Sunday, 16 August 2020

इफरात और तफरीत, मुर्तद की सज़ा।







इफरात और तफ़रीत का मामला,
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मुसलमानों के बारे में नबी सल्ल० ने पेशीनगोई फ़रमाई थी, कि "तुम क़दम दर कदम, अहले क़िताब की पैरवी करोगे यहाँ तक कि वो अगर गोह के बिल में घुसे होंगे तो तुम भी घुस जाओगे..."
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.... मैंने कहीं पढ़ा था कि यहूदियों ने दीन में इफ़रात (हद से आगे बढ़ने) का मामला किया और अपनी तरफ़ से खुद पर ऐसी चीज़ें भी हराम कर लीं जिनपर दीन में कोई पाबंदी लगाई ही नही गई थी, जैसे यहूदियों ने ख़ुद पर ऊंट का गोश्त खुद ही हराम कर लिया, जबकि उनके लिए वो हलाल था, इसके बरअक्स ईसाइयों ने दीन में तफ़रीत यानि बिलकुल आज़ादी लेने और हराम को भी हलाल ठहरा लेने का मामला किया और सूअर जैसी हराम चीज़ को हलाल ठहरा लिया
.... अल्लाह ने न यहूदियों की इफ़रात का मामला पसन्द किया न ईसाइयों की तफ़रीत का, बल्कि यहूद ओ नसारा के इफ़रात ओ तफ़रीत के अमल पर सूरह आराफ़ में ये बयान किया कि इस्लाम के नबी तुम्हारे लिए तय्यबात को हलाल और खबाइस को हराम ठहराते हैं, और यहूद ओ नसारा पर से उनके वह बोझ उतारते हैं, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलते हैं, जिनमें वे जकड़े हुए थे... (7:157)
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.... इस आयत का मतलब ये था कि दीन में सिर्फ़ उतना ज़रूरी है जितना फरमाने इलाही में बयान किया गया है, न उससे कम पर अल्लाह राज़ी है, न उससे ज्यादा ही बढ़ना अल्लाह के नज़दीक पसंदीदा है...
..... अहादीस में भी ये बात इस तरह बयां की गई है हलाल वो चीज़ें हैं जिन्हें क़ुरआन में हलाल किया गया, और हराम वो तमाम बातें हैं जिन्हें क़ुरआन में हराम ठहराया गया, और रही वो बातें जिनका तज़किरा क़ुरआन में नही किया गया, ये बातें "मुआफ़" हैं...!!!
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... इतनी साफ़ वजाहत के बावजूद मैंने मुसलमानों में इफ़रात का मुआमला देखा है.... जी हां वैसी ही इफ़रात का मामला जैसी इफ़रात यहूदियों ने अपनाई थी... उम्मीद है आप हज़रात भूले नही होंगे वो तमाम जानवरों की टैन खाल को पाक मानने की इमाम इब्ने हज़्म रह० की फ़िक़्ह को मेरी ताईद, और उस पर लोगों का बवाल, जबकि वो फ़िक़्ह हदीस शरीफ़ पर मबनी थी और क़ुरआन की आयतों के गहरे अध्ययन पर इफ़रात और तफ़रीत के अमल से बचने के ख़्याल से तरतीब दी गई थी, इसके बावजूद मुझे हराम को हलाल साबित करने की कोशिशें करने वाला बताकर ख़ूब गालियां दी गईं, 
मैंने उन लोगों का रद्दे अमल देखकर यही जाना कि भले ही ये लोग यहूदियों से हद से ज़्यादा नफ़रत दिखाते हों, मगर कदम दर कदम हैं ये लोग यहूदियों के नक़्शे कदम पर ही, जैसा कि नबी सल्ल० पेशीनगोई फ़रमा चुके हैं, ये लोग पूरा कर रहे हैं... यहूदी मज़हबी मामलात में इफ़रात करने के आदी थे, आज का मुसलमान भी देख लीजिये कई मामलों में इफ़रात कर रहा है, यहूदियों में एक आदत मज़हब को लेकर चरमपंथी बनने की थी कि अपने बनाए अक़ाइद से अलग दूसरी बात सुनने पर हज़रत ईसा का क़त्ल करने पर आमादा हो गए थे, और आज के मुसलमानों में भी ये चरमपंथ आप बख़ूबी देख सकते हैं, ये अपना अपना फ़िरक़ा पकड़कर दूसरों को क़त्ल करने पर आमादा हैं....
..... बेशक़ हुज़ूर सल्ललल्लाहो अलैहे वसल्लम की पेशीनगोई सच्ची साबित हुई।

~ ज़िया इम्तियाज़।



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क़ुरआन में इरतिदाद करने वालों का ज़िक्र बार बार आया है और कुरआन में कहीं वक़्त के हाकिम को ये हुक्म नही दिया गया कि वो मुर्तद को मौत की सज़ा दे
.... सिर्फ़ एक मुख्तसर रिवायत की बुनियाद पर कुछ भाईयों के हिसाब से इस्लाम से धर्म परिवर्तन करने के हर मामले पर मौत की सज़ा नाफिज़ होगी ..... हालांकि बड़े बड़े उलमा ने यही फ़तवा दिया है कि आम इर्तिदाद के मामलों पर हुदूद नाफ़िज़ नही होते....
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....... फिर भी जाने क्यों हमारे कुछ भाईयों के खयाल मे जो इंसान एक बार मुस्लिम से गैर मुस्लिम बना फिर उसे ज़िन्दा रहने का कोई हक नहीं .....
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लेकिन भाईयों क्या आप ये मानोगे कि अल्लाह और रसूल का कोई हुक्म कभी गलत साबित हो सकता है ??
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 गाज़ी धर्मपाल के बारे मे आपने कभी न कभी ज़रूर पढ़ा या सुना होगा .... उन्होने भी इस्लाम त्याग दिया था और कई साल मुर्तद के रूप मे गुज़ारे, और इस्लाम की खूब धज्जियां उड़ाई.....
....... किस्सा तमाम ये है कि सन् 1903 मे अब्दुल गफूर नाम के इक्कीस साल के नौजवान ने गुजरांवाला की आर्यसमाज में दाखिल होकर इस्लाम छोड़ कर वैदिक धर्म अपना लिया और अपना नाम धर्मपाल रखा इसके बाद धर्मपाल ने इस्लाम की बुराइयों से भरी किताबें लिखनी शुरू कर दीं, और तमाम हिन्दोस्तानी मुसलमानों को हिलाकर रख दिया
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ग़ाज़ी महमूद धर्मपाल जो इस्लाम के खिलाफ़ आर्यसमाज की मदद से कई किताबों के लेखक थे आपको सभी किताबों के इस्लामी स्कॉलरों ने जवाब भी दिये थे, 
.... तो मौलाना सनाउल्लाह अमृतसरी लेखक ‘हक प्रकाश बजवाब सत्यार्थ प्रकाश‘ से 11 साल के बहस मुबाहिसे के बाद धर्मपाल वापस इस्लाम की सच्चाई को मान कर 14 जून 1914 मे फिर से मुसलमान हुए और अपने 11 साल के आर्यसमाजी अनुभव से इस्लाम को अपनी कई किताबों से तक़वियत बख़्शी 
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 ..... ये अल्लाह का ही करना था कि इर्तिदाद के बरसों बाद उन्हें अपनी गल्ती का एहसास हुआ, और वो वापस मुस्लिम बन गए और इसके बाद उन्होंने इस्लाम की जो खिदमत की और अपने और दूसरों के लगाए इल्ज़ामात को इस्लाम पर से धो डाला,  वो हरगिज़ न हो पाता अगर उन्हें कत्ल कर दिया जाता...
..... तो भाईयों क्या ये मुमकिन है कि एक तरफ़ अल्लाह और रसूल मुर्तद को मौत की सज़ा के लायक़ बताएं, और दूसरी तरफ इर्तिदाद करने वाले को इस तरह क़ुबूल कर लें कि उससे इस्लाम की बेहतरीन ख़िदमात लें.....
...... सोचिये, अल्लाह का करना बता रहा है कि इस मामले में कहीं, मिसइन्फॉर्मेशन का मामला हुआ है, एक आम मुर्तद से मुसलमान का क्या रवैया हो, इस पर उस सज़ा वाली रिवायत से हम तक पूरी बात नहीं पहुँची है
..... तो ऐसी अधूरी बात पर कोई क़ानून तय करने की बजाय कुरआन की तरफ़ आएं, वहां देखें कि इस मामले पर क्या बताया गया है....
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...... क़ुरआन में सूरह आले इमरान की आयतें 86 से लेकर 90 तक, ईमान के बाद इर्तिदाद करने वालों का ज़िक्र किया जा रहा है कि अगर ये मुर्तद होकर अपनी गुमराही में बढ़ते गये तो अल्लाह भी इनको हमेशा की जहन्नुम में डाल देगा, .... लेकिन इसी बीच आयत 89 में पढ़िए, यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो इरतिदाद के बाद फिर मुस्लिम बन गया तो अल्लाह भी माफ़ करने वाला है, .... यानी इरतिदाद करने वाला अगर अपनी गलती का एहसास होने पर वापस दाखिल ए इस्लाम हो जाएगा, तो अल्लाह भी उस बन्दे का जुर्म माफ कर के उसे क़ुबूल कर लेगा, इन शा अल्लाह !!!
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....... अब यहां खुद देखिए, मुर्तद का वापस मुस्लिम बनना तभी सम्भव है जब वो इंसान ज़िंदा रहे, उसे अपने फैसले पर सही-गलत सोचने का मौका और मोहलत मिले.... आज आप थोड़ा ही इंटरनेट सर्च करें तो ऐसे लोगों की वीडिओज़ भरी पड़ी पाएंगे जो ये कहते हैं कि हम मुसलमान से मुर्तद हो गए थे और बरसों बाद हमें वापस इस्लाम के वाहिद सच्चा मज़हब होने का एहसास हुआ और हम वापस पहले से कहीं ज़्यादा पुख़्ता ईमान के साथ इस्लाम में दाख़िल हो गए....
.... मैं खुद अपनी आपबीती देखता हूँ तो पाता हूँ कि इस्लाम पर शक और फिर तहक़ीक़ के बाद इस्लाम पर जो मज़बूत यक़ीन बनता है, उसका कोई मुक़ाबला नही.... मुझे लगता है कि अपने बन्दों को दीन की तरफ़ लाने की ये भी अल्लाह की एक मस्लेहत है, .... उम्मीद है आप भी अल्लाह की इस मसलेहत को समझने की कोशिश करेंगे !!

क्या अल्लाह साकार हैं।

क्या अल्लाह साकार है।

पिछले कुछ दिनों में दो तीन बार इस किस्म के सवाल मेरे सामने आये कि मुस्लिम तो ये दावा करते हैं कि अल्लाह निराकार है, उसका कोई आकार नही, लेकिन क़ुरान पाक में तो लिखा है कि अल्लाह ने आदम अस० को अपने हाथों से बनाया जिससे सिद्ध होता है कि मुस्लिमों का अल्लाह शरीर वाला है, तथा क़ुरान में अल्लाह के एक कुर्सी पर बैठे होने का वर्णन है जिसका अर्थ ये हुआ कि अल्लाह एक आकार और एक स्थान में सीमित है, वो सर्वव्यापी नही है जैसा कि मुस्लिम दावा करते हैं !!!
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उत्तर : देखिये, पहली बात तो ये है जिसे मैंने अक्सर बताया है कि क़ुरान की भाषा को अलंकृत, या लयात्मक यानि शायरी जैसा रखा गया है ताकि ये रूचि से सुनी जाये और इसे याद रखने और कंठस्थ करने में आसानी हो... सो, शायरी या काव्य का तरीका ये है कि उसमें मिसालों और मुहावरों का इस्तेमाल कर के बात को बयान किया जाता है .....

..... जहाँ तक क़ुरआन पाक में इस सांसारिक जीवन से परे की स्थितियों की बात है, इसके बारे में सच्चाई तो ये है कि ये ऐसी बातें हैं जो अपने वास्तविक रूप में इंसान की समझ में नही आ सकतीं जब तक इंसान उस अगली दुनिया में जाकर खुद उन परिस्थितियों और चीज़ों का अनुभव न कर ले, मुस्लिम शरीफ में एक हदीस का सार ये है कि परलोक की बातों का कोई मनुष्य न वर्णन कर सकता है, न उन दृश्यों की सही सही कल्पना ही करना उसके वश में है, (सही मुस्लिम, किताब-40, हदीस संख्या- 6780, 6781 और 6782 से मफ़हूम) .... ऐसा इसलिये, क्योंकि धरती पर ऐसा कभी कुछ किसी व्यक्ति ने देखा ही नही जिसकी तुलना के आधार पर वो परलोक की दुनिया के रूप पर कोई अनुमान लगाये..
पर क्योंकि क़ुरान का काम इंसान को आख़िरत के बारे में चेतावनी देना था, इसलिये इंसान को परलोक के बारे में एक अनुमान देना ज़रूरी था, इसलिये क़ुरान में इंसानी ज़बान में इंसानों के समझने में आसान मिसालें दे देकर बात को समझाया गया है, ताकि लोग कुछ हद तक बातों को समझ सकें, और कम से कम बात के मर्म तक पंहुच पाएं ..
..... इन बातों को दिमाग में बिठाकर क़ुरान की इन आयतों को समझना चाहिये....
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.... इस्लामी आस्था बिलकुल यही कहती है कि अल्लाह को निराकार स्वीकार करते हुए उसकी बन्दगी की जाए, और जिस तरह विश्व के अनेकों समुदायों ने ईश्वर के आकार की कल्पना करके झूटी मूर्तियों और तस्वीरों को गढ़ के उन्हें ईश्वर का रूप बता दिया इस कुचेष्टा से मुसलमान कोसों कोसों दूर रहें और बिना किसी मूर्ति की कल्पना के ईश्वर की इबादत करें.... कुरआन में कई स्थानों पर ये बात दोहराई गई है कि अल्लाह "बेमिस्ल" है, यानी यानी वो किसी भी प्रकार की "भौतिक" तुलनाओं से परे है.... तो स्पष्ट है कि पवित्र क़ुरआन की जिन आयतों से विरोधीजन अल्लाह के आकार प्रकार का पता लगाना चाह रहे हैं, उन आयतों का वास्तविक मन्तव्य कुछ और ही है,
........ ..... देखिये, जहाँ तक सवाल अल्लाह के "कुर्सी" पर बैठने का है तो जैसा कि हमारा ईमान है कि अल्लाह किसी भी किस्म की बनावट, जगह और वक्त की हदों से परे है, सो स्पष्ट है कि यहां उसके किसी "भौतिक" सिंहासन या कुर्सी पर बैठने की बात नही कही गई है, यहां दरअसल कुर्सी पर बैठने के शब्दों का प्रयोग मिसाल के तौर पर, या मुहावरतन किया गया है, और वो मुहावरा ये है कि जैसे एक बात कही जाती है, कि इस वक्त देश की गद्दी पर फलां शख्स बैठा है, इस बात का मतलब ये नही होता कि इस लम्हे वो शख्स किसी गद्दी पर बैठा ही होगा, बल्कि इस मुहावरे का मतलब ये है कि मौजूदा दौर में इस देश का हाकिम वो शख्स है, .... यही मुहावरा क़ुरान में अल्लाह ने अपने लिये इस्तेमाल किया है कि उसने दुनिया बनाई और इस दुनिया की सर्वोच्च सत्ता की बागडोर खुद सम्हाली यानि सबसे ऊंची कुर्सी पर वो विराजमान हुआ, ....!!!

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इसी तरह हज़रत आदम को अल्लाह द्वारा अपने "हाथों से" बनाए जाने की बात कहना भी एक इंसानों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला आम मुहावरा ही है, ..... क्योंकि क़ुरान ही तस्दीक करता है कि किसी भी चीज़ के निर्माण के लिये अल्लाह को खुद परिश्रम नही करना पड़ता, बल्कि अल्लाह जब किसी चीज़ का निर्माण करना चाहता है तो केवल आदेश करता है, और उस चीज़ का निर्माण होने लगता है, याद कीजिये क़ुरआन का प्रसिद्ध वाक्य "कुन फह्या कुन" जिसका खुलासा ये है कि जब अल्लाह किसी चीज़ का निर्माण करना चाहता है तो वो सिर्फ उस चीज़ को निर्मित होने का आदेश देता है और उस चीज़ का निर्माण हो जाता है...!!
... दरअसल किसी काम के पीछे किसी का "हाथ" होने के मुहावरे का अर्थ ये है कि फलां काम करने के पीछे, फलां व्यक्ति ज़िम्मेदार है, फिर भले ही वो काम उसने वास्तव में अपने हाथ से न किया हो लेकिन मुहावरे में यही कहा जाता है कि इस काम में उसका हाथ है....
.. और जब कोई व्यक्ति ख़ुद ये बात कहता है कि ये काम मैंने ख़ुद अपने "हाथों" से किया है, तो इसका सीधा मतलब ये समझा जाता है कि ये शख्स इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि फलां बात करने का ज़िम्मेदार मैं हूँ, जैसे एक उदाहरण लीजिये... हमारे समाज में अक्सर बूढ़े बाप अपने जवान बेटों पर जब गुस्सा होते हैं तो कहते हैं कि "मैंने तुझे अपने इन्हीं हाथों से पाल पोसकर बड़ा किया, और आज तू मुझे जवाब दे रहा है ?" .... जबकि वास्तव में अपने हाथों से पालने पोसने का काम तो माँएं करती हैं, हां बच्चों को पालने में बराबर के ज़िम्मेदार बाप भी होते हैं, और बच्चे को पालने के साधन जुटाने के ज़िम्मेदार होते हैं
... तो इसी मुहावरे का इस्तेमाल इंसानों को बात का मर्म अच्छे ढंग से समझाने के लिये किया गया इस आयत के पार्श्व में वृतांत ये है कि जब आदम अलैहिस्लाम का निर्माण करने के बाद अल्लाह ने अपने दासों को आदम के सम्मान में झुकने का आदेश दिया तो इब्लीस ने आदम अस० को अपने से हेय मानते हुए, अल्लाह के इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया, तब अल्लाह ने शैतान पर क्रोध करते हुए खासतौर पर इस बात बात पर ज़ोर देकर कहा कि शैतान ने उस आदम को तुच्छ कैसे समझ लिया जिस आदम का निर्माण करने का ज़िम्मेदार सर्वोच्च शक्तिशाली ईश्वर है, ...यानी आदम से अल्लाह के सम्बन्ध का ध्यान इब्लीस को दिलाने पर अल्लाह ने जोर दिया और इसी बात को इंसानी मुहावरे में क़ुरान में यूँ बयान किया गया है..."अल्लाह ने कहा, ऐ शैतान, तुझे आदम को सजदा करने से किस बात ने रोका ?? जिस आदम को मैंने अपने हाथों से बनाया है, क्या तूने घमण्ड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है ??" (38:75)
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......... तो वास्तव में बात यहां कुछ और है और विरोधीजन कुछ और सिद्ध करना चाहते थे...... इसी तरह कुछ हदीसें जिनमे बताया गया है कि कयामत के दिन बन्दे अपने रब्ब को देखेंगे, ... इन हदीसों को कोट करके भी लोग ये सिद्ध करना चाहते हैं कि देखा तो साकार को ही जा सकता है, निराकार को नही !! जबकि मामला यहाँ भी वही है कि मानवीय शब्दावली पारलौकिक दुनिया की बातों का सही सही वर्णन करने के लिये अपर्याप्त है, .... कयामत के रोज़ हर बन्दा अल्लाह के समक्ष होगा और उसके सामने अपने रचयिता को लेकर कोई संशय नही रहेगा जो संशय सांसारिक जीवन में उसके साथ रहे थे, इस स्थिति को अल्लाह को देखना के शब्दों से व्यक्त करने का प्रयास किया गया है, पर अल्लाह के आकार प्रकार पर कोई चर्चा नही की गई, वास्तव में मरने के बाद क्या होगा और कैसा होगा इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य की गर्त में हैं... और बेहतर ये है कि इन प्रश्नों में उलझने की बजाए हम सांसारिक जीवन के अपने कर्तव्यों को पूरा करने में ध्यान लगाएं, जिन कर्तव्यों को निभाने की हमारा रब्ब हमसे अपेक्षा रखता है !!!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

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पशु संभोग की सज़ा।




पशु संभोग की सज़ा।

एक भाई ने ये साबित करने के लिए कि इस्लाम मे पशुओं से सेक्स करना जायज़ है, एक किताब के पन्ने की फोटो हमें दिखाई जिसमें दावा किया गया था कि तिरमिज़ी शरीफ़ मे हजरत इब्न अब्बास से रिवायत है कि "यदि कोई व्यक्ति सुअर, बकरी ,कुतिया, ऊंट, गाय आदि जानवरों के साथ संभोग करे तो उसपर कोई जुर्म लागू नहीं होता "

भाई, सबसे पहले तो आपका ध्यान इन दो रिवायतों की तरफ खींचना चाहता हूँ जिनमे से एक रिवायत तो हजरत इब्न अब्बास रज़ि. से ही सम्बन्धित है,

पहली हदीस ये है कि नबी सल्ल. ने फरमाया "लानत है उस शख्स पर जो किसी जानवर के साथ व्यभिचार करे, और लानत है उस शख्स पर जो कौमे लूत अ. का काम (समलैंगिक सम्बन्ध बनाए) करे ॥" ( सही अल जामी)

और हजरत इब्न अब्बास रज़ि. से रिवायत है कि "अगर कोई शख्स किसी जानवर के साथ संभोग करता है तो उस शख्स को मौत की सज़ा देनी चाहिए, और उस जानवर को भी कत्ल कर देना चाहिए, " (अबू दाऊद)

यही पशु से संभोग पर मौत की सज़ा की रिवायत अन्य कई किताबों मे भी मौजूद है जैसे तिरमिज़ी, इब्न माजाह, मुस्नद अहमद आदि ..... यानी पशु से सम्भोग करने को निश्चित ही इस्लाम मे बेहद घृणित , और दण्डनीय अपराध माना गया है ..... पर इस अपराध के लिए देश निकाला, कोड़े मारना या अंग भंग जैसी सजाओं को छोड़कर केवल मौत की सजा निर्धारित की गई हो, इस बात पर इस्लामी विद्वानों मे मतभेद है ... मतभेद का एक कारण तो ये कि पशु से संभोग पर मौत की सजा के आदेश वाली रिवायतो को कमजोर माना गया है, और दूसरा कारण वो ही रिवायत है जो आपने दिखाई...

परन्तु भाई ने जिस पेज का फोटो दिया, सबसे पहली बात तो ये है कि वो एक एण्टी इस्लामिक बुक है .... और जो शब्द और जानवरों के नाम भाई  ने दिखाए वो शब्द रिवायत मे बिल्कुल नहीं हैं , तिरमिज़ी शरीफ़ की रिवायत के शब्द ये हैं कि "किसी जानवर के साथ संभोग करने वाले व्यक्ति के लिए कोई "निर्धारित" दण्ड नही है " .... 

इसका अर्थ ये है कि किसी पशु के साथ अनैतिक सम्बन्ध बनाने के अपराध मे किसी विशेष सजा का आदेश नहीं दिया गया है ... और ये अपने समय के विधि व्यवस्थापकों पर निर्भर करता है कि वे इस अपराध के लिए अपराधी को मौत की सजा, या उससे इतर कोई दण्ड दे सकते हैं ।

दरअसल नबी सल्ल. के समय से ही जिन कार्यों को इस्लाम ने अपराध ठहराया मगर कोई निर्धारित सजा न रखी थी, ऐसे अपराधों के लिए मुस्लिम विधि व्यवस्थापकों ने यहूदी और ईसाई दण्ड संहिता लागू करने की नीति बना रखी थी, ऐसा हमें बनू कुरैज़ा के मामले मे भी देखने को मिलता है,
अत: बाइबल के लेविटिकस 20:5 मे ये विधान बताया गया है कि "पशु के साथ संभोग करने वाले व्यक्ति और उस पशु दोनों को कत्ल कर देना चाहिए " 
..... यही विधान बाइबल मे लिखा होने के कारण शुरू के मुस्लिमों ने रखा, लेकिन नबी करीम सल्ल. ने सहाबा के सामने ये भी स्पष्ट किया था की इस अपराध के लिए अनिवार्य रूप से मौत की सजा निर्धारित नहीं है ..... बल्कि किसी विशेष प्रकार की सजा निर्धारित नहीं है, और न्यायाधीश बाइबल के विधान से हटकर भी कोई दण्ड अपराधी को दे सकता है .... अत: इब्न अब्बास रज़ि. ने फरमाया कि पशु से संभोग के अपराध की निर्धारित सजा नही है, जिस रिवायत को तोड़ मरोड़ कर विरोधी ये साबित करने मे लगे हुए हैं इस्लाम मे पशुओं से सम्भोग करना जायज़ है ....

गौर कीजिएगा अगर पशु संभोग पर व्यक्ति और पशु को मार डालने की शिक्षा बाइबल की न होती और केवल इस्लाम की ये शिक्षा होती, तो सारे मानवतावादी इस बात पर हाय तौबा मचा रहे होते कि "इतने छोटे से जुर्म पर मौत की भयंकर सजा क्यों ?"....
पर क्योंकि ये मौत की सजा यहूदियों और ईसाई लोगों के धार्मिक कानून पर सवाल उठाती है, इसलिए इस मौत की सजा पर आपत्ति उठाए जाने की बजाय इस मामले मे मौत की सजा की अनिवार्यता समाप्त करने के इस्लामी विधान पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस्लाम ने तो पशु सम्भोग को जायज़ बता दिया है, .....
इसे इस्लाम विरोधियों की धूर्तता नहीं तो और क्या कहा जाएगा ?
वैसे इस विषय मे प्रश्न करने वाले भाई से एक रिक्वेस्ट ये है कि वो बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर साहब का शोध "अश्वमेध यज्ञ" के बारे मे पढ़ लें, एवं एक बार खजुराहो की मूर्तियों पर पैनी नजर डाल के देखें, उन्हें कुछ ऐसा मिलेगा जो वो पहले नहीं जानते थे।


~ ज़िया इम्तियाज़।
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गैरमुस्लिम जन्नत में जाएगा।

क्या गैर मुस्लिम जन्नत में नहीं जाएगा।

बहुत से मुस्लिमों और उन मुस्लिमों के कारण गैर मुस्लिमों के बीच मे ये गलत विश्वास फैला हुआ है कि एक मुस्लिम व्यक्ति सिर्फ मुस्लिम घराने मे पैदा होने भर से जन्नत का अधिकारी हो जाता है जबकि एक गैर मुस्लिम व्यक्ति चाहे कितना भी भला क्यों न हो वो दोजख मे ही जाएगा ....॥

....सबसे पहले तो ये बात जान लें कि बिना अच्छे कर्मो के मुस्लिम घर मे पैदा हुआ व्यक्ति भी दोज़ख से बच नहीं सकेगा , पूरी कुरान पाक की शिक्षा का सार यही है कि अल्लाह का बंदा अल्लाह का आज्ञाकारी बने और अल्लाह के आदेश मानकर हमेशा अच्छे और भलाई के काम करता रहे, पर यदि वो व्यक्ति अल्लाह की आज्ञाओं का तिरस्कार कर के अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए, अल्लाह द्वारा अवैध ठहराए गए कर्म करता रहे तो फिर ये व्यक्ति भी नरक से बच नहीं सकता 

अब रही बात हर गैरमुस्लिम के दोज़खी होने की..... तो ध्यान रहे कि किसी भी विश्वास को बनाने से पहले एक मुस्लिम को इस बात का गहन अध्ययन कर लेना चाहिए कि इस विषय मे कुरआन क्या कहता है ....
देखें कुरान अध्याय 2 एवं अध्याय 5 । यहाँ ऐसी कुछ बातें बयान की गई हैं जोकि इस्लाम के पैगाम का सार है जो समस्त पैगंबरों ने हर दौर के लोगो को दिया है !! कुरान ने ये मूल सिद्धान्त दो जगह बयान किए है । 

सूरह बकरह अध्याय 2 , आयत नंबर 62 में अल्लाह ताला फरमाते है : "निस्संदेह, जो लोग ईमान वाले हुए और जो लोग यहूदी हुए और नासारा (ईसाई) और साबि , उनमे से जो व्यक्ति ईमान लाया अल्लाह पर और आखिरत (परलोक) के दिन पर और उसने भले कर्म किए तो उसके लिए उसके पालनहार के पास (अच्छा) बदला है । और उनके लिए न कोई भय है और न वह दुखी होंगे। "

बिलकुल यही सिद्धान्त सूरह माइदाह सूरह नंबर 5 एवं आयत नंबर 69 मे भी बयान हुआ है कि चाहे कोई शख़्स मुसलमान हो या यहूदी हो या ईसाई हो या साबी या फिर कोई दूसरे धर्म का । आखिरत मे फैसला तीन बुनियाद पर होगा: 
•> एकेश्वरवाद पर ईमान । 
•> परलोक (आखिरत के दिन) पर ईमान । 
•> और अच्छे कर्म करते रहना । 

ये सारी चीज़े हर मनुष्य के लिए लोक और परलोक मे सफल होने के लिए ज़रूरी है। और इन शर्तों को पूरा करने वाला हर शख्स, चाहे वो किसी भी धर्म का हो अल्लाह उन्हें दण्डित नहीं करेगा.... वैसे देखा जाए तो ये तीनों उसूल इंसान की मूल प्रवत्ति मे मौजूद हैं और अक़ल भी इन्ही बातों की तरफ इशारे करती है , कि हमें सदा अच्छे, सबकी भलाई के काम करने चाहिए, और ये, कि इस दुनिया के रचयिता का आंख से ओझल एक अस्तित्व कहीं न कहीं तो मौजूद है, और ये कि हमारे शरीर की मौत के बावजूद हमारा अस्तित्व बाकी बचा रह जाने की सम्भावना है, जिस अस्तित्व के साथ हम एक और जीवन जियेन्गे ॥

खैर इन सब बातों के साथ ही ये भी अक़ल का तक़ाज़ा है कि अगर किसी ऐसे शख्स के पास खुदा के रसूल का पैगाम पहुंचता है और वो ये जान लेता है की ये पैगाम बिलकुल सही है लेकिन हठधर्मी की बुनियाद पर उसे मानने से इंकार कर देता है तो ऐसे शख्स के लिए भी हमेशा की जहन्नम की चेतावनी है । ये ऐसा जुर्म है जिसका बयान कुरान पाक की बहूत सी आयतों मे आया है, और जो भी ये जुर्म करेगा चाहे वो साबि हो या यहूदी, या ईसाई या कोई और पंथ वाला या चाहे वो मुस्लिम घराने मे पैदा हुआ कोई शख्स ही क्यों न हो, उसे अपने इन कामो के लिए दण्ड भोगना पड़ेगा.... यानि हर एक नबी की उम्मत और आज के समय के मुस्लिमों को इन उपरोक्त तीन मूल नियमों के साथ ही साथ अपने नबी की शिक्षाओं का पालन करना भी आवश्यक है, और ऐसा न किया जाने पर व्यक्ति अपराधी ठहरेगा
अब रहा ऐसा शख्स जिसने किसी रसूल या नबी का पैगाम सुना ही नहीं या अगर सुना भी है तो उस तक गलत जानकारी पहुंची है (जैसे कि आज के दौर मे हम देख सकते है कि नबी सल्ल. और इस्लाम के बारे मे बहुत ही गलत और भ्रामक बातें फैलाकर लोगों को इस्लाम से दूर रखने की कोशिशें की जाती हैं, और इन गलत जानकारियों के कारण ही बहुत से गैर मुस्लिम लोग इस्लाम से नफरत करने लगते हैं, और ये लोग हमेशा गलतफहमी मे ही रहते हैं, सिवाय तब के, जब कोई जानकार मुस्लिम उसे सच्चाई न बता दे, या अल्लाह पाक कोई और अन्य बहाना न बना दे, उस व्यक्ति को सच्चाई बताने का ) तो ऐसे शख्स के लिए ऊपर बयान किए हुए 3 सिद्धांत की बुनियाद पर फैसला होगा।

एक बात और ध्यान मे रखिए कि अल्लाह पाक कभी निर्दोष और ईश्वरीय संदेश से अनभिज्ञ लोगों को दण्डित नहीं करते, और ये बात अल्लाह ताला कुरान (सूरह 17 आयत 15) मे खोलकर फरमाते है कि, : "हम लोगो को यातना नहीं देते जब तक कोई रसूल न भेज दे "। 

चुनांचे इस्लामी विद्वान इमाम ग़ज़ाली ने पांचवें सदी में ये राय ज़ाहिर की थी कि ग़ैर मुस्लिमों का एक गिरोह तो यक़ीनन रसूल अल्लाह सल्ल अल्लाह अलैहि वसल्लम की नबुव्वत की हक़्क़ानियत (सत्यवादिता) से पूरी तरह वाक़िफ़ है और इस के इनकार के नतीजे में ख़ुदा के अज़ाब का पात्र ठहरेगा, लेकिन वो ग़ैर मुस्लिम जिन्हों ने सिरे से रसूल अल्लाह सल्ल अल्लाह अलैहि वसल्लम का नाम ही नहीं सुना या नाम तो सुना है, लेकिन आप की नबवी हैसियत और पैग़ंबराना कमालात व औसाफ़ ( ईशदूत होने के कारण मिले चमत्कार एवं विशेषताओं ) से परिचित नहीं हैं , उन के बारे में यही उम्मीद है कि वो रहमत इलाही (ईश्वर की दया) के दायरे में शामिल हो कर नजात (मुक्ति) पा जाऐंगे।

.... इस विश्वास की बुनियाद सम्भवत: अल-अस्वद बिन सरीअ़ की ये हदीस है यहाँ उन लोगों का जिक्र है जिन तक किसी रसूल का संदेश उनके जीवन मे नहीं पहुंच पाया था, हदीस है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "चार (गैरमुस्लिम) लोग क़ियामत के दिन बहस करेंगे, (यानि उनके पास एक वैध कारण होगा खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ) एक बहरा आदमी जो कुछ नहीं सुनता, एक बेवक़ूफ आदमी, और एक बूढ़ा आदमी और एक वह आदमी जो दो पैगंबरों के बीच की अवधि में मर गया हो। बहरा आदमी कहेगा कि मेरे रब इस्लाम इस हाल में आया कि मैं कुछ सुनता ही नहीं था। बेवक़ूफ आदमी कहेगा कि इस्लाम इस हाल में आया कि बच्चे मुझे मेंगनी से मारते थे, और बूढ़ा आदमी कहेगा कि मेरे रब इस्लाम इस हाल में आया कि मैं कुछ समझता बूझता ही नहीं था, और दो नबियों के बीच की अवधि में मरने वाला आदमी कहेगा कि मेरे रब मेरे पास तेरा कोई सन्देष्टा नहीं आया। तो अल्लाह तआला उस समय इन लोगों की एक परीक्षा लेगा, और जो व्यक्ति उस समय भी अल्लाह के आगे हठधर्मी दिखाकर अल्लाह की आज्ञा नहीं मानेगा वो नरक मे जाएगा, और जो गैरमुस्लिम व्यक्ति उस समय अल्लाह की आज्ञा मान लेगा वो जन्नत मे भेज दिया जाएगा ....
इसे इमाम अहमद और इब्ने हिब्बान ने रिवायत किया है, और अल्बानी ने सहीहुल जामिअ़ हदीस संख्या : 881 के अंतर्गत सहीह कहा है।

और देखिए... कुरान पाक मे ये स्पष्ट लिखा हुआ है कि कयामत मे, यानि न्याय के दिन कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का "बोझ" नही उठाएगा, यानि कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के पाप का दण्ड नहीं पाएगा, बल्कि सबको अपने अपने किए का दण्ड भरना होगा .... तो आप समझ सकते हैं कि कुरान मे जहाँ जहाँ नरक मे जाने वाले पापियों के समूहों का जिक्र है, तो वहाँ इन समूहों का अर्थ किसी खास नस्ल या धर्म में जन्मे व्यक्तियों के समूह की बजाय ऐसे समूह से है जिसका प्रत्येक व्यक्ति, वैयक्तिक रूप से इस बात का दोषी है कि उस पर सत्य पूरी तरह प्रकट हुआ लेकिन फिर भी हटधर्मी के चलते वो अत्याचारी बना रहा, इन व्यक्तियों के पाप के आधार पर इनको एक समूह में रख दिया गया होगा, और इन समूहों मे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसपर सत्य पूरी तरह प्रकट न हो पाया हो, और केवल अनभिज्ञता के कारण उसने ईश्वर का सत्य न स्वीकारा हो .... देखिए, कुरान मे ये बात भली भांति स्पष्ट है, अल्लाह तआला का फरमान है : 

"जब कभी उस (नरक) में कोई गिरोह डाला जायेगा उस से नरक के दरोगा पूछेंगे कि क्या तुम्हारे पास कोई डराने वाला नहीं आया था? वे जवाब देंगे कि बेशक आया तो था, लेकिन हम ने उसे झुठलाया और कहा कि अल्लाह ने कुछ भी नाज़िल नहीं किया, तुम बहुत बड़ी गुमराही में ही हो।" (सूरतुल मुल्क : 8-9)

और देखिए : 

"और काफिरों के झुण्ड के झुंड नरक की तरफ हाँके जायेंगे, जब वे उसके क़रीब पहुँच जायेंगे, उसके दरवाज़े उनके लिए खोल दिये जायेंगे और वहाँ के रक्षक उन से पूछेंगे कि क्या तुम्हारे पास तुम में से रसूल नहीं आये थे? जो तुम पर तुम्हारे रब की आयतें पढ़ते थे और तुम्हें इस दिन के भेंट से सावधान करते थे, ये जवाब देंगे कि हाँ, क्यों नहीं, लेकिन अज़ाब का हुक्म काफिरों पर साबित हो गया।" (सूरतुज़्ज़ुमर : 71) 

अत: हर वह व्यक्ति जिसे उचित ढंग से इस्लाम की दावत   
पहुँच चुकी है उस पर हुज्जत क़ायम हो चुकी है, यानि उसके पास कोई बहाना नही रहा कि वो सच को जान, व दिल से मान नही चुका था, फिर भी वो अल्लाह और रसूल से शत्रुता करे, ऐसे ही अपराधी को कयामत के दिन दण्ड का अधिकारी ठहराया जायगा, और जो इस हाल में मरा है कि उसे दावत नहीं पहुँची या अनुचित रूप से पहुँची है तो उसका मामला अल्लाह के हवाले है, वह अपनी सृष्टि को सर्वश्रेष्ठ जानता है और अल्लाह किसी के साथ अन्याय या किसी पर बिलकुल भी अत्याचार नहीं करता है, जैसा कि अल्लाह का फरमान है सूरह 41 आयात 46 मे , "तुम्हारा रब अपने बंदो पर तनिक भी ज़ुल्म नहीं करता। "

तो ऐसे मे उम्मीद की जा सकती है की अल्लाह ताला उसे उसके सच से अनजान होने की बुनियाद पर माफ कर देंगे। 
और अल्लाह बेहतर जानते है !


~ ज़िया इम्तियाज़।
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तौहीन गुस्ताखे रसूल की सज़ा।

क्या तौहीन रिसालत की सज़ा मौत है।

पिछले कुछ दिनों मे कुछ जज़्बाती मुसलमानों के मुंह से ये बात मैने कई बार सुनी कि तौहीने रिसालत की सजा मौत है, नबी ए करीम से अपने भाईयों की मोहब्बत की हम कद्र करते हैं लेकिन ये बात भी साफ कर देना चाहते हैं कि इस मामले मे मौत की सज़ा की बात सिर्फ जज़्बात मे बहकर हमारे भाई बोल रहे हैं, वरना हकीकत ये है कि शरीयत मे तौहीने रिसालत पर मौत की सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है,  सबसे पुरानी इस्लामी विचारधारा के संस्थापक और भारतीय उपमहाद्वीप सहित विश्व के सर्वाधिक मुस्लिम जिनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं, उन इस्लामी विद्वान इमाम अबू हनीफा रह° ने तौहीने रिसालत पर मौत की सज़ा का विरोध किया है , हज़रत अबू हनीफा रह• ने फरमाया है कि किसी ज़िम्मी (इस्लामी हुकूमत मे महकूम गैर मुस्लिम) का कत्ल तौहीने रिसालत के जुर्म पर नहीं किया जा सकता क्योंकि वो ज़िम्मी पहले से ही उससे भी बड़े गुनाह (शिर्क) का मुजरिम है, (और जब शिर्क जैसे संगीन गुनाह के लिए उसे शरीयत ने मौत की सज़ा नहीं दी है तो तौहीने रिसालत, जो शिर्क से कम संगीन जुर्म है इस पर उसे मौत की सज़ा कैसे दी जा सकती है ??))
[इमाम खत्ताबी कृत मुअलिम अस-सुनन, शरह सुनन अबू दाऊद)

बेशक हर समर्पित मुसलमान का विश्वास यही होना चाहिए कि नबी सल्ल. की शान में गुस्ताखी बेशक गुनाहे कबीरा है, लेकिन ऐसे गुनाहगार को मौत की सजा अव्वल तो गैर इस्लामी कानून वाले मुल्क मे देने की अथॉरिटी किसी के पास हो नहीं सकती ... दूसरे इस्लामी शरीयत जिस मुल्क मे लागू हो वहाँ भी गुस्ताखी ए रसूल पर मौत की सज़ा नही दी जा सकती, शरीयत के मुताबिक गुस्ताखी ए रसूल की सज़ा सिर्फ एक सूरत मे दी जा सकती है कि जब किसी मुल्क मे इस्लामी हुकूमत हो और हाकिम ने ज़िम्मियों और मुस्लिमों, सभी से ये अहद लिया हो कि वो किसी भी मज़हब का अपमान नहीं करेंगे और अगर करेंगे तो उस सजा को झेलने के लिए राज़ी होंगे जो मुआहिदे के वक्त तय की जाएगी, ये सज़ा भी मौत की न होकर कुछ मुद्दत की जेल, कुछ कोड़ों की मार या कुछ जुर्माने की हो सकती है ॥

इस कानून की वजह कुरान पाक की पवित्र आयतें और सही अहादीस हैं, कुरान पाक मे आया है -
“(ऐ नबी सल्ल.) जो लोग तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं, बेशक हम तुम्हारी तरफ से उनके लिए काफी हैं ” [अल-कुरआन, 15:95]
... यानि नबी सल्ल. का मज़ाक उड़ाने की सजा किसी को देना पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध है, अल्लाह कुरान पाक मे नबी सल्ल. से फरमाता है कि नबी सल्ल. का मजाक उड़ाने वालों को दण्ड देने का अधिकार अल्लाह ने अपने हाथ मे ले रखा है, न कि किसी देश के कानून को दिया है...

वहीं हदीसों मे ये दर्ज है कि प्यारे नबी सल्ल. ने कभी अपना अपमान करने वाले व्यक्तियों के लिए मौत की सजा का हुक्म नहीं दिया था, बल्कि नबी सल्ल. का अपमान करने वालों के कत्ल करने की जब नबी सल्ल. के साथियों ने इजाज़त मांगी तो नबी सल्ल. ने सहाबा को वो इजाज़त भी ना दी।

... लोग एक यहूदी शायर काब बिन अशरफ के कतल को गुस्ताखी रसूल की सज़ा बताते थे, स्टडी करने पर मालूम हुआ कि काब को मौत की सजा का हुक्म नबी सल्ल. ने अपने अपमान की बजाय मुस्लिमों की जान माल की सुरक्षा के लिए दिया गया था।

हालांकि ये कोई तरीका नहीं कि कहीं से भी एक हदीस उठाकर बिना उसका पूरा पसमन्ज़र देखे उसपर अटकलें लगा ली जाएं मगर हमारे कुछ भाई तौहीने रिसालत के गुनाहगार को मौत की सज़ा होने की ऐसी ही अटकल, अबू दाऊद शरीफ की किताबे हुदूद की एक हदीस पर लगाते हैं कि एक नाबीना (नेत्रहीन) शख्स की खादिमा/उपपत्नी नबी सल्ल. को अक्सर गालियां दिया करती थी और अपने स्वामी के रोकने से रूकती भी न थी, और एक दिन जब वो इसी तरह नबी सल्ल. को गालियां दे रही थी तो गुस्से मे आकर उस नाबीना शख्स ने एक छुरी उठा कर उस औरत को मार दी, औरत पेट से थी, छुरी उसके पेट मे लगी जिससे वो औरत और उसके पेट के बच्चे दोनों की मौत हो गई, और जब इस कत्ल का मुकदमा नबी सल्ल. ने कायम किया तो पूरा वाकया सुनने के बाद नबी सल्ल. ने फरमाया कि इस कत्ल का कोई किसास नहीं है ॥
....रावियों की चेन के आधार पर इस हदीस को सही प्रमाणित किया गया है, लेकिन इस हदीस के विषय मे और बहुत सी बातें जानना ज़रूरी हैं ॥

अव्वल तो बात इसकी कि इस हदीस मे एक बड़ा पेंच है, और वो ये है कि इस्लाम मे कानून है कि किसी बेगुनाह के नाहक कत्ल की सजा मौत है तो यहाँ पर गर्भ के कत्ल की सजा देना या किसास अदा करना ज़रूरी था, जिन बातों पर अमल नहीं किए जाने से साबित होता है कि ये हदीस इतनी संक्षिप्त बयान की हुई है कि उसके शब्द पर्याप्त रूप से अस्पष्ट हैं व इनसे ऐसी कोई शिक्षा नहीं ली जा सकती जो पवित्र कुरान या अन्य सही हदीसों की शिक्षा के विरुद्ध ठहरती हो ॥

फिर इस हदीस के सम्बन्ध मे ये बता दें, कि हदीस अध्ययन और उस अध्ययन के निष्कर्ष पर शरीयत के प्रतिपादन के सिद्धांतों के अनुसार इस हदीस की स्थिति क्या है....
... उपरोक्त हदीस मे बताया गया है कि उस स्त्री के कत्ल का मुकदमा नबी सल्ल. ने अनेकों मुस्लिमों को एकत्र कर के पेश किया था, तब होना तो ये चाहिए था कि उपरोक्त घटनाक्रम को कई सहाबाओं ने रिवायत किया होता पर बहुत अजीब सी बात है कि ये हदीस हम तक केवल एक सहाबी के ज़रिए पहुंची है, अत: ये 'खबर ए वाहिद' यानि केवल एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात है, और सभी इस्लामी धार्मिक विद्वानों का मत है कि कुरान एवं अन्य हदीसों के विरुद्ध जानेवाली खबर ए वाहिद मान्य नहीं है ॥
दूसरी बात किसी हदीस पर, विशेषकर संक्षेप मे बयान की गई हदीस पर कोई विश्वास बनाने से पहले उस विषय की कई हदीसों का अध्ययन किया जाना आवश्यक होता है, ताकि हदीस का विस्तार और उसकी सही शिक्षा पता चल सके ... लेकिन यहाँ क्योंकि एक के अलावा दूसरे सहाबी ने इस हदीस को रिवायत ही नहीं किया इसलिए इस हदीस की सही शिक्षा पता चलना भी असम्भव है, 
और तीसरी बात, किसी के जीवन और मौत के अति गम्भीर विषय पर शिक्षा देनेवाली किसी एक संक्षिप्त हदीस के अध्ययन के आधार पर किसी को मौत की सजा देने की शिक्षा ग्रहण करने के पक्ष मे भी इस्लामी विद्वान कभी नही रहे हैं .. तब तो और नहीं जब एक दूसरे का परस्पर समर्थन करने वाली अनेक अहादीस उस एक हदीस के विरोध मे मौजूद हों 

यानि कुल मिलाकर ये हदीस शरीयत की दण्ड संहिता के निर्माण मे शामिल होने की शर्तों को ही पूरा नहीं करती

हां यदि इस हदीस से कोई ऐसी शिक्षा मिले जो नबी करीम सलल्लाहो अलैहि वसल्लम की अन्य अनेकों अहादीस की शिक्षा का समर्थन करती हो तो इस हदीस की वो शिक्षा इस कारण मान ली जाएगी क्योंकि अन्य कई हदीसों ने उस शिक्षा को समर्थन देकर मजबूत बना दिया है, तो इस हदीस से ये बात मालूम चलती है कि नबी सल्ल. की हुकूमत के दौर मे ऐसा कोई भी कानून नहीं था जिसमें गुस्ताख ए रसूल को मुल्क का कानून हद्द या दूसरी भी किसी तरह की सज़ा देता, क्योंकि अगर उस दौर मे गुस्ताखी ए रसूल पर सज़ा का प्रावधान होता तो जब वो औरत बार बार नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखी किया करती थी तो उसे सजा दिलाने के लिए वो शख्स वक्त के हाकिम नबी सल्ल. से शिकायत करते बजाय खुद उस औरत पर वार करने के, लेकिन उस दौर मे गुस्ताखी ए रसूल पर सज़ा का कोई शरई हुक्म न होने की वजह से बहुत मुद्दत तक उन नाबीना शख्स ने नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखियां बर्दाश्त कीं जिससे ये ही बात साबित होती है कि नबी सल्ल. की तौहीन के गुनाह की नबी सल्ल. ने भी अपनी हुकूमत मे कोई सजा न रखी थी और इस गुनाह की सजा का फैसला अल्लाह पर ही छोड़ रखा था ॥

~ ज़िया इम्तियाज़।
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नबी के अपमान की सज़ा।

हदीस की पुस्तकों से बनाई गई इस्लामी मान्यताओं मे कभी कभी एक विरोधाभास दिखाई पड़ता है , जैसे कि कई अहादीस मे नबी सल्ल. धर्म मे नए रिवाज़ो को बनाने की मनाही करते हैं, पर कुछ मुस्लिम भाई इस्लाम मे नए रिवाज़ो का प्रचलन करना गलत नहीं मानते और इसके लिए कारण देते हैं वो सहाबा द्वारा इस्लाम मे शुरू की गई कुछ रीतियों को, इसी तरह नबी सल्ल. ने अनेकों हदीसों मे कब्रो से अकीदत और लगाव रखने को मना फरमाया है, लेकिन कुछ मुस्लिम भाई कब्रो से लगाव रखने को गलत नहीं मानते और इसके लिए कारण देते हैं कि कुछ सहाबा ने नबी सल्ल. के रौज़ा ए मुबारक के हुजरे की दीवारों से अपना चेहरा मला या कोई सहाबा रौज़ा ए मुबारक से लिपटे थे ....॥
और नबी सल्ल. ने कभी खुद को बुरा भला कहने वालों का अहित नहीं किया ऐसा अनेक विवरणों मे दर्ज है लेकिन कुछ सहाबा ने नबी सल्ल. का अपमान करने वालों को कत्ल कर डाला, ऐसे कुछ विवरण सुनकर लोग असमंजस मे पड़ जाते हैं कि किस बात को मानें और किस बात को रद्द कर दें ....

जहाँ अक्सर सहाबा से ये विरोधाभासी बातें जुड़ी हुई हैं, वहाँ ये बात ध्यान मे रखी जानी आवश्यक है कि नबी सल्ल. का उम्मती होने के नाते हमारे लिए तो सबसे बेहतरीन नमूना जिन्दगी जीने का प्यारे नबी सल्ल. हैं ....
सहाबा के कौल (कथनी) और फेल (करनी) को हम नबी सल्ल. के कौल और फेल पर हरगिज़ तरजीह नही दे सकते जबकि सहाबा और नबी सल्ल. के कौल और फेल मे प्रत्यक्ष विरोधाभास भी नजर आए....

हां क्योंकि ये सहाबा की आदत बिल्कुल नहीं थी कि वो नबी सल्ल. की आज्ञा का उल्लंघन करें , इसलिए इस विरोधाभास के नजर आने के पीछे अपनी कोई मसलेहत (अप्रत्यक्ष योजना) हो सकती है ... 
जैसे कि यहूदी कवि काब बिन अल अशरफ की सहाबा द्वारा हत्या को काब द्वारा अपनी शायरी मे नबी सल्ल. का मज़ाक उड़ाने का दण्ड मान लिया जाता है....
जबकि नबी सल्ल. का मज़ाक उड़ाने का दण्ड किसी को देना पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध है, अल्लाह कुरान पाक मे नबी सल्ल. से फरमाता है कि नबी सल्ल. का मजाक उड़ाने वालों को दण्ड देने का अधिकार अल्लाह ने अपने हाथ मे ले रखा है .... 
अल्लाह का फरमान है :
“जो लोग तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं, बेशक हम तुम्हारी तरफ से उनके लिए काफी हैं ” [अल-कुरआन, 15:95]

..... दरअसल काब बिन अल अशरफ की हत्या के पीछे मसलेहत ये थी कि वो काफिरों को मुस्लिमों पर आक्रमण करने को भड़काया करता था और उसके कारण सैकड़ों मुस्लिमों की जान को खतरा बना रहता था, इसलिए काब की हत्या, आत्मरक्षा के तहत की गई हत्या थी, न कि नबी के अपमान का दण्ड ...

तो ऊपरी तौर पर पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध जाने वाली किसी हदीस या सहाबा से जुड़े किसी विवरण के पीछे क्या मसलेहत है, वो मसलेहत बिना पर्याप्त अध्ययन के समझी नहीं जा सकती, और बिना मसलेहत को समझे उस हदीस का अनुकरण कुरान की शिक्षा के विरुद्ध करने लगा जाए तो अर्थ का अनर्थ ही होगा
अत: यही बेहतर है कि विशेषकर जिन मामलों मे नबी सल्ल. ने स्पष्ट मनाही की हुई है, या जिन मामलों के बार बार नबी सल्ल. के साथ घटित होने पर भी नबी सल्ल. ने एक सा ही व्यवहार रखा और उन मामलों मे सहाबा के विरोधाभासी व्यवहार के पीछे की मसलेहत का ज्ञान न हो तो उन मामलों मे नबी सल्ल. के आदेश का अनुसरण और आप सल्ल. के व्यवहार का अनुकरण ही करना चाहिए, यही श्रेयस्कर है, और यही धर्म परायणता है ॥

शेष धार्मिक मामलों मे जो नबी सल्ल. के ज़माने मे पेश नहीं आए थे, या जिन मामलों मे नबी सल्ल. ने मनाही नहीं की थी, वहाँ सहाबा के निर्देशों का पालन करना ज़रूर बेहतरीन अमल है ... ॥

~ ज़िया इम्तियाज़।
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गुस्ताखे नबी।

(ये लेख फ्रांस की एक धर्म विरोधी पत्रिका शार्ली हेब्दो, जो हर धर्म पर बेहद अश्लील टिप्पणियां करने के लिए कुख्यात है, इस पत्रिका के कार्यालय पर जनवरी 2015 मे आईसिस द्वारा किए गए  आतंकवादी हमले को इस्लाम से जोड़े जाने के विरोध मे लिखा गया है )

बेशक मुझे भी पेरिस मे मारे जाने वाले चार्ली हेब्दो के कर्मचारियों से उनकी गलीज़ हरकतों के कारण, कोई हमदर्दी नहीं है, मगर उनका मार डाला जाना....., ये इस्लामी तरीका नहीं हो सकता .......

वो सिर्फ कुछ महीनों की जेल, या कुछ जुर्माने, या कुछ कोड़ो की मार भर की सज़ा के मुस्तहिक थे, जान से मार दिए जाने के नहीं.
... ताअफ के मैदान मे जहाँ ज़ालिमो ने मेरे प्यारे नबी सल्ल. को पत्थरों से मारकर लहूलुहान कर दिया था उस वक्त अल्लाह ने जब नबी सल्ल. की आजिज़ी से मांगी गई दुआ कुबूल कर के, उस नामुराद शहर पर अज़ाब डालने के लिए पहाड़ों का सरदार फरिश्ता भेजा था, तो नबी सल्ल. ने ये जवाब दिया था उस फरिश्ते को कि मै इन लोगों को कत्ल नहीं करवाना चाहता बल्कि अगर ये लोग हक की दावत कुबूल नहीं करते, कोई बात नहीं , मै अल्लाह से उम्मीद रखता हूँ कि इनकी आगे आने वाली नस्ल ज़रूर सच को कुबूल करेगी .....[ सही मुस्लिम, किताब-19, हदीस-4425 ]
मेरा ख्याल है कि वो ही इस्लामी तरीका है ...

ये तो रहा अपने बारे मे खुद नबी सल्ल. का फैसला, ...ऐसे ही किसी मौके पर जब कोई गुस्ताख शख्स हमारे नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखी करे तो हम मुसलमानो को नबी सल्ल. ने क्या हुक्म दिया है....??? नबी सलल्लाहो अलैहि वसल्लम ने कभी अपनी शान मे गुस्ताखी करने वाले के लिए किसी सज़ा का हुक्म नही दिया, बल्कि जब सहाबा ए किराम ने आप सल्ल. से गुस्ताख ए रसूल को सजा देने की इजाज़त मांगीतो आप  सल्ल. ने सहाबा को वो इजाज़त भी न दी, .... देखिए 

बुखारी शरीफ़ मे हजरत अबू हुरैरा,रज़ि. से रिवायत एक हदीस है, कि एक शख्स ने नबी सल्ल. से अपने कर्ज का मुतालबा किया उसकी जुबान कडवी थी तो आप सल्ल. के सहाबा ने उस बदतमीज़ शख्स की गर्दन मारने के लिए झपटे, इस पर आप सल्ल. ने सहाबा को मना किया, और न सिर्फ उस बदतमीज़ शख्स को मारने से नबी सल्ल. ने सहाबा को रोका बल्कि उस शख्स को उसके कर्ज़ से बेहतर चीज भी लौटाई [बुखारी शरीफ़, किताब 41, हदीस 575,]

इसी तरह सहीहैन मे एक हदीस हज़रत अबू सईद ख़दरी रज़ि. से रिवायत है कि आप सल्ल. सहाबा के बीच माले गनीमत तकसीम कर रहे थे, तो एक शख्स ने नबी सल्ल. से बदतमीज़ी की हज़रत उमर रज़ि. ने तलवार लेकर उस बदतमीज़ शख्स का सर काट लेने की इजाज़त नबी सल्ल. से मांगी, तो आप सल्ल. ने हजरत उमर रज़ि. को ऐसा करने से मना किया और भविष्यवाणी की कि ऐसे ही गुस्ताख लोग आगे भी होंगे जो बहुत इबादत करेंगे मगर दीन से ऐसे बेअसर निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार के जिस्म से ऐसे पार हो जाता है कि उसपर शिकार के खून का एक भी कतरा नहीं होता .... [सही मुस्लिम शरीफ़, किताब 5, हदीस 2323, ]

तो इन दोनों अहादीस मे नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखी किए जाने पर मुसलमान को नबी सल्ल. की तरफ से क्या हुक्म है वो साफ पता चल रहा है .... और वो हुक्म ये है कि उस गुस्ताख को छोड़ दिया जाए, या उसके साथ बेहतर सुलूक कर के उसको उसकी गलती पर शर्मिन्दा किया जाए .... 

बेशक सहाबा ए किराम की मोहब्बत नबी सल्ल. के लिए किसी भी पॉलिटिक्स, किसी भी हिकमत के बगैर और इन चीज़ों से ऊपर थी, इस बात मे कोई शक नहीं लेकिन इस बात मे भी कोई शक नहीं कि इन मौकों पर दीन का सही इल्म नबी सल्ल. सहाबा को बताया करते थे, न कि सहाबा को जैसा वो कर रहे हों वैसा ही करने देते थे, और फिर सहाबा ए किराम आप सल्ल. के हुक्म की तामील करते थे .... 
ज़ाहिर है सहाबा पहले से दीन को नहीं जानते थे, नबी सल्ल. मौके मौके पर यूं ही उन्हें दीन का इल्म देते, भले काम की ताकीद करते और गलत कामों को करने से रोका करते ...

और आज के ज़माने मे अगर हम भावनाओं मे बहकर कुछ गलत करने चलें तो यही अहादीस हमें नबी सल्ल. का हुक्म बताती हैं, .... क्या आपको ऐसा नहीं लगता ??


~ ज़िया इम्तियाज़।
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इरतिदाद की सज़ा।


अभी परसों एक मित्र ने सूडान की इस खबर की ओर ध्यान दिलाया कि वहाँ की एक सजायाफ्ता आठ महीने की गर्भवती महिला अपने बच्चे का जन्म होने का इन्तज़ार कर रही है जिसके बाद उस महिला को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा .... ये भयंकर सज़ा उस महिला को धर्म परिवर्तन कर के मुस्लिम से ईसाई बन जाने के कारण शरीयत कानून के अनुसार सुनाई गई है ... 
ये खबर पढ़कर मुझे वाकई दुनिया के मुस्लिमों की हालत पर बड़ा अफसोस हुआ, जिन्होंने दुनिया के सामने इस्लाम की एक ज़ालिम और बेदर्द मज़हब की छवि बनाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी..... जिसके ऐसे दोस्त हो जाएं उसे फिर दुश्मनों की क्या जरूरत ??

इस्लाम मे इरतिदाद यानि धर्म का त्याग करने पर मौत की सज़ा देने का ख्याल बुखारी शरीफ की एक हदीस से बना है कि जो अपना इस्लाम धर्म त्याग दे उसको मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए  ... पर किसी के जीवन और मौत के इतने गम्भीर मसले पर केवल हदीस के संक्षिप्त अध्ययन के आधार पर फैसला करना सही नही है .. 

क्योंकि इस्लामी ज्ञान का सबसे विश्वसनीय स्रोत पवित्र कुरान है, इसलिए किसी भी हदीस पर कोई निर्णय लेने से पहले ये देखना चाहिए कि कहीं वो हदीस कुरान की शिक्षा से टकरा तो नही रही. क्योंकि यदि किसी हदीस की शिक्षा कुरान की शिक्षा के विपरीत हो जाती है, तो उस हदीस की शिक्षा को दरकिनार करते हुए कुरान की शिक्षा को ही माना जाएगा ॥ अत: हमें ये देखना चाहिए कि स्वधर्म त्याग यानि इरतिदाद के मामले मे पवित्र कुरान क्या हुक्म देता है ?? क्या कुरान पाक मे मुर्तद अर्थात् जिसने इस्लाम का त्याग कर दिया हो, उस के लिए कहीं मौत की सज़ा का हुक्म दिया गया है ??
जब हम कुरान पाक पढ़ते हैं, तो कई जगह इरतिदाद का ज़िक्र मिलता है, जैसे कुरान की आयत 2:217;
3:72,86-87,90;
4:137;
5:54;
16:106;
33:14;
47:25-27;
73:11;
और 74:11.....
पाक कुरान की इन तमाम आयतों मे इरतिदाद का ज़िक्र है, 
इनमें हर जगह ये तो लिखा है कि इरतिदाद एक बड़ा पाप है जो भी शख्स इस्लाम का त्याग करेगा, वो अपनी मौत के बाद कयामत के दिन कष्ट भोगेगा...... परंतु ये कहीं नहीं लिखा कि मुस्लिम शासक यानि कोई इंसान उस मुर्तद शख्स को मौत की सज़ा दें .... यानी मुर्तद को दण्ड देने का अधिकार अल्लाह ने मनुष्यों को नहीं दिया है बल्कि ये अधिकार अल्लाह ने अपने पास ही रखा है .....
बल्कि कुरान की तीसरी सूरत , सूरह आले इमरान की आयत 89 पढ़िए, यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो इरतिदाद के बाद फिर मुस्लिम बन गया उसका इरतिदाद का जुर्म माफ हो जाएगा, 
खुद देखिए, मुर्तद का वापस मुस्लिम बनना तभी सम्भव है जब वो व्यक्ति जीवित रहे 

और ऐसा ही हनफी विचारधारा के मशहूर इस्लामी फुकहा, शम्स अल दीन अल सरक्शी लिखते हैं कि, हालांकि इस्लाम का त्याग एक बड़ा जुर्म है, पर ये अल्लाह और उसके बंदे के बीच का मामला है , और इस जुर्म की सज़ा कयामत के रोज़ के लिए टाल देनी चाहिए

मलिकी विचारधारा के फुकहा अबुल वलीद अल बाजी और बहुत मशहूर हम्बली विचारधारा के फुकहा इब्न तैमिय्याह, इन दोनों का कहना ये ही है कि इरतिदाद ऐसा गुनाह नहीं है जिस पर हद्द की सज़ा ( मौत की सज़ा ) दी जाए . 

आज के जमाने मे, दुनिया की शीर्षस्थ इस्लामी शिक्षण संस्था, अल अज़हर युनिवर्सिटी के शेख मरहूम महमूद शलतूत जो कि इस्लामी फिक्ह के अपने गहरे ज्ञान और कुरान की सटीक विवेचनाएं करने के लिए जाने जाते थे, उन्होंने लिखा है कि बहुत सारे इस्लामी विद्वानों की इस बारे मे एक राय है कि हुदूद ( मौत आदि की सख्त सज़ाएं ) एक अकेली हदीस के आधार पर लागू नहीं की जा सकतीं , और धर्म त्याग अपने आप मे मौत की सज़ा के लायक संगीन गुनाह नहीं है . इसी तरह अल अज़हर के वर्तमान शेख डाक्टर मोहम्मद सैयद तान्तवी, जो कि इजिप्ट के ग्रैंड मुफ्ती रह चुके हैं, उन्होंने भी स्पष्ट किया है कि धर्म त्याग मौत की सज़ा के योग्य जघन्य अपराध नहीं है !

तो फिर अब सवाल ये उठता है, कि फिर वो मुर्तद को मौत की सजा वाली हदीस आखिर पवित्र कुरान की शिक्षा से कैसे टकराई ??
अस्ल मे हदीस के साथ ऐसा होता है कई बार वो संक्षेप मे बयान की जाती है या कई बार हदीस कहने और लिखे जाने के बीच में लगभग ढाई सौ वर्षों के लंबे समय अंतराल के कारण हदीस के शब्द एकदम सही सही संचारित नही हो पाते, जिस कारण वो हदीस सम्बन्धित विषय के बारे मे पूरा एवं सही सही ज्ञान नही दे सकती ... इस कारण सम्बन्धित विषय का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक विषय की अनेक हदीसों, एवं विषय पर पवित्र क़ुरआन का भी अध्ययन करना पड़ता है
मुर्तद को मौत की सजा वाली हदीस के बारे में भी यही बात प्रतीत होती है कि इसके शब्द सही से संचारित नही हुए हैं ... इरतिदाद के विषय का विस्तृत अध्ययन करने पर पता चलता है कि केवल उसी मुर्तद को मौत की सज़ा दी जाएगी जो इस्लामी सत्ता के विरुद्ध राजद्रोह करेगा और मुस्लिमों की हत्या करेगा
इसी कारण अनेक इस्लामी विद्वानों, जिनमें इब्न तैमिय्याह, शल्तूत और तान्तवी भी शामिल हैं ... इन सब का कहना है कि मौत की सज़ा एक आम धर्म परिवर्तन के केस मे लागू नही होती,
लेकिन हिराबा के केस मे मौत की सज़ा लागू होगी, हिराबा अर्थात् , जब इस्लाम का त्याग करने वाला व्यक्ति मुस्लिमों और इस्लामी सत्ता के विरुद्ध युद्ध भी छेड़ दे ..... ऐसे व्यक्ति को आज के समय मे भी हर देश मे आतंकवादी कहकर मौत की सज़ा का अधिकारी ठहराया जाता है

लेकिन सूडान की उस महिला ने देश के खिलाफ युद्ध नहीं छेड़ा, बल्कि केवल धर्म परिवर्तन ही किया है, अत: उस इस्लाम का त्याग करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा देना एक बहुत ही गलत फैसला है और इस्लाम इस कट्टरता के खिलाफ है ....और सारी इस्लामी दुनिया के विद्वानों को मिलकर इस अमानवीय फैसले को बदलने के लिए सूडान पर दबाव डालना चाहिए केवल निन्दा कर के कोरी संवेदना जताकर एक औरत को यों ही मरने,और उसके होने वाले बच्चे को अकारण ही अनाथ होने नही दिया जा सकता

~ ज़िया इम्तियाज़।
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ज़ैनब बिन्त जहश।

ज़ैनब बिन्त जहश।

हमारे प्यारे नबी स. का अपना कोई बेटा नहीं था ,जो बेटे पैदा हुए भी उनका बहुत कमसिनी मे इन्तेकाल हो गया था,  सो आप स. ने अपने एक आज़ाद किए हुए गुलाम जिनका नाम हज़रत ज़ैद बिन हारिस था को गोद लेकर अपना बेटा बना लिया था, मगर दोनों के बीच कोई खून का रिश्ता न था, 

नबी स. चाहते थे कि हजरत ज़ैद रज़ि. की शादी बीवी ज़ैनब बिन्ते जहश से हो जाए, जबकि बीवी ज़ैनब के वालिदैन बीवी ज़ैनब की शादी खुद नबी स. से कराना चाहते थे, 
पर आखीर मे नबी स. की ही बात मानकर बीवी ज़ैनब रज़ि. की शादी हज़रत ज़ैद रज़ि. के साथ कर दी गई ...

लेकिन ये शादी ज्यादा दिन तक टिक न सकी और हजरत ज़ैद ने बीवी ज़ैनब बिन्त जहश रज़ि. को तलाक दे दी 
क्योंकि ये शादी नबी स. के इसरार पर हुई थी इसलिए इस शादी के टूटने पर आप स. को बहुत रंज हुआ कि आप स. की वजह से बीवी ज़ैनब रज़ि. को इतनी तकलीफ पहुंची

इस्लाम इस बात को पूर्णतया निषिद्ध (हराम) ठहराता है कि कोई बाप अपने जैविक पुत्र द्वारा तलाक दी हुई औरत से शादी करे .... लेकिन कुरान मे इस बात को भी स्पष्ट कर दिया गया है कि “गोद लिए हुए बेटे तुम्हारे असली बेटे नही हैं ” [Al-Quran, 33:4] 
बीवी ज़ैनब रज़ि. का दुख दूर करने के लिए और अल्लाह के हुक्म पर बीवी ज़ैनब की शादी आप स. के साथ कर दी गई, ताकि आने वाली नस्ल ये जान जाएं कि इस प्रकार की शादी इस्लाम मे वैध है [देखें  Quran, 33:37] 

अस्ल मे इस्लाम हमें मुंहबोले रिश्तों के साथ खून के रिश्तों जैसा सुलूक करने से रोकता है, क्योंकि खून के रिश्तों मे तो प्रेम और मर्यादा अल्लाह पैदा करता है, जबकि मुंहबोले रिश्तों मे  मर्यादा बनाने का प्रयास इनसान करता है , और इनसानी प्रयास मे असफलता की दर ज्यादा होती है, क्योंकि कृत्रिमता मे प्राकृतिकता वाला गुण बडे प्रयास से ही आ सकता है, वो भी शत प्रतिशत नहीं ...  या बहुत बार व्यक्ति मुंहबोले रिश्ते बनाकर मर्यादा का केवल दिखावा करता है और दिल मे कपट छिपाकर बैठा होता  है, इसलिए मुंहबोले रिश्तों मे अमर्यादित व्यवहार बहुत ज्यादा होते हम देखते हैं, जबकि खून के रिश्तों मे न के बराबर ...!! 

हम अपने आसपास अक्सर देखते ही हैं कि वो युवा लड़का लड़की एक दूसरे के साथ घर से भाग जाते हैं, जो समाज की नजरों मे राखी भाई बहन थे .... अक्सर गुप्त प्रेमी प्रेमिका राखी के पवित्र बन्धन का इस्तेमाल अपने बेखौफ मेलजोल के बनाए रखने के लिए करते हैं , हमारा समाज उनको भाई बहन मानकर घुलने मिलने का पूरा मौका देता है जिसका नतीजा ये निकलता है  . इस्लाम यही मौके नहीं देता मुंहबोले रिश्तों को ।

मुंहबोले रिश्तों के साथ जब खून के रिश्तों सा सुलूक न करने की सीमा बना दी गई  तो ये मुंहबोले शून्य साबित हुए, और इन रिश्तों के शून्य होने से इनके बीच शादी होने की सम्भावना खुद पैदा हो गई ।


~ ज़िया इम्तियाज़।
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जन्नत जहन्नुम का दीदार। भविष्य भूत की तरह दिखाना।

मेराज पर जन्नत जहन्नुम का दीदार।

एक सवाल आया है .... कि जबकि इस्लाम के हिसाब से जन्नत या दोज़ख इन्सान को कयामत के बाद मिलेगी तो फिर मेराज की रात मे आप सल्ल. की तमाम नबियों से मुलाकात कैसे हुई, और इस रात मे नबी सल्ल. ने दोज़ख मे औरतों को कैसे देख लिया ...??

दोस्तों,  जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ,  कि मेराज के वाकये के दो भाग हैं, 1. इसरा,  यानि जमीनी सफर,  और 2. मेराज यानि आसमानी सफर

मैं आपको ये भी बता चुका हूँ कि इसरा वल मेराज के सफर के बारे मे मुसलमानों मे दो किस्म के खयाल हैं, बड़ा तबका ये मानता है कि नबी सल्ल. मेराज पर जिस्म के साथ गए थे , जैसा कि अल्लाह के हुक्म से होना बिल्कुल मुश्किल नहीं है , वहीं कुछ मुस्लिमों का ये ख्याल भी है कि इस सफर पर नबी सल्ल. का जिस्म नही केवल आप सल्ल. की रूह गई थी, इनके इस ख्याल का आधार उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ि. का ये कौल है कि " मेराज का वाकया हुज़ूर सल्ल. की रूह के साथ ही पेश आया था और आप सल्ल. के जिस्म ने अपनी जगह नहीं छोड़ी थी " अम्मा आइशा रज़ि. के इस क़ौल को अल-ताबरी और इब्न कसीर जैसे विद्वानों ने अपनी तफ्सीरात मे नक्ल किया है..

साथ ही मै ये भी कह चुका हूँ कि मेरा अकीदा ये है कि इस सफर का जमीनी हिस्से वाला वाकया आप सल्ल. के जिस्म के साथ पेश आया था.

यहीं मैं कहना चाहता हूँ दो हिस्सों मे हुआ ये सफर  जिस्मानी और रूहानी दोनों ही तौर पर हुआ, यानि "इसरा" तो आप सल्ल. के जिस्म के साथ हुआ पर "मेराज" आप सल्ल. की रूह के साथ हुआ था .... क्योंकि कुरान शरीफ मे इसरा का जिक्र करते हुए अल्लाह साफतौर पर फरमाता है कि वो एक ही रात मे अपने बन्दे को खान-ए-काबा से मस्जिद ए अक्सा तक ले गया , यानि कुरान मे अल्लाह ने इसरा का ज़िक्र एक अस्ल जिस्मानी सफर के तौर पर किया .... फिर इसरा को ही अल्लाह ने कुरान और हदीस मे लोगों के सामने साबित भी किया है... और हमारा अकीदा है कि कुरान मे कोई बात, इस तरह से नही लिखी गई है जैसी हकीकत मे हुई ही न हो, इसलिये हमे पूरा विश्वास है कि इसरा के सफर पर आप सल्ल. जिस्मानी तौर पर गए थे ....

जहाँ तक इस सफर के दूसरे भाग यानि मेराज (ऊंचाई पर जाने) का ताल्लुक है, तो उसके बारे मे अल्लाह पाक ने कुरआन पाक सूरह बनी इसराईल की 60 वीं आयत मे खुद इसे एक "रुया" यानि एक अलौकिक दृश्य फरमाया है,  और इस रात के सिलसिले मे कुरान पाक मे कहीं ये नही लिखा कि अल्लाह ने नबी सल्ल को आसमानो की सैर कराई, न ही ये लिखा है कि अल्लाह.ने नबी सल्ल. को सातवें आसमान पर बुलाया, बल्कि पवित्र कुरान मे केवल इतना लिखा है कि "नबी सल्ल. ने सिदरतुल मुन्तहा (जन्नत के द्वार के निकट स्थित बेर का पेड़ ) के पास जिब्रील अ.स को देखा " 
अब क्योंकि अल्लाह अपने बन्दे को कहीं से भी कहीं का मन्ज़र रूहानी तौर पर दिखा सकता है, फिर अगर आप सल्ल. जिस्म के साथ आसमान पर गए होते, तो मक्का वालों के आगे सिर्फ येरोशलम तक के सफर को नही बल्कि आसमान के सफर को भी साबित करते ..

अब सवाल ये है कि कयामत से पहले कोई जन्नत मे नहीं जा सकता तो फिर आसमान पर तमाम नबियों से आप सल्ल. की मुलाकात कैसे हुई थी.... 
पहली बात तो ये समझिए कि आप सल्ल. से नबियों की मुलाकात जन्नत मे नहीं बल्कि आसमान पर हुई बताई गई है, और क्योंकि तब तमाम नबी बरज़ख के आलम मे थे सो यही ज़ाहिर होता है कि आप सल्ल. से तमाम नबियों की रूहों की मुलाकात हुई थी, इसलिए हज़रत आइशा रज़ि. के इसी कौल के हकीकत होने की पूरी गुन्जाइश है कि आप सल्ल. की भी सिर्फ रूह आसमान पर गई थी, जिस्म नही..

इसी तरह इस रात मे दोज़ख मे औरतों को बहुतायत से आप सल्ल. को दिखाया जाना भी एक अलौकिक दृश्य था, और औरतों के बड़ी संख्या मे दोज़ख मे होने वाली हदीस मे आगे ये लिखा है कि क्योंकि औरतें अपने पति के साथ अकारण ही नाशुक्रगुज़ारी करती हैं, इस कारण वो दोज़ख मे थीं ... इस हदीस मे ये बात केवल ये शिक्षा देने के लिए की गई है कि मरने से पहले ही स्त्रियाँ अपने दोज़ख मे जाने के एक सम्भावित कारण को जान लें और इस कारण , यानि नाशुक्री की आदत को त्यागकर अपना जन्नत मे जाना सुनिश्चित कर लें ....इस हदीस मे केवल इतना सिखाया गया है, और वास्तव मे उस समय तक कोई भी प्राणी जन्नत या दोज़ख मे नही गया था  ... 

वल्लाहु आलम !

~ ज़िया इम्तियाज़।

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भविष्य की घटना वर्तमान में दिखाना।


अक्सर हदीस साहित्य में हमें कुछ ऐसे ज़िक्र पढ़ने या सुनने को मिलते हैं जिनमे आप सल्ल० फ़रमाते हैं कि फलां शख़्स अपने किसी गुनाह की वजह से मरने के बाद दोज़ख में डाल दिया गया, या फलां शख़्स को उसके किसी नेक काम की वजह से मरने के बाद जन्नत मिली, .... एक सवाल इन किस्सों को पढ़कर सहज उठता है, और हमारे कुछ गैरमुस्लिम दोस्त भी ये सवाल यदाकदा उठाते हैं कि, इस्लामी यक़ीन तो ये है कि मरने के बाद दुनिया की शुरुआत से लेकर अब तक सारे इंसानों की रूहें "बरज़ख़" के आयाम में हैं न कि दोज़ख़ या जन्नत में, इनके दोज़ख या जन्नत में डाले जाने का फ़ैसला कयामत यानी दुनिया पर जीवन विनष्ट करने के बाद हश्र के मैदान में  अल्लाह द्वारा किया जाएगा, उसके बाद ही किसी व्यक्ति की रूह जन्नत या दोज़ख़ में जा सकती है, .... तो फिर नबी सल्ल० का लोगों को जन्नत या दोज़ख में पहले से भेजा जाना बताना, इस्लामी विश्वास से विरोधाभासी, या गलत बात नही हो गई ??? 
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जवाब: बात सही है कि अभी तक कोई व्यक्ति जन्नत या दोज़ख़ नही गया बल्कि ये सब फैसले हश्र के रोज़ होंगे... इसके बावजूद ऐसा वर्णन कई हदीसों में है कि फलां व्यक्ति दोज़ख़ गया या जन्नत भेजा गया दरअसल ये वर्णन ऐसे व्यक्तियों के बारे में है जो व्यक्ति हज़रत मुहम्मद सल्ल० के आगमन से पूर्व ही भले या बुरे कर्म कर के मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे, और इनके कर्मों के आधार पर ईश्वर ने इनके लिए जन्नत या दोज़ख़ नियत कर दी है और इनके लिए केवल हश्र के समय तक का इंतज़ार बाक़ी है ... आने वाली नसलों को इन लोगों द्वारा किये गए कर्मों के आधार पर कोई शिक्षा देने के लिए इनकी कथाओं को ईश्वरीय अभिप्रेरण से नबी सल्ल० को बता दिया जाता था, और वास्तव में जहाँ नबी सल्ल० ये कहते हैं कि वो व्यक्ति जन्नत में या दोज़ख़ में गया तो वे भविष्य का वर्णन कर रहे होते हैं ... क्योंकि अल्लाह समय से परे के आयाम में स्थित है अतः वहाँ भविष्य की बात का वर्णन भी भूत की तरह किया जाता है, पर हम उसको इसी तरह समझेंगे कि वे लोग अभी दोज़ख़ या जन्नत, जो उनके लिये नियत कर दिया गया है उसमें जाने वाले हैं.. .!!!


~ ज़िया इम्तियाज़।
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बच्चे गोद लेना, अपंग बच्चे।

बच्चे गोद लेना।


एक भाई ने प्रश्न किया ... किसी देश में अगर किसी दयालू मुसलमान को एक छोटा न बोल सकने वाला बच्चा कचरे में फेंका लावारिस मिलता है, पुलिस को सूचना दे कर उसके असली बाप का पता न चलने पर, कानूनी रूप से मुसलमान दयालू व्यक्ति उस न बोल सकने वाले बच्चे को गोद ले लेते हैं, चार साल बाद उस बच्चे का नाम मदरसे में लिखाने जाते है तो बाप की जगह अपना नाम लिखा देते है %सवाल% दयालू मुसलमान भाई ने शरीयत के अनुसार क्या अपराध किया ? शरीयत के अनुसार इसकी सजा क्या है ? (बच्चा जब मिला था तो 6 महीने का था )

उत्तर :- कुरआन कहता है कि गोद लिए हुए बच्चों को अपना बेटा नहीं, उनके बाप का बेटा कहो..... इस कारण भाई को ये भ्रम हो गया कि इस्लाम मे बच्चा गोद लेना पाप है 

लेकिन भाई का भ्रम निर्मूल है, इस्लाम के अनुसार बच्चा गोद लेना कोई पाप नहीं, बल्कि ये तो इस्लाम मे बहुत बड़ा पुण्य का कार्य है कि किसी अनाथ बच्चे को पूरे वात्सल्य और प्यार दुलार से पाल पोस कर बड़ा किया जाए और आत्मनिर्भर बनाया जाए .... इस विषय मे कुरान की अनेक आयतें और अनेक अहादीस मौजूद हैं, जो मुस्लिमों को अनाथ बच्चों का पूरे न्याय और प्रेम से पालन पोषण करने के दिशा निर्देश देती हैं । 

निसन्देह कुरान मे गोद लिए हुए पुत्रों को अपना नहीं बल्कि उनके पिता का नाम (जबकि उनके जैविक पिता का नाम मालूम हो ) देने का आदेश दिया गया है, ये इसका सबसे प्रमुख कारण तो ये है कि बड़ी उम्र मे गोद लिया गया गैर रक्त सम्बन्धी युवा लड़का गोद लेने वाली स्त्री के लिए नामहरम है, अत: स्त्री उस लड़के से पर्दा रखे, तथा उस लड़के की पत्नी से लड़के को गोद लेने वाला पिता भी पर्दा रखे, पर्दे के मामले मे ये लोग उतने उन्मुक्त न हों जितने उन्मुक्त रक्त सम्बन्ध मे हो सकते हैं, ताकि मर्यादा बनी रहे ॥
... दूसरा कारण गोद लिये बालक को उसके जैविक पिता का नाम देने के पीछे ये था कि बालक को अपनी वास्तविक पैतृक सम्पत्ति प्राप्त करने मे, पिता का नाम बदला हुआ होने की वजह से कोई अड़चन न आए...॥

अब भाई के प्रश्न की ओर लौटते हैं, यहाँ एक तो बालक छह महीने का है, अत: पालक माता बच्चे को अपना दूध पिलाकर उससे दुग्धजात सम्बन्ध स्थापित कर सकती है, जिसे इस्लाम मे सगे मां पुत्र के सम्बन्ध के बराबर प्रगाढ़ सम्बन्ध की मान्यता है, इसलिए इस रिश्ते मे अनावश्यक पर्दे की बाध्यता न होगी ।

दूसरे, बालक के जैविक पिता का नाम मालूम नहीं तो पालक पिता, स्कूल वगैरह मे अभिभावक की जगह अपना नाम बेखटक लिखवा सकता है, इस बालक को पूरे अपनत्व से पालकर किसी लायक बना सकता है, व अपनी जायदाद के 33 प्रतिशत भाग का उसे वारिस भी बना सकता है ...
... इस्लाम के अनुसार ऐसा मुस्लिम बहुत बड़े पुण्य का ही भागी होगा, न कि दण्ड का, जैसा कि भाई को भ्रम हो गया था ॥


~ ज़िया इम्तियाज़।
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अपंग बच्चे क्यों।

जैसा कि मैंने बताया था कि आजकल मैं क़ुरआन में इस ताल्लुक़ से पढ़ रहा हूं कि बेगुनाह इन्सान के आगे दुनिया में बहुत सी तकलीफें क्यों आ जाती हैं ?? ..... इंसान इन मुसीबतों से अक़्सर हौसला हार जाया करता है, फ़िर ऐसी मुसीबतें इंसान को देने के पीछे अल्लाह की मस्लेहत क्या है, जिन मुसीबतों के पड़ने से कई लोग दुनिया के किसी रब के होने की बात से भरोसा खो देते हैं, कि अगर कोई ख़ुदा होता तो हम पर बेवजह इतना ज़ुल्म न करता... अक्सर हम आप जैसे साधारण लोग भी जब बेगुनाह लोगों या अबोध बच्चों की निर्मम हत्याओं के मामले देखते हैं तो "सब कुछ अल्लाह की मर्ज़ी से होता है" और "अल्लाह बहुत रहम वाला है" इन दोनों किस्म की बातों में उलझ से जाते हैं....कि अगर अल्लाह रहम वाला है तो इन बेगुनाह लोगों पर ज़ुल्म क्यों होता 
रहने दिया अल्लाह ने ???
अबोध बच्चों को बिना किसी कुसूर क्यों दुनिया में बड़ी पीड़ादायक स्थितियाँ झेलनी पड़ती हैं , अबोध उम्र में बिना कोई पाप पुण्य किये मर जाने वाले बच्चों का स्वर्ग और नरक के कांसेप्ट से कोई ताल्लुक कैसे हो सकता है ??? ऐसे कई सवाल हमें परेशान किया करते हैं !!
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देखिये दोस्तों, क़ुरआन से हम जानते हैं कि हमारी ये दुनियावी ज़िन्दगी एक इम्तिहान के सिवाय कुछ नहीं है, इस ज़िन्दगी में अल्लाह हमें सुख देकर भी आज़माता है और तकलीफ़ देकर भी.... हम ये बात जानते हैं, इसके बावजूद अपना या किसी और का दुःख देखकर हमें अगर अल्लाह के रहम या उसके वजूद पर शक़ होने लगे तो इसमें ज़रूर हमारे सोचने के गलत ढंग और हमारी लाइल्मी का क़ुसूर है,
.... सोचने का गलत ढंग ये है कि ये दुनिया हम इंसानों के इम्तिहान की जगह है, न कि अल्लाह के इम्तिहान की, 
...... दुनिया में कहीं कोई इंसान किसी पर ज़ुल्म न करे ऐसे हालात बनाने के लिए लगातार कोशिश करने की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने हम इंसानों को सौंपी है, ... लेकिन हम इंसान दुनिया में लड़ाई झगड़ों को उभरते हुए हाथ पर हाथ रखे बैठे देखते रहते हैं, और जब खून खराबा मचने लगता है तो अल्लाह पर सवाल उठाने लगते हैं...
.... इसी तरह हमारी लाइल्मी ये है कि हमको लगता है कि जो ज़िन्दगी हम जी रहे हैं उसमें हमारी कोई मर्ज़ी नही थी, बल्कि अल्लाह ने सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से हमें जैसी तकलीफों में डालना चाहा, डाल दिया है... लेकिन ऐसा नहीं है ... हक़ीक़त ये है कि दुनिया में पैदा होने वाले हर शख़्स ने अपनी ज़िंदगी के इम्तिहानों का चुनाव ख़ुद अपनी मर्ज़ी से अपनी पैदाइश से पहले अल्लाह के सामने किया था, ... ये जानकारी अगर लोग अपने ज़हन में बिठा लें कि हर तकलीफ़ सहने वाले इंसान ने अपने लिये खुद अल्लाह से ऐसी ज़िन्दगी मांगी थी, तो हमारे बहुत से वसवसे और वहम दूर हो जाएंगे....
..... कुरआन में कुछ आयतों पर गौर करें तो पूरा मामला समझ में आता है कि हमारी पैदाइश से पहले हमने क्या क्या मुआहिदे अपने ख़ुदा के साथ कर रखे हैं....
.... क़ुरआन से मालूम चलता है कि अल्लाह ने दुनिया में जन्म से पहले तमाम इंसानों और अपनी अन्य रचनाओं की भी आत्मा/अंतर्चेतना को इकठ्ठा किया, उन्हें जन्नत की नियामतें साकार दिखाईं, फिर उन्हें बताया कि इस जन्नत को पाने के लिए उन्हें दुनिया में जन्म लेना होगा और कुछ इम्तिहानों से गुज़रना होगा, फिर उन्हें दुनिया में तमाम तरीक़े की तकलीफ़ों और आजमाइशों के साकार दर्शन कराए, और बताया गया कि इन हालात में भी अगर तुम धैर्य और सत्यनिष्ठा पर कायम रहोगे भले काम करते हुए ज़िन्दगी गुज़ारोगे तो जन्नत के अधिकारी होगे, और इसके विपरीत अगर दुनिया में कामना के वशीभूत होकर बुराई का मार्ग पकड़ोगे, दूसरे इंसानों पर ज़ुल्म करने लगोगे, तो दोज़ख़ के भयंकर दण्ड पाओगे.... अल्लाह की अन्य रचनाएं तो इस कठिन इम्तिहान का ख़ाका देखकर पीछे हट गईं, पर इंसान ने सब देखने समझने के बाद ही दुनिया की जिंदगी में उतरने का फ़ैसला किया, 
..... सूरह अहज़ाब की 72वीं आयत में ज़िक्र है....
"हकीक़त में हमने यह अमानत आसमान और ज़मीन और पहाड़ों (वगैरह) के सामने पेश की तो उन्होंने उसे लेने से इनकार किया और वह डर गए, मगर इंसान ने उसे उठा लिया..."
... अमानत, यानी दुनियावी ज़िन्दगी लेने से अल्लाह की दूसरी तख़लीक़ात क्यों डर गईं ? बेशक़ उसमें दिखाए गए कठिन इम्तिहान का दुख, तकलीफ़ और आसानी से गुमराही की तरफ़ झुक जाने का ख़ाका देखकर...., उन्हें लगा कि वो इस इम्तिहान में सफल नहीं हो सकेंगे
लेकिन इंसान ने इस इम्तिहान का चैलेन्ज क़ुबूल कर लिया क्योंकि उसे लगा कि वो इस इम्तिहान को पार कर लेगा और जन्नत और उसकी बेशकीमत नियामतों का हक़दार बनेगा,
.... जब इतना हो चुका तो अल्लाह ने इंसान से दुनिया की ज़िंदगी में जाने से पहले कुछ वचन लिये, वचन लेने का अर्थ है इंसान की अंतर्चेतना में कुछ बातों को बैठा दिया, जो बातें दुनिया की ज़िंदगी में भी उसकी अंतर्चेतना में मौजूद रहीं, ये जिस घटना का ज़िक्र है, उसे इस्लामी विद्वान "अहद ए अलस्त" यानि सबसे पहली प्रतिज्ञा के नाम से जानते हैं, .... 
सूरह आराफ़ की आयत 171-172 में ज़िक्र है.....
... "याद करो, जब तुम्हारे रब ने आदम की पुश्त से उनकी सन्तति को निकाला और उन्हें खुद पर गवाह बनाया, कि क्या मैं तुम्हारा रब नही हूं ? बोले "क्यों नहीं, हम गवाह हैं कि तू ही हमारा रब है" ऐसा इसलिये किया ताकि कयामत के रोज़ तुम ये न कहने लगो कि ऐ रब हमें तो दुनिया में पता ही नही था (कि हमारा कोई ख़ुदा भी है), या ये कहो कि शिर्क को हमारे बाप दादा ने किया था (हम तो बस उनके दीन पर चलते थे) क्या तू हमें उसपर दण्ड देगा जो कुछ उन्होंने किया" 
..... यानी अल्लाह ने तमाम इंसानों के दुनिया में जन्म से पहले उनकी अंतर्चेतना में ईश्वर पर विश्वास की बात बिठा दी थी, दुनिया में इस विश्वास को झुटलाने के मौके आएंगे ये बताते हुए उन्हें तर्क से सही बात का फ़ैसला करने की अक़्ल भी दी थी, .... इसी तरह सूरह आले इमरान की 81वीं आयत में ज़िक्र है कि अल्लाह ने इसी समय इंसानों की अंतर्चेतना में ये बात भी बैठाई थी कि उन्हें दुनिया में बुराई के मार्ग से बचना चाहिए और नेकी के मार्ग पर चलना चाहिए और जब कोई रसूल उनके पास नेकी का मार्गदर्शन लेकर आए तो उसकी बातें माननी चाहिये... आयत के शुरुवाती अलफ़ाज़ हैं "और याद करो जब अल्लाह ने नबियों के बारे में तुमसे वचन लिया था..."
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.... तो हम ये भी देखते हैं कि दुनिया में ज़्यादातर इंसानी आबादी शांति, भाईचारे और मुहब्बत के माहौल को पसंद करती है, .... अंदरूनी तौर पर हर इंसान ऐसा ही होता है कि उसको दूसरे के साथ भला सुलूक करने से ख़ुशी मिलती है, ये बाहरी परिस्थितियां होती हैं जिनकी वजह से कुछ लोग बुराई और ज़ालिमाना आदतें अपना लेते हैं, ..... बहरहाल स्वाभाविक तौर पर अच्छाई की तरफ़ झुकाव इंसान की प्रकृति/फ़ितरत में होना दरअसल उसी "अहद ए अलस्त" की निशानी हैं, जब इंसान ने दुनिया में जाने से पहले अपने रब से ये अहद किया था कि वो नेकी और अच्छाई के रास्ते पर चलेगा ताकि वो अपने इम्तिहान में कामयाब हो सके !!
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इसके बाद हदीस लिटरेचर से हमें ये भी पता चलता है कि अबोध बच्चों की मौत होने पर वो जन्नत में जाते हैं, इसी तरह बेगुनाह इंसान को अगर दुनिया में कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो अल्लाह के यहाँ उस इंसान की नेकियों की तादाद भी बढ़ा दी जाती है.... यानी नवजात या अबोध उम्र में मौत या ज़िन्दगी की तकलीफें भी अपनी पैदाइश से पहले लोगों ने दुनिया की ज़िंदगी को "माया" जानते हुए मांगी थी ताकि उनका जन्नत में जाना पक्का हो जाए, ....
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लेकिन जब अपनी ज़िन्दगी में खुद तकलीफें मांगने वाले ये लोग "मायालोक" में पहुँचे तो माया को ही सच मानने लगे, और रोने तड़पने लगे... अपने फ़राइज़ उन्हें ऐसे मौके पर याद न रहे और वो अल्लाह की ज़ात से ही बदगुमान होने लगे.... बेशक़ ऐसे ही लोगों के लिए क़ुरआन में हिदायत है, बस ज़रूरत इसमें गौर और फ़िक्र करने की है !!!

दोस्तों, याद रखिये दुनिया की मुसीबतों में आप खुद अपनी मर्ज़ी से पड़े हैं, अपनी मुसीबतों के लिये अल्लाह को दोषी न ठहराईये .... बल्कि मुसीबतों के वक्त अल्लाह से बेतरह अपनी आज़माइश में आसानी की दुआ कीजिये... अपने ईमान की पुख्तगी का इस वक्त ज़्यादा ख्याल रखिये .... क्योंकि असल इम्तिहान आपके ईमान की पुख्तगी का ही है, आपके नेकी और ईमानदारी पर डंटे रहने का ही है, आप इस इम्तिहान में अल्लाह के अहकाम पर चल लीजिये, थोड़े वक्त बाद अल्लाह की रहमत आपको अपनी पनाह में यकीनन लेने ही वाली है, इस बात का यकीन रखिये.... क्योंकि क़ुरान हमें बताता है, कि "अल्लाह किसी जीव पर बस उसकी सामर्थ्य और समाई के अनुसार ही दायित्व का भार डालता है।" (2:286) ... यानी हमारा रब्ब किसी भी इंसान की ताकत से ज़्यादा उसपर बोझ नही डालता, कि उस तकलीफ को सहा ही न जा सके, बल्कि अल्लाह बस इतना बोझ डालता है कि जानदार उसे सह भी ले और उसकी परख, परीक्षा भी हो जाए ... तो मुसीबतों से इस ज़िन्दगी में भी निजात यकीनी है, ये यकीन रखिये...!!!

~ ज़िया इम्तियाज़।

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बनू क़ुरैज़ा, बनू मुस्तालिक।

बनू क़ुरैज़ा क़बीला।

बनू कुरैज़ा एक यहूदी कबीला था जिसने मुसलमानों के साथ ये सन्धि की थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे काफिरों की सहायता नही करेंगे, बल्कि मदीना की हिफाज़त मे मुस्लिमों का साथ देंगे लेकिन अस्ल मे उन यहूदियों के दिलों मे मुस्लिमों से नफरत और दुश्मनी भरी थी, और सन्धि उन्होंने केवल दिखावे के लिए की थी ताकि ये यहूदी खुद तो अन्दर ही अन्दर मुस्लिमों की जड़ें काटते रहें, पर मुस्लिम इन साज़िशों से अनजान रहें और इन यहूदियों के विरुद्ध कोई कदम न उठा पाएँ. अपनी इसी छिपी रणनीति के तहत ये बनू कुरैज़ा के यहूदी मुस्लिमों के दुश्मनों की मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे चुपके चुपके मदद करते रहते थे, पहले बद्र की लड़ाई मे मुस्लिमों पर हमला करने वाले कुरैश की मदद बनू कुरैज़ा वालों ने हथियारों से की थी, जिसका पता भी प्यारे नबी सल्ल. को लगा, मगर उस वक्त रहमतुल्लिल आलमीन सल्ल. ने बनू कुरैज़ा का ये कसूर माफ कर दिया

फिर अहज़ाब की लड़ाई के वक्त ये यहूदी खुलकर सामने आ  गए और इन यहूदियों ने खुद जा जाकर मुसलमानों के दुश्मनों को लड़ाई के लिए उकसाया , और उनको मुस्लिमों के विरुद्ध पूरी मदद देने के वायदे किए, ताकि तमाम मुसलमानों का इसी लड़ाई मे खात्मा हो जाए। अहज़ाब की लड़ाई मे बनू कुरैज़ा की इस गद्दारी की वजह से बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इसलिए अहज़ाब की लड़ाई खत्म हो जाने के बाद बनू कुरैज़ा का घेराव किया गया, इन यहूदियों को सज़ा देना जरूरी था, वरना अगर मुस्लिम इन यहूदियों को सबक न सिखाते तो ये यहूदी हमेशा काफिरों को उकसा कर मुसलमानों पर हमले करवाते रहते, मुस्लिमों को खत्म करवाते रहते। जब इन यहूदियों ने खुद को मुसलमानों की पकड़ मे पाया तो मुसलमानों के सामने ये मांग रखी कि "हज़रत साद बिन मुआज़ को हमारे (बनु कुरैज़ा) के मामले मे मुंसिफ (सरपंच) बना दिया जाए ,और जो फैसला साद बिन मुआज़ करें वो हमें भी मन्ज़ूर होगा, और उस फैसले को नबी सल्ल. भी मान लें ! "

आप सल्ल. ने यहूदियों की ये मांग मान ली, शायद यहूदियों की नज़दीकी हज़रत साद बिन मुआज़ से थी जिस वजह से बनू कुरैज़ा को फैसले मे हज़रत साद से यहूदियों की तरफदारी की उम्मीद थी ... मगर ज़रूरी तहकीकात के बाद हज़रत साद ने ये फैसला दिया कि मुसलमानों से युद्ध करने वाले बनू कुरैज़ा के वाले मर्दों को सज़ा ए मौत दी जाए, जबकि उनके साथ की औरतों और बच्चों को गुलाम बनाया जाए। ये बात ध्यान मे रखनी चाहिए खुद उन यहूदियों के चुने हुए न्यायाधीश ने उन यहूदियों के ही कानून के मुताबिक उन्हें सज़ा दी थी जिस तरह वो यहूदी अपने दुश्मनों को सज़ा देते थे ... इस तरह की सज़ा यहूदी और ईसाईयों द्वारा अपने दुश्मनों को देने का हुक्म आज भी बाइबल के लेविटिकस, अध्याय 20, आयत 10 मे आप देख सकते हैं. सो अगर सज़ा सख्त थी तो इसके लिए इस्लाम को दोष नहीं दिया जा सकता, यदि दोष ही दिया जाए तो वह यहूदियों के अपने कानून को जाएगा।

और क्योंकि बनू कुरैज़ा का फैसला उन यहूदियों की ही मांग पर नबी सल्ल. ने नही किया था, इसलिए बनू कुरैज़ा को मिली सख्त सजा का दोष नबी सल्ल. को नही दिया जा सकता बल्कि नबी सल्ल. से नफरत या दुश्मनी के चलते बनू कुरैज़ा वालों ने नबी सल्ल. से अपना फैसला न करवाकर, और नबी सल्ल. से साद बिन मुआज़ का फैसला मानने का वादा लेकर अपना ही नुकसान कर लिया, वरना हमें पूरा यकीन है कि अगर बनू कुरैज़ा वालों ने अपना फैसला नबी सल्ल. पर छोड़ा होता तो उन यहूदियों को आप सल्ल. मौत की सज़ा तो न ही सुनाते , जैसे आप सल्ल. ने पहले भी ऐसे ही अपराधों पर बनू केनुक़ाअ और बनी नज़ीर जैसे कबीलों को मौत की सजा न दी थी। फिर भी आप सल्ल. ने मुसलमानों के खून के प्यासे इन बनू कुरैज़ा मे से भी कुछ की सज़ा माफ करवा दी थी, जैसे ज़ुबैर यहूदी और रिफ़ाआ बिन शमूईल यहूदी दोनों की जां बख्शी फरमा दी थी (तारीखे तबरी)। याद रखिए गुलाम बनाने या कत्ल करने की सजा उन्हीं स्त्री पुरुष और बच्चों को दी गई थी जो लोग युद्ध मे मुस्लिमों के विरुद्ध शामिल थे, और मुस्लिमों की हत्याओं के दोषी थे। और एक बात और याद रखनी चाहिए कि मुस्लिमों द्वारा गुलाम बनाए गए लोगों का कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेशों के कारण, कभी किसी तरह से शोषण नहीं किया जाता था, जैसा गम्भीर शोषण गैरमुस्लिम अपने युद्धबंदियों के साथ उन्हें गुलाम बनाकर करते थे ॥

अब फैसला कीजिए कि कहां मुसलमानों को मिटा डालने के लिए लगातार मुसलमानों पर जानलेवा हमले करवाने वाले, और खुद मुसलमानों के कत्ल करने को लड़ने वाले यहूदियों के सिर्फ मर्दों को मौत की सज़ा देने वाले, और उसमें से भी कुछ यहूदियों की जान बख्श देने वाले नबी सल्ल०, और कहाँ कर्बला में निर्दोष निहत्थे और मासूम बच्चों तक का खून बहाने वाले ? कोई तुलना इन दोनों के बीच नही की जा सकती

~ ज़िया इम्तियाज़।
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बनू मुस्तालिक क़बीला।


हमारे एक भाई ने हमसे प्रश्न किया है कि मुस्लिमों ने बनु मुस्तलिक़ पर आक्रमण क्यों किया था....
... उत्तर देने से पहले पाठको को पूरा प्रश्न सही से समझाने के लिए मैं ताबिश सिद्दीक़ी भाई की एक पुरानी पोस्ट का अंश डाल देता हूँ, फिर उत्तर देता हूँ...
... ताबिश भाई ने लिखा था "सहीह बुखारी: किताब 46 हदीस नंबर 717: इब्ने-औन बताते हैं कि... “मैंने नफ़ी को एक ख़त लिखा और नफ़ी ने मेरे ख़त के जवाब में मुझे बताया कि “पैग़म्बर मुहम्मद ने बनू मुस्तलिक़ (एक कबीला) पर बिना किसी चेतावनी के उस समय अचानक से हमला किया था जब वो लोग एक जल स्रोत के पास थे और बेपरवाह हो कर अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे.. बनू मुस्तलिक़ की ओर से लड़ने वाले आदमियों को हमने मार डाला और उनकी औरतों और बच्चों को बंदी बना लिया.. नफ़ी ने आगे लिखा कि पैगम्बर को जुवैरियह (जो बाद में उनकी पत्नी बनी) इसी कबीले से मिली थी (बंदी के रूप में).. नफ़ी ने लिखा कि इब्ने उमर ने बातें उन्हें बताई क्यूंकि इब्ने उमर ख़ुद पैगम्बर की तरफ़ से उनकी सेना में थे”
उपरोक्त बुख़ारी हदीस को मैं आगे एक्सप्लेन कर के आपको बताना चाहूँगा कि.. बनू मुस्तलिक़ क़बीले पर हमला, पैगम्बर मुहम्मद और उनकी सेना द्वारा सन 627 में किया गया था.. यानि पैगम्बर के मक्का से मदीना जाने के पांच साल बाद.. पैगम्बर को ये ख़बर मिली थी कि ये लोग मुसलमानों के ख़िलाफ़ गुट बना रहे हैं और उन्होंने अपनी सेना के साथ इन पर पहले ही हमला कर दिया.. पैगम्बर द्वारा दो सौ से अधिक परिवारों को इसमें बंदी बनाया गया था.. दो सौ ऊंट, पांच हज़ार भेड़, बकरियों और बहुत बड़ी तादात में सामान माल-ए-ग़नीमत (लूट का इनाम) के रूप में लिया गया था.. और फिर उन सामानों की बहुत ऊँचे दामों पर नीलामी की गयी थी"
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चलिये जी अब उत्तर देते हैं....
.... बनु मुस्तलिक़ अरब में लाल सागर के समीप क़दीद के क्षेत्र में रहने वाला एक यहूदी कबीला था, ये मक्का के मूर्तिपूजकों के मित्र थे और मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध में बढ़चढ़कर मूर्तिपूजकों की सहायता किया करते थे
उहद के युद्ध में भी बनु मुस्तलिक़ ने मूर्तिपूजकों का साथ दिया जिस युद्ध में मुसलमानों को जानमाल की बहुत हानि हुई थी,
फिर 5 हिजरी में मुसलमानों को ये सूचना मिली कि बनु मुस्तलिक़ भारी मात्रा में एकत्र हो कर मुस्लिमों पर चढ़ाई करने आ रहे हैं, ये लड़ाकों, हथियारों और युद्ध में सहायक जानवरों की बड़ी भारी मात्रा लेकर आ रहे थे, स्पष्ट है हथियारों और लड़ाकों की इतनी बड़ी मात्रा के साथ जब मुसलमानों पर हमला किया जाता तो जानमाल का काफी नुकसान होता, इसलिए मुसलमानों के पास आत्मरक्षा में युद्ध करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था
... उपरोक्त ताबिश भाई वाला वर्णन पढ़कर सहज ये भ्रम हो सकता है कि बनु मुस्तलिक़ के लोग अपने शहर, अपने घरों में बैठे थे जब मुस्लिमों ने उनपर अचानक हमला कर दिया, .... पर सच्चाई ये नही है, बनू मुस्तलिक़ अपने घरों में नही बैठे थे, बल्कि वो मुसलमानों पर हमला करने के लिए फौज और हथियार लेकर अपनी बस्ती क़दीद से बहुत दूर मदीना की ओर "अल मुरैसी" नामक एक जल स्रोत पर पहुँचकर पड़ाव डाल चुके थे जब मदीना से निकलकर मुसलमान इन तक पहुँचे (अल तबरी, वॉल्यूम-8, पृष्ठ -51)
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बनु मुस्तलिक़ का चित्रण एक मज़लूम की तरह करने वालों को इस बात पर विचार करना चहिये कि जब वो फौज और हथियार लेकर पहले से मुसलमानों पर हमला करने के लिए निकल चुके और मार्ग में थे तो मुस्लिम क्या मदीना में ख़ामोश बैठकर खुद के मारे जाने की प्रतीक्षा करते, या अपनी जान बचाकर और कहीं भाग जाते जबकि जान बचाकर भागने पर यदि मुसलमानों की जान छोड़ दी जाती, तो मक्का से मुसलमान अपनी जान की सुरक्षा के लिए ही मदीना गए थे, लेकिन शत्रुओं ने मुस्लिमों के समूल नाश के प्रयास नही छोड़े...
.... मुसलमानों द्वारा अचानक से बनु मुस्तलिक़ की फौज पर हमला भी भारी रक्तपात से बचने के उद्देश्य से मुसलमानों ने किया, अगर बनु मुस्तलिक़ के लोग सजग होते तो निश्चित ही दोनों ओर के सैंकड़ों लोग मारे जाते, पर मुस्लिमों ने बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेते हुए छापेमार ढंग से उन आक्रमणकारियों को जा दबोचा, यहूदियों ने सम्हलते हुए मुकाबले की कोशिश की इसमे जो झड़प हुई उसमें एक मुस्लिम और दस यहूदियों की जान गई, जो निश्चित ही यहूदियों द्वारा नियोजित भारी रक्तपात के मुकाबले कुछ नहीं था
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मुसलमानों को मारने के उद्देश्य से जो शक्ति यहूदी युद्धक्षेत्र में लाये थे उन्हीं चीज़ों को माल ए गनीमत के रूप में मुसलमानों द्वारा बांट लेने की बात आपने ताबिश भाई के शब्दों में ऊपर पढ़ी,
...ये वे सारे जानवर और हथियार व स्त्री पुरुष थे जो मुसलमानों को मारने के उद्देश्य से युद्ध के मैदान में लाये गए थे उन्हें मुस्लिमों ने बांट लिया और व्यक्तियों को बंदी बना लिया.... इसे लूट का माल नही कहा जाएगा क्योंकि यहूदी ये सब कुछ मुस्लिमों के लिए ही तो तैयार कर के लाये थे कि अगर मुसलमानों की हत्या करते समय में इनमें से बहुत से लोग मर भी जाएं तो चिंता नहीं... तो जब खुद वो ये फौज, हथियार और जानवर मुस्लिमों के लिये होम करने को तैयार थे, तो जब मुसलमानों ने उन इंसानों, जानवरों और हथियारों को नुकसान पहुचाएं बिना अपने पास रख लिया तो आपत्ति नहीं होनी चाहिए, ये उस समय का कानून था कि युद्ध जीतने लोग हारने वालों को गुलाम बना लेंगे और उनकी बस्तियां तबाह कर देंगे, और हथियार व अन्य उपयोगी सामान आपस में बांट लेंगे लेकिन नबी सल्ल० ने बस्तियों को तबाह करने और युद्धक्षेत्र में न लाये लोगों को पूरी सुरक्षा देने का कानून बनाया.... युद्धक्षेत्र में लड़ने आये लोगों को मुस्लिमों ने युद्धबंदी बनाया, पर उनके साथ भी दुर्व्यवहार नही किया जिस प्रकार काफ़िर अपने युद्धबन्दियों को भयंकर शारीरिक प्रताड़नाएं दिया करते व स्त्रियों के बलात्कार किया करते थे....
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.. यदि आप को कहीं कुछ पढ़कर ये सन्देह हो कि मुस्लिम लोग युद्ध में बन्दी बनाई गई स्त्रियों के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाते थे, तो मैं विश्वास दिलाता हूं ये झूट है, इस विषय में मैने एक लेख लिख रखा है उसका लिंक मैं आपको दे दूंगा...
... पर युद्ध में बन्दी बनाई गई स्त्रियों से मुस्लिम कैसा व्यवहार करते थे इसका अनुमान इस युद्ध में बन्दी बनीं जुवैरिया बिन्त हारिस रज़ि० के वृत्तांत से भी आप लगा सकते हैं, इनके पति इसी युद्ध में मारे गए थे और ये विधवा हो गई थीं, इन्हें दासी के रूप में एक सहाबी हज़रत साबित बिन क़ैस रज़ि० को दिया गया था, पर हज़रत जुवैरिया रज़ि० ऐश्वर्य में पली बढ़ी थीं उन्हें घरेलू नौकरानी के तौर पर काम करने में असुविधा होने लगी और वे फ़रियाद लेकर नबी सल्ल० के पास गईं नबी सल्ल० ने उनकी विपदा सुनकर उनकी आज़ादी की क़ीमत चुका दी,  फिर आप सल्ल० ने हज़रत जुवैरिया रज़ि० को विवाह का प्रस्ताव दिया जिसे स्वीकार करके हज़रत जुवैरिया रज़ि० ने नबी सल्ल० से विवाह कर लिया व मुसलमानों के मध्य सबसे ज्यादा सम्माननीय महिलाओं में से एक बन गई थीं इसके साथ ही उनके पिता और बनु मुस्तलिक़ के अन्य कई बंधकों को भी मुस्लिमों ने आज़ाद कर दिया, बाद में इन लोगों ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया ...(अबू दाऊद, किताब-30, हदीस-3920) 
क्या इस उदाहरण को देखकर आप यह सोच भी सकते हैं कि मुसलमानों ने युद्धबन्दी पुरुषों के साथ किसी तरह का ज़ुल्म किया या  युद्धबन्दी स्त्रियों या दासियों के साथ कोई अशोभनीय व्यवहार किया होगा ???

~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या क़ुरान युध्द, कत्ल, हुक़ूमत का आदेश देता है।

क्या क़ुरान युद्ध की शिक्षा देता है।

बहुत से लोग कुरान की आयतों मे युद्ध की शिक्षाओं को दुनियाभर मे फैले "इस्लामी आतंकवाद" का कारण बताते हुए सीधे इस्लाम के अस्तित्व पर ही प्रहार करते हैं

इन सब लोगों से मेरा इतना ही कहना है कि इस्लाम मे तो युद्ध के बारे मे मुस्लिमों को सही और गलत की स्पष्ट शिक्षाएं देकर किसी पर हिंसा और अन्याय करना, समर्पित मुस्लिमों के लिए हराम, पूर्णतया निषेध ठहरा दिया है । 

और ऐसा तो नहीं हुआ कि जिन धर्मों मे युद्ध के विषय मे स्पष्ट शिक्षा नहीं थीं उसके अनुयायी युद्ध नहीं करते,..
वो भी बहुत क्रूरता के साथ युद्ध करते हैं, वो भी धर्म के नाम पर खून की नदियाँ बहाते हैं
अन्य "शान्ति के प्रतीक" धर्मों ने युद्ध के बारे मे स्पष्ट शिक्षाएं नहीं दीं, इसलिए इन सब धर्मों के लोग बिना ईश्वर के डर, बिना अपने धर्म के जाने के किसी डर,  भयंकर मारकाट मचाया करते हैं, उसका क्या ???

ठीक है युद्ध की शिक्षाएं पवित्र कुरान मे हैं, पर उन सबसे ऊपर, और सबसे पहले ये दो शिक्षाएं हैं कुरान की
जैसे पवित्र कुरान की सूरत मायदा मे [5:32] पर ये तालीम है, कि एक भी निरपराध व्यक्ति की हत्या करना सारी मानवजाति की हत्या करने के बराबर जघन्य अपराध है जिसका दण्ड भी अपराध की गम्भीरता के समान ही गम्भीर होग,

फिर पवित्र कुरान मे कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मुस्लिमों को युद्ध की इजाजत तभी है जब मुश्रिक मुस्लिमों पर आक्रमण करें ...
‘‘जिन मुसलमानों से (खामखाह) लड़ार्इ की जाती है, उनको इजाजत हैं (कि वे भी लड़े), क्योकि उन पर जुल्म हो रहा हैं और खुदा (उन की मदद करेगा, वह) यकीनन उनकी मदद पर कुदरत रखता है।’’ (कुरआन, सूरा-22, आयत-39)

‘‘और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी खुदा की राह मे उनसे लड़ो, मगर ज्यादती (अत्याचार) न करना कि खुदा ज्यादती करनेवालो को दोस्त नही रखता।’’(कुरआन, सूरा-2, आयत-190)

इतने स्पष्ट नियमों के बाद जो व्यक्ति जन्मजात मुस्लिम होते हुएभी कुरान की इन आज्ञाओं की अवहेलना करे तो वह तो खुला काफिर और शरीयत के अनुसार सजा ए मौत का अधिकारी और नरकगामी हो गया

अत: इस्लाम के नियम तो स्पष्ट हैं, पर मेरा सवाल विश्व के अन्य सभी धर्मों से है ..ईसाईयत क्या कहती है अमेरिका द्वारा इराक़ मे की गई करोड़ों हत्याओं पर, हिन्दूइज़्म क्या कहता है गुजरात मे हजारों निर्दोष लोगों की जघन्य हत्याओं पर, यहूदियत क्या कहती है इजरायल द्वारा अनगिनत फलिस्तीनियों की हत्या पर, बुद्धिज़्म क्या कहता है म्यांमार मे रोहिंग्य मुस्लिमों की नस्लकुशी पर ???

क्या इन सब ईसााईयों, हिन्दुओं, यहूदियों, बौद्धों का धर्म गया ? या नहीं ?? कृपया धर्म ग्रंथों से सिद्ध कीजिए ।

~ ज़िया इम्तियाज़।

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क्या क़ुरान क़त्ल का हुक़ूम देता है।

आजकल कथित Isis द्वारा अमेरिकी स्वतंत्र पत्रकारों की नृसंश हत्याओं की वीडियो जारी करने के गैर इस्लामी कृत्य का बड़ा मीडिया प्रसार हो रहा है,
ईश्वर ही जानता है ये वीडियो फेक हैं, या वास्तव मे उन वीडियोज़ मे किन्हीं निहत्थे, निर्दोष व्यक्तियों के कत्ल किए गए हैं ....... 

परंतु एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, कि वीडियो मे जिस व्यक्ति को Isis का इस्लामी आतंकी सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है, वास्तव मे वो व्यक्ति मुस्लिम है ही नहीं ..... क्योंकि इस्लाम मुसलमानों को कभी बेगुनाह का कत्ल करने की इजाज़त नहीं देता,  कुरान मे ईश्वर का स्पष्ट आदेश है :-

"यदि कोई व्यक्ति किसी हत्यारे को दण्ड देने, या धरती मे फसाद फैलाने के दोषी के अतिरिक्त किसी की हत्या कर देता है , तो ये ऐसा (गम्भीर अपराध) है, जैसे उसने सम्पूर्ण मनावता की हत्या कर दी हो ।और यदि किसी व्यक्ति ने किसी निर्दोष की जान बचा ली, तो जैसे सारी मानवता के प्राणों  को बचा लिया" 
[अल कुरान, 5:32 ]

अगर कोई हम पर जुल्म करे तो हम जुल्म का बदला सिर्फ उस ज़ुल्म करने वाले से ले सकते हैं, हम उस ज़ालिम के किसी ऐसे सगे सम्बन्धी को जो हम पर ज़ुल्म करने मे शामिल न रहा हो, उसको जरा भी तकलीफ पहुंचाने का हक नहीं रखते 
इस विषय मे चेतावनी देते हुए कुरान स्पष्ट रूप से तमाम मुस्लिमो से कहता है

"ऐ ईमानवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं।"
[सूरह माइदह 5, आयत 8]

तो जब इन पत्रकारों ने जब किसी मुस्लिम का कभी अहित नहीं किया, फिर इनकी निर्मम हत्या कोई मुस्लिम कैसे कर सकता है ??

वैसे मुस्लिमों के दुश्मनों द्वारा खुद को मुस्लिम दर्शाते हुए आतंकी वारदातें कर के उनका शक मुस्लिमों पर डालने की साजिश कोई नयी या अनोखी बात नही...
फिर चाहे भारत मे समझौता, मालेगांव, मक्का मस्जिद आदि धमाके कर के, और कर्नाटक मे पाकिस्तान का झण्डा फहरा के उसका दोष मुस्लिमों पर डालने के कुत्सित प्रयास हों या फिर मिस्र और इसराइल के बीच कैंप डेविड समझौता होने के बाद मिस्र में समुद्र के किनारे उन जगहों पर बम धमाके किए जाना जहाँ विदेशी पर्यटकों का आना-जाना रहता था, और धमाकों  के बाद अरबी में लिखा एक पत्र मिलना, जिसमे विदेशियों के अर्धनग्न होकर नहाने के गैर इस्लामी काम के कारण उनकी हत्या करने की बात कही गई होती थी...

लेकिन इन सारी घटनाओं मे जब गहराई से छानबीन की गई तो इन आतंकी कृत्यों मे मुस्लिम नहीं बल्कि मुस्लिमों के धुर विरोधियों को संलिप्त पाया गया
जहाँ भारत मे पहले निर्दोष मुस्लिमो को जेल मे डाला गया था पर बाद कर्नल पुरोहित, असीमानन्द और साध्वी प्रज्ञा जैसे नाम इन धमाकों मे सामने आए, वहीं मिस्र मे भी पहले पुलिस ने काहिरा विश्व विद्यालय के इस्लाम विभाग के अनेक निर्दोष छात्रों को शक के आधार पर गिरफतार किया.... पर अंत मे असली दोषी को पकड़ने मे सफलता मिली और मिस्र इंटिलीजेंसी ने एक यहूदी राजनयिक को रंगे हाथों अरबी मे लिखे वैसे ही पत्रों  के साथ पकड़ा..... तो स्पष्ट है कि आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से इस्लाम के दुश्मन इस्लाम को बदनाम करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं .....

खैर, दो टूक कहूंगा, कि ऐसे वीडियोज़ मे किसी निर्दोष का कत्ल करते, या किसी स्त्री का बलात्कार करते, या निरीह लोगों पर अत्याचार को इस्लाम का अंग बताते आप जिसे भी देखें, जान लें कि वो मुस्लिम नहीं बल्कि इस्लाम से नफरत करने वाला, अल्लाह का दुश्मन है !!


~ ज़िया इम्तियाज़।
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इस्लामी हुक़ूमत क़ायम करने का हुक्म।

अल्लाह ने मुसलमानों पर ये ड्यूटी फ़र्ज़ नही की है कि जिस मुल्क में रहें वहां किसी भी तरह इस्लामी सल्तनत क़ायम करने की कोशिशों में लगे रहें, .... अफ़सोस कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के कुछ "अहले इल्मों" का ये ख्याल था कि हर मुसलमान को अल्लाह ने अपने मुल्क में इस्लामी सल्तनत कायम करने की ड्यूटी दी है, इसके बाद जिस तरह पाकिस्तान या उसके आसपास के इलाक़ों में इस्लामी सल्तनत क़ायम करने के नाम पर हथियार उठाकर कुछ नामनिहाद मुसलमान, मुसलमान अवाम का ही कत्लेआम किया करते हैं, दरगाहों और खानकाहों को शिर्क के अड्डे कहकर वहाँ बम फेंक देते हैं, बजाय कि उन भटके हुए मुसलमानों को दीन की तब्लीग करें, सीधे उनकी जान ही ले लेते हैं, सरकारी इदारों पर हमले करके सरकार को कमज़ोर किया करते हैं, जो सरकार मुसलमान ही चला रहे हैं, ऐसी बेवकूफियों को देखकर, क्या आप ये कहेंगे कि ऐसे लोग इस्लाम की तालीम पर अमल कर रहे हैं ??
... ये इस्लाम की तालीम हरगिज़ नही है, बल्कि क़ुरआन में भी और अहादीस में भी अल्लाह और रसूल सल्ल० ने मुसलमानों को अपने मुल्क के हाकिम से वफ़ादार रहने का हुक्म दिया है, .... 
.... हक़ीक़तन कहा जाए तो एक मुसलमान की सही ड्यूटी इस्लाम के लिए ये है कि वो अपने मुल्क की सरकार का वफादार रहते हुए ही, इस्लामी तालीम को ज़माने में आम करे और कोशिश करे कि मुल्क और दुनिया में दीन की दावत के ज़रिये इस्लामी निज़ाम कायम हो सके, 
रहा सवाल इस्लामी सल्तनत क़ायम होने का, तो जब किसी जगह अल्लाह इस्लामी सल्तनत कायम करना चाहेगा तो खुद ब खुद रास्ते बना देगा, इस्लामी सल्तनत कायम करने के नाम पर मुल्क की सरकार से बग़ावत करने की बात एक मुसलमान हरगिज़ हरगिज़ नही सोच सकता
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..... कुछ अहले इल्म ये दलील देते हैं कि जिस तरह नबी सल्ल० ने अरब में इस्लामी सल्तनत क़ायम की, अल्लाह ने उनको ग़लबा दिया उससे सबूत मिलता है कि मुसलमानों को भी नबी सल्ल० की तरह इस्लामी सल्तनत क़ायम करने की कोशिशें हमेशा करते रहना चाहिये....
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.... क्या वाक़ई ??? नबी सल्ल० की कोशिशें क्या जंग शुरू कर के अरब में अपनी सल्तनत क़ायम करने के लिए थीं ?? 
..... तो फिर आप सल्ल० क्यों मक्का छोड़कर मदीना शरीफ़ में बस गए थे और आप सल्ल० ने कभी कुफ़्फ़ार पर चढ़ाई नही की बल्कि कुफ़्फ़ार ने ही बार बार मुसलमानों पर हमले किये, अगर आप सल्ल० का मकसद मक्का की सल्तनत ही पाना था तो आप सल्ल० ने हमेशा मक्का के काफिरों के साथ जंगबन्दी के समझौते क्यों किये उन्हें तो जंग ही चलानी चाहिये थी, उन्हें तो खुद ही कुफ़्फ़ार पर हमले करने चाहिये थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, फिर जब कुफ़्फ़ार ने सुलह हुदैबिया को खुद तोड़ दिया, तब अल्लाह ने हुक्म दिया कि अब तुम काफिरों पर चढ़ाई करो, और फिर अल्लाह ने ही बगैर किसी का खून बहाये मुसलमानों को फतह ए मुबीन अता फरमाई .... क्योंकि ये अल्लाह का इंतज़ाम है कि जब वो किसी नबी को भेजता है तो बददीनों को हार और नबी को उनपर ग़लबा देता ही देता है, ये नबियों के लिए ही अल्लाह का ख़ास कानून है, जिसे क़ुरआन में यूं फ़रमाया गया है... "अल्लाह ने लिख दिया है, "मैं और मेरे रसूल ही विजयी होकर रहेंगे।" निस्संदेह अल्लाह शक्तिमान, प्रभुत्वशाली है (क़ुरआन, 58:21)

मगर अल्लाह ने नबी को कभी इसलिये खुद से जंग करने का हुक्म नही दिया था कि वो जंग छेड़ कर इस्लामी सल्तनत क़ायम करें, अगर जंग की पहल मुसलमानों को करनी मतलूब होती तो क़ुरआन जिहाद की इजाज़त देने के लिए ये अलफ़ाज़ न इस्तेमाल करता कि "जिनसे नाहक़ जंग की जाती हैं, उन्हें भी बदले में जंग की इजाज़त है" [ कुरआन, सूरा-2, आयत-190 ] 
....... यानी अपनी तरफ से जंग शुरू करने का हुक्म अल्लाह ने मुसलमानों को क़ुरआन में नही दिया.... हदीस शरीफ़ में नबी सल्ल० ने फ़रमाया कि "ऐ लोगों, खुद कभी लड़ाई भिड़ाई की आरज़ू न करो, और जब मजबूर किये जाओ, तो साबितक़दम रह के जंग करो" [ सहीह मुस्लिम, किताब-19, हदीस-4314 ]
.... तो ये क़ुरआन और हदीस के पैग़ाम यही साबित कर रहे हैं कि मुसलमान तब हथियार उठाएगा जब दूसरा पक्ष उसे जंग के लिए मजबूर कर देगा, उससे पहले हरगिज़ नही.... इन हुक्मों के बाद भी अगर किसी को ये महसूस होता हो कि मुस्लिमों ने खुद से जंगें छेड़ कर मक्का की सल्तनत पर कब्ज़ा किया, तो ऐसा शख़्स इस्लाम की इंसाफपसंद और सुलह-अमन की तस्वीर को धुंधला करता है,
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अल्लाह ने नबी सल्ल० को सिर्फ दीन फैलाने का हुक्म दिया था, ग़लबा उनको उनकी नबुव्वत के सदके दिया वरना नबी सल्ल० की कोशिशों को देखिये तो वो सल्तनत को पाने की कोशिश कभी नहीं कर रहे थे, आप सल्ल० सिर्फ और सिर्फ़ अल्लाह के दीन को मुहब्बत भरी दावत के ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा फैलाने की कोशिश कर रहे थे, .....
.... और ये भी सोचिये, जब इस्लाम इन कोशिशों से हर जगह फैल जाएगा, तो ख़ुद ब ख़ुद रियाया में मुसलमानों के साथ साथ इस्लामी सल्तनत में भी मुसलमान होंगे...
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.... इस्लाम के लिए यही शन्ति भरी कोशिशें हर मुसलमान को भी करनी चाहिये.... ये कोशिशें ही शरई कोशिशें कहलाएंगी जिनमें किसी के साथ धोखा नहीं, किसी के साथ बगावत नही होगी ...!!!


~ ज़िया इम्तियाज़।
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दासप्रथा।

दासप्रथा 

बहुत से लोग इस्लाम मे दास प्रथा को जारी रखे जाने पर सवाल उठाया करते हैं ...
अस्ल मे सवाल उठाते समय लोगों के जहन मे दासों  के साथ किया जाने वाला वो दुर्व्यवहार रहता है जो विश्व भर के गैर मुस्लिम समाजों ने अपनाया हुआ था
गैरमुस्लिम समाज मे वास्तव मे दासों की हालत चिंतनीय थी चाहे वो भारत के शूद्र हों या फिर प्री इस्लामिक अरब के गुलाम हों उनकी स्थिति उनके शासक वर्ग ने एक पालतू जानवर से अधिक नहीं रखी थी, जिसे भूखा रखने, उसकी  शक्ति से बहुत अधिक काम उससे लेने ,  उसको किसी भी छोटी मोटी बात पर बुरी तरह पीटने, यहां तक कि उसके हाथ पैर तोड़ डालने और उसकी हत्या तक कर डालने को भी उन समाजों मे बुरा नही समझा जाता था , दास स्त्री को इन सारे अत्याचारों के साथ ही ये नर्क भी भोगना पड़ता था कि उसे खरीदने वाला उसका स्वामी खुद तो उस स्त्री की इच्छा की परवाह किए बिना जब तब उसके शरीर से खेला ही करता  था ,साथ ही अपने दोस्तों और मेहमानों के आगे भी दासी को पेश कर देता था ॥

इस्लाम ने दास प्रथा को तत्काल बन्द नहीं करवाया, लेकिन इस्लाम ने गुलामो के साथ होने वाली उपरोक्त तमाम अमानवीय और गन्दे कामों को बन्द करवाया

( गुलाम पर हाथ उठाने की मनाही [Muslim,15:4088],

गुलाम की ताकत से ज्यादा उसपर काम का बोझ न डालना, और अगर गुलाम को कोई मेहनत वाला काम सौंपना तो मालिक को स्वयं उस गुलाम के साथ उस काम मे हाथ बंटाने का हुक्म [Muslim,15:4094],

मालिक को खुद कम खाना खाकर गुलाम को भरपेट खाना खिलाने की तालीम   [Muslim,15:4096],

गुलाम स्त्री के साथ विधिवत विवाह करने के बाद ही उससे सम्बन्ध बनाने और विवाह से पहले एक मुस्लिम पुरुष की दासी अपना सतीत्व बनाए रख सके ये व्यवस्था क़ायम की गई  [Quran 4:25] 

और गुलाम स्त्रियों को व्यभिचार के लिए विवश न करने का हुक्म [Quran 24:33] )

.... इस्लाम ने गुलामो के लिए ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की कि यदि कोई मुस्लिम ने किसी गुलाम को खरीदे तो फिर उस गुलाम के कष्ट भूली भूली बिसरी बात हो जाएं, और वो गुलाम उस मुसलमान के घर मे उसी हैसियत से रहे  जैसे एक घर मे मोहब्बत करने वाले बड़े भाई के साथ उसके छोटे भाई रहते हैं .... नबी करीम सल्ल. ने फरमाया “तुम्हारे गुलाम तुम्हारे भाई हैं जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे संरक्षण मे दिया है ” [Muslim, 15:4094]

... इस्लाम ने पूर्णतः हराम ठहराकर तत्काल दास प्रथा को बन्द न करवाया....  इसके पीछे एक बहुत बड़ा कूटनीतिक उद्देश्य ये था कि मुसलमान लोग बिना किसी युद्ध या विरोध, शांतिपूर्ण ढंग से उन गुलाम स्त्री पुरूषों को  खरीदकर उन्हें आज़ाद करवा सकें, इस व्यवस्था का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हजरत बिलाल रज़ि. का है ..... हज़रत बिलाल रज़ि. को उनपर घोर अत्याचार करने वाले उनके काफिर मालिक से खरीदकर हजरत अबूबक्र रज़ि. ने आज़ाद करवाया था 

हाँ, अपना धन खर्च कर के दास को खरीदने वाले मुस्लिम, गुलाम को तत्काल आजाद करने के हुक्म को खुद पर अनावश्यक बोझ न समझने लगें, इसलिये खरीद कर तत्काल नही, लेकिन अनेक बहानों से गुलामों को आजाद करने के आदेश क़ुरआन में दिए गए हैं... सन्दर्भ के लिए क़ुरआन 4:42, 5:89, 58:3  और 90:13 देखिये

और बीच का जितना समय गुलाम अपने मुस्लिम मालिक की सेवा में रहे वो प्रताड़ित न किया जाए इसकी व्यवस्था में वो सारे आदेश दिए गए जो मैंने पहले बताये....

और कुरान मे इस को बड़ा ही पुण्य कार्य बताया गया है कि किसी गुलाम को आजाद कराने मे उसकी सहायता की जाए [क़ुरआन 9:60] 

अस्ल मे 1400 साल पहले जब अरब मे इस्लाम के नियम दोबारा से स्थापित किए गए उस समय दुनियाभर मे सिर्फ राजशाही और सामन्त सत्ता की व्यवस्था ही लागू थी और दास प्रथा उन्मूलन की बात सिर्फ इस्लाम जैसी लोकतांत्रिक व समाजवादी व्यवस्था मे ही पनप सकती थी, 
पर उस समय मुस्लिम संख्या मे बहुत कम थे, और इस्लामी नियमों को  गैर मुस्लिम मानने के लिए कतई तैयार नहीं थे   उस पर अगर इस्लाम गुलामो को खरीदने पर रोक लगा देता तो फिर मुस्लिम उन गुलामो को इतनी सरलता से आज़ाद नही करवा सकते थे जैसे उन्होंने आज़ाद करवाया, इस्लाम में दासों को ख़रीदकर रखने की अनुमति न होती तो दासों के साथ भले व्यवहार की शिक्षाओं का पालन गैरमुस्लिम तो करते नही .... पर ये मानवीय प्रवृत्ति है कि जो चीज़ें वो नसीहतों से नही सीखते, पर दूसरे समुदायों में उसी शिक्षा की वजह से अच्छा व्यवहार चलते और उसके अच्छे परिणाम मिलते देखते हैं तो उन बातों से प्रभावित होते हैं और उन व्यवहारों को सहर्ष आत्मसात कर लेते हैं, गुलामों के साथ अच्छे, सहृदय व्यवहार की शिक्षा देने के पीछे इस्लाम का ये उद्देश्य भी था कि इसे देखकर गैरमुस्लिम समुदाय भी अपने गुलामों के साथ अच्छा व्यवहार करने को प्रेरित हों

.... समझ आता है इस्लाम मे तत्काल हराम ठहरा कर दासो को खरीदने पर इसलिये रोक नहीं लगाई गई थी, ताकि गैरइस्लामी व्यवस्था में प्रताड़ित किये जा रहे दासों को तत्काल इस्लामी व्यवस्था में लाया जा सके, उनके साथ अच्छा व्यवहार करके दूसरे समुदायों को भी गुलामों से अच्छा व्यवहार करने को प्रेरित किया जा सके, और धीरे ही धीरे दास व्यवस्था को ख़त्म करते रहा जा सके, क्योंकि एक मुस्लिम द्वारा ग़ुलाम को खरीद कर उसे दोबारा बेचने की व्यवस्था नही थी, उसे सिर्फ़ आज़ाद करने का ही आदेश इस्लाम में दिया गया है.... 
.... दूसरी ओर, हदीस साहित्य में किसी भी आजाद स्त्री या पुरुष को दास बनाना महापाप बताया गया है, किसी व्यक्ति को ग़ुलाम के तौर पर बेचकर उसकी क़ीमत वसूलना इस्लाम मे महापाप बताया गया है (देखें बुख़ारी शरीफ़, किताब-36, हदीस-470) ) .... जिससे स्पष्ट है कि इस्लाम दास व्यापार को उत्साहित नही करता बल्कि नकारता है, दास प्रथा को अपनी ओर से इस्लाम ने खत्म करते जाने के नियम बनाये पर शेष गैर इस्लामी विश्व द्वारा बनाये गए दासों को इस्लामी व्यवस्था में लाकर उनका जीवन सुधारने का मार्ग खुला रखा, इस्लाम ने तत्कालीन दास व्यवस्था को निस्संदेह स्वीकार किया था, उसको बाकी तत्कालीन समुदायों की तरह ही खुद भी क़ानूनी मान्यता दे दी थी पर उसके पीछे दासप्रथा के विरुद्ध ही उद्देश्य निहित थे, ये बात आप इस्लाम की दासों के लिये बनाई गई व्यवस्थाओं और ऐतिहासिक घटनाओं के अध्ययन के बाद अच्छी तरह समझ सकते हैं

~ ज़िया इम्तियाज़।


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मक्खी, सुवर, काला कुत्ता।


मक्खी के पर में शिफा।

एक भाई साहब बहुत मजाक उड़ाते हुए बोले कि देखो मुसलमानों के रसूल (स.) का विज्ञान जो पीने की चीजों मे मक्खी को डुबकी देकर बीमारियों का इलाज करते हैं ... 
भाई इस हदीस शरीफ़ का उपहास कर रहे थे कि
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "यदि तुम में से किसी के पीने की वस्तुओं (पानी, दूध आदि) में मक्खी गिर पड़े तो उसे चाहिए कि उसे ड्रिंक में डुबकी दे, फिर उसे निकाल फेंके, क्योंकि उसके एक पर मे बीमारी है तो दूसरे में शिफा।"

निश्चय ही मजाक उड़ाने वाले भाईयों को औषध विज्ञान के मूल नियम नहीं पता इसलिए उन्हें इस हदीस को पढ़कर हंसी आती है ...
पर यदि वे चिकित्सा के छात्र होते तो इस हदीस को पढ़कर ये सोचने पर मजबूर अवश्य होते कि चिकित्सा की इतनी गूढ़ बात 1400 वर्ष पहले नबी स. को किसने बताई ????

दरअसल औषधि विज्ञान मे रोगों से लड़ने के लिए दो तरीकों पर काम किया जाता है 1- रोग होने के बाद रोग के विषाणुओं को मारने की औषधि देना
2- रोग होने से पहले ही रोग से बचाव के लिए शरीर को तैयार करने को रोग प्रतिरोधक औषधि देना

उपरोक्त हदीस मे रोग होने से पहले ही रोग से बचाव के लिए शरीर को तैयार करने यानि रोग प्रतिरोधक लेने की बात है ।

गौर तलब है कि उपरोक्त हदीस मे 1400 वर्ष पूर्व रोग से बचाव का जो फार्मूला नबी स. ने बताया आज अक्षरश उसी फार्मूले का अनुसरण कर के आज मनुष्य ने हैजा, कण्ठमाला और चेचक जैसी घातक बीमारियों की प्रतिरोधक औषधियां विकसित कर ली हैं.... ये बात और है कि इन खोजों के लिए विज्ञानियों ने इस हदीस से मदद न लेकर अपने स्वतंत्र प्रयासों से इलाज खोजे .. जिससे एक ओर तो बीमारियों का इलाज खोजने मे बहुत देर लग गई, वहीं खोज का श्रेय हदीस को नहीं दिया गया ।

खैर रोग प्रतिरक्षण के लिए जिस फार्मूले का उपयोग किया जाता है, उसे समझिए....
...ईश्वर ने हर जीव के शरीर मे रोगों से लड़ने की एक अद्भुत क्षमता दी है कि जब भी किसी बीमारी के विषाणु किसी जीव या मनुष्य के शरीर मे पहली बार जाते हैं तो शरीर उन विषाणु की प्रकृति की पहचान करता है और फिर स्वयं शरीर मे उन विषाणुओं से लड़ने वाली एण्टीबॉडी औषधि बना लेता है और विषाणुओं को मार कर खत्म कर देता है जिसके बाद उस जीव या मनुष्य को रोग से मुक्ति मिल जाती है. इसे जीव की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि इम्यूनिटी कहा जाता है ॥
रोग के विषाणु को पहचानने, और फिर एण्टीबॉडी बनाने के लिए इम्यूनिटी को पर्याप्त समय मिले इसके लिए आवश्यक है कि पहली बार शरीर के सम्पर्क मे आने वाले रोगाणु कमजोर या कम घातक हों .... क्योंकि यदि पहली ही बार मे शरीर मे किसी घातक रोग के उग्र विषाणु चले जाएंगे तो जब तक इम्यूनिटी उनको पहचानेगी शरीर के काफी भाग, यहाँ तक कि शरीर की इम्यूनिटी पर भी रोग का कब्जा हो जाएगा और बीमारी घातक रूप ले लेगी ....
हां यदि पहली बार मे कमजोर विषाणु से इम्यूनिटी का सामना होगा और बहुत हल्की बीमारी के बाद उसके विरुद्ध शरीर एण्टीबॉडी बना लेगा, फिर लम्बे समय तक शरीर इस फार्मूले को याद रखेगा और इसी रोग के शक्तिशाली विषाणुओं के शरीर के सम्पर्क मे आने पर , शरीर मे पहले से बने फार्मूले के तहत बिना एक पल भी गंवाए एण्टीबॉडी बनाकर विषाणुओं को मारना शुरू कर देगा... और शरीर को घातक रोग से बचा लेगा

तो बस इसी ईश्वरप्रदत्त सुविधा का लाभ उठाते हुए चिकित्सा विज्ञानियों ने मनुष्य की इम्यूनिटी को घातक रोगों का मुकाबला करने के लिए तैयार करने को उन्हीं घातक रोगों के निष्क्रिय विषाणु शरीर मे टीके या मुख द्वारा पहुंचाए ( जैसे चेचक से बचाव के लिए टीके द्वारा गाय चेचक "cow pox" के विषाणु शरीर मे डाले जाते हैं, जो मानव शरीर के लिए  घातक नही होते पर इनके कारण शरीर की इम्यूनिटी घातक चेचक से लड़ने की क्षमता विकसित कर लेता है)

नबी स. को 1400 वर्ष पूर्व भी इस बात का भली भांति ज्ञान था कि कुछ हल्की फुल्की बीमारियां हो जाने पर इन से सम्बन्धित घातक बीमारियों से बचाव करती हैं ... जैसे आप स. ने फरमाया कि आंख दुखने को बुरा मत समझो क्योंकि जिसकी आंख दुखती है उसका अंधेपन से बचाव हो जाता है
तो पेय पदार्थ मे गिरी मक्खी को डुबकी देकर निकाल देने की शिक्षा देकर भी नबी स. ने व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की युक्ति बताई है ... कि संक्रामक रोगों के कुछ विषाणु इस प्रयोग से व्यक्ति के शरीर मे जाएं और शरीर उन रोगों के घातक प्रभाव से लड़ने को तैयार हो जाए
और इस बात का भी भय नहीं कि मक्खी के शरीर से शक्तिशाली रोगाणु निकल कर पेय पदार्थ मे मिल जाएंगे क्योंकि मक्खी के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने भी उन रोगाणुओं से मक्खी को रोगी होने से रोकने की औषधि तैयार की हुई है जो मक्खी की त्वचा पर फैले रोगाणुओं को निष्क्रिय करने के लिए मक्खी की त्वचा पर ही सक्रिय रहती है 
इस कारण जब मक्खी का पूरा शरीर पेय मे डुबकी लगाकर निकाला जाएगा तो निश्चय ही मक्खी के शरीर से निष्क्रिय रोगाणु ही पेय में जाएंगे ॥ पर उन निष्क्रिय रोगाणुओं की एण्टीबॉडीज़ बनाकर हमारा शरीर कई घातक बीमारियों से लड़ने को तैयार हो जाएगा .... तो इस तरह चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से यदि देखा जाए तो नबी सल्ल० का ये कथन अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है कि मक्खी के एक पर मे बीमारी है तो दूसरे में शिफा।


~ ज़िया इम्तियाज़।

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सुवर के गोश्त।


"सूअर के नाम से भी मुसलमान नफरत करते हैं " मैं इसे एक जुमले से ज्यादा नहीं समझता .... क्योंकि सूअर से यदि नफरत की बात हो तो सबसे ज्यादा पोर्क खाने वाले पश्चिम मे भी "स्वाइन" शब्द एक गाली की तरह इस्तेमाल होता है, और हमारे ही देश मे गैर मुस्लिम समुदायों के लोग खुद गालियों मे सूअर शब्द का बहुत प्रयोग करते हैं, सूअर को सबसे गन्दा जानवर मानकर नफरत की राजनीति मे सूअर और सूअर के मांस का प्रयोग किया करते हैं, 

.... तो हमारे कुछ भाई लोगों को सूअर से सिर्फ मुस्लिमों की ही विरक्तता क्यों दिखाई देती है, ??

.......हां ये ठीक है कि सूअर का मांस खाना मुस्लिमों के लिए प्रतिबंधित है ... और प्रतिबंधित इसलिए क्योंकि सूअर की प्रकृति गंदगी खाने की होती है, इसलिए मुस्लिम इस जानवर से घिन महसूस करते हैं और इसी घिन के कारण अपने घर या खाने मे इस जानवर की कल्पना नहीं कर सकते हैं, सिर्फ मुस्लिम ही नहीं हमारे देश के अधिकांश गैर मुस्लिम भी समान कारणों से सूअर से घिन रखते हैं .... 

अब इस घिन या "नफरत" मे मुस्लिम क्या करते हैं सिवाय इसके कि वो सूअर को अपने घरों से दूर रखते हैं 
..... कहीं नफरत के चलते मुस्लिम लोग सूअरों को मार मार कर घायल कर रहे हों, या सूअर की निर्मम हत्या कर रहे हों, ऐसा तो कोई उदाहरण आज तक हमारे सामने नहीं आया, बल्कि सूअर को प्रकृति का सफाईकर्मी बनाया गया है, ये बात और इस कारण सूअर के जीवित रहने की जरूरत हम मुस्लिम अच्छी तरह से जानते हैं ॥

कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि सूअर 1400 वर्ष पहले सिर्फ मल खाता था, तब उसका मांस हराम ठहराया जाना ठीक था पर अब सूअर को सफाई सुथराई के साथ साफ आहार खिलाकर पाला जाता है तो अब मुस्लिमो को सूअर का मांस हराम न समझकर खा लेना चाहिए.... पर ये तर्क देने वाले सूअर के आहार की मूल प्रकृति को भूल जाते हैं जिस प्रकृति को बदला नहीं जा सकता, इसी प्रकृति के चलते उसे चाहे कितनी ही सफाई से रखा जाए व साफ खाना खिलाया जाए तब भी सूअर अपना और बाड़े के अन्य सूअरों का मल खाया करता है, इसलिए ये तर्क देने का कोई अर्थ नहीं कि सफाई से पाले हुए सूअर का मांस खाने मे हर्ज नहीं, 

.... सूअर की मल खाने की प्रकृति के कारण इस जानवर का शरीर अशुद्धियों से भरा हुआ होता है, क्योंकि जाहिर है किसी भी जीव का शरीर उसके द्वारा खाए गए भोजन के तत्वों से ही बनता बढ़ता है, तो विभिन्न जीवों, मनुष्यों के मल को खाकर बने सूअर के मांस मे खतरनाक बीमारियां पैदा करने वाले कीटाणुओं की भरमार रहती है, मेडिकल एक्सपर्टस के मुताबिक पोर्क मे मौजूद किस्म किस्म के बैक्टीरिया लगभग 70 तरह की बीमारियां पैदा कर सकते हैं, जो लोग पोर्क खाया करते हैं उनकी आंतों मे पिन वर्म, हुक वर्म और रोइण्ड्रम जैसे कीड़े पैदा हो जाते हैं, जिनमें कदुदाना नाम का आंत मे पैदा होने वाला कीड़ा सबसे ज्यादा घातक होता है, ये कीड़ा खून के बहाव के साथ जिस्म के किसी भी हिस्से मे पहुंचकर हार्ट अटैक, दिमागी बीमारी, अंधापन जैसी खतरनाक बीमारियां दे सकता है ... सूअर के मांस मे मौजूद बैक्टीरिया उसको अच्छी तरह पकाने के बावजूद जिन्दा रह सकते हैं, अमेरिका मे किए गए एक अध्ययन मे ये बात सामने आई कि "Trichura Tichurasis" रोग से पीड़ित 24 मे से 22 लोगों ने पोर्क को अच्छी तरह पकाकर खाया था फिर भी वो इस रोग से पीड़ित हो गए ॥

.... कुछ लोग ये कह सकते हैं कि अगर सूअर का मांस इतना ही हानिकारक है तो अमेरिका मे तो सभी पोर्क खाते हैं तो सब बीमार क्यों नहीं रहते वहाँ ? वो लोग स्वास्थ्य के मामले मे भारत के लोगों से बेहतर कैसे रहते हैं  ??
उसका उत्तर ये है कि अमेरिका के लोग पोर्क के साथ ही साथ बहुत सी स्वास्थ्यवर्धक चीजें, फल,मेवे, मछली, शुद्ध दूध मक्खन आदि भी भरपूर मात्रा मे खाते हैं जिन चीजों के गुणों से इनके शरीर को जो क्षति पोर्क खाने से हुई होती है उसकी क्षतिपूर्ति हो जाती है, ये ठीक ऐसा है जैसे एक चेन स्मोकर , सिगरेट पीने के साथ साथ खाने मे विटामिन सी से भरपूर चीजों की भी खूब मात्रा ले रहा हो तो उस व्यक्ति की त्वचा और बाल स्मोकिन्ग के प्रभाव से बचे रहेंगे लेकिन कोई इसका ये निष्कर्ष निकाले कि भरपूर सिगरेट पीने से त्वचा मुलायम और बाल काले घने रहते हैं तो इसे निष्कर्ष निकालने वाले की अज्ञानता ही कहा जाएगा ॥ 

बहरहाल कुरान के अलावा बाइबल मे भी सूअर के मांस पर प्रतिबंध है तो हम समझ सकते हैं कि पहले के नबियों के लिए भी ये चीज हराम थी और अल्लाह का नियम सदा एक सा और स्पष्ट रहा है कि स्वास्थ्य के लिए हानिकर चीजों से सदा दूर रहा जाए, अज्ञानी तो वो मनुष्य हैं जो इन बातों पर ध्यान न देकर अस्वास्थ्यकर चीजों मे मजा ढूंढने चलते हैं और बीमारी मोल ले लेते हैं ॥


~ ज़िया इम्तियाज़।
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क्या नबी सल्ल० ने मुसलमानों को हुक्म दिया है कि वो तमाम काले कुत्तों को मार डालें ???
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मुस्लिम शरीफ में एक रिवायत है, जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० ने फरमाया नबी सल्ल० ने हमें कुत्तों को मारने का हुक्म दिया, हमने आप सल्ल० के हुक्म को माना, यहां तक कि हमने बाहरी क्षेत्र से आई हुई एक औरत के साथ आये उसके कुत्ते को भी मार दिया, जब रसूलल्लाह सल्ल० ने ये सुना तो ऐसे कुत्तों को मारने से हमें मना किया और फ़रमाया कि तुम केवल काले कुत्तों को मारो जिनके ऊपर दो स्पॉट्स हों"  (सहीह मुस्लिम, किताब-10, हदीस-3813)
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.... क्या कह रही है ये हदीस ??? हदीस के शब्दों को पढ़ने से पता चलता है कि हदीस को काफी संक्षिप्त रूप से बयान किया गया है, किस तरह के स्पॉट्स की बात कही गई है, ये स्पष्ट नही है, काले कुत्तों में क्या बुराई है ये स्पष्ट नही ... ये बात सन्तोषजनक है कि मुस्लिम समुदाय ने काले कुत्तों को मारने की कोई परिपाटी नही अपनाई है, और अपनाई भी नहीं जा सकती, क्योंकि हदीस के शब्द अस्पष्ट और संक्षिप्त हैं, ऐसी हदीस से कोई गलत शिक्षा लिए जाने की बहुत संभावना है, संक्षिप्त हदीस से कोई शिक्षा तब तक नहीं ली जा सकती जब तक इस विषय (यानी कुत्तों के साथ मनुष्यों का क्या व्यवहार हो?) से लगती अन्य हदीसों और पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं का हम अध्ययन नही कर लेते.....
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.... कुत्तों के साथ एक मुस्लिम व्यक्ति का कैसा व्यवहार हो, इस बात की चर्चा छिड़ने पर मुझे बचपन से सुनी वो कथा याद आ जाती है जो असल में एक हदीस है कि एक वेश्या के सारे पाप अल्लाह ने इस कारण माफ कर दिये थे क्योंकि एक दिन उस वेश्या ने एक प्यासे कुत्ते को पानी पिलाकर उस कुत्ते की जान बचा ली थी, उस वेश्या की इस नेकी के बदले अल्लाह ने उसके लिए जन्नत नियत कर दी थी.... बचपन से इस कहानी को सुनते रहने के कारण ही, मेरे मन में हमेशा तमाम जानवरों के लिए दयाभाव प्रबल रहा....
इसी तरह बुख़ारी और मुस्लिम शरीफ में वर्णित एक हदीस है जिसमें नबी सल्ल० लोगों को एक ऐसे व्यक्ति की कथा सुनाते हैं, जिस ने रेगिस्तान में प्यास से मौत के सन्निकट हुए एक कुत्ते को कुएं से पानी भर के पिला दिया, तो अल्लाह ने उस व्यक्ति की इस एक नेकी के बदले उसके पापों को क्षमा कर दिया था, लोगों ने ये कथा सुनकर नबी सल्ल० से पूछा कि क्या चौपायों के साथ नेकी करने पर भी सवाब मिलता है ? इस पर आप सल्ल० ने जवाब दिया कि "हां, हर जानदार के साथ नेकी करने पर सवाब मिलता है"
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..... अब आएं क़ुरआन पर, .... सूरह माएदा की चौथी आयत में प्रशिक्षित पालतू कुत्तों द्वारा पकड़े गए शिकार को अल्लाह ने हमारे लिये हलाल करार दिया है, यानी अल्लाह ने न अपनी किताब में कुत्तों को नापाक माना है, न उनके पालने पर रोक लगाई है, और न ही उन्हें कोई अप्रिय जानवर घोषित किया है, बल्कि क़ुरआन में असहाबे कहफ़ का किस्सा (सूरह नम्बर 18) इंसानों और कुत्ते की अद्भुत मित्रता की कहानी बताता है, जहां अल्लाह ने अपने प्रिय बन्दों के पालतू कुत्ते को भी तीन सौ वर्ष लम्बा जीवन दे दिया था...
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.... ऐसे में जहां कुत्तों के साथ नेक व्यवहार पर जन्नत देने की बात की जा रही हो, जहां धार्मिक ग्रन्थ कुत्तों की उपयोगिता की तारीफ़ कर रहा हो, वहां अकारण कुछ कुत्तों को मार डालने का आदेश, तब गले से नही उतरता जबकि हमने हदीस और क़ुरआन की अन्य शिक्षाएं पढ़ ली हैं जो उस हदीस से बिलकुल विपरीत बात कर रही हैं
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.... काले कुत्तों को मारने वाली हदीस में उन कुत्तों को मारने का कोई वैध कारण नज़र नही आ रहा, इस कारण वो हदीस समझ में नही आ रही, वैसे किसी कुत्ते को मार डालने का एक प्रबल वैध कारण रेबीज़ का संक्रमण होता है और कुत्ते उसके मुख्य संवाहक होते हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि रेबीज (हलक जाना) का कोई इलाज नहीं है और रेबीज़ ग्रसित व्यक्ति की तीन महीने के भीतर मौत होना निश्चित है।
ये बीमारी होने पर व्यक्ति के शरीर मे तेज दर्द होता है, व्यक्ति को प्यास लगती है, पर पानी देखते ही उसे दौरा पड जाता है, रोगी चीखने चिल्लाने लगता है, धीरे धीरे रोगी का व्यवहार बढ़ते रोग के साथ मनुष्य की बजाय एक हिंसक जानवर की तरह का हो जाता है, व्यक्ति बोलना छोड़ देता है और कुत्ते की तरह गुर्राना और भौंकना शुरू कर देता है, लोगों को झपटने और काटने दौड़ता है, तदन्तर रोगी की रीढ़ की हड्डी भी किसी जानवर की तरह मुड़ जाती है और अंतत: इसी कष्ट मे रोगी प्राण त्याग देता है, ये रोग कितना घातक है इसका अनुमान इस बात से लगाइए कि आज तक कोई भी इस रोग से ठीक नहीं हुआ है
रेबीज़ से ग्रसित कुत्ते जिन्हें आम भाषा में हम पागल कुत्ते कहते हैं, ये कुत्ते आक्रामक होकर हर किसी को काटने दौड़ते हैं, और जिसे काट लिया उसको प्राणघातक बीमारी निश्चित थी, इसलिये कुछ हदीसों में  हम देखते हैं कि "काट खाने वाले कुत्ते यानी पागल कुत्ते क्योंकि मनुष्य के लिये प्राणघातक होते हैं, इस कारण ऐसे कुत्तों को मार देने की अनुमति दे दी गई है," (उदाहरण के लिए बुख़ारी, किताब-29, हदीस-54)
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..... प्रतीत होता है कि जिन विशेष प्रकार के स्पॉट्स वाले काले कुत्तों को मारने का नबी सल्ल० ने हुक्म दिया था वो रेबीज़ से ग्रसित कुत्ते थे,
... ऐसा हो सकता है कि काले कुत्तों की कोई नस्ल जो उस समय नगर में रहती थी, में रेबीज़ फैल गया हो, हदीस में काले रंग के साथ ही दो स्पॉट्स यानी दो निशानों की बात भी है, ये दो रहस्यमयी निशान, जिन पर हदीस में खुलकर नही बताया गया है, ये रेबीज़ के दो निशान यानी ग्रसित कुत्तों के खुले जबड़े और टपकती लार हो सकते हैं... हो ये भी सकता है कि "काले कुत्तों" से आशय "पागल कुत्ते" हों जैसे हमारी भाषा में काले का अर्थ बुराई से लिया जाता है और "काली नज़र" या "काली करतूत" जैसे शब्द प्रयोगों के हम शाब्दिक अर्थ न लेकर अलंकारिक अर्थ समझ जाते हैं, ऐसे ही हो सकता है अरब में शब्द "काले" का अलंकारिक प्रयोग किसी चीज़ की भयावहता बताने के लिए किया जाता हो, और "काले कुत्तों" से अर्थ उनमें फैले भयावह संक्रमण से लिया जाता हो.... बहरहाल सच्चाई चाहे जो हो, इतना तय है कि किसी जानवर की नस्ल या वंश को अकारण हानि पहुँचाने की शिक्षा इस्लाम कहीं नही देता...!!!


~ ज़िया इम्तियाज़।
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बुद्ध और ईसा।

एक दिन संयोग से मैंने डॉ. वेदप्रकाश उपाध्याय की किताब "नराशंस और अन्तिम ऋषि" में महात्मा बुद्ध द्वारा अपने शिष्य नन्दा को अपने अंत...