क्या तौहीन रिसालत की सज़ा मौत है।
पिछले कुछ दिनों मे कुछ जज़्बाती मुसलमानों के मुंह से ये बात मैने कई बार सुनी कि तौहीने रिसालत की सजा मौत है, नबी ए करीम से अपने भाईयों की मोहब्बत की हम कद्र करते हैं लेकिन ये बात भी साफ कर देना चाहते हैं कि इस मामले मे मौत की सज़ा की बात सिर्फ जज़्बात मे बहकर हमारे भाई बोल रहे हैं, वरना हकीकत ये है कि शरीयत मे तौहीने रिसालत पर मौत की सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है, सबसे पुरानी इस्लामी विचारधारा के संस्थापक और भारतीय उपमहाद्वीप सहित विश्व के सर्वाधिक मुस्लिम जिनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं, उन इस्लामी विद्वान इमाम अबू हनीफा रह° ने तौहीने रिसालत पर मौत की सज़ा का विरोध किया है , हज़रत अबू हनीफा रह• ने फरमाया है कि किसी ज़िम्मी (इस्लामी हुकूमत मे महकूम गैर मुस्लिम) का कत्ल तौहीने रिसालत के जुर्म पर नहीं किया जा सकता क्योंकि वो ज़िम्मी पहले से ही उससे भी बड़े गुनाह (शिर्क) का मुजरिम है, (और जब शिर्क जैसे संगीन गुनाह के लिए उसे शरीयत ने मौत की सज़ा नहीं दी है तो तौहीने रिसालत, जो शिर्क से कम संगीन जुर्म है इस पर उसे मौत की सज़ा कैसे दी जा सकती है ??))
[इमाम खत्ताबी कृत मुअलिम अस-सुनन, शरह सुनन अबू दाऊद)
बेशक हर समर्पित मुसलमान का विश्वास यही होना चाहिए कि नबी सल्ल. की शान में गुस्ताखी बेशक गुनाहे कबीरा है, लेकिन ऐसे गुनाहगार को मौत की सजा अव्वल तो गैर इस्लामी कानून वाले मुल्क मे देने की अथॉरिटी किसी के पास हो नहीं सकती ... दूसरे इस्लामी शरीयत जिस मुल्क मे लागू हो वहाँ भी गुस्ताखी ए रसूल पर मौत की सज़ा नही दी जा सकती, शरीयत के मुताबिक गुस्ताखी ए रसूल की सज़ा सिर्फ एक सूरत मे दी जा सकती है कि जब किसी मुल्क मे इस्लामी हुकूमत हो और हाकिम ने ज़िम्मियों और मुस्लिमों, सभी से ये अहद लिया हो कि वो किसी भी मज़हब का अपमान नहीं करेंगे और अगर करेंगे तो उस सजा को झेलने के लिए राज़ी होंगे जो मुआहिदे के वक्त तय की जाएगी, ये सज़ा भी मौत की न होकर कुछ मुद्दत की जेल, कुछ कोड़ों की मार या कुछ जुर्माने की हो सकती है ॥
इस कानून की वजह कुरान पाक की पवित्र आयतें और सही अहादीस हैं, कुरान पाक मे आया है -
“(ऐ नबी सल्ल.) जो लोग तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं, बेशक हम तुम्हारी तरफ से उनके लिए काफी हैं ” [अल-कुरआन, 15:95]
... यानि नबी सल्ल. का मज़ाक उड़ाने की सजा किसी को देना पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध है, अल्लाह कुरान पाक मे नबी सल्ल. से फरमाता है कि नबी सल्ल. का मजाक उड़ाने वालों को दण्ड देने का अधिकार अल्लाह ने अपने हाथ मे ले रखा है, न कि किसी देश के कानून को दिया है...
वहीं हदीसों मे ये दर्ज है कि प्यारे नबी सल्ल. ने कभी अपना अपमान करने वाले व्यक्तियों के लिए मौत की सजा का हुक्म नहीं दिया था, बल्कि नबी सल्ल. का अपमान करने वालों के कत्ल करने की जब नबी सल्ल. के साथियों ने इजाज़त मांगी तो नबी सल्ल. ने सहाबा को वो इजाज़त भी ना दी।
... लोग एक यहूदी शायर काब बिन अशरफ के कतल को गुस्ताखी रसूल की सज़ा बताते थे, स्टडी करने पर मालूम हुआ कि काब को मौत की सजा का हुक्म नबी सल्ल. ने अपने अपमान की बजाय मुस्लिमों की जान माल की सुरक्षा के लिए दिया गया था।
हालांकि ये कोई तरीका नहीं कि कहीं से भी एक हदीस उठाकर बिना उसका पूरा पसमन्ज़र देखे उसपर अटकलें लगा ली जाएं मगर हमारे कुछ भाई तौहीने रिसालत के गुनाहगार को मौत की सज़ा होने की ऐसी ही अटकल, अबू दाऊद शरीफ की किताबे हुदूद की एक हदीस पर लगाते हैं कि एक नाबीना (नेत्रहीन) शख्स की खादिमा/उपपत्नी नबी सल्ल. को अक्सर गालियां दिया करती थी और अपने स्वामी के रोकने से रूकती भी न थी, और एक दिन जब वो इसी तरह नबी सल्ल. को गालियां दे रही थी तो गुस्से मे आकर उस नाबीना शख्स ने एक छुरी उठा कर उस औरत को मार दी, औरत पेट से थी, छुरी उसके पेट मे लगी जिससे वो औरत और उसके पेट के बच्चे दोनों की मौत हो गई, और जब इस कत्ल का मुकदमा नबी सल्ल. ने कायम किया तो पूरा वाकया सुनने के बाद नबी सल्ल. ने फरमाया कि इस कत्ल का कोई किसास नहीं है ॥
....रावियों की चेन के आधार पर इस हदीस को सही प्रमाणित किया गया है, लेकिन इस हदीस के विषय मे और बहुत सी बातें जानना ज़रूरी हैं ॥
अव्वल तो बात इसकी कि इस हदीस मे एक बड़ा पेंच है, और वो ये है कि इस्लाम मे कानून है कि किसी बेगुनाह के नाहक कत्ल की सजा मौत है तो यहाँ पर गर्भ के कत्ल की सजा देना या किसास अदा करना ज़रूरी था, जिन बातों पर अमल नहीं किए जाने से साबित होता है कि ये हदीस इतनी संक्षिप्त बयान की हुई है कि उसके शब्द पर्याप्त रूप से अस्पष्ट हैं व इनसे ऐसी कोई शिक्षा नहीं ली जा सकती जो पवित्र कुरान या अन्य सही हदीसों की शिक्षा के विरुद्ध ठहरती हो ॥
फिर इस हदीस के सम्बन्ध मे ये बता दें, कि हदीस अध्ययन और उस अध्ययन के निष्कर्ष पर शरीयत के प्रतिपादन के सिद्धांतों के अनुसार इस हदीस की स्थिति क्या है....
... उपरोक्त हदीस मे बताया गया है कि उस स्त्री के कत्ल का मुकदमा नबी सल्ल. ने अनेकों मुस्लिमों को एकत्र कर के पेश किया था, तब होना तो ये चाहिए था कि उपरोक्त घटनाक्रम को कई सहाबाओं ने रिवायत किया होता पर बहुत अजीब सी बात है कि ये हदीस हम तक केवल एक सहाबी के ज़रिए पहुंची है, अत: ये 'खबर ए वाहिद' यानि केवल एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात है, और सभी इस्लामी धार्मिक विद्वानों का मत है कि कुरान एवं अन्य हदीसों के विरुद्ध जानेवाली खबर ए वाहिद मान्य नहीं है ॥
दूसरी बात किसी हदीस पर, विशेषकर संक्षेप मे बयान की गई हदीस पर कोई विश्वास बनाने से पहले उस विषय की कई हदीसों का अध्ययन किया जाना आवश्यक होता है, ताकि हदीस का विस्तार और उसकी सही शिक्षा पता चल सके ... लेकिन यहाँ क्योंकि एक के अलावा दूसरे सहाबी ने इस हदीस को रिवायत ही नहीं किया इसलिए इस हदीस की सही शिक्षा पता चलना भी असम्भव है,
और तीसरी बात, किसी के जीवन और मौत के अति गम्भीर विषय पर शिक्षा देनेवाली किसी एक संक्षिप्त हदीस के अध्ययन के आधार पर किसी को मौत की सजा देने की शिक्षा ग्रहण करने के पक्ष मे भी इस्लामी विद्वान कभी नही रहे हैं .. तब तो और नहीं जब एक दूसरे का परस्पर समर्थन करने वाली अनेक अहादीस उस एक हदीस के विरोध मे मौजूद हों
यानि कुल मिलाकर ये हदीस शरीयत की दण्ड संहिता के निर्माण मे शामिल होने की शर्तों को ही पूरा नहीं करती
हां यदि इस हदीस से कोई ऐसी शिक्षा मिले जो नबी करीम सलल्लाहो अलैहि वसल्लम की अन्य अनेकों अहादीस की शिक्षा का समर्थन करती हो तो इस हदीस की वो शिक्षा इस कारण मान ली जाएगी क्योंकि अन्य कई हदीसों ने उस शिक्षा को समर्थन देकर मजबूत बना दिया है, तो इस हदीस से ये बात मालूम चलती है कि नबी सल्ल. की हुकूमत के दौर मे ऐसा कोई भी कानून नहीं था जिसमें गुस्ताख ए रसूल को मुल्क का कानून हद्द या दूसरी भी किसी तरह की सज़ा देता, क्योंकि अगर उस दौर मे गुस्ताखी ए रसूल पर सज़ा का प्रावधान होता तो जब वो औरत बार बार नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखी किया करती थी तो उसे सजा दिलाने के लिए वो शख्स वक्त के हाकिम नबी सल्ल. से शिकायत करते बजाय खुद उस औरत पर वार करने के, लेकिन उस दौर मे गुस्ताखी ए रसूल पर सज़ा का कोई शरई हुक्म न होने की वजह से बहुत मुद्दत तक उन नाबीना शख्स ने नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखियां बर्दाश्त कीं जिससे ये ही बात साबित होती है कि नबी सल्ल. की तौहीन के गुनाह की नबी सल्ल. ने भी अपनी हुकूमत मे कोई सजा न रखी थी और इस गुनाह की सजा का फैसला अल्लाह पर ही छोड़ रखा था ॥
~ ज़िया इम्तियाज़।
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नबी के अपमान की सज़ा।
हदीस की पुस्तकों से बनाई गई इस्लामी मान्यताओं मे कभी कभी एक विरोधाभास दिखाई पड़ता है , जैसे कि कई अहादीस मे नबी सल्ल. धर्म मे नए रिवाज़ो को बनाने की मनाही करते हैं, पर कुछ मुस्लिम भाई इस्लाम मे नए रिवाज़ो का प्रचलन करना गलत नहीं मानते और इसके लिए कारण देते हैं वो सहाबा द्वारा इस्लाम मे शुरू की गई कुछ रीतियों को, इसी तरह नबी सल्ल. ने अनेकों हदीसों मे कब्रो से अकीदत और लगाव रखने को मना फरमाया है, लेकिन कुछ मुस्लिम भाई कब्रो से लगाव रखने को गलत नहीं मानते और इसके लिए कारण देते हैं कि कुछ सहाबा ने नबी सल्ल. के रौज़ा ए मुबारक के हुजरे की दीवारों से अपना चेहरा मला या कोई सहाबा रौज़ा ए मुबारक से लिपटे थे ....॥
और नबी सल्ल. ने कभी खुद को बुरा भला कहने वालों का अहित नहीं किया ऐसा अनेक विवरणों मे दर्ज है लेकिन कुछ सहाबा ने नबी सल्ल. का अपमान करने वालों को कत्ल कर डाला, ऐसे कुछ विवरण सुनकर लोग असमंजस मे पड़ जाते हैं कि किस बात को मानें और किस बात को रद्द कर दें ....
जहाँ अक्सर सहाबा से ये विरोधाभासी बातें जुड़ी हुई हैं, वहाँ ये बात ध्यान मे रखी जानी आवश्यक है कि नबी सल्ल. का उम्मती होने के नाते हमारे लिए तो सबसे बेहतरीन नमूना जिन्दगी जीने का प्यारे नबी सल्ल. हैं ....
सहाबा के कौल (कथनी) और फेल (करनी) को हम नबी सल्ल. के कौल और फेल पर हरगिज़ तरजीह नही दे सकते जबकि सहाबा और नबी सल्ल. के कौल और फेल मे प्रत्यक्ष विरोधाभास भी नजर आए....
हां क्योंकि ये सहाबा की आदत बिल्कुल नहीं थी कि वो नबी सल्ल. की आज्ञा का उल्लंघन करें , इसलिए इस विरोधाभास के नजर आने के पीछे अपनी कोई मसलेहत (अप्रत्यक्ष योजना) हो सकती है ...
जैसे कि यहूदी कवि काब बिन अल अशरफ की सहाबा द्वारा हत्या को काब द्वारा अपनी शायरी मे नबी सल्ल. का मज़ाक उड़ाने का दण्ड मान लिया जाता है....
जबकि नबी सल्ल. का मज़ाक उड़ाने का दण्ड किसी को देना पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध है, अल्लाह कुरान पाक मे नबी सल्ल. से फरमाता है कि नबी सल्ल. का मजाक उड़ाने वालों को दण्ड देने का अधिकार अल्लाह ने अपने हाथ मे ले रखा है ....
अल्लाह का फरमान है :
“जो लोग तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं, बेशक हम तुम्हारी तरफ से उनके लिए काफी हैं ” [अल-कुरआन, 15:95]
..... दरअसल काब बिन अल अशरफ की हत्या के पीछे मसलेहत ये थी कि वो काफिरों को मुस्लिमों पर आक्रमण करने को भड़काया करता था और उसके कारण सैकड़ों मुस्लिमों की जान को खतरा बना रहता था, इसलिए काब की हत्या, आत्मरक्षा के तहत की गई हत्या थी, न कि नबी के अपमान का दण्ड ...
तो ऊपरी तौर पर पवित्र कुरान की शिक्षा के विरुद्ध जाने वाली किसी हदीस या सहाबा से जुड़े किसी विवरण के पीछे क्या मसलेहत है, वो मसलेहत बिना पर्याप्त अध्ययन के समझी नहीं जा सकती, और बिना मसलेहत को समझे उस हदीस का अनुकरण कुरान की शिक्षा के विरुद्ध करने लगा जाए तो अर्थ का अनर्थ ही होगा
अत: यही बेहतर है कि विशेषकर जिन मामलों मे नबी सल्ल. ने स्पष्ट मनाही की हुई है, या जिन मामलों के बार बार नबी सल्ल. के साथ घटित होने पर भी नबी सल्ल. ने एक सा ही व्यवहार रखा और उन मामलों मे सहाबा के विरोधाभासी व्यवहार के पीछे की मसलेहत का ज्ञान न हो तो उन मामलों मे नबी सल्ल. के आदेश का अनुसरण और आप सल्ल. के व्यवहार का अनुकरण ही करना चाहिए, यही श्रेयस्कर है, और यही धर्म परायणता है ॥
शेष धार्मिक मामलों मे जो नबी सल्ल. के ज़माने मे पेश नहीं आए थे, या जिन मामलों मे नबी सल्ल. ने मनाही नहीं की थी, वहाँ सहाबा के निर्देशों का पालन करना ज़रूर बेहतरीन अमल है ... ॥
~ ज़िया इम्तियाज़।
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गुस्ताखे नबी।
(ये लेख फ्रांस की एक धर्म विरोधी पत्रिका शार्ली हेब्दो, जो हर धर्म पर बेहद अश्लील टिप्पणियां करने के लिए कुख्यात है, इस पत्रिका के कार्यालय पर जनवरी 2015 मे आईसिस द्वारा किए गए आतंकवादी हमले को इस्लाम से जोड़े जाने के विरोध मे लिखा गया है )
बेशक मुझे भी पेरिस मे मारे जाने वाले चार्ली हेब्दो के कर्मचारियों से उनकी गलीज़ हरकतों के कारण, कोई हमदर्दी नहीं है, मगर उनका मार डाला जाना....., ये इस्लामी तरीका नहीं हो सकता .......
वो सिर्फ कुछ महीनों की जेल, या कुछ जुर्माने, या कुछ कोड़ो की मार भर की सज़ा के मुस्तहिक थे, जान से मार दिए जाने के नहीं.
... ताअफ के मैदान मे जहाँ ज़ालिमो ने मेरे प्यारे नबी सल्ल. को पत्थरों से मारकर लहूलुहान कर दिया था उस वक्त अल्लाह ने जब नबी सल्ल. की आजिज़ी से मांगी गई दुआ कुबूल कर के, उस नामुराद शहर पर अज़ाब डालने के लिए पहाड़ों का सरदार फरिश्ता भेजा था, तो नबी सल्ल. ने ये जवाब दिया था उस फरिश्ते को कि मै इन लोगों को कत्ल नहीं करवाना चाहता बल्कि अगर ये लोग हक की दावत कुबूल नहीं करते, कोई बात नहीं , मै अल्लाह से उम्मीद रखता हूँ कि इनकी आगे आने वाली नस्ल ज़रूर सच को कुबूल करेगी .....[ सही मुस्लिम, किताब-19, हदीस-4425 ]
मेरा ख्याल है कि वो ही इस्लामी तरीका है ...
ये तो रहा अपने बारे मे खुद नबी सल्ल. का फैसला, ...ऐसे ही किसी मौके पर जब कोई गुस्ताख शख्स हमारे नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखी करे तो हम मुसलमानो को नबी सल्ल. ने क्या हुक्म दिया है....??? नबी सलल्लाहो अलैहि वसल्लम ने कभी अपनी शान मे गुस्ताखी करने वाले के लिए किसी सज़ा का हुक्म नही दिया, बल्कि जब सहाबा ए किराम ने आप सल्ल. से गुस्ताख ए रसूल को सजा देने की इजाज़त मांगीतो आप सल्ल. ने सहाबा को वो इजाज़त भी न दी, .... देखिए
बुखारी शरीफ़ मे हजरत अबू हुरैरा,रज़ि. से रिवायत एक हदीस है, कि एक शख्स ने नबी सल्ल. से अपने कर्ज का मुतालबा किया उसकी जुबान कडवी थी तो आप सल्ल. के सहाबा ने उस बदतमीज़ शख्स की गर्दन मारने के लिए झपटे, इस पर आप सल्ल. ने सहाबा को मना किया, और न सिर्फ उस बदतमीज़ शख्स को मारने से नबी सल्ल. ने सहाबा को रोका बल्कि उस शख्स को उसके कर्ज़ से बेहतर चीज भी लौटाई [बुखारी शरीफ़, किताब 41, हदीस 575,]
इसी तरह सहीहैन मे एक हदीस हज़रत अबू सईद ख़दरी रज़ि. से रिवायत है कि आप सल्ल. सहाबा के बीच माले गनीमत तकसीम कर रहे थे, तो एक शख्स ने नबी सल्ल. से बदतमीज़ी की हज़रत उमर रज़ि. ने तलवार लेकर उस बदतमीज़ शख्स का सर काट लेने की इजाज़त नबी सल्ल. से मांगी, तो आप सल्ल. ने हजरत उमर रज़ि. को ऐसा करने से मना किया और भविष्यवाणी की कि ऐसे ही गुस्ताख लोग आगे भी होंगे जो बहुत इबादत करेंगे मगर दीन से ऐसे बेअसर निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार के जिस्म से ऐसे पार हो जाता है कि उसपर शिकार के खून का एक भी कतरा नहीं होता .... [सही मुस्लिम शरीफ़, किताब 5, हदीस 2323, ]
तो इन दोनों अहादीस मे नबी सल्ल. की शान मे गुस्ताखी किए जाने पर मुसलमान को नबी सल्ल. की तरफ से क्या हुक्म है वो साफ पता चल रहा है .... और वो हुक्म ये है कि उस गुस्ताख को छोड़ दिया जाए, या उसके साथ बेहतर सुलूक कर के उसको उसकी गलती पर शर्मिन्दा किया जाए ....
बेशक सहाबा ए किराम की मोहब्बत नबी सल्ल. के लिए किसी भी पॉलिटिक्स, किसी भी हिकमत के बगैर और इन चीज़ों से ऊपर थी, इस बात मे कोई शक नहीं लेकिन इस बात मे भी कोई शक नहीं कि इन मौकों पर दीन का सही इल्म नबी सल्ल. सहाबा को बताया करते थे, न कि सहाबा को जैसा वो कर रहे हों वैसा ही करने देते थे, और फिर सहाबा ए किराम आप सल्ल. के हुक्म की तामील करते थे ....
ज़ाहिर है सहाबा पहले से दीन को नहीं जानते थे, नबी सल्ल. मौके मौके पर यूं ही उन्हें दीन का इल्म देते, भले काम की ताकीद करते और गलत कामों को करने से रोका करते ...
और आज के ज़माने मे अगर हम भावनाओं मे बहकर कुछ गलत करने चलें तो यही अहादीस हमें नबी सल्ल. का हुक्म बताती हैं, .... क्या आपको ऐसा नहीं लगता ??
~ ज़िया इम्तियाज़।
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इरतिदाद की सज़ा।
अभी परसों एक मित्र ने सूडान की इस खबर की ओर ध्यान दिलाया कि वहाँ की एक सजायाफ्ता आठ महीने की गर्भवती महिला अपने बच्चे का जन्म होने का इन्तज़ार कर रही है जिसके बाद उस महिला को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा .... ये भयंकर सज़ा उस महिला को धर्म परिवर्तन कर के मुस्लिम से ईसाई बन जाने के कारण शरीयत कानून के अनुसार सुनाई गई है ...
ये खबर पढ़कर मुझे वाकई दुनिया के मुस्लिमों की हालत पर बड़ा अफसोस हुआ, जिन्होंने दुनिया के सामने इस्लाम की एक ज़ालिम और बेदर्द मज़हब की छवि बनाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी..... जिसके ऐसे दोस्त हो जाएं उसे फिर दुश्मनों की क्या जरूरत ??
इस्लाम मे इरतिदाद यानि धर्म का त्याग करने पर मौत की सज़ा देने का ख्याल बुखारी शरीफ की एक हदीस से बना है कि जो अपना इस्लाम धर्म त्याग दे उसको मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए ... पर किसी के जीवन और मौत के इतने गम्भीर मसले पर केवल हदीस के संक्षिप्त अध्ययन के आधार पर फैसला करना सही नही है ..
क्योंकि इस्लामी ज्ञान का सबसे विश्वसनीय स्रोत पवित्र कुरान है, इसलिए किसी भी हदीस पर कोई निर्णय लेने से पहले ये देखना चाहिए कि कहीं वो हदीस कुरान की शिक्षा से टकरा तो नही रही. क्योंकि यदि किसी हदीस की शिक्षा कुरान की शिक्षा के विपरीत हो जाती है, तो उस हदीस की शिक्षा को दरकिनार करते हुए कुरान की शिक्षा को ही माना जाएगा ॥ अत: हमें ये देखना चाहिए कि स्वधर्म त्याग यानि इरतिदाद के मामले मे पवित्र कुरान क्या हुक्म देता है ?? क्या कुरान पाक मे मुर्तद अर्थात् जिसने इस्लाम का त्याग कर दिया हो, उस के लिए कहीं मौत की सज़ा का हुक्म दिया गया है ??
जब हम कुरान पाक पढ़ते हैं, तो कई जगह इरतिदाद का ज़िक्र मिलता है, जैसे कुरान की आयत 2:217;
3:72,86-87,90;
4:137;
5:54;
16:106;
33:14;
47:25-27;
73:11;
और 74:11.....
पाक कुरान की इन तमाम आयतों मे इरतिदाद का ज़िक्र है,
इनमें हर जगह ये तो लिखा है कि इरतिदाद एक बड़ा पाप है जो भी शख्स इस्लाम का त्याग करेगा, वो अपनी मौत के बाद कयामत के दिन कष्ट भोगेगा...... परंतु ये कहीं नहीं लिखा कि मुस्लिम शासक यानि कोई इंसान उस मुर्तद शख्स को मौत की सज़ा दें .... यानी मुर्तद को दण्ड देने का अधिकार अल्लाह ने मनुष्यों को नहीं दिया है बल्कि ये अधिकार अल्लाह ने अपने पास ही रखा है .....
बल्कि कुरान की तीसरी सूरत , सूरह आले इमरान की आयत 89 पढ़िए, यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो इरतिदाद के बाद फिर मुस्लिम बन गया उसका इरतिदाद का जुर्म माफ हो जाएगा,
खुद देखिए, मुर्तद का वापस मुस्लिम बनना तभी सम्भव है जब वो व्यक्ति जीवित रहे
और ऐसा ही हनफी विचारधारा के मशहूर इस्लामी फुकहा, शम्स अल दीन अल सरक्शी लिखते हैं कि, हालांकि इस्लाम का त्याग एक बड़ा जुर्म है, पर ये अल्लाह और उसके बंदे के बीच का मामला है , और इस जुर्म की सज़ा कयामत के रोज़ के लिए टाल देनी चाहिए
मलिकी विचारधारा के फुकहा अबुल वलीद अल बाजी और बहुत मशहूर हम्बली विचारधारा के फुकहा इब्न तैमिय्याह, इन दोनों का कहना ये ही है कि इरतिदाद ऐसा गुनाह नहीं है जिस पर हद्द की सज़ा ( मौत की सज़ा ) दी जाए .
आज के जमाने मे, दुनिया की शीर्षस्थ इस्लामी शिक्षण संस्था, अल अज़हर युनिवर्सिटी के शेख मरहूम महमूद शलतूत जो कि इस्लामी फिक्ह के अपने गहरे ज्ञान और कुरान की सटीक विवेचनाएं करने के लिए जाने जाते थे, उन्होंने लिखा है कि बहुत सारे इस्लामी विद्वानों की इस बारे मे एक राय है कि हुदूद ( मौत आदि की सख्त सज़ाएं ) एक अकेली हदीस के आधार पर लागू नहीं की जा सकतीं , और धर्म त्याग अपने आप मे मौत की सज़ा के लायक संगीन गुनाह नहीं है . इसी तरह अल अज़हर के वर्तमान शेख डाक्टर मोहम्मद सैयद तान्तवी, जो कि इजिप्ट के ग्रैंड मुफ्ती रह चुके हैं, उन्होंने भी स्पष्ट किया है कि धर्म त्याग मौत की सज़ा के योग्य जघन्य अपराध नहीं है !
तो फिर अब सवाल ये उठता है, कि फिर वो मुर्तद को मौत की सजा वाली हदीस आखिर पवित्र कुरान की शिक्षा से कैसे टकराई ??
अस्ल मे हदीस के साथ ऐसा होता है कई बार वो संक्षेप मे बयान की जाती है या कई बार हदीस कहने और लिखे जाने के बीच में लगभग ढाई सौ वर्षों के लंबे समय अंतराल के कारण हदीस के शब्द एकदम सही सही संचारित नही हो पाते, जिस कारण वो हदीस सम्बन्धित विषय के बारे मे पूरा एवं सही सही ज्ञान नही दे सकती ... इस कारण सम्बन्धित विषय का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक विषय की अनेक हदीसों, एवं विषय पर पवित्र क़ुरआन का भी अध्ययन करना पड़ता है
मुर्तद को मौत की सजा वाली हदीस के बारे में भी यही बात प्रतीत होती है कि इसके शब्द सही से संचारित नही हुए हैं ... इरतिदाद के विषय का विस्तृत अध्ययन करने पर पता चलता है कि केवल उसी मुर्तद को मौत की सज़ा दी जाएगी जो इस्लामी सत्ता के विरुद्ध राजद्रोह करेगा और मुस्लिमों की हत्या करेगा
इसी कारण अनेक इस्लामी विद्वानों, जिनमें इब्न तैमिय्याह, शल्तूत और तान्तवी भी शामिल हैं ... इन सब का कहना है कि मौत की सज़ा एक आम धर्म परिवर्तन के केस मे लागू नही होती,
लेकिन हिराबा के केस मे मौत की सज़ा लागू होगी, हिराबा अर्थात् , जब इस्लाम का त्याग करने वाला व्यक्ति मुस्लिमों और इस्लामी सत्ता के विरुद्ध युद्ध भी छेड़ दे ..... ऐसे व्यक्ति को आज के समय मे भी हर देश मे आतंकवादी कहकर मौत की सज़ा का अधिकारी ठहराया जाता है
लेकिन सूडान की उस महिला ने देश के खिलाफ युद्ध नहीं छेड़ा, बल्कि केवल धर्म परिवर्तन ही किया है, अत: उस इस्लाम का त्याग करने वाली स्त्री को मौत की सज़ा देना एक बहुत ही गलत फैसला है और इस्लाम इस कट्टरता के खिलाफ है ....और सारी इस्लामी दुनिया के विद्वानों को मिलकर इस अमानवीय फैसले को बदलने के लिए सूडान पर दबाव डालना चाहिए केवल निन्दा कर के कोरी संवेदना जताकर एक औरत को यों ही मरने,और उसके होने वाले बच्चे को अकारण ही अनाथ होने नही दिया जा सकता
~ ज़िया इम्तियाज़।
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