन, लौकी के खोल को सुखा कर बनाए गए बर्तन, और पॉलिश किये गए जग, खोखले तने से बनाये गए बर्तनों वगैरह के नाम शामिल हैं ..... ज़ाहिर है, बर्तन अपने आप में कोई गुनाह वाली चीज़ नहीं होते, इसलिये इन अहादीस से किसी दूसरी तरफ संकेत को समझा जाता है और अन्य विस्तार से आई हदीसों को पढ़ने पर पता चलता है कि इन बर्तनों को मना नही किया गया, बल्कि इन बर्तनों में "नबीज़" (एक किस्म की शराब) बनाने से मना किया गया है...
... उसी तरह कुछ साज़ों की मनाही के पीछे भी किसी अन्य बात की तरफ़ संकेत है, और एक ख़ास पृष्ठभूमि है... एक तो ये पृष्ठभूमि ये मालूम होती है कि संगीत की महफिलों को उस समय बेहयाई के और हराम कामों में संगत देनेवाली चीज़ बना दिया गया था... दूसरे, सूरह लुक़मान की छठी आयत जिसे कुरआन में इनडायरेक्टली संगीत की मनाही का हुक़्म कहा जाता है, उसमें लिखा है कि "लोगों में से कोई ऐसा भी है जो दिल को लुभानेवाली बातों का ख़रीदार बनता है, ताकि बिना किसी ज्ञान के अल्लाह के मार्ग से (दूसरों को) भटकाए और उनका परिहास करे। वही है जिनके लिए अपमानजनक यातना है" ... इस आयत से पता चलता है कि नबी सल्ल० के दौर में जब मुस्लिम कहीं अल्लाह का ज़िक्र कर रहे होते थे, या इबादत कर रहे होते थे तब वहां इस्लाम विरोधी लोग मुस्लिमों का ध्यान भटकाने के लिए कुछ खेल तमाशे और बाजे बजाने लगते थे ताकि मुसलमान अल्लाह का ज़िक्र न कर पाएं और जो लोग अल्लाह के ज़िक्र को सुन रहे हैं वो खेल तमाशों से आकर्षित होकर मुसलमानों के पास से उठकर खेल तमाशों के पास आ जाएं,
... इस आयत के बारे में हज़रत इब्न अब्बास रज़ि० का क़ौल बताया जाता है कि यहां संगीत के बारे में बात की जा रही थी.... यानी मुसलमानों को अल्लाह की इबादत से डिस्ट्रैक्ट करने के लिए साज़ों का इस्तेमाल किया जाता था... ऐसे समय में ही आप सल्ल० ने उन साज़ों को शैतान के साज़ फ़रमाया, जब उन साज़ों का पापकर्म में इस्तेमाल किया जा रहा था... लेकिन उसी साज़ की मनाही आप सल्ल० ने तब नही की जब ईद के दिन हज़रत आयशा रज़ि० उसे सुन रही थीं, क्योंकि तब उन साज़ों से कोई पापकर्म नही किया जा रहा था...!!
.... एक अन्य बहुत मशहूर हदीस है कि आप सल्ल० ने फ़रमाया कि "एक ख़राबी का वक़्त मेरी उम्मत पर ऐसा आएगा जब लोग शर्मगाह को, रेशम को, संगीत को और शराब को अपने लिये हलाल कर लेंगे, और अल्लाह ऐसे लोगों के चेहरे बिगाड़ कर उन्हें बन्दर और सुअर में तब्दील कर देगा"....
... इस हदीस के शब्दों पर ध्यान दें तो इनमें एक (शराब) को छोड़कर कोई चीज़ कतई हराम नही है, .... यानी हर एक शर्मगाह मुसलमान के लिए हराम नही होती बल्कि निकाह में आए मर्द औरत एक दूसरे के लिये हलाल होते हैं, इसी तरह रेशम मर्दों के लिए तो मना है, मगर मुसलमान औरतों के लिए हलाल है, और फिर बात आती है संगीत की तो ये भी सही अहादीस जो ऊपर बयान की गईं उनसे साबित है कि जहां कुफ्र और हराम कामों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो वहां हराम है और बाक़ी जगह गुनाह नही !!!
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... तो इस सारे अध्ययन से पता चलता है कि ख़ुशी व्यक्त करने के लिए, या मनोरंजन के लिए भी गीत संगीत हो, या अन्य कोई भी खेल तमाशा, उसकी मनाही इस्लाम में नही की गई है जब तक कि उनमें किसी कुफ्र, या ज़ुल्म, या शराब पीने और व्यभिचार या अन्य किसी गुनाह पर उभारने वाले तत्व शामिल न हों..
.... और ऐसे गुनाह पर उभारने वाले तत्व गीत संगीत के अलावा भी जिस खेल तमाशे में होंगे, वो हर खेल-तमाशा गुनाह होगा... इसीलिए क़ुरआन में स्पेशली गीत संगीत का नाम लेकर नही, बल्कि अल्लाह की राह से भटकाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले किसी भी प्रकार के खेल तमाशों का आयोजन करने वालों पर बद्दुआ की गई है !!
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अक्सर डार्विन की थ्योरी और इस्लाम को आमने सामने खड़ा किया जाते देखता हूँ... लोग समझते हैं कि डार्विन की थ्योरी फैक्ट बन चुकी है, लेकिन मुझे लगता है कि डार्विन महोदय ने एक बने बनाये फैक्ट पर एक अनुमान लगाया है, तो पहले से बनाया फैक्ट तो ठीक है, लेकिन उनके अनुमान के सही होने का अब तक पता नहीं चल पाया है...
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..... चार्ल्स डार्विन की थ्योरी में दो बातें हैं,
एक तो ये कि जीवों की दो अलग अलग नस्लें मिलकर एक तीसरी नस्ल को पैदा कर सकती हैं.
...और दूसरी बात ये कि सारा जीवजगत एक ही जीव से पैदा हुआ ...
....तो डार्विन की थ्योरी में यहां दूसरा पॉइंट जो है वो तो सिर्फ़ एक अंदाज़ा है और अभी तक उसके पक्ष में कोई सबूत मिल नही सका है, जबकि इस थ्योरी का पहला पॉइंट, यानी दो अलग नस्लों से एक तीसरी नस्ल पैदा करना, ये सदियों से आज़माया हुआ तरीक़ा है, .... खच्चर को दुनिया का पहला मानवनिर्मित हाइब्रिड जीव माना जाता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे घोड़े और गधे के संयोग से आज से लगभग तीन हज़ार साल पहले मनुष्यों ने बनाया था.... ऐसा लगता है कि डार्विन महोदय ने इसी हायब्रिड तकनीकी के आधार पर अपनी थ्योरी बनाई.... और अंदाज़ा लगाया कि इसी तरह अपने आप दुनिया में नए नए जीव पैदा होते गए होंगे....
पर इस थ्योरी के वास्तविक धरातल पर सही होने की संभावना बहुत कम दिखती है, .... ये तो है कि दो अलग अलग नस्ल के जीवों की इन्टरब्रीडिंग करा के उस जीव की एक तीसरी नस्ल पैदा की जा सकती है, लेकिन उसमें भी बहुत सीमित सम्भावनाएं होती हैं, उदाहरण के लिए आप दो अलग अलग नस्लों के कुत्तों की तो इन्टरब्रीडिंग कराके एक नई नस्ल का कुत्ता तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन दो मुख्तलिफ किस्म के जानवरों, यानी कुत्ता और भेड़ की इन्टरब्रीडिंग करा कर एक नया जानवर पैदा नही कर सकते, वैज्ञानिक ऐसा भ्रूण विकसित कर भी लें तो भी नया जानवर पैदा होने से पहले भ्रूण प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाया करते हैं..... ऐसे में एक ही जीव से सारी दुनिया अपने आप बनती बसती गई, इसमें संदेह बना रह जाता है
.... श्रीमान चार्ल्स डार्विन की ये थ्योरी कि संसार के सारे जीव जगत की उत्पत्ति केवल एक जीव से हुई और उसी जीव की संतानों में बदलाव आते रहने से दुनिया में करोड़ों किस्म के जीव जंतु बन गए" ये थ्योरी देने के पीछे उनका कारण ये था कि उन्हें बताना था कि ये संसार बिना किसी क्रियेटर के, अपने आप बनता चला गया है... अब इस विचार के लिए ज़रूरी था कि वो आसान पोसिबिलिटीज़ पर विचार करते.... और ज़ाहिर है कि दुनिया में जीव जगत करोड़ों अलग अलग रूप में जन्मा, ये बात "अपने आप" वाले खांचे में फिट बैठ ही नहीं सकती थी... पर डार्विन की थ्योरी के सही होने में सबसे बड़ी चुनौती भी यही बात है कि जब एक जीव से बदल बदल कर नए जीव बनते हुए ये जीव जगत बना है तो अब ये नए जीव बनना बन्द क्यों हो गए ?? पिछले सैकड़ों सालों में कोई भी नया जीव बनता नोटिस नही किया गया, बल्कि इस बीच सैकड़ों जीव विलुप्त ज़रूर होते पता चले हैं
... पिछले कुछ दशकों में तो अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में पूरी सुरक्षा के साथ पुराने जीवों की कोशिकाओं से नए जीव बनाने की कोशिशें की गईं लेकिन नए जीव पैदा करने में सफ़लता नही मिल सकी.. ऐसे में डार्विन महोदय का ये विचार ध्वस्त होता दिखता है कि संसार में पुराने जीवों से नए जीव बनते गए... और वो भी अपने आप !!!
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... फिर जिस तरह होमो सेपियंस की उत्पत्ति के बाद के ज़मानों तक भी एप्स के जीवाश्म बरामद हुए हैं.... उनको देखने के बाद, ये कहने का भी कोई कारण नही बचता कि ये इंसानों के पूर्वज हैं और बन्दर से इंसान बनने की प्रक्रिया की एक कड़ी हैं.... क्योंकि इंसान तो ढाई लाख साल पहले वजूद में आ चुका था, और अभी कुछ समय पहले फिलीपींस से अब से केवल 50,000 साल पहले के कपिमनुष्यों के जीवाश्म बरामद हुए हैं, जिन्हें "होमो लुजोनेसिस" का नाम दिया गया है, यानी ये होमो सेपियंस के दुनिया आने के लगभग दो लाख साल बाद तक मौजूद थे.... अगर किन्हीं प्राकृतिक कारणों से कपिमनुष्यों की बनावट बदलते बदलते इंसान बनने की थ्योरी सही होती तो होमो लुजोनेसिस का अस्तित्व अबसे 50,000 पहले हो ही नहीं सकता था....इसका मतलब ये है कि इन जीवों का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व था, जैसे बिल्ली और शेर का अलग अलग अस्तित्व है ठीक वैसे....!!!
...... दिखता तो ये है कि दुनिया के इतिहास में हम जितना पीछे जाते हैं, उतनी ही प्रचुर जैव विविधता का पता चलता है... और इसके साथ ही दिमाग में ये सवाल पैदा होता है कि जब संसार अपेक्षाकृत कम आयु का था तब उसमें इतनी ज्यादा जैव विविधता थी, तो विकासवाद के नियम के मुताबिक अब जब दुनिया की उम्र कई हज़ार साल ऊपर हो चुकी है तो जैव विविधता को और बढ़ जाना चाहिए था पर ये नही बढ़ी, बल्कि उत्तरोत्तर ये जैव विविधता कम होती जा रही है...
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... ख़ैर तो डार्विनवाद को अभी पूरी तरह फैक्ट साबित होना बाक़ी है, अलबत्ता एवोल्यूशन के मामले में वो बात जो डार्विन से पहले ही फैक्ट थी कि दो अलग अलग नस्ल के जीव तीसरी नस्ल को जन्म दे सकते हैं, उसका इनकार नही है, लेकिन ऐसा संयोग अपने आप बन सकता हो इसका भी कोई उदाहरण पता नहीं है.....
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..... मुस्लिम समुदाय में जो विद्वान हज़रत आदम के जन्म के बारे में वैज्ञानिक सम्भावनाओं पर विचार करते हैं, वो थ्योरी किसी जीव की पुरानी नस्ल के एक हाइब्रिड नस्ल में तब्दील हो जाने के फैक्ट पर आधारित है.... और उस थ्योरी को आप कुछ कुछ डार्विन की थ्योरी जैसा कह सकते हैं, लेकिन डार्विन और मुस्लिम थ्योरी के बीच बड़ा फ़र्क ये है कि डार्विन के हिसाब से वर्तमान मनुष्य भी (होमो सेपियंस) अपने जन्म के समय जानवर जैसा था, जबकि मुस्लिम विद्वानों के अनुसार वर्तमान मनुष्य अपने जन्म से ही अभूतपूर्व रूप से बुद्धिमान था, इसी बुद्धिमानी के कारण वो मनुष्य बना, और उससे पूर्व के लोग यही बुद्धि न होने के कारण मनुष्य नही कहलाये जा सकते थे !!
.... उनके इस ख्याल का बेस, क़ुरआन की दो आयतें हैं
... जिनमें से एक तो सूरतुल इंसान की पहली आयत है कि "बेशक इन्सान पर एक ऐसा वक्त भी गुज़र चुका है जबकि वह कोई क़ाबिले ज़िक्र चीज़ न था (76:1)
.... और दूसरी आयत सूरह अल-अनआम की 133वीं आयत ये कि "तुम्हारा रब निस्पृह, दयावान है। यदि वह चाहे तो तुम्हें (दुनिया से) ले जाए और तुम्हारे स्थान पर जिसको चाहे तुम्हारे बाद ले आए, जिस प्रकार उसने तुम्हें कुछ और लोगों की सन्तति से उठाया है" (6:133)
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...... इन आयतों की बुनियाद पर कई मुस्लिम विद्वान ये ख्याल ज़ाहिर करते हैं कि ऐसा मुमकिन है कि इंसान को अल्लाह ने किसी ग़ैरइंसांनी मख़लूक़ से पैदा किया हो, और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से पहले के वो जीव जिनमें इंसानी शऊर नही था, उन्हीं गैर इंसानी मख़लूक़ के बारे में सूरतुल इंसान में अल्लाह ने फ़रमाया है कि वो कोई क़ाबिल ए ज़िक्र चीज़ नही था
.... कुछ अरसा पहले मैंने डॉ० इसरार अहमद रह० का एक बयान सुना था, जिसके मुताबिक़ आदम अलैहिस्सलाम से पहले अल्लाह ने हैवाने इंसान को दुनिया में भेज रखा था, जिसमें जान थी, बाक़ी जानवरों की तरह खाने जीने की प्राकृतिक क्षमता भी उसमें थी, मगर उसमें इंसानी रूह नही थी, यानी वो मानवीय चेतना नही थी, जो अच्छाई और बुराई में फ़र्क करना जानती है, जो चेतना मनुष्य को निरन्तर नई नई चीज़ें सीखने, निरन्तर नए अविष्कार करने लायक बनाती है....
.... मुस्लिम विद्वानों के मुताबिक़ ये मानवीय चेतना/रूह, अल्लाह ने सबसे पहले आदम अलैहिस्सलाम के भीतर डाली, और इसलिए दुनिया में इंसानियत की शुरुआत हज़रत आदम से कहलाई...
... हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के विषय में क़ुरआन में कुछ एक स्थानों पर ये लिखा मिलता है कि अल्लाह ने उन्हें एक अकेली जान से पैदा किया (जैसे 7:189 के शुरुआती अल्फ़ाज़ कि "वही है जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर प्रवृत्त होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे" ...और 3:59 जिसमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश के बारे में उनकी मिसाल हज़रत आदम की तरह बताई, और हज़रत ईसा अकेली मरियम अलैहिस्सलाम से पैदा हुए थे, इस बारे में क़ुरआन विस्तार से बताता है)
.... अल्लाह ने हज़रत आदम का पुतला बनाया और उसमें जान डाली, और फिर आदम अलैहिस्सलाम की पसली से हव्वा को बनाया, ये सब बातें क़ुरआन में नही हैं, हां क़ुरआन में ये ज़रूर लिखा है कि अल्लाह ने इंसान को मिट्टी से पैदा किया, .... अगर हम डॉ० इसरार अहमद साहब के बताए मुताबिक़ सोचकर देखें तो मिट्टी से हैवाने इंसान के बनाने की बात हो सकती है, जिसका जिस्म तो इंसान से मिलता जुलता था, लेकिन उसमें इंसानी चेतना न थी... बहरहाल इस विषय में सही बात तो केवल अल्लाह ही जानने वाला है, हां जब हम इंसान के दुनिया में जन्म की संभावना पर गौर करते हैं तो इतना ज़रूर पाते हैं कि अपने आप विविधता भरे जीव जगत का बन जाना, एक ही जीव से खुद बखुद करोड़ों जीवों का बन जाना तो सम्भव ही नहीं है, अलबत्ता कोई ईश्वरीय शक्ति अगर इन्हें डिज़ाइन कर रही थी, तो सब मुमकिन है !!!....